Wednesday, November 23, 2016

अरविन्द तिवारी के लेखन से उद्धरण


1.संवेदना तो उनके हृदय में कूट-कूटकर भरी थी, जैसे उनके फ्रिज में शराब और बीयर की बोतलें भरीं थीँ।
2.हमारे देश की हुकूमत गधे की तर्ज पर काम करती है। जब तक समस्या विकराल रूप न धारण कर ले तब तक उसके समाधान के लिए हमारे देश की सरकार लात नहीं उठाती।
3. कविता लिखने के लिए प्रेरणा की आवश्यकता होती है इसलिए आरती से इश्क करना उसकी मजबूरी थी।
4. चुनाव प्रचार उस ऊंचाई पर जा पहुंचा था जिस ऊंचाई पर पहुंचकर अक्सर प्रेमी-प्रेमिका या तो विवाह कर लेते हैं या फिर साथ-साथ आत्महत्या।
5. इस देश में आजादी के बाद जितने भी नेता गरीबों के मसीहा सिद्ध हुए , वे अपने पेशे में असफल होने के कारण ही हुए हैं।
6. नगर पालिका में घोटाला नहीं तो नगरपालिका कैसी।
7. भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है कि किंगमेकर को भी किंग जैसा सम्मान मिल जाता है।
8. बिना उद्घाटन के राजनीति अधूरी है और बिना राजनीति के उद्घाटन दुर्लभ घटना है।
9. इस देश की राजभाषा जो है , वह पुलिस के डंडे से निकलती है। डंडे की भाषा उत्तर में भी समझी जाती , दक्षिण में भी। पूरब में भी और पश्चिम में भी। इसदेश में पुलिस न होती तो हम कैसे साबित करते , कि देश कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक है।
10. जो पत्रकार पत्रकारिता में धुरन्धर हो जाता है, वह अपने से कनिष्ठ पत्रकारों को घास नहीं डालता।
11. राज्य सभा को संसद का पिछवाड़ा कहते हैं।
अरविन्द तिवारी के उपन्यास 'शेष अगले अंक में' से

Monday, November 21, 2016

महाभारत में नोटबंदी

महाभारत काल में द्रोणाचार्य जी बहुत प्रसिद्ध गुरु थे। तमाम राजकुमारों को ट्यूशन पढाने के चलते दूर-दूर तक उनका नाम था। राजकुमारों को ट्यूशन पढ़ाना तो उनकी मजबूरी थी लेकिन इस बात को उन्होंने इस तरह प्रचारित किया कि जो भी उनके यहां ट्यूशन पढ़ता था वो राजकुमार बन जाता था। यह प्रचार आजकल के बड़े-बड़े कोचिंग संस्थानों की तर्ज पर था जिसमें वे लोग हर इम्तहान के टापर को पकड़कर उसका फ़ोटो लगाते हुये उनसे बयान दिलवाते हैं कि उनकी सफ़लता सिर्फ़ उस कोचिंग में पढ़ने के चलते हुयी। कभी-कभी तो एक-एक टापर की सफ़लता के पीछे इतनी कोचिंगों का हाथ सिद्ध होता है कि यह तय करना मुश्किल होता है कि इतनी कोचिंग में आने-जाने में ही दिन में जितने घंटे लग जाते हैं उतने घंटे तो दिन में होते भी नहीं। खैर !
जब सब राजकुमार पढ-लिख गये तो द्रोणाचार्य खाली हो गये। कोई नया काम करने की सोची। पहले तो विश्वामित्र की तर्ज पर लोगों को सीधे स्वर्ग भेजने का काम शुरु करने की सोची । लेकिन फ़िर जब याद आया कि वे राजा त्रिशंकु को स्वर्ग में इंट्री कराने में असफ़ल रहे थे तो उन्होंने विचार छोड़ दिया।
इसके बाद द्रोणाचार्य जी ने अपनी अच्छे ट्यूटर की धाक का उपयोग करते हुये बड़े कोचिंग संस्थान खोले। जैसे आजकल हर शहरों की ’कोचिंग मंडी’ में लाखों बच्चे इंजीनियर/ डाक्टर बनाने की कोचिंग में भर्ती के लिये भागे चले आते हैं वैसे ही द्रोणाचार्य जी के संस्थान में हर साल अनगिनत बच्चे भरती होने के लिये आने लगे। खूब पैसा पीटा उन्होंने। देखते-देखते द्रोणाचार्य जी की गिनती देश के बड़े धनिकों में होने लगी। उनकी सफ़लता के किस्से चलने, दौड़ने लगे।
ऐसे में ही महाभारत का युद्ध शुरु हो गया। युद्ध की बात तो खैर लोगों ने अपने मन से उड़ा दी है। सच में तो उस समय एक बड़ा चुनाव हुआ था। कौरव और पाण्डव पहले एक ही पार्टी में थे। महाभारत का जब चुनाव हुआ तो दोनों में समाजवादी पार्टी की तरह वर्चस्व की लडाई थी इसलिये भाई-भाई एक दूसरे के खिलाफ़ चुनाव प्रचार में जुट गये।
द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों दोनों के गुरु थे। उनके पास जमा पैसे के चलते दोनों उनको अपनी पार्टी में शामिल करना चाहते थे। लेकिन लोकतंत्र में बहुमत के महत्व को विचारते हुये द्रोणाचार्य जी कौरवों की पार्टी में शामिल हो गये और उनके पक्ष में धुंआधार प्रचार करने लगे।
एक दिन ऐसे ही द्रोणाचार्य बीच कुरुक्षेत्र में माइक पर दहाड़ते हुये कौरवों के समर्थन में भाषण दे रहे थे। ऐसे-ऐसे कटाक्ष कर रहेथे पांडवों पर कि उनके हाल बेहाल हो गये। लेकिन कटाक्ष का कोई जबाब न होने के चलते पांडव बेचारे सर झुकाये चुपचाप गुरु जी को बीच मैदान दहाड़ते सुन रहे थे। महाभारत के चुनाव में अपनी लगभग निश्चित पराजय से दुखी हो रहे थे बेचारे पांडव।
उस समय के पांडवों के ’प्रशांत किशोर’ कृष्ण जी ने जब पाण्डवों के ऐसे हाल देखे उन्होंने द्रोणाचार्य की ताकत का कारण पता किया। उनको पता चला कि जब से द्रोणाचार्य जी के पास कोचिंग की कमाई का पैसा आना शुरु हुआ है तब से उनका आत्मविश्वास बहुत बढ गया है। वे ट्रंप की तरह बड़बोले भी हो गये हैं।
द्रोणाचार्य जी की ताकत उनके पास इकट्ठा अथाह पैसे में जानकर कृष्ण जी ने युधिष्ठर को कुछ सिखाकर गुरु द्रोण के पास भेजा। यु्धिष्ठर को अपनी तरफ़ आता देखकर द्रोण जी की आवाज गनगना उठी। वे और तेज आवाज में पाण्डवों के खिलाफ़ प्रचार करने लगे।
युधिष्ठर ने गुरु द्रोण की बातों का कोई जबाब नहीं दिया। सीधे मंच पर पहुंचकर गुरु के चरण छुये और कान में फ़ुसफ़ुसाकर कुछ कहा।
युधिष्ठर ने गुरु के कान में क्या कहा यह उस समय पता नहीं चला लेकिन बाद में तमाम लोगों ने नाम न बताने की शर्त के साथ बताया कि युधिष्ठर ने द्रोणाचार्य के काम में जो फ़ुसफ़ुसाया था उसका लब्बो-लुआब यह था -’ गुरुदेव आप जिन कौरवों के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे हैं उन्हीं कौरवों ने बड़े नोट बंद करने की राजाज्ञा जारी कर दी है। उनको डर है कि कहीं चुनाव के बाद आप अपने पैसे के बल पर जीते हुये प्रतिनिधि खरीदकर खुद राजगद्दी न हड़प लें।’
युधिष्ठर की बात सुनते ही पहले गुरु द्रोण का दिल बैठ गया, इसके बाद उनकी आवाज और अंतत: वे खुद भी बैठ गये। एक बार जो बैठे तो फ़िर दुबारा उठ नहीं पाये।
विमुद्रीकरण के झटके न सह पाने के चलते हुई यह संभवत: पहली मौत थी।

एटीएम मल्लब एक ट्राई और मारो




आजकल एटीएम के चर्चे जोरों पर हैं। लाइनें लगी हुईं हैं। देखकर लगता है कि देश वाकई अपने पैरों पर खड़ा हुआ है। लिखते-लिखते लव हो जाने की तर्ज पर ’लगते-लगते लव हो जाने’ की खबरे भी आ रही हैं। अकेले गये थे लाइन में लगने लेकिन लौटते हुये लक्ष्मी लेकर लौट रहे हैं। यह चलन बढा तो आगे ऐसी शादियां ’एटीएम शादी’ के नाम से जानी जायेंगी।

एटीएम पैसा निकालने की मशीन है। पहले पैसा बैंक से निकलता था। लोग बैंक जाते थे। टोकन लेते थे। लोगों से बतियाते थे। गपियाते थे। देखने, घूरने, आंखे लड़ाने के सिलसिले भी इसी बहाने हो लेते थे। दावत के ’पंगत सिस्टम’ सरीखा था बैंक से पैसा निकालने का काम । एटीएम आने के बाद पंगत सिस्टम ’बुफ़े सिस्टम’ में बदल गया। एटीएम खाने की मेज की तरह पैसे की खड़ी ठेलिया में बदल गये हैं। आओ , पिन दबाओ, जित्ता मन चाहे पैसा ले जाओ।

एटीएम का मतलब तो आटोमेटेड टेलर मशीन होता है। लेकिन हम इसे ’आल टाइम मनी’ मशीन समझते हैं। इधर पैसे के लिये लोग एटीएम दर एटीएम भटक रहे हैं। उनके लिये एटीएम का मतलब हौसला बढाने की मंशा से ’एक ट्राई और मारो’ हो गया है। किसी और एटीएम पर लाइन लगाओ। क्या पता पैसा निकल ही आये।

एटीएम एक तरह से पैसे के छोटे-छोटे बांध हैं। चंचला लक्ष्मी के की सरपट गति को रोकने के लिये जगह-जगह बने स्पीड ब्रेकर हैं। यहां पैसा निकलने के पहले जरा तसल्ली से बैठकर सुस्ता लेता है।

एटीएम पर कुछ और बात करने के पहले हम यह बता दें कि दुनिया में भले एटीएम आज शुरु हुये हों लेकिन अपने भारत दैट इज इंडिया में दुनिया का हरकाम सबसे पहले हो चुके होने की तर्ज एटीएम का चलन बहुत पहले से था। हमारे मंदिर, मठ धन संपदा के एटीएम ही तो थे। खूब पैसा जमा होता था। जिसको भी पैसा चाहिये होता था वो मंदिर पहुंचकर पैसा निकाल लेता था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ वाले एटीएम से कई बार पैसा निकालने की कोशिश की थी। जब कई तरह के पिन फ़ेल हो गये पैसा नहीं निकला तो बेचारे ने शाश्वत एटीएम -लूटपाट का प्रयोग किया और पैसा लेकर चला गया। आजकल जो लोग एटीएम लूटकर ले जाते हैं वे महमूद गजनवी की परम्परा के सच्चे वाहक हैं। मशालची हैं लूटपाट की मशाल मशाल को सुलगाते हुये आगे बढ़ाने का काम के।

आज एटीएम के सामने लम्बी-लम्बी लाइनें लगी हुई हैं। लोग पैसा निकालने के लिये लगे हुये हैं। पैसा आ नहीं रहा है। लोग इंतजार में लगे हुये देश दुनिया के दीगर मसायल सुलटा ले रहे हैं। देवी-देवताओं की भी चांदी है। लोग तरह-तरह की मनौती मान रहे हैं आज पैसा निकल आया तो प्रसाद पक्का, सौ के नोट निकल आये तो लड्डू भोग। यमराज की दुकान भी खूब गुलजार हो रखी है।

कामगारों को नये तरह का काम मिला है। लाइन में लगने के पैेसे मिल रहे हैं। मनरेगा की तर्ज पर धनरेगा चल रहा है। बड़े-बुजुर्गों की पुराने बर्तनों को धोने-पोंछकर प्रयोग करने की तर्ज पर लाइनों में लगाया जा रहा हैं।

लोग एटीएम को सिर्फ़ पैसा निकालने की मशीन के रूप में जानते हैं। लेकिन इसके कई दीगर व्यवहारिक उपयोग किये जा सकते हैं। कुछ इस तरह के हो सकते हैं:

१. एटीएम स्थल प्रेम, मोहब्बत के नये ठीहे की तरह प्रयोग किये जा सकते हैं। एटीएम पर हुआ प्रेम ’एटीएम प्रेम’ और उससे हुई शादी एटीएम शादी के नाम से जानी जायेगी। ’एक्सिस शादी’ , ’ एसबीआई प्रेम’ जैसे फ़ैशन सुनने में आयेंगे।

२. एटीएम पर हुई भीड़ का उपयोग सभाओं के रूप में करने का चलन शुरु हो सकता है। आसपास माइक लगाकर जब मन चाहा भाइयों, बहनों शुरु हो सकता है। एक ही एटीएम पर विरोधी दलों की सभाओं में भाइयों-बहनों से हुई शुरुआत मां-बहन की ऊंचाइयों तक पहुंच सकती है।

३. लोग अपनी किताबों का विमोचन किसी लम्बी लाइन एटीएम के सामने करके कहकर कह सकते हैं -खचाखच भीड़ में विमोचन के बाद किताब खरीदने के लिये लाइन में लगे लोग।

४. एटीएम टूरिज्म की नई संभावनायें तलाशी जा सकती हैं। विदेश से आये लोगों को शहर में लगी एटीएम लाइने दिखाने के लिये बसें चलवाई जा सकती हैं। उनको बताया जा सकता है -यही असली भारत है।

५. एटीएम ट्यूशन का चलन शुरु हो सकता है। बच्चे स्कूल से लौटते ही अपना कार्ड लेकर एटीएम की लाइन में लग जायेंगे। टीचर बाहर कुर्सी पर बैठा-बैठा उनको सबक सिखाता रहेगा। जब नम्बर आ गया तो बच्चे अपना पिन दबाकर एटीएम बैलेन्स चेककर वापस लौट जायेंगे। जिनका पाठ पूरा नहीं हुआ होगा वे फ़िर से लाइन में लग जायेंगे।

६. लाइन में लगे-लगे अंग्रेजी सिखाने वाले एटीएम अंग्रेजी लर्निंग सेंटर चलन में आ सकते हैं। लाइन में लगते की सूचना मोबाइल से भेजते ही पिज्जा की तर्ज पर लोग अंग्रेजी ’डिलिवरी बालक’ निकल पड़ेंगे। उधर आदमी लाइन में लगा इधर अंग्रेजी की ड्रिप लगी। लाइन से बाहर आने तक दो-चार अंग्रेजी के शब्द तो सीख ही जायेगा।

७. एटीएम कवि भी चलन में आयेंगे। जिस भी कवि की कविता मुकम्मल हुई वह मुकर्रर, इरशाद की आश में किसी एटीएम की तरफ़ चल देगा। जहां पैसा जल्दी निकलता है वहां ’एटीएम आशु कवि’ और देरी वाले एटीएम पर ’एटीएम प्रबन्ध कवि’ पहुंचेंगे। मोबाइल एटीएम पर ’वनलाइनर’ लिखने वालों की लाइन मिलेगी।

८. आगे चलकर नायक-नायिका ए.टी.एम. के दरवाजे पर भिड़ जायेंगे और अन्धे हो दिखता नहीं, गुस्से में बड़ी हसीन लग रही हो से शुरू करके एक-दूजे के लिये होने का सफ़र तय किया जायेगा। इसे ए.टी.एम. प्यार के नाम से जाना जायेगा और साहित्य में इस तरह की कहानियों, कविताओं,लेखों को ए.टी.एम. युग का साहित्य माना जायेगा।

९. एटीएम पर खड़े लोगों को इनाम भी शुरु हो सकते हैं। एटीएम रत्न, एटीएम भूषण, एटीएम श्री की शुरुआत हो सकती है। एटीएम पर लगे-लगे दुनिया से निकल लेने वालों को ’एटीएम शहीद’ की उपाधि से विभूषित किया जा सकता है। क्या पता कोई शायरान अंदाज में जाते हुये कहकर जाये:

कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों
अब तुम्हारे हवाले ये एटीएम साथियों।

१०. एटीएम पर रोजगार के नये अवसर उपलब्ध होंगे। चाय, पान, खोमचे वाले लाइन के बाहर और जेबकतरे लाइन में लगे हुये अपनी दिहाड़ी कमायेंगे। शहरों में जाम के लिये ’जेबकतरे- उस्तादों’ का स्टेशन , बस अड्डे जाना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में वे घर के पास के ही एटीएम पर जेब काटना सिखा सकते हैं।

११. ए.टी.एम. के उपयोग से आप एक नयी शब्दावली का चलन होगा। नये मुहावरे गढ़ सकते हैं। कोई अपने बास को कोसते हुये कह सकता है- हमारा बास हमको ए.टी.एम. समझता है, जब मन आता है ए.टी.एम. कार्ड की तरह हुकुम ठूंस कर काम निकाल लेता है।
१२. भविष्यफ़ल बांचने वाले लोगों की भाषा में एटीएम शब्दावली घुसपैठ करेगी। वे कहेंगे- ’आज सौ के नोट निकलने का संयोग है। आपके एटीएम पिन चोरी का खतरा है संभलकर रहें। परिश्रम करेंगे लेकिन नंबर आते-आते पैसा खत्म हो जायेगा। भाग्य तगड़ा है आपकी लाइन में आगे लगे आदमी का कार्ड खराब होने के चलते पैसा नहीं निकल पायेगा और आखिरी दो हजार का नोट आपको ही मिलेगा। कोई महिला ’प्लीज, हमको पहले निकाल लेने दीजिये कहकर, एटीएम का आखिरी नोट निकाल ले जायेगी और आप भले आदमी का तमगा और महिला का ’थैंक्यू भाई साहब’ लेकर एटीएम दर एटीएम भटकते फ़िरेंगे।

१३. समय के साथ कागजी मुद्रा चलन से बाहर से होती जायेगी। ऐसे में ए.टी.एम. युग का अवसान होगा। तब ए.टी.एम. कम्पनियां अपनी ए.टी.एम. खोखों को दूसरे काम के लिये इस्तेमाल करने लगेगीं। सुलभ शौचालय की तर्ज पर सम्भव है सुलभ शीतालय चालू हो जायें जहां लोग घंटे-आधे घंटे के लिये अपनी शरीर और जेब की गर्मी निकाल सकें।

इतने व्यवहारिक उपयोग हमने अपने अनुभव से बताये। अब आप भी कुछ अपने अनुभव साझा करिये। तब तक हम जरा पास के एटीएम तक होकर आते हैं। क्या पता पैसा आया हो वहां। उसके आगे भी क्या पता उसमें से पैसे भी निकल आयें। लेकिन सबसे बड़ा क्या पता तो ये होगा कि ’क्या पता निकलें पैसों में कुछ नोट सौ के भी हों।’

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Friday, November 18, 2016

पैसा सिर्फ़ पैसा है जिन्दगी थोड़ी है।



आर्मापुर से निकलते हुये नजर अपने-आप यूको बैंक के एटीएम के बाहर लगी लाइन पर जाती है। सुबह आठ बजे ही 25-30 आदमी लग लिये थे। सबसे आगे खड़े लोग चैनल से चिपककर ऐसे खड़े थे जैसे दीवार पर छिपकली। मन किया गाड़ी रोककर अपन भी लाइन में लग जायें। बैंक खुलते ही आधे घंटे में नम्बर तो आ ही जायेगा। लेकिन फ़िर लगे नहीं। एक दिन की छुट्टी लेकर 2000 रुपया निकालने लायक स्थिति अभी आई नहीं।
ओ एफ़ सी के पास मांगने वाली महिला अब फ़िर वापस आ गयी है। बीच में वह कहीं चली गयी थी शायद ! टाटमिल चौराहे पर गाड़ी रुकते ही साफ़ करने के लिये लपकने वाले लोग भी अब फ़िर दिखने लगे हैं। इसका नोटबंदी और छोटे नोट की उपलब्धता से कोई संबंध है कि नहीं -पता नहीं।
जरीब चौकी के आगे के तीन-चार एटीएम पूरी तसल्ली से गुलजार हैं। लोग धूप खाते, बतियाते, अखबार बांचते, इधर-उधर बेमतलब ताकते लाइन में लगे हुये हैं। लाइन सड़क तक आकर अपने-आप किसी न किसी आकार में मुड-तुड़कर फ़िर एटीएम की तरफ़ पलट जाती है। एटीएम की आकर्षण शक्ति जबरदस्त है। लोगों को अपनी तरफ़ खींच लेता है।
दफ़्तर पहुंचते ही नोटबंदी के अनगिनत किस्से सुनने को मिलते हैं। ज्यादातर सुने-सुनाये। लेकिन सहज लगते हैं। लोग कहते मिलते हैं:
1. पांच सौ का नोट चार सौ में और हजार का नोट आठ सौ में धड़ल्ले से चल रहा है।
2. उसने अपने सब मजदूरों को छह-छह महीने की तन्ख्वाह एडवांस में बांट दी। सब पांच सौ-हजार के नोट निकाल दिये।
3. नौ लाख की गाड़ी अभी कल लाये हैं हमारे पड़ोसी। सब हजार-पांच सौ के नोट। सब चल रहे हैं।
4. जनधन वाले सब खाते पर 500/1000 के नोट से भरे जा रहे हैं।
5. हफ़्ते भर में सब ठीक हो जायेगा।
6. अरे अभी महीनों लगेगा हाल ठीक होने में। दो-चार दिन ऐसे ही रहा तो बवाल होगा कहीं। अभी ही 40 आदमी मर चुके हैं लाइन में लगे-लगे।
7. अब देखना प्रेस में शादी के कार्ड छपवाने वाले भीड़ लगायेंगे। कार्ड दिखाकर ढाई लाख निकालकर शादी की तारीख आगे बढ़वा देंगे।
इसी तरह की और बातें दिन भर सुनते रहते हैं। जैसे कभी रामजी वन-वन भटकते हुये खग-मृग-मधुकर से सीता के बारे में पूछते फ़िरे थे वैसे ही पैसा निकालने वाला इंसान एटीएम-दर-एटीएम भटक रहे हैं। जिधर लाइन छोटी दिखी लग लिया। मिल गया पैसा तो ठीक नहीं तो अगली में लग लिया। जिसका पैसा नहीं निकला वह याद करता है--’असफ़लता बताती है कि सफ़लता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया’ इसके बाद फ़िर पुरे मन से दूसरी लाइन में लग जाता है।
जिसका पैसा निकल आता है उसके चेहरे पर वीरता के भाव अपने-आप लपक के बैठ जाता है। घर वाले बलैया लेते हैं। यार-दोस्त पार्टी की मांग करते हैं। एटीएम से पैसा निकालना सबसे बड़ा पुरुषार्थ हो गया हो गया।
काले धन की नकेल कसने के लिये उठाये गये कदम धड़ल्ले से नये तरह का काला धन बना रहे हैं। पांच सौ का कागज का टुकड़ा चार सौ रुपये में चल रहा है। कोई बताये कि इसमें काला धन सौ का हुआ कि पांच सौ का? बंद नोटों से खरीदी गयी नौ लाख की गाड़ी मोटरवाले के पास काले धन के रूप में मानी जायेगी कि सफ़ेद धन की।
लगता है काले धन से खुद को सफ़ेद करने के लिये जगह-जगह पार्लर लगा रखे हैं। सबमें धड़ल्ले से काम हो रहा है। काला धन मुस्करा रहा है। सफ़ेद धन कराह रहा है। उसका काम बढ गया है। कई बार इधर से उधर होते-होते उसका पोर-पोर दर्द कर रहा है। हड्डी-पसली एक हो रही है।
जिसका हजार का नोट आठ सौ में चल जाता है उसके चेहरे ख़ुशी देखकर उस बाप की याद आती है जिनका शर्तिया फेल होने वाला बच्चा 80% नम्बर पाकर सम्मान सहित उत्तीर्ण होता है।
इस सबसे बेखबर हमारे पंकज बाजपेयी जी हैं। वे अपनी जगह पर खड़े रोज मिलते हैं। कहते रहते हैं-’ कोहली को पकड़वाइये। वह रैकेट चला रहा है। गलत काम कर रहा है। कनाडा से लोग आये हुये हैं।’
हम चलते हैं दफ़्तर। तब तक आप मजे करिये। लाइन में लगें हों तो पानी की बोतल ले जाना मत भूलिये। धक्का मुक्का मत करिये। पैसा सिर्फ़ पैसा है जिन्दगी थोड़ी है। मिल जायेगा देर-सबेर। ठीक न !

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209691882227292

Tuesday, November 15, 2016

हाल तो बेहाल हैं ही

दफ्तर जाते हुए देखा यूको बैंक के एटीएम के बाहर लाइन लगी है। एटीमएम अभी खुला नहीं है। एटीम से शुरू हुई लाइन सड़क तक पहुंच गयी है।
रास्ते में कई जगह एटीम की लाइनें दिखीं। कोई अंगेजी के आई (I) की तरह,कोई एल (L) के आकार में। कहीं-कहीं एल मुड़कर यू (U) या फिर एस ( S ) नहीं तो (Z) के आकार में बदल गयीं लाइनें भी दिखीं। क्षण-क्षण रूप बदलती लाइनें भगवान की लीला की तरह दिखीं। अंग्रेजी सिखाने वाले स्कूल अपने बच्चों को इन लाइनों को दिखाते तो बच्चे अंग्रेजी के अक्षर फ़ौरन पहचान कर फर्राटे से गलत अंग्रेजी बोलना सीख जाते।
सुबह का समय था सो लोग तसल्ली से लाइन में लगे हुए थे। धूप गुनगुनी थी। लोग मुफ़्त की विटामिन डी लेते हुए एटीएम खुलने का इंतजार कर रहे थे जिस तरह अपने देश की धर्मभीरु जनता किसी अवतार का इंतजार करती है कि वह अवतार लेकर आये तो उनके कष्ट कम हों।
दफ़्तर में सुबह से ही लोग बाहर जाने के लिए परेशान दिखे। लोगों के घरों में पैसा नहीं है। एटीएम में जाकर लाइन लगाएंगे। क्या पता पैसा मिल जाए। खबर यह थी कि पास के एटीएम में पैसा है। देर हुई तो ख़त्म हो जायेगा। बाहर जाने की अनुमति मिलने में देरी के साथ उनकी चिंता और गुस्सा बढ़ता जा रहा था। जिसको जाने की अनुमति मिली वह उसको देखकर अंदाज लगाया जा सकता था कि तरकश से तीर और बन्दूक से गोली निकलते हुए कैसे निकलती है।
जो पैसे निकाल पाये एटीएम से उनके चेहरे पर विजेता का गर्व पसरा हुआ था। क्या पता शाम को घर जाकर गाना भी गायें हों:
हम लाएं एटीएम से नोट निकालकर
पैसे को खर्च करना बच्चों संभालकर।
जिनके पैसे नहीं निकल पाये वे दुख चेहरे पर पोते दूसरे एटीएम की तरफ बढ़ गए और लाइन में लग गए।
आराम तलबी के लिए बदनाम बैंक वाले बेचारे दिन रात जुटे हैं नोट बदलने, जमा करने में, नकदी देने में। सुबह से देर रात तक काम करते हुए।लोग अपनी परेशानियों में ही इतने व्यस्त हैं कि इनकी मेहनत की अनदेखी करते हुए अपनी ही कठिनाइयों का भोंपू बजाये जा रहे हैं।
टेलीविजन पर पैसे के लिए मारपीट, लाइन में लगने के चलते मौत और इसीतरह की खबरें आ रहीं हैं। ऐसा लगा रहा है जैसे पूरा देश भयंकर परेशानी से जूझ रहा है। कई फुटकर दुकानदारों की आमदनी एकदम ठप्प हो गयी है। लेकिन लोगों में उतना आक्रोश नहीं जितना विपक्षी दलों के नेताओं की आवाज में है। नेता जनता की आवाज को कई गुना बढाकर बोलता है।
कल पुस्तक मेले में भी गए। पता चला पुस्तक मेला फ्लॉप हो गया। राजकमल प्रकाशन को छोड़कर किसी के पास इलेक्ट्रानिक भुगतान की व्यवस्था नहीँ थी। बाकी जगह किताबें केवल देखकर और राजकमल से खरीदकर वापस लौट लिए।
एक बेकरी से कुछ सामान लेना था। उसके पास भी इलेक्ट्रानिक भुगतान की व्यवस्था नहीं थी। लाखों की बिक्री है महीने की। लेकिन ई पेमेंट की सुविधा नहीं। बिल भी नहीं देते लेते। टैक्स चोरी के अलावा दूसरे और भी कारण होंगे। ऐसा ही गड्डमड्ड समाज है अपन का।
जो ठेकेदार फैक्ट्री का काम करते है ठेके पर उसके पास अपने कामगारों को देने के लिए पैसे नहीं हैं। 100 लोग काम करते होंगे , 300 रूपये रोज भी धर ली जाए मजदूरी तो हफ्ते की दो लाख रूपये से ऊपर के नोट चाहिए उसको। नकद भुगतान ही होता है ज्यादातर। रूपये न निकल पाने के चलते काम ठप्प भले न हो लेकिन हाल तो बेहाल हैं ही।
एटीएम से फटाफट पैसे निकलने की आदत हो गयी है अपन को। घर में पैसे नहीं रखते लोग। कभी वो दिन भी थे जब आधा दिन तक लगता था रुपये निकालने में।
कुछ दिन वैसा ही सही।
बैंक के लोगों से बात होती है तो उनका कहना है कि जल्दी ही स्थिति सामान्य होगी। कुछ दिन लगेंगे बस।
फ़िलहाल तो इंतजार है कि जल्द ही नोट संक्रमण का यह समय जल्दी समय जल्दी विदा हो। नए-नवेले नोट आएं और हालात को ठीक बनाएं। इस बीच कमखर्च करके काम चलायें।
आप मजे करिये। तब तक हम दफ़्तर होकर आएं।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209667600260258

Sunday, November 13, 2016

न से नमक

दो दिन पहले कई जगह नमक ’ब्लैक’ में बिका। नमक को लगा होगा कि जब धन काला हो सकता है तो नमक क्यों नहीं। लोकतंत्र में काला होने का सबको बराबर हक है। फ़िर क्या , नमक भी ब्लैक होने के लिये मचल गया। नोट के लिये लाइनों में लगे लोग नमक की लाइनों में लग गये। लोकतंत्र बचाये रखने के लिये लाइन जरूरी है। लाइन चाहे वोट देने के लिये हो या फ़िर नोट बदलने के लिये। नौकरी के लिये हो या फ़िर नमक के लिये। हो किसी की लाइन लेकिन लाइन लगनी चाहिये। लाइन है तो लोकतंत्र है। लाइन टूटी, लोकतंत्र दरका। लाइन लोकतंत्र की ’लाइफ़ लाइन’ हैं।

नमक तो देश में इफ़रात है। फ़िर भी इसकी कमी की अफ़वाह फ़ैल गयी। 20 रुपये का नमक 400 रुपये तक बिक गया। ’नमक ब्लैक’ के पैकेज के साथ धक्कम मुक्का, गाली-गलौज, पारपीट मुफ़्त में। परेशानी का ’मेक बाई जनता’ था नमक का ब्लैक होना।

नमक मामले में बातचीत करने के लिये एक ठेलुहा मित्र मिल गये। वे न नोट बदलने के लिये लाइन में लगे थे नमक लेने की कतार में। आइये देखिये उनसे हुये सवाल-जबाब:

सवाल: ये नमक के लिये भगदड़ का क्या कारण है यार जबकि नमक तो इफ़रात है देश में ?
जबाब: नमक के लिये लाइन लगाकर जनता ने एक बार फ़िर से अपनी ताकत दिखा दी कि परेशान होने के लिये वह किसी बाहरी सहातया की मोहताज नहीं है। परेशानी के मामले में जनता खुदमुख्तार है। स्थानीय स्तर पर परेशान होकत जनता ने ’लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण’ टाइप करके दिखा दिया। गांधी जी के सपनों को पूरा किया जनता ने।
सवाल: लेकिन जिस चीज की कमी नहीं है उसके लिये गाली-गलौज, मारपीट, लूटपाट करने का क्या मतलब है?
जबाब: यह तो जनता द्वारा संविधान के जनता संस्करण में आस्था व्यक्त करने का तरीका है। नमक के लिये गाली-गलौज, मारपीट, लूटपाट करने वाले लोगों ने अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का प्रयोग किया। अपनी रोजी-रोटी के लिये कहीं भी जा सकने के अधिकार का प्रयोग करके लोग नमक के दुकानों में घुस गये। ब्लैक में बेंचकर मांग और आपूर्ति के मूल सिद्धांत की पुष्टि की दुकानदारों ने।
सवाल: लेकिन जिनके घरों में नमक इफ़रात था वे भी क्यों नमक की लाइन में लग गये यार?
जबाब: अब यार आदत भी कोई चीज होती है न! जनता को आदत हो गयी है लाइन में लगने की। इसलिये नोट की लाइन से निकला आदमी नमक की लाइन में लग गया। लाइन में लगने का अभ्यास बना भी रहना चाहिये। कल को अगर पानी के लिये लाइन में लगना पड़ा, हवा के लिये कतार बनानी पड़ी तो अभ्यास काम आयेगा न! अभ्यास बहुत जरूरी है लोकतंत्र में जीने के लिये। लूटने वाले को लूटने का अभ्यास, लुटने वाले को लुटने का अभ्यास, पीटने वाले को पीटने की प्रैक्टिस तो पिटने वाले को पिटने की आदत बनी रहनी चाहिये। व्यवस्था बनी रहने से सुकून बना रहता है!
सवाल: लेकिन इससे अरहर की दाल, टमाटर, प्याज जैसे वीआईपी आइटम बड़ा बुरा महसूस कर रहे होंगे? उनमें दहशत हो रही होगी कि कहीं वे ’मंहगाई के मार्गदर्शक मंडल’ में तो नहीं ठेल दिये गये।
जबाब: इसमें सनीमा की साजिश है। तुमको याद होगा कि शोले पिक्चर में जब गब्बरसिंह सांभा के डायलाग –’सरदार आपका नमक खाया है’ के जबाब में कहता है न - ’तो अब गोली खा।’ तो जनता जब एटीएम से खाली हाथ लौटी तो उनको लगा होगा कि बैंक एटीएम ने पैसे न देकर उनको ’गोली’ दी है। तो उन्होंने सोचा होगा कि अब जब ’गोली’ मिल ही गयी तो नमक भी ले लिया जाये। वर्ना क्या पता गब्बरसिंह नाराज होकर फ़िर रात के बारह बजे हल्ला मचाये - ’रामगढ़ वालों तुमने ’गोली’ खा ली लेकिन नमक क्यों नहीं खाया?’ इसी चक्कर में वे नमक की लाइन में लग गये होंगे। उसी से भभ्भड़ मच गया। हिट पिक्चरों के साइड इफ़ेक्ट हैं ये सब। शोले में अगर सांभा गब्बर की दाल पिये होता तो दाल की दुकाने लुटतीं।
सवाल: लेकिन जिस तरह नमक जैसी इफ़रात में उपलब्ध चीज के बारे में बवाल देखकर डर नहीं लगता तुमको?
जबाब: यही तो हमारी ताकत है यार! हमारी खासियत है यह कि हमारे सामने कोई भी समस्या आ जाये हम अगले दिन उससे बड़ी दूसरी समस्या पैदा करके उस पहली समस्या का टेटुआ दबा देते हैं। बुखार और दिल के दौरे में आदमी पहले दिल के दौरे को का इलाज करवाता है न! इसी तरह बेरोजगारी, मंहगाई, कालाबाजारी, धार्मिक कट्टरता से निपटने के तरीके हैं ये अपन के। ये तो शाश्वत साथी हैं अपन के। ये तो घर के लोग हैं। ये हैं तो हम हैं। ये निपटे तो हम भी निपट गये। छोटी लकीर को मिटाने की जगह जैसे बड़ी लकीर खींचनी पड़ती है न! वैसे ही इन समस्याओं छोटा बताने के लिये इनसे बड़े दुश्मन पैदा करने पड़ते हैं और उनको निपटाते रहना पड़ता है। वो शेर है न :
पहले पागल भीड़ में शोला बयानी बेचना
फ़िर जलते हुये शहरों में पानी बेंचना।
नयी समस्या पैदा करते रहना और उनके हल खोजना ही आज के समय का सच है। जो नयी समस्यायें पैदा नहीं कर सकता वह आज के समय में प्रगति नहीं कर सकता। हमें हर समस्या का अपने लिये धनात्मक उपयोग करना आना चाहिये।
सवाल: इस समस्या का क्या धनात्मक उपयोग किया जा सकता है?
जबाब: इस समस्या के बहाने बच्चों को वर्णमाला सिखाई जा सकती है। व्यवहारिक ज्ञान दिया जा सकता है। बच्चों को नमक के लिये लंबी लाइन दिखाकर बताया जा सकता है – ’बेटे ये लाइन लगी है वह नमक के लिये लगी है।’ नोटवादी युग में भी बच्चों को बताया जा सकता है कि ’न से नोट’ ही नहीं होता सिर्फ़। ’न से नमक’ भी होता है।
बातचीत और होती तब तक उनके घर से आवाज आई-’अरे एटीएम लेकर लाइन में लगो जाकर। क्या पता आज नोट निकल ही आयें।’
हम भी अपने दोस्त के साथ-साथ लाइन में लगे हुये मुफ़्त की विटामिन डी ग्रहण करते हुये एटीएम खुलने का इंतजार कर रहे हैं। लाइन बढ़ती जा रही है।


Tuesday, November 08, 2016

हम लायें इन किरणों को धुंध से निकालकर



आज सुबह निकले तो देखा सूरज भाई आसमान पर विराजमान थे। चेहरा अलबत्ता कुछ झटक गया सा लग रहा था। थोड़ा कुम्हलाया हुआ। देखते ही जिस तरह के भाव चेहरे पर आये उनके उससे लगा कि बस अब गाना गाने ही वाले हैं:
हम लायें इन किरणों को धुंध से निकालकर
इनको रखना तुम धूल-धुयें से संभालकर।
सड़क पर एक रिक्शे में बैठे बच्चे स्कूल जा रहे थे। उनके बैग लटके हुये रिक्शे के किनारे। रिक्शा वाला उचक-उचककर रिक्शा चला रहा था। धूप बेचारी उसकी मेहनत देखकर खिलने में सकुचा रही थी।
आर्मापुर गेट तक आते-आते ख्याल आया कि बताओ पांच आदमियों के बैठने की जगह वाली गाड़ी में हम अकेले जाते हैं। चार आदमियों का प्रदूषण बेफ़ालतू फ़ैलाते हैं। कुछ ऐसा जुगाड़ करें कि चार सवारी आर्मापुर गेट से झकरकटी तक या टाटमिल चौराहे तक बैठा लिया करें। प्रति व्यक्ति कुछ प्रदूषण ही कम करें। विकसित देशों की तरह हम भी अपना आने-जाने का समय डाल दिया करें नेट्पर । जिसको चलना हो साथ में वो चला चले।
लेकिन फ़िर तमाम बवाल याद आये तो इरादा दिमाग में ही दफ़ना दिया। जलाया नहीं। जलाने में धुंआ उड़ता है न ! कूड़ा जलाना मना है न स्मॉग के चलते। दफ़नाने से धुंआ नहीं होता।
विजयनगर चौराहे पर तमाम कौवे पता नहीं क्यों चक्कर काट रहे थे। आसमान में। महाकवि भूषण की मूर्ति के ऊपर सीने तक अनेक इश्तहार चिपके हुये थे। क्या पता महाकवि मन में कहते हों:
इस प्रदूषण को गरियाऊं कि
गरियाऊं चौराहे के जाम को।
फ़जलगंज जाते हुये एक आदमी बाल्टी में पाने भरे जा रहा था। दिन शुभ होगा ऐसा लगा। लेकिन सुबह बेजान दारूवाला ने लिखा था हमारी राशिवालों के लिये कि नये कपड़े पहनकर जायेंगे। वो तो नहीं हुआ। फ़िर यह पानी-सगुन भी क्या पता गच्चा हो।
पंकज बाजपेयी आज कुछ शान्त दिखे। कुछ कपड़े और पहन लिये हैं उन्होंने। उनसे कुछ और बात हो तब तक पीछे से आती बस ने हार्न दिया और हम आगे बढ़ गये।
झकरकटी पुल पर एक गाड़ी को ओवरटेक किये तो सामने से आते मोटरसाइकिल सवार को थोड़ा देरी सी हुई। उसने हेलमेट के अंदर से ’अंखियों से गोली मारे’ वाले अंदाज में मुझे देखा। हाथ से इशारा करते हुये पूछा- ’बड़ी जल्दी है क्या भाई?’ हमें लगा कि पुल पर ओवरटेक करना ठीक नहीं। लेकिन यह अकल तब आई तब ओवरटेक कर चुके थे। जित्ती तेजी से आई उत्ती तेजी से ही फ़ूट भी ली।
टाटमिल चौराहे के आगे एक मोटरसाइकिल सवार तेजी से पीठ पर बस्ता लादे चला जा रहा था। उसका हेलमेट उसके दायें हाथ में लटका हुआ था। लगता है उसको भरोसा था कि अगर कहीं दुर्घटना हुई तो हेलमेट फ़टाक से पहन लेंगे। हेलमेट हाथ में धारण करके चलने वाले सर पर कफ़न बांधकर चलते हैं।
मोड़ पर मट्ठे वाला खड़ा था। मट्ठा 12 रुपये ग्लास। हमें लगा मंहगाई बहुत बढ गयी है सच्ची में। 2011 में हम आठ 11 रुपये में पूरा खाना खाते थे। विजयनगर के एक ढाबे में। लेकिन फ़िर याद आया कि आज भी तो 10 रुपये में कैंटीन में पूरा खाना खाते हैं। इसलिये मंहगाई की बात हमने छोड़ दी और सीधा फ़ैक्ट्री में जमा हो गये जहां का हम नमक खाते हैं।
नीचे फ़ोटो जीटी रोड की नर्सरी की
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Monday, November 07, 2016

छठ पूजा का आयोजन

आज सबेरे जरा टहलने निकले। बाहर देखा सूरज भाई अभी तक हाजिर नहीं हुये थे। मन किया अब्सेंट लगा दें लेकिन फ़िर नहीं लगाई। उजाला उनके पायलट के रूप में कायनात में पसरा था। मतलब आयेंगे, भले ही थोड़ी देर से।
एक कुत्ता अपनी पूंछ को झंडे की तरह फ़हराता हुआ सड़क पर खड़ा था। हमारी तरफ़ ही देख रहा था मानो हमको सलामी दे रहा हो। हमको अपनी तरफ़ देखकर पूछ ’टाटा, बॉय-बॉय मुद्रा’ में हिलाई और निकल लिया।
आगे तीन मोर सड़क पार करते हुये दिखे। एक के पीछे एक ठुमकते हुये मोर ”तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर" वाले पोज में चले जा रहे थे। सड़क की इस तरफ़ के कूड़े के ढेर को छोड़कर उस तरह के कूड़े की तरफ़ लपकते हुये मोर अपनी फ़ोटो अगर फ़ेसबुक पर लगाते तो ’हाऊ क्यूट, हाऊ स्वीट’ घराने की तमाम टिप्पणियां मिलतीं।
नहर के किनारे छठ पूजा का आयोजन हो रहा था। लोगों की भीड़ पूजा के लिये उमड़ी हुई थी। सामने से लोग डलिया में फ़ल, पूजा सामग्री लिये चले आ रहे थे। कुछ सर पर धरे थे। पूजा करके लौटती महिलाओं के माथे से नाक तक सिंदूर चमक रहा था।
पूजा स्थल के पहले ही दोनों तरफ़ गाडियों की कतार लगी थी। पूजा का द्वार सजा हुआ था। लाउड स्पीकर व्यवस्था बनाये रखने का अनुरोध हो रहा था। अन्य उद्घोषणायें भी हो रहीं थीं। गेट के पास ही मांगने वाले भी हथेली फ़ैलाये बैठे थे।
नहर के किनारे लोगों की भीड़ जमा थी। पूजा कर थी। प्रसाद पा रही थी। हंस रही थी। खिलखिला रही थी। दोने में प्रसाद ग्रहणकरके दोना वहीं सड़क पर फ़ेंककर आगे बढ़ रही थी। जगह-जगह पूजा पण्डाल में प्रसाद बंट रहा था। लोग ज्यादा हो गये थे इसलिये पंचामृत प्लास्टिक की ग्लास में तली में चिपका हुआ बंट रहा था। लोग ग्लास टेढ़ा करके पंचामृत ग्रहण कर रहे थे। इसके बाद ग्लास को सड़क को समर्पित करके चले जा रहे थे।
लोगों को मेले में गन्दगी फ़ैलाते देखकर भारतेन्दु का वाक्य याद आया-”त्योहार हमारी मुनिसपैलिटी हैं।" भारतेन्दु जी के समय मुनिसपैलिटी अपना सफ़ाई का मुस्तैदी से करती होंगी शायद इसलिये उन्होंने ऐसा कहा। आज होते तो शायद ऐसा कहने में हिचकते।
एक जोड़ा नहर के पानी में खड़ा पूजा कर रहा था। आदमी फ़ुल पैंट पहने , औरत साड़ी में। पूजा के बाद फ़ोटो। उसके बाद आदमी उचककर पानी के बाहर आ गया। महिला को आने में दिक्कत हो रही थी। किनारे गीली मिट्टी के चलते फ़िसल-फ़िसल जा रही थी महिला। फ़िर ऊपर एक आदमी ने उसका हाथ पकड़ा । दूसरे हाथ को किनारे जमाकर वह बाहर आई। बाहर आकर मुस्कराई। फ़िर फ़ेमिली के लोगों के साथ फ़ोटो खिंचाई।
एक महिला थकी-थकी सी पूजा कर रही थी।थकी महिला को उसके साथ की बच्ची कागज के पैकेट वाला घोल पिला रही थी, प्लास्टिक के पाइप के सहारे। बगल में एक बुजुर्ग महिला कपड़े बदल रही थी। वहीं सड़क पर जाती एक महिला ने अपनी ही उमर की एक महिला के बीच सड़क पर पांव छुये। कई बार छुये। बीच सड़क पर पांव छुआई से ’जन-जाम’ हो गया थोड़ी देर को। जब पांव-छुआई खतम हुई तब ’जन-जाम’ खुला। एक और बुजुर्ग महिला ने अपने पांव छूने वाली महिला की पीठ पर देर तक आशीष मालिश की।
पांव छुआने वालों में एक बुजुर्ग आदमी भी थे। एक नवविवाहिता ने उनकी पत्नी के पांव छुये। इसके बाद उनके छुय़े। उनकी मूंछे तनी हुई थीं। पांव छुआते हुये उनका चेहरा भी तन गया। शायद बहू को तनकर ही आशीष देना चाह रहे हों।
इस बीच घोषणा हुई कि एक बच्ची खो गयी है। नीली फ़्राक पहने है। जिसको दिखे मंच के पास पहुंचा दे।
नहर किनारे मंच भी बना था। वहां ’एक दिया शहीदों के नाम’ का पोस्टर लगा था। तमाम दिये रखे थे सामने। कुछ जल रहे थे, ज्यादातर बुझ गये थे।
जगह-जगह ठेलों पर चाय की दुकानें लगी थीं। एक ठेले पर मियां-बीबी चाय बेंच रहे थे। बच्चे वहीं प्रसाद खाते हुये खेल रहे थे।
मेले में गुब्बारे और खिलौने वाले भी थे। एक गुब्बारे वाला साइकिल पर सिलिंडर धरे एक गुब्बारा लटकाये खड़ा था। वहीं बाहर पचीसों गुब्बारे फ़ुलाये दूसरा बच्चा खड़ा था। उसके गुब्बारे धड़ाधड़ बिक रहे थे। दस रुपये का एक गुब्बारा। पता चला शुक्लागंज घर है उसका। कम से कम 15 किमी दूर। वहां से गुब्बारा बेंचने आया है। पांच बजे आ गया था मतलब चार बजे चला होगा। उठा और पहले होगा। कमर में बांधे गुब्बारे ग्राहकों को देता जा रहा था। साथ में फ़ुलाता भी जा रहा था।
एक गाड़ी की डिग्गी में बच्चे तसल्ली से बैठे हुये थे। एक मोटरसाइकिल में तीन लोग बैठे हुये थे। बीच वाली महिला किनारे वाली महिला को कपड़ों से पकड़े हुये थी कि अगर गिरे तो उसे बचा ले।
नहर की दूसरी तरफ़ भी लोग पूजा करने वाले थे। लेकिन कम थे। इस बीच देखा सूरज भाई आसमान में अपनी सेना के साथ हाजिर थे। पुराने आसमान पर जलवा फ़ैला हुआ था उनका। मल्लब सुबह हो गयी थी।
यह छठ पर्व की खास सुबह थी।

Sunday, November 06, 2016

बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन

अजीब बवाल है यार है। यही दिन देखने को बचे थे। लिखने के पहले विषय तय करना पड़ेगा। ये तो ऐसा ही हुआ जैसे अपने घर में परिचय पत्र दिखा के घुसने को मिले। अपन तो जो मन आये लिखते हैं। आदतन उल्टा-पुल्टा। ईरान की बात को तूरान से जोड़ते हैं। मीडिया में हालिया चलन वाले शब्द यहां-वहां घुसा देते हैं। अपनी गरीबी की बात लिखकर थोड़ा रोना टाइप। दूसरों की अमीरी के किस्से थोड़ी हिकारत के साथ। नेताओं का जिक्र गाली के साथ। तकनीक का तफ़सरा बुड़बकपन के साथ। विनम्रता का चित्रण अक्खड़पन के साथ। अपन तो ऐसे ही बिनते हैं ताना-बाना!


ओत्तेरी की। विसंगति को तो भूल ही गये थे। अच्छा हुआ याद आ गया। व्यंग्य मतलब विसंगतियों का चित्रण। बिना विसंगति के व्यंग्य उसी तरह फ़ीका लगता है जैसे बिना गुंडों-बाहुबलियों के कोई लोकतांत्रिक सरकार। फ़िर वापस लौटते हैं। लिखे हुये वाक्यों तोड़ते-मरोडते हैं। सीधा समझ में आने वाली बातों को उलझाऊ बनाते हैं। उसमें विसंगतियां घुसाते हैं।


अब आप विसंगति का मतलब पूछेंगे क्या? पूछेंगे तो बताना ही पड़ेगा। लेकिन आप मोटा मोटी यह समझ लो कि अपने देश में विसंगति का मतलब है बिना गढ्ढे की कोई सार्वजनिक सड़क होना। बिना लिये दिये आपना ड्राइविंग लाइसेंस बनना। बिना जाम का कोई शहर होना। बिना प्रदूषण की दिल्ली होना। बिना उकसावे के किसी देशभक्त का बयान होना। बिना राजनैतिक पहुंच वाले किसी शरीफ़ और विद्वान व्यक्ति का किसी विश्वविद्यालय का कुलपति होना।


लेख में विसंगति घुसा के सांस ले ही रहे थे कि स्मृति ( अरे वो वाली नहीं भाई) ने टोंक दिया कि व्यंग्य में करुणा की अंतर्धारा भी होनी चाहिये। अब ये नया बवाल। करुणा कहां से लाई जाये। कित्ती करुणा मिलायी जाये? असली बंधानी हींग की तरह कोई असली करुणा भी मिलती होगी। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि लेख बिना के करुणा के लिख दिया जाये और फ़िर पैकिंग करुणा के कागज से कर दी जाये। खैर करुणा को छोडिये अभी। करुणा तो अपने यहां इफ़रात में पसरी मिलती है। जिधर देखो उधर करुणा ही करुणा दिखती है। अपने खिलाफ़ हुई साजिश के किस्से सुनाता हर बड़ा लेखक करुणा का चलता-फ़िरता इश्तहार लगता है।


हमसे एक पाठक ने पूछा – “भाईसाहब आप अपने हर अटपटे लेखन को व्यंग्य क्यों कहते हैं? अपने बेवकूफ़ी के लेखन को जिसे आप व्यंग्य लेखन कहते हैं को अगर परिभाषित करने को कहा जाये तो कैसे करेंगे?”
मन तो किया कि पाठक को जबाब देते हुये रोने लगें। अपनी व्यंग्य साधना का इतना मार्मिक वर्णन करें कि वह दहल जाये। इत्ता रोयें कि देखकर उसके मन में मेरे प्रति करुणा पैदा हो जाये जिसको इकट्ठा करके दो-चार व्यंग्य लेख निकाल लें हम। बाकी चलते समय उसी को ’सप्रेम भेंट’ कर दें। लेकिन फ़िर हम किये नहीं। यह उन बड़े लेखकों को शोभा देता है जिनकी तमाम किताबें छप चुकी होती हैं, जिनको खूब इनाम मिल चुके होते हैं। हमको तो कोई दूसरा क्या , हम खुद ही लेखक नहीं मान पाते।


हमने अपने पाठक को प्यार से निहारते हुये बचपन में सुनी एक सब्जी बेंचने के लिये निकली स्त्री का सौंदर्य वर्णन सुनाया:
शकरकंद सी शकल बनाई
गाजर की पैजनियां
आलू के दो बन्द लगाये
ठुमक चली काछिनिया।
अपन का व्यंग्य लेखन इसी तरह का है। अखबार/टीवी में जैसे ही कोई खबर मिली उसको लपक लिया। थोड़ा अंग्रेजी मिलाई ताकि युवा पीढी पढ सके। आगे बढते हुये शब्दों के अनुप्रासिक श्रंगार किया। हट,पट, सट,खट,लट, झट। आओ,जाओ, भगाओ, पटाओ, दिलाओ। अबे, तबे, सबे, क्यों बे, हां बे, ना बे, फ़ूट बे।
किसी भी पढे-लिखे लेखक के लिये ’अनुप्रासिक श्रंगार’ का लालच सहज होता है। चाट के ठेले के पास से गुजरते हुये बतासे खाने की सहज इच्छा की तरह। ’शब्दों की ड्रिबलिंग’ में लेखक इतना आनन्दमग्न हो जाता है कि अपना गोल किधर है यही भूल जाता है। इसी चक्कर में कभी अपने ही गोल पोस्ट में गेंद घुसा देता है। जब तक उसे होश आता है तब तक खेल खत्म होने का सीटी बज जाती है। ऐसे लेखक के यहां से लेख निकलता है तो देखते ही पता चल जाता है कि सीधा ’अनुप्रास ब्यूटी पार्लर’ से मेकअप कराकर आ रहा है।


कभी-कभी मन में विसंगतियों पर इत्ता गुस्सा आता है कि मन करता है एकदम सर्जिकल स्ट्राइक कर दें उनके खिलाफ़। ऐसे में जित्ती भी विसंगतियां सामने दिखती हैं उन सबको एक सिरे से गरिया देते हैं। कुछ इस तरह जैसे हर बड़ा लेखक अपने अलावा बाकी सारे लेखन को ’लगभग कूड़ा’ बताते हुये अपना बड़प्पन सुरक्षित रखता है। कभी-कभी तो इत्ता जोर से हड़काते हैं विसंगतियों को कि बेचारी सहमकर रोने लगती हैं। कभी-कभी मन करता है कि व्यंग्य में सपाटबयानी व्यंग्य सम्प्रदाय, सरोकारी व्यंग्य सम्प्रदाय, गाली युक्त व्यंग्य सम्प्रदाय के साथ एक ’वीरगाथा व्यंग्य सम्प्रदाय’ का चलन भी होना चाहिये।


इतना लिखने के बाद लगता है कि व्यंग्य लेख पूरा हो गया। परसाई जी की परम्परा से सीधे जुड़ गये। परम्परा से क्या जुड़े उनसे आगे का लेखन कर रहे। परसाई जी के जाने के बीस साल बाद कुछ लिखना उनसे आगे का ही लेखन हुआ न! भले ही देश दुनिया की समझ उत्ती भी न हो जितनी परसाई जी को साठ साल पहले थी।
अब जब लेख पूरा हो गया है तो इसका शीर्षक भी तय करना जरूरी है। वैसे शीर्षक तो पहले ही तय है- व्यंग्य का विषय क्या हो? इसके अलावा अगर हमसे किसी लेख का विषय तय करने को कहा जाये तो हम इस तरह के शीर्षक सुझायेंगे:


1. बुलेट ट्रेन के युग में लबढब व्यंग्य लेखन
2. एवरेस्ट से उतरकर कूड़ा बीनता व्यंग्य लेखक
3. शब्द अनुप्रास की फ़िसलपट्टी पर झूलता लेखक
4. व्यंग्य के मठाधीशों का करुणा आख्यान
5. व्यंग्य के देवालय में चिरकुटई साधता लेखक
आपको कौन सा शीर्षक पसंद आया? आप भी कुछ सुझाइये!

Saturday, November 05, 2016

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था

आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न नूर साहब का:

मैं जिन्दगी पर बहुत एतबार करता था
इसीलिये सफ़र न कभी सुमार करता था।

मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।

बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।

आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।

हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।

हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।


सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।

पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।

’श्वान चिन्तन’ करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये।’पलक झपकते’  से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।

बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये


आज सबेरे जल्दी ही ’हकाल’ दिये घर से। घरैतिन को लगता है दफ़्तर समय पर ही जाना चाहिये। लगता तो हमको भी है लेकिन अपन का आलस्य से गठबंधन कुछ ऐसा कि लगते पर अमल अक्सर छूट जाता है। हर काम ’अंतिम समय पर’ करने के आदत। वो शेर है न वाली असी साहब का:
मैं रोज मील के पत्थर शुमार (गिनती) करता था
मगर सफ़र न कभी एख़्तियार (शुरू)करता था।
तमाम काम अधूरे पड़े रहे मेरे
मैँ जिंदगी पे बहुत एतबार (भरोसा)करता था।
मतलब इतना विश्वास है कि कल्लेंगे कभी काम। हो जायेगा। लेकिन घरैतिन का हिसाब अलग है । काम करना है तो अभी कर लो वर्ना छूट जायेगा।
बहरहाल जल्दी निकलने का फ़ायदा हुआ। तसल्ली से नजारे देखते हुये आये। घर के बाहर ही तीन महिलायें भी काम पर जाती दिखीं। वे भी लगता है जल्दी ही निकली थीं क्योंकि वे भी नजारा देखते हुये तसल्ली से बतियाये हुये जा रहीं थी।
आर्मापुर बाजार में गन्ने बिक रहे थे। छठ पर्व के लिये। पन्द्रह रुपये का एक गन्ना था। अभी तो ये शुरुआत थी। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा दाम सेंसेक्स सरीखे उतरेंगे-चढेंगे। बिकने के लिये तैयार गन्ने बड़े खूबसूरत लग रहे थे। जैसे डिग्री मिलने पर कालेंजों में नौकरी के लिये जाते बच्चे सामूहिक फ़ोटो खिंचवाते हुये हसीन लगते हैं वैसे ही गन्ने भी क्यूट लग रहे थे।
हमने गन्नों की फ़ोटो लेने के लिये खिड़की खोली गाड़ी की। धूल गाड़ी में घुसकर गुडमार्निंग करने लगी। गाड़ी में पहले से मौजूद धूल ने उसको बैठने की जगह नहीं दी तो बाकी की फ़िर आयी नहीं। सूरज की किरणें भी खिलखिलाते हुये घुस आईं और चमका दी गाड़ी।
हमारे फ़ोटो लेने तक वे तीन महिलायें आगे आ गयीं थीं। क्लिक करते ही कमरे के सामने आ गयीं। हमने फ़ोटो दुबारा लिया। उनको अंदाजा हो गया था कि वे कैमरे के सामने आ गयीं थीं। वे मुड-मुडकर हमको देखने लगीं। हमने सोचा हम भी देख लें लेकिन फ़िर नहीं देखा। देखने लगते तो देर हो जाती।
सड़क पर एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ चला जा रहा था। कुत्ते का अगला पैर शायद चोटिल था। अगला एक पैर जमीन से कुछ इंच ऊपर उठाये कुत्ता सड़क पर कर रहा था। आने-जाने वाले हरेक को सलाम करता हुआ कुत्ता संस्कारी कुत्ता लग रहा था। संभव है किसी बकैत कुत्ते का चौकीदार हो वो कुत्ता और उसकी सेवा शर्तों में आता हो कि जब तक यहां रहोगे आसपास तब तक अगली टांग हमेशा सलाम मुद्रा में रखनी होगी।
पता नहीं कुत्तों के यहां यह लंगड़े कुत्तों को दिव्यांग कहने की व्यवस्था लागू हुयी कि नहीं। लागू हो गयी होगी तो उसको लंगड़े की जगह दिव्यांग ही कहना होगा। न कहें तो क्या पता कोई कार्रवाई हो जाये अपने ऊपर तो अपन माफ़ी मांगते घूमें। क्या पता सजा ही हो जाये कि एक दिन पोस्ट नहीं कर पाओगे अपना रोजनामचा। हम तो अपील भी न कर पायेंगे। न अपना कोई अखबार है न कोई टीवी चैनल।
कुत्ता चिन्तन करते हुये पलक झपकते जरीब चौकी के पास पहुंच गये। पलक झपकते से बेहतर होगा कहना ’पलकें झपकाते’ हुये। एक ठेलिया पर एकदम लाल युवा टमाटर बिक रहे थे। इत्ते क्यूट और स्वीट लग रहे थे टमाटर कि मन किया गाड़ी वहीं ठेलिया के पार ठढ़िया कर प्यार कर लें टमाटरों को। लेकिन मुये दफ़्तर की याद ने फ़िर दौड़ा दिया आगे।
बाजपेयी जी मिले। जाड़े में उनकी ड्रेस बदल गयी है। गरम कोट पहने थे। हमने कहा नई ड्रेस बढिया है तो बोले -’ हां बुकेट प्रूफ़ है।’ सीना खुली ड्रेस को बुलेट प्रूफ़ ड्रेस बताते हुये बाजपेयी जी की बात सुनकर ऐसा ही लगा कि जैसा अपनी आबादी के बड़े हिस्से को भूख से बेहाल देश के नेता विकास की दौड़ में सबसे आगे बताते हुये लगते हैं।
बाजपेयी जी ने कहा -कोहली को पकड़वाओ। वो अपनी मां के साथ मिलकर बच्चों को उठवा रहा है। पाकिस्तान के शरीफ़ से बात करके उसको पकड़वाओ।
एक मानसिक रूप से असंतुलित आदमी को सुनकर लगता है कि देखो इस आदमी को अपनी चिन्ता नहीं है। समाज की चिंता है। तमाम बुद्धिजीवी जिनको तमाम उपलब्धियां हासिल हो चुकी होती हैं अक्सर रोते हुये दिखते हैं -हाय हमको ये इनाम नहीं मिला, वो सम्मान नहीं मिला, ये इज्जत नहीं मिली,वो अपमान हो गया। उनसे भले तो अपने बाजपेयी जी हैं जो कभी अपना रोना नहीं रोते।
आगे एक आदमी दूसरे के कन्धे पर हाथ धरे चला जा रहा था। लग रहा था मित्रभाव मूर्तिमान टहल रहा है सड़क पर। भाईचारा जिन्दगी में बाकायदा आबाद है।
ओवरब्रिज के पहले एक लड़का सड़क पर तेजी से भागता गाड़ी के सामने निकल गया। दोनों हाथ चकरघिन्नी की तरह तेजी से घुमाता हुआ भागता बच्चा सड़क की दूसरी तरफ़ जाकर खेलने लगा।
दस साल के करीब से निर्माणीधीन ओवरब्रिज अपने पूरे होने के इंतजार में बाट जोह रहा है। उसके आखिरी छोर पर कपड़ों की फ़ेरी लगाये हुये बैठे लोग शायद सोच रहे होंगे कि यह पुल ऐसा ही अधबना बना रहे ताकि अपनी दिहाड़ी चलती रहे। उससे ज्यादा तो शायद पुल के बाद बना मंदिर का पुजारी सोचता होगा कि पुल बना तो मंदिर टूटेगा। कमाई बंद होगी। क्या पता मंदिर के पुजारी ने ही कुछ तगड़ा चढ़ावा चढाकर पुल की फ़ाइल रुकवा दी हो।
यही सब फ़ालतू की बातें सोचते हुये समय पर नहीं समय से बहुत पहले पहुंच गये और दिन भर के लिये जमा हो गये।
आपका दिन चकाचक बीते।

Friday, November 04, 2016

हर तरफ मंगतों का हुजूम है

किरन और करन
शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर कोई न कोई गाड़ी पोंछने लगता है। मना करते न करते सामने का शीशा पोंछ डालता है। कुछ न कुछ आशा करता है। कभी-कभी कुछ फुटकर रूपये दे देते हैं। कभी बत्ती हरी होती है तो फूट लेते हैं।

जब पैसे नहीं देते तो लगता है अगले की मजूरी मारकर फूट लिए हैं। कभी मना करते हैं तो कहता है मर्जी हो देना नहीं तो मत देना। मानों उसकी सफाई न हुई जियो का मुफ्तिया सिम हो गया। अब्बी मुफ़्त है। बाद में मन करे तो जारी रखना, न मन करे तो बन्द कर देना।

एक दिन सिग्नल देर में हुआ तो बतियाने भी लगे। भाईसाहब गाड़ी पोंछते जा रहे थे जबाब देते जा रहे थे। बताया कि तीन-चार घण्टे 'सफाई सेवा' प्रदान करके 40-50 रूपये जुटा लेते हैं।कभी कोई देता है कभी नहीं भी देता है (कहते हुए उसने हमारी तरफ देखा)। कभी कोई पांच-दस भी दे देता है। कभी एकाध में टरका देता है। जिसकी जो मर्जी हो देता है , हम ले लेते हैं।

ये तो हुई बात कुछ करके कुछ पाने की आशा रखने वाली बात। दूसरी जमात में वे लोग हैं जो बिना कुछ किये कुछ चाहते हैं। जरीब चौकी क्रासिंग पर ऐसे तमाम बच्चे सक्रिय हैं। क्रासिंग पर गाड़ी रुकते ही खिड़की पर जुट जाते हैं। कुछ लोग कोई फोटो भी पकडे रहते हैं। खासकर शनिवार को एक बाल्टी में लोहे की पत्ती तेल में डुबाये हुए। तेल भी क्या पता तेल होता है या कोई मोबिलऑयल पता नहीं।

भीख मांगने वालों की उपेक्षा करके बचना तो आसान होता है। कभी उनकी फोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो भाग जाते हैं। लेकिन अफ़सोस बहुत होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे पैदा होते ही मांगने के धंधे में उतार दिए जाते हैं। जिस उम्र में किसी स्कूल में होना चाहिए उनको उस आयु में चौराहे पर हथेली फैलाये मिलते हैं।

स्कूल जाने वाले बच्चे भी कभी-कभी यह एहसास कराते हैं कि अभाव और गरीबी हमारे अंदर मांगने की आदत के इंजेक्शन लगाती रहती है।

एक दिन घर से निकलते ही दो बच्चे मिल गए। पता चला पास के स्कूल में पढ़ते हैं। नौ बजे का स्कूल है। आठ बजे तैयार होकर भाई बहन चल दिए स्कूल। भाई करन 4 में पढ़ता है। बहन किरन 2 में शायद। कुछ गिनती पहाड़े पूछते हुए हम आगे बढ़े तो बच्चे ने कुछ पैसे मांगे। हमने पूछा क्या करोगे ? बच्चा बोला - चिज्जी खाएंगे।

यह बात जब तक हुई तब तक हम गाड़ी स्पीड में ले आये थे। बच्चे की मांग में भी , शायद आदत न होने के चलते, थोड़ी हिचक सी थी। कुल मिलाकर हम कुछ दिए बिना आगे बढ़ गए।

यह तो अबोध बच्चे थे। लेकिन आसपास देखते हैं तो लगता है चारो तरफ मांगने वालों का हुजूम हैं। कोई सुविधा मांग रहा है तो कोई रियायत।कोई वोट मांग रहा है तो कोई नोट। कोई अपने लिए जबरियन उपहार मांग रहा है तो कोई आरक्षण। कोई यश और सममान के लिए कटोरा थामें खड़ा है। हर तरफ मंगतों का हुजूम है। हम भी किसी न किसी रूप में इसी जुलूस में कहीं शामिल हैं।

शायद  हम मंगते समाज के रूप में विकसित हो रहे हैं। मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं। सन्तुलन गड़बड़ाएगा तो बवाल होगा ।

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मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं



शाम को जब दफ़्तर से घर लौटने पर अक्सर ही टाटमिल चौराहे पर ट्रैफिक सिग्नल की मेहरबानी से कुछ रुकना होता है। गाड़ी रुकते ही लपककर कोई न कोई गाड़ी पोंछने लगता है। मना करते न करते सामने का शीशा पोंछ डालता है। कुछ न कुछ आशा करता है। कभी-कभी कुछ फुटकर रूपये दे देते हैं। कभी बत्ती हरी होती है तो फूट लेते हैं।
जब पैसे नहीं देते तो लगता है अगले की मजूरी मारकर फूट लिए हैं। कभी मना करते हैं तो कहता है मर्जी हो देना नहीं तो मत देना। मानों उसकी सफाई न हुई जियो का मुफ्तिया सिम हो गया। अब्बी मुफ़्त है। बाद में मन करे तो जारी रखना, न मन करे तो बन्द कर देना।
एक दिन सिग्नल देर में हुआ तो बतियाने भी लगे। भाईसाहब गाड़ी पोंछते जा रहे थे जबाब देते जा रहे थे। बताया कि तीन-चार घण्टे 'सफाई सेवा' प्रदान करके 40-50 रूपये जुटा लेते हैं।कभी कोई देता है कभी नहीं भी देता है (कहते हुए उसने हमारी तरफ देखा)। कभी कोई पांच-दस भी दे देता है। कभी एकाध में टरका देता है। जिसकी जो मर्जी हो देता है , हम ले लेते हैं।
ये तो हुई बात कुछ करके कुछ पाने की आशा रखने वाली बात। दूसरी जमात में वे लोग हैं जो बिना कुछ किये कुछ चाहते हैं। जरीब चौकी क्रासिंग पर ऐसे तमाम बच्चे सक्रिय हैं। क्रासिंग पर गाड़ी रुकते ही खिड़की पर जुट जाते हैं। कुछ लोग कोई फोटो भी पकडे रहते हैं। खासकर शनिवार को एक बाल्टी में लोहे की पत्ती तेल में डुबाये हुए। तेल भी क्या पता तेल होता है या कोई मोबिलऑयल पता नहीं।
भीख मांगने वालों की उपेक्षा करके बचना तो आसान होता है। कभी उनकी फोटो खींचने की कोशिश करते हैं तो भाग जाते हैं। लेकिन अफ़सोस बहुत होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी बच्चे पैदा होते ही मांगने के धंधे में उतार दिए जाते हैं। जिस उम्र में किसी स्कूल में होना चाहिए उनको उस आयु में चौराहे पर हथेली फैलाये मिलते हैं।
स्कूल जाने वाले बच्चे भी कभी-कभी यह एहसास कराते हैं कि अभाव और गरीबी हमारे अंदर मांगने की आदत के इंजेक्शन लगाती रहती है।
एक दिन घर से निकलते ही दो बच्चे मिल गए। पता चला पास के स्कूल में पढ़ते हैं। नौ बजे का स्कूल है। आठ बजे तैयार होकर भाई बहन चल दिए स्कूल। भाई 4 में पढ़ता है। बहन 2 में शायद। कुछ गिनती पहाड़े पूछते हुए हम आगे बढ़े तो बच्चे ने कुछ पैसे मांगे। हमने पूछा क्या करोगे ? बच्चा बोला - चिज्जी खाएंगे।
यह बात जब तक हुई तब तक हम गाड़ी स्पीड में ले आये थे। बच्चे की मांग में भी , शायद आदत न होने के चलते, थोड़ी हिचक सी थी। कुल मिलाकर हम कुछ दिए बिना आगे बढ़ गए।
यह तो अबोध बच्चे थे। लेकिन आसपास देखते हैं तो लगता है चारो तरफ मांगने वालों का हुजूम हैं। कोई सुविधा मांग रहा है तो कोई रियायत।कोई वोट मांग रहा है तो कोई नोट। कोई अपने लिए जबरियन उपहार मांग रहा है तो कोई आरक्षण। कोई यश और सममान के लिए कटोरा थामें खड़ा है। हर तरफ मंगतों का हुजूम हैं। हम भी किसी न किसी रूप में इसी जुलूस में कहीं शामिल हैं।
मांगने वाले बढ़ रहे हैं देने वाले घट रहे हैं। सन्तुलन गड़बड़ाएगा तो बवाल होगा ।

Sunday, October 30, 2016

दीपावली मतलब अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की सर्जिकल स्ट्राइक



दीपावली को रोशनी का त्योहार माना जाता है। त्योहार के आते ही अंधेरे को निपटाने की बातें शुरु हो जाती हैं। गोया अंधेरा न हुआ जानी दुश्मन हो गया। पाकिस्तान टाइप। निपटा दो फ़ौरन उजाले की बमबारी करते हुये। एक तरह से दीपावाली अंधेरे के खिलाफ़ उजाले की ’सर्जिकल स्ट्राइक’ है।
ये सर्जिकल स्ट्राइक वाली बात पौराणिक संदर्भ में भी लागू होती है। राम ने लंका में घुसकर रावण को मारा। अपनी पसंद का राजा बना आये वहां। सीता जी को ले आये। जब वापस आये तो देश की जनता ने हर्षित होकर हल्ला-गुल्ला मचाया। पटाखेबाजी करी। शायद नारे भी लगाये हों- ’हमारा राजा कैसा हो, रामचन्द्र जी जैसा हो’। कुल मिलाकर कुछ-कुछ ऐसा ही सीन रहा होगा जैसा अभी अपनी सेना की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद हुआ।
लेकिन अंधेरे के खिलाफ़ ये उजाले की हल्ला बोल की प्रवृत्ति के पीछे बाजार की ताकत काम करती है। अंधकार पर रोशनी की विजय के नाम पर तमाम रोशनी के एजेंट अपनी दुकान लगाकर बैठ जाते हैं। इतना उजाला फ़ैला देते हैं कि आंख मारे रोशनी के चौंधिया जाती है। दिखना बंद हो जाता है। अंधेरे के ’अंधेरे’ से उजाले के ’अंधेरे’ में लाकर खड़ा कर देते हैं रोशनी के ठेकेदार। जब तक आपको कुछ समझ में आता है तब तक आपको लूटकर फ़ूट लेते हैं। आपको जब तक होश आता है तब तक आप लुट चुके होते हैं। जो लोग लुटने की शराफ़त नहीं दिखा पाते वे पिट भी जाते हैं।
पर हम तो प्रकृति के उत्पाद हैं। अपने लिये तो अंधेरा और उजाला प्रकृति के दो सहज पक्ष हैं। दिन और रात की तरह। प्रकृति ने हमें इसी तरह बनाया है कि जब धरती सूरज के सामने रहे तब हमें दिखता रहे। बाकी समय अंधेरा रहे। दिखना बंद हो जाये। यह वास्तव में धरती ने हमारे लिये आराम का इंतजाम किया है। जितने भी जीव जंतु हैं धरती पर सबके लिये इसी तरह का इंतजाम है। सब जीव जंतु इसे सहज भाव से लेते हैं। कोई हल्ला नहीं मचाता। लेकिन इंसान खुराफ़ाती है। जबसे उसने कृत्तिम रोशनी की खोज की होगी तबसे वह अंधेरे के खिलाफ़ हल्ला मचाता रहता है।
इंसान को अंधेरे में दिखता नहीं। अंधेरे में डरता है वह। अपनी औकात कम लगती हैं अंधेरे में उसे इसलिये वह अंधेरे को अपना दुश्मन मानकर उसके खिलाफ़ साजिश करता है। जहां देखो तहां अंधेरे का कत्ल करता रहता है। कहीं-कहीं तो इतनी ज्यादा रोशनी करती है कि अंधेरे से भी ज्यादा अंधेरा फ़ैल जाता है। अंधेरा कभी उजाले के खिलाफ़ साजिश नहीं करता। वह लड़ाई भिड़ाई भी नहीं करता उजाले से। जब उजाला अंधेरे पर हमला करता है तो चुपचाप किनारे हो जाता है। नेपथ्य में चला जाता है। जब उजाले की सांस फ़ूल जाती है अंधेरे से कुश्ती लडते हुये तब अंधेरा फ़िर से अपनी जगह वापस आ जाता है।
अंधेरे का बड़प्पन ही है कि वह उजाले घराने के किसी भी सदस्य को चोट नहीं पहुंचाता। वो एक शेर है न:
जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं तो और क्या है जी!
अंधेरा जरा से जुगनू को भी चमकने का मौका देता है। उजाले में यह उदारता नहीं होती। वह जहां रहता है वहां किसी अंधेरे को उजाले को पनपने का मौका नहीं देता। डरता है उजाला कि जरा सा मौका मिला अंधेरे को तो वह उजाले को भगा देगा।
अंधेरे पर उजाले की जीत की आड़ में तमाम घपले होते हैं। बिजली बनाने के नाम पर जंगल काट दिये जाते हैं। बांध बनाने के लिये आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया जाता है। शहर में बिजली का झटका गांवों में लगता है। कहीं 24 घंटे बिजली पहुंचाने के लिये दूसरी जगह 48 घंटे अंधेरे में डुबा दिये जाते हैं। एक जगह रोशनी की चकाचौंध होती है तो दूसरी जगह घुप्प अंधेरा। मतलब हाल ये होता है कि:
कल उजालों के गीत बहुत गाये गये!
इसी बहाने गरीब अंधेरे निपटाये गये।
अंधेरे पर उजाले का जयघोष करने वाले कामना करते हैं कि दुनिया में सदैव उजाला बना रहे। अंधेर-उजाले के लोकतंत्र की जगह रोशनी की तानाशाही सरकार बनी रहे। यह कामना ही प्रकृति विरुद्ध है। यह तभी हो सकता है जब धरती सूरज का चक्कर लगाना बन्द कर दे। जैसे ही ऐसा कुछ हुआ, ग्रहों का सन्तुलन बिगड़ जायेगा। सौरमण्डल की सरकार गिर जायेगी। धरती पर प्रलय जैसा कुछ आयेगा। अंधेरे पर उजाले की विजय का हल्ला मचाने वाला इंसान अपने टीन टप्पर, अस्थि-पंजर समेत ब्रह्मांड के किसी कोने में कचरे सरीखा पड़ा रहेगा न जाने किसी आकाशीय पिंड का चक्कर लगाते हुये।
मान लीजिये धरती नष्ट भी न हुई और आज से ही दुनिया से अंधेरा विदा हो गया। सब तरफ़ उजाला ही उजाला हो गया तो सोचिये क्या होगा। दुनिया के सारे अंधेरे में किये जाने वाले कार्य व्यापार ठप्प बन्द हो जायेंगे। जनरेटर बनाने/बेंचने वाली कम्पनियां बन्द हो जायेंगी। किराये पर गैस बत्ती देने वाले कटोरा लिये नजर आयेंगे। अंधेरे में देखने वाले उपकरण बनाने वाली कम्पनियां दीवालिया हो जायेंगी। अंधेरे-उजाले में रहने के अभ्यस्त लोग बिना हवाई यात्रा के ही जेट लैग के शिकार होने लगेंगे।
अगर कभी ऐसा हुआ तो पक्का फ़िर अंधेरे के भाव बढेंगे। कृत्तिम उजाले की जगह कृत्तिम अंधेरे का व्यापास शुरु होगा। अंधेरा पैदा करने वाले उपकरण बनेंगे। अंधेरा पैदा करने वाले बल्ब बनेंगे। अंधेरा उगाने वाली मोमबत्तियां बंद बनेंगी। लोग आंख के डाक्टर के पास जाकर दुखड़ा रोयेंगे – ’डा.साहब इस आंख से दिखता ज्यादा है। कोई कम दिखने वाली दवा दीजिये। रोशनी से बहुत तकलीफ़ होती है।’ उजाले की तानाशाही होगी तब मुहावरे भी बदलेंगे। लोग ’आंख के सामने अंधेरा छा जाने’ की जगह ’ आंख के सामने उजाला छा गया’ कहने लगेंगे। कवि गण अंधेरे के सम्मान में गीत लिखेंगे। दीपावली के बदले क्या पता कोई ऐसा त्योहार मनाया जाने लगे जिसमें अंधकार ही अंधकार पैदा किया जाये। नीरज की तर्ज पर कोई कवि कहे-
बुझाओ दिये पर रहे ध्यान इतना,
उजाला धरा पर कहीं रह न जाये।
आपको भी लग होगा कि कहां की अल्लम-गल्लम हांकने लगे। लेकिन कहने का मतलब मेरा इतना ही है कि धूप-छांह की तरह ही अंधेरे-उजाले का रिश्ता है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। खुशी मनायें लेकिन उसके लिये अंधेरे को गरियाये नहीं। उसकी भी इज्जत बनाये रखें। अंधेरा वास्तव में मिट गया तो रोशनी में आपस में समाजवादी कुनबे की तरह कटाजुज्झ होने लगेगी क्योंकि:
असल में अंधेरे की अपनी कोई औकात नहीं होती,
इसकी पैदाइश तो उजालों में जूतालात से होती है।

आपको दीपावली की मंगलकामनायें।

https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10209516305677988