Thursday, July 09, 2026

अभी ख़्वाब में देखा आपको

 


अभी शाहजहांपुर से एक मित्र से संदेश वार्ता हुई। टेलर हैं वहाँ । उसने बताया -‘ अभी ख़्वाब में देखा आपको। हम और आप साथ में चाय पी रहे हैं मन्दिर के पास की चाय की दुकान में।’

हमने कहा-‘ चाय वाला अभी पेमेंट माँगेगा तुमसे। बिना पैसे दिए निकल लिए हम लोग।’
उसने कहा -‘ लिया ही नहीं उसने आपसे पैसा। वो आपको जानता है।’
हमने सोचा ये तो लफड़ा हुआ। एक को सपना आया। दो लोगों ने चाय पी। दूसरे को सपना आया नहीं। उसने चाय भी नहीं पी । उससे पैसे भी नहीं लिए। पता नहीं इसका हिसाब कैसे होगा ?’
इसके बाद फ़ोन पर बातचीत भी हुई। दोस्त ने यह भी बताया -‘ चाय बनाने में देर हो रही थी चाय वाले से तो आपने कहा -‘ हटो हम बनाते हैं चाय।’
मतलब हम लखनऊ में और शाहजहांपुर में हमने सपने में ये सब कर डाला। चाय वाले को चाय बनाना सिखा रहे हैं। यह तो ऐसे ही जैसे कोई चाय वाला गणितज्ञों को (a+b) स्क्वायर में एक्स्ट्रा टू एबी निकाल कर दिखा दे। गणितज्ञ बेचारे -‘ सही पकड़े हैं साहब ‘ कहकर भौंचक्के रह जाएँ।
हमारे बारे में देखे दूसरे के द्वारा देखे गए इस सपने का क्या मतलब हो सकता है? चाय वाले दुकानदार ने भी यह सपना देखा होगा ? क्या हमारी उस पर देनदारी बनती है?

Wednesday, July 08, 2026

ब्लिकिट और जेप्टो की डिलीवरी

 










कल एक जगह सड़क किनारे मोटरसाइकिलें खड़ी देखीं। चालीस पचास होंगी। पता किया तो मालूम हुआ ये जेप्टो का डिलीवरी पॉइंट है। जेप्टो भी ब्लिंकिट की तरह घरेलू सामान पहुँचाने का काम करती है। मोटरसाइकिलों में जेप्टो के डिलीवरी करने वाले लोग अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे।

ब्लिकिट और जेप्टो की डिलीवरी प्रक्रिया के बारे में कौतूहल था। कल इसे पास से देखा। अंदर गए। लोहे के जंगले के पीछे खूब बड़ा स्टोर था। अलमारियों में सामान रखा था। अंदर लोग सामान उठाए इधर-उधर घूमते हुए पैकेट में सामान रखकर डिलीवरी वाले लोगों को दे रहे थे। सामान मिलते ही लोग डिलीवरी के लिए लपकते थे।
वहाँ मौजूद लोगों से सामान का आर्डर मिलने से लड़के डिलीवरी तक हिसाब समझा। जेप्टो/ब्लिंकिट को आर्डर मिलने पर उसका डिलीवरी पर्सन कंप्यूटर से तय होता है। बाहर खड़े डिलीवरी वाले आदमी के पास संदेश जाता है। उसके मोबाइल पर काउंटर नंबर आता है। वहाँ पहुंचकर वह सामान उठाता है। काउंटर पर लगे स्कैनर से उसे डिलीवरी का पता मिलता है। वहाँ पहुंचकर सामान डिलीवर करके वह ‘सामान डिलीवर किया’ का मेसेज करता है। अगली डिलीवरी के लिए उसका नम्बर लग जाता है।
वहाँ डिलीवरी के लिए तैयार लोगों से बातचीत हुई। कई तरह के लोग काम के लिए आते हैं। कुछ स्थानीय कुछ आसपास के गाँव से आने वाले। कई लोगों के लिए यह पूरे समय का रोज़गार है। कुछ के लिए पार्टटाइम काम। पार्टटाइम काम करने वाले वो लोग हैं जिनको कहीं दूसरी जगह भी काम मिला है। छुट्टी पाने पर यहाँ काम करने आ जाते हैं। ऐसे लोगों में कुछ लोग किराए पर बाइक भी चलाते हैं।
अमेरिका और विकसित देशों में जेबखर्च के लिए होटलों और रेस्तरां में पार्ट टाइम काम करना आम बात मानी जाती है। भारत में बाइक सेवा और डिलीवरी सेवा में पार्टटाइम काम का चलन बहुत तेजी से बढ़ा है।
एक बच्चा ग्रेजुएशन की पढ़ाई करते हुए दो से तीन घंटे डिलीवरी का काम करता है। वहाँ मिला। उसने बताया कि पास की कॉलोनी में सामान डिलीवर करके आया है। प्रति किलोमीटर 14 रुपए मिलते हैं। किसी खास समय अंतराल में काम करने पर अतिरिक्त पैसे भी मिलते हैं। पिछली डिलीवरी के उसे 24 रुपए मिले। दो-तीन घंटा काम करने से उसे अपने कमरे का किराया और जेबखर्च भर के पैसे मिल जाते हैं।
बच्चे ने बताया कि वह ग्रेजुएशन की पढ़ाई के साथ कंपटीशन की तैयारी भी कर रहा है। यूपी पीसीएस और सिविल सर्विसेज की। मैं कल्पना करता हूँ की कुछ साल बाद बालक किसी कंप्टीशन में सफल होकर मीडिया की इंटरव्यू देते हुए बताएगा कि मैं डिलीवरी का काम भी करता था। मीडिया में सुर्खियों में खबर आएगी -‘ जेप्टो का डिलीवरी मैं बना अधिकारी।’
लेकिन ऐसा सबके साथ नहीं होता। कुछ लोग ही ऐसा कर पाते हैं। बाक़ी बहुत लोग उमर भर इसी तरह के काम करते रह जाते हैं। उनका किसी मीडिया में कोई जिक्र नहीं होता। मीडिया की निगाह चमकीले लोगों पर ही रहती है। इससे आगे वह देख नहीं पाता।

अरे ओ सांभर, कितनी इडली थी

 


शोले फ़िल्म का डायलॉग -‘ अरे ओ सांभा, कितने आदमी थे?’

सबसे ज़्यादा दोहराये जाने वाले संवादों में से एक है। बदलते समय और जरूरत के अनुसार इसे लोग अपने हिसाब से बदल लेते हैं। जिस हिसाब से जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त होती है उसमे कोई गब्बर पूछता होगा -‘ कितने सांसद/विधायक थे (बिकने के लिए)’
यह डायलॉग कल एक नए रूप में दिखा। सड़क किनारे इडली बेचने वाले के बोर्ड में लिखा था -‘ अरे ओ सांभर, कितनी इडली थी।’
इस तरह के डायलॉगबाजी आज आम है। हर जगह लोगों की/सामान की/नोटों की गिनती हो रही है। उसी में चोरी भी चल रही है। लेकिन हम चोरी के बारे में कुछ न कहेंगे। उसकी जांच चल रही है। न जाने कब तक चलेगी। असलियत जाँच को भी नहीं पता।

Sunday, July 05, 2026

आकड़ों की बाज़ीगिरी

 


आज सबेरे स्वीमिंग पूल जाने के लिए निकले। कॉलोनी के एक भाई साहब बाइक पर आते दिखे। हेलमेट हाथ में लटकाये थे। शायद, कभी कोई दुर्घटना हुई तो फौरन लगा लेंगे।

मोड़ पर दो महिलायें साइकिल पर बतियाती जा रही थीं। शायद काम पर जा रहीं होंगी। उनमें से एक बोलती जा रही थी। दूसरी सुनती जा रही थी। वक्ता-श्रोता की जोड़ी पैडलियाते जा रही थी। मोबाइल घर में धरा था। साथ में होता तो वीडियो बनाते।
पूल वाली सड़क के बीच वाली फ़ुटपाथ पर तमाम दिहाड़ी मज़दूर बैठे थे। कुछ बतिया रहे थे। कुछ खाना बना रहे थे। रोटी बनाकर फुटपाथ पर रखते जा रहे थे। देखने से रोटियाँ कड़ी दिख रही थीं। इतनी कड़ी कि फेंककर किसी को मार दें तो सुदर्शन चक्र की तरह गर्दन काट दें। आगे दिहाड़ी मजदूरों को ले जाने वाले लोग मोलभाव कर रहे थे।
पूल पर पहुंचकर शॉवर लिया। कलाई घड़ी पूल मोड में की। पानी में उतरे। उतरकर याद आया कि कैप तो पहनी ही नहीं। पानी से निकालकर बैग से कैप निकालकर पहनी। साथ में पानी भी पी लिया। इस चक्कर में तैराकी का समय पाँच मिनट कम हो गया।
पूल में दुबारा उतरकर ब्रीदिंग, किकिंग का अभ्यास किया। दोनों ठीक-ठाक। इसके बाद तैरने का अभ्यास करने लगे। पिछले कई दिनों से किकिंग का अभ्यास पक्का करने में लगे थे। अब पाँव का मूवमेंट ठीक हो गया है। आराम से पांव मेढक की तरह चलने लगे। पाँव चलाते समय सोचा कि कहीं मेढकों को पता चल जाये कि इंसान उनकी तरह पांव चलाकर तैरना सीख रहे हैं तो वे कॉपीराइट का मुकदमा न कर दें।
तैराकी सीखने का यह दूसरा महीना है। पाँच दिन हुए महीना ऊपर। इस बीच ब्रेस्टस्ट्रोक के तमाम वीडियो देखे। हर वीडियो देककर लगता कि इस तरह तैरना तो अपन का बायें हाथ का काम है। लेकिन जब सही में तैरते तो लगता जिस काम को बायें हाथ का काम समझ रहे थे वह बायाँ हाथ, दायाँ हाथ और दोनों पैर मिलाकर नहीं हो पा रहे है।
पूल में देखे गए वीडियो याद करके तैरना सीखते। लगता कि पूल पर क्रिकेट मैदान के स्कोर बोर्ड की तरह तैरने के वीडियो चलते तो अच्छा रहता। देखते हुए सीखते। कोच से यह आइडिया बताया तो वह बोला -'स्क्रीन लगेगी तो उसकी फ़ीस भी जुड़ जायेगी। तीन हज़ार की जगह पाँच हज़ार लगेगी पूल की फीस।'
हमने अपना स्क्रीन प्रस्ताव बिना कुछ कहे वापस ले लिया।
घंटे बार की तैराकी के बाद कोच को अपना मूवमेंट दिखाया। उसने कहा -'बढ़िया कर रहे। हाथ और पैर के मूवमेंट ठीक हैं। अब सर ऊपर करके साँस लीजिए।'
पानी में सांस लेने का काम थोड़ा जटिल है। सर उठाकर साँस लेने की कोशिश करने पर लगता है कोई गैरकानूनी काम कर रहे हैं। मुंडी उठाते ही फौरन अंदर कर लेते। गोया पूल किसी फायरिंग रेंज में हो। सर उठाते ही गोली लगने की आशंका। सुरक्षा के लिए सर फौरन अंदर। वैसे भी सर झुकाये-झुकाये जीते रहने के बाद कहीं भी सर उठाकर चलना किसी अलिखित क़ानून का उल्लंघन लगता है।
ब्रेस्ट स्ट्रोक में पैर का मूवमेंट मतलब किकिंग का समय बहुत महत्वपूर्ण है। साँस लेने के बाद फौरन पानी को धकियाकर सर ऊपर करना। एकदम राहत सामग्री की लूट की तरह झटके से सांस ले लेना। इसके बाद सर पानी के अंदर कर लेना। सर पानी में अंदर करना ऐसे जैसे कोई साँस चोरी की रपट लिखाए तो धरपकड़ के पहले ही मौका-ए-वारदात फ़रार हो जाना। इसके बाद पैर पीछे करते पानी को किक करके, पानी को लतियाकर आगे बढ़ जाना।
इस मामले में ब्रेस्टस्ट्रोक और राजनीति एकदम एक सरीखी हैं। सच पूछा जाये तो दूसरों को लतियाकर आगे बढ़ने की कला जीवन के हरेक क्षेत्र में लागू होती है।
घंटे भर पूल से निकलकर घड़ी में तैराकी की रिपोर्ट इस प्रकार दिखी :
-वर्कआउट टाइम (तैराकी का समय):एक घंटा एक मिनट सत्रह सेकंड
-दूरी - 1550 मीटर
-औसत पेस - 4'03" / 100 M (चार मिनट तीन सेकेंड प्रति सौ मीटर)
-औसत हृदय गति - 90 बीपीएम (एक मिनट में नब्बे बार)
पूल की लंबाई - 25 मीटर
-किलोकैलोरी: 252
यहाँ तय की गई दूरी भ्रामक है। घड़ी ने यह मानकर दूरी कैलकुलेट कि हर बार हमने पूरा पूल पार किया। जबकि हर बार हम अधिक से अधिक पाँच मीटर तैरे। इस लिहाज से तय दूरी में पाँच का भाग करने पर असल में कुल 300 मीटर तैरे होंगे घंटे भर में।
आकड़ों की बाज़ीगिरी करके प्रदर्शन बेहतर बताने में कॉर्पोरेट और सरकार की मोनोपोली थोड़ी है।

Saturday, July 04, 2026

पेट्रोल में एथनॉल

 


'इनका कोई भरोसा नहीं। बड़ी बात नहीं कल को टेस्टिंग के नाम पर खाने में जहर मिलाकर बांटने लगें।'

यह बात कल एक कैब ड्राइवर ने कही। बातचीत एथनॉल मिले पेट्रोल की हो रही थी। आजकल यह मुद्दा चर्चा में है। कई लोगों ने अपनी गाड़ियों के एवरेज कम होने की बात कही। हमको भी इसका एहसास तब हुआ जब पिछले हफ़्ते हमने अपनी गाड़ी का एवरेज चेक किया। लखनऊ से कानपुर जाने-आने में गाड़ी हुई पेट्रोल की खपत जबरदस्त थी। एवरेज धराशायी।
खबर यह भी आई कि सरकार ने अदालत में बयान दिया कि पेट्रोल में एथनॉल की टेस्टिंग कर रहे हैं। यह कैसी टेस्टिंग है भाई कि पूरे देश में एथनॉल मिला पेट्रोल बेचने लगे बिना उसका प्रभाव जाने।
दवाइयों या किसी और चीज की टेस्टिंग छोटे समूहों पर होती है। टेस्टिंग सफल होने पर उसको प्रयोग के लिए अनुमति दी जाती है। यह कैसी टेस्टिंग कि बिना परिणाम जाने उसको लागू कर दिया। देश की आम जनता मानो चूहा या गिनीपिग है जहाँ कोई भी टेस्टिंग करने लगें।
हालांकि सरकार की तरफ़ से कहा गया है कि पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का निर्णय विशेषज्ञों से सलाह लेकर किया गया है। गाड़ियों की लाइफ़ में असर क्या होगा यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन गाड़ियों का एवरेज कम कम होने की ख़बरें हर तरफ़ से आ रही हैं। आम जनता के मन में उनकी गाड़ियों के एवरेज कम होने से जो प्रतिक्रिया हो रही है उससे यह लगता है E20 के बहाने यह लूट है। मुझे नंदन जी की कविता का अंश याद आया :
लूटने में कोई उज्र नहीं आज लूट ले,
लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूटमार के।
क्या आपकी गाड़ी में भी एथनॉल मिले पेट्रोल से एवरेज कम हो रहा है?

Thursday, July 02, 2026

बाजार से गुजरा हूँ लेकिन ख़रीदार नहीं हूँ

 

कल शाम को सड़क किनारे इलेक्ट्रॉनिक सामान बिकते देखे। सौ रुपये के पाँच। सड़क किनारे रखे सामान के लिए आवाज आ रही थी -‘ऑफ़र, ऑफ़र बम्पर ऑफ़र। सौ रुपए के पाँच आइटम।दो LED लाइट, एक चार्जिंग वाली लाइट, एक डाटा केबल और एक मोबाइल स्टैंड।’

दुकान के बगल में एक लड़का चार्जिंग वाली लाइट को ऊपर उछाल कर सड़क पर गिराकर उसकी मजबूती का प्रदर्शन कर रहा था। लाइट को ऊपर उछलते और नीचे गिरते देखकर मुझे कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब का शेर याद आया :
ज़िंदगी से कटता रहा, जुड़ता रहा मैं,
जैसे कोई माँ बच्चा खिलाए उछाल के
सौ रुपए के पाँच आइटम लेने वालों की भीड़ लगी थी। कुछ तमाशबीन थे। कुछ हमारे जैसे खलिहर वीडियोबाज। 'बाजार से गुजरा हूँ लेकिन ख़रीदार नहीं हूँ' घराने के लोग।
हमको वीडियो बनाते देखकर LED लाइट टेस्टिंग करने वाले ने लाइट और ऊपर उछलकर सड़क पर गिराई। लाइट टूटी नहीं।
सौ रुपए में पाँच आइटम बिकते देखकर मुझे अपने यहाँ के जनप्रतिनिधियों की याद आ गई। क्या उनके दाम भी इसी तरह लगते होंगे। कोई पैसे वाला किसी पार्टी से संपर्क करता होगा-‘ सौ करोड़ में पाँच प्रतिनिधि, बम्पर ऑफ़र।’
हो सकता है कोई जनप्रतिनिधि मेरी बात से नाराज न हो जाए। कहे -‘ हमको इतना सस्ता समझ लिया है। इतने में तो लागत भी नहीं निकलेगी।’

Wednesday, July 01, 2026

मेट्रो सुलभ शौचालय

 


आज मेट्रो से यात्रा हुई। गंतव्य पर पहुंचे तो एक बुजुर्ग ने पूछा -'टोकन कहाँ डालना है?'

हमने बताया। उन्होंने टोकन डाला। एग्जिट से बाहर निकल आए। एग्जिट से बाहर निकलकर इधर-उधर ताकते हुए उन्होंने हमसे बाहर का रास्ता पूछा। बाहर का रास्ता मतलब मेट्रो स्टेशन से बाहर जाने का रास्ता। हमने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा -'चलो, हम भी बाहर जा रहे।'
हम साथ चल दिए।
मेट्रो से लिफ्ट से बाहर आने तक बातचीत हुई। हमने पूछा -'कहाँ से आ रहे ?'
बोले -'कहीं से नहीं। शौचालय जाना था। रास्ते में कहीं शौचालय नहीं दिखा। मेट्रो स्टेशन दिखा। हमने दस रुपए का टोकन लिया। मेट्रो के शौचालय का उपयोग किया। बाहर निकल आए।'
मतलब मेट्रो स्टेशन का उपयोग सुलभ शौचालय की तरह। इतने रुपए किसी सुलभ शौचालय का उपयोग करने में भी लग जाते।
आगे बातचीत करते हुए बुजुर्ग ने बताया कि सिद्धार्थनगर के रहने वाले हैं।
उनका प्रोस्टेट का आपरेशन हुआ है। पिछले महीने। डॉक्टर को दिखाने आए थे। लौटते समय शौचालय की जरूरत पड़ी तो मेट्रो की शरण में आए।
स्टेशन से बाहर निकल मैं अपने लिए गाड़ी बुक करने लगा। बुजुर्ग फिर पास आए। पूछा -' हमारे साथ एक गांव का आदमी आया था। उसको बाहर रोककर गए थे। पता नहीं कहाँ चला गया। मिल नहीं रहा।'
हमने कहा -' यहीं कहीं होगा। फ़ोन कर लो।'
उनके पास फ़ोन नहीं था। बुजुर्ग इधर-उधर अपने साथी को खोजने में लग गए। क्या पता साथी भी हल्का होने मेट्रो स्टेशन चला गया हो।
हमारी सवारी आ गई। हम बुजुर्ग को स्टेशन पर छोड़कर चले आए। बुजुर्ग को अब तक उनका साथी मिल गया होगा।

Monday, June 29, 2026

गर्मी के मौसम में बिजली की जरूरत

 


आज सबेरे अखबार में खबर पढ़ी -' भड़के लोगों ने (बिजली विभाग के) जेई को 13 किमी तक दौड़ाया।'

गर्मी के मौसम में बिजली की जरूरत और सप्लाई में काफ़ी अंतर हो जाता है। जहाँ बिजली नहीं आती वे अपने गर्मी बिजली विभाग के नजदीकी दफ़्तर, अधिकारी पर उतारते हैं। गर्मी में बिजली विभाग के डिस्ट्रीब्यूशन आफिस में काम करना सबसे चुनौतीपूर्ण कामों में से एक है। पता नहीं कब पब्लिक दौड़ा ले।
लोगों का आक्रोश सहज प्रतिक्रिया है। लेकिन उनको यह भी समझना चाहिए कि जेई कोई बिजली अपने पास तो जमा करके रखता नहीं। सप्लाई जो आयेगी वही मिलेगी। दौड़ाने से बिजली आने लगे तो बिजली विभाग शायद पावर प्लांट बनाने की जगह धावक भर्ती करने लगे। भर्ती तो अब होती नहीं। ठेके पर रखे जायेंगे धावक।
13 किमी दौड़ाने के बाद रुक जाने का कारण शायद 13 अंक से जुड़ी अपशकुनी धारणा भी होगी। 13 अंक को अपशकुन न माना जाता तो क्या पता ज़्यादा दौड़भाग होती।
अख़बार में एक खबर यह भी थी -'भाजपाइयों ने सुनी मोदी के मन की बात।' खबर के शीर्षक से अंदाज़ नहीं लगता कि अब 'मन की बात' केवल भाजपा के लोग ही सुनते हैं या भाजपा के लोगों के लिए 'मन की बात' सुनना अनिवार्य है। क्या पता किसी मुलाक़ात में पूछ लिया जाये -'मन की बात' के 139 वे में अंक में क्या सुना?
दौड़ाए गए जेई की उन लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत कर देनी चाहिए -'साहब देखिए ये लोग आपके 'मन की बात' सुनने की बजाय हमको दौड़ा रहे थे। इन्होंने न सुना न सुनने दिया। हो सकता है शिकायत होने पर भीड़ के ख़िलाफ़ एक्शन हो जाता।
राम मंदिर के चंदा चोरी से जुड़े आरोपियों के ठिकानों से संपत्ति के दस्तावेज जब्त करने की खबर मुख्य खबर है अख़बार की। एक मित्र ने खबर पढ़कर कहा -" चंदे में पैसे की हेरा-फ़ेरी हुई है। पैसा हाथ का मैल है। बेचारे आरोपी लोगों के हाथ के मैल की सफ़ाई कर रहे थे। उनके ख़िलाफ़ कारवाई करना स्वच्छता अभियान के ख़िलाफ़ कार्यवाही करना है।"
हमने उनसे कहा -" तुम भी अजीब बात करते हो यार। तुम तो उन लोगों की तरह बात कर रहे हो जो कह रहे हैं कि जिसने चंदा नहीं दिया उसको चोरी पर सवाल उठाने का हक नहीं।"
मित्र ने हमको विधर्मी, नास्तिक और देशविरोधी बताकर हड़काया। हम हड़क गए। चाय के पैसे भी हमको देने पड़े। इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकते थे हम।
फ्रांस में गर्मी से 1000 लोगों के मरने की ख़बर भी है अख़बार में। पिछले चार-पाँच दिनों में इतने लोग गर्मी के कारण नहीं रहे। यह हाल 40 डिग्री तापमान पर है। भारत में तो गर्मी में कहीं -कहीं तापमान 50 डिग्री तक पहुंच जाता है। फ्रांस के लोग अगर इस तापमान में रहें तो उनके क्या हाल होंगे, कहना मुश्किल है। आफ़त में पड़ जाएँगे वे।
दुनिया भर में गर्मी बढ़ती जा रही है। कारण सबको पता है। हल भी पता है। लेकिन उस पर अमल की किसी को चिंता नहीं है। बड़े लोगों को लड़ाई से ही फुर्सत नहीं। दुनिया के सामर्थ्यवान लोग दुनिया की बर्बादी की कहानी लिखने में लगे हुए हैं। कभी-कभी तो लगता है कि दुनिया के बागडोर लोगों ने अपने यहाँ के छँटे हुए लोगों को सौंप दी है। ये लोग अपने यहाँ के पूजीपतियों के इशारे पर दुनिया की ऐसी-तैसी करने में जुटे हैं।
हम भी फ़िलहाल कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। अफ़सोस।

Saturday, June 27, 2026

तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन


 आज सुबह स्वीमिंग के लिए घर से निकले। सोसाइटी के गेट के पास एक गिलहरी सड़क पार करती हुई दिखी। हमारी गाड़ी के आगे से निकली। मतलब गिलहरी रास्ता काट गई। लेकिन गिलहरी के रास्ता काटने से कोई अपशकुन जुड़ा नहीं है इसलिए आगे बढ़ गए। दरबान ने गाड़ी देखकर अलसाये, अनमने मन से गेट से खोला। दिन भर में सैकड़ों बार गेट खोलना पड़ता है दरबान को।

गेट के बाहर निकलते ही एक बालिका पूरे शरीर को ढँके स्कूटी पर आते दिखी। केवल आँखे दिख रहीं थीं। एकदम पुतलीबाई सरीखी। धूप से बचाव के लिए मुफ़ीद ड्रेस। लेकिन इस चक्कर में सुबह की विटामिन डी का नुक़सान हो रहा होगा। सूरज की किरणों की  विटामिन डी की मिसाइल  'क्लॉथ डोम' टकराकर वापस लौट गईं होंगी।

रेलवे अंडरपास के आगे लाल पैथोलॉजी में काम करने वाली बच्ची सामने से आते दिखी। अक्सर दिखती है। सुबह पैथोलॉजी खोलने जाती है। वही टेस्टिंग के सैंपल भी लेती है। सर झुकाये मोबाइल में कुछ देखती चली आ रही थी। हमने हार्न बजाया। उसने सर उठाया। हाथ हिलाने पर उसने भी मुस्कराते हुए हाथ हिलाया। दाँत चमके। इसके बाद वह फिर चलते हुए मोबाइल देखने लगी।

चलते हुए मोबाइल देखने से कल की बात याद आई। चौराहे पर ट्रैफिक सिपाही एक हाथ से गाड़ियों को दिशा दे रहा था। दूसरे हाथ से मोबाइल थामे लगातार कहीं बतियाता जा रहा था। बतियाने से फुर्सत मिलती तो मोबाइल देखने लगता। उसकी मोबाइल निर्भरता देखकर लगा कि यह उसकी ड्यूटी का अपरिहार्य हिस्सा है। मोबाइल अलग कर दिया जाये तो शायद उसका ड्यूटी करने मुश्किल हो जाये।

स्वीमिंग सीखने में ब्रेस्ट स्ट्रोक (हाथ से) और फ्री स्टाइल (पैर से) के गठबंधन से शुरुआत की थी। कुछ दूर तक तैरने भी लगे थे। लेकिन फिर लगा कि तैराकी में गठबंधन सरकार चल नहीं पायेगी। इसके बाद पैर भी फ्री स्टाइल की जगह ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलाना सीखने लगे। सीखने से ज़्यादा मेहनत फ्री स्टाइल में पांव चलाना भूलने में लगी। दो दिन हुए हाथ और पांव ब्रेस्ट स्ट्रोक में चलना सीख लिए। बस दोनों का गठबंधन कराना है। हाथ और पैर के मूवमेंट का गठबंधन होते ही हमारी तैराकी की गृहस्थी बस जाएगी। 

आज अभ्यास करते हुए देखा कि हाथ और पैर दोनों फ्रीस्टाइल में चलने लगे। दोनों में गठबंधन सा हो गया है। करीब पाँच सात मीटर तैरे भी। अब बस कुछ दिन और अभ्यास की ज़रूरत है। इसके बाद स्टेमिना बनाना है। देर तक और दूर तक तैरना सीखना है। सीख जायेंगे। हमको कोई हड़बड़ी थोड़ी है। आराम-आराम से सीखेंगे। सीख रहे हैं।

आज हमारा तैराकी सीखने का पच्चीसवाँ दिन था। 

Friday, June 26, 2026

संस्कारी युवा पीढ़ी


 चारबाग रेलवे स्टेशन पर चाय पीते हुए अगल-बगल के नजारे भी देखते रहे। लोग आ-जा रहे थे। स्टेशन से गाड़ियों के आने-जाने की सूचनाएँ प्रसारित हो रहीं थीं। कोने के जीने से स्टेशन से बाहर की तरफ़ आने वाले यात्रियों की भीड़ देखकर लगा कि किसी ने आदमियों से भरा बोरा सीढ़ियों पर उलट दिया हो।

चाय जी दुकान के बगल में एक लड़का-लड़की अलग-अलग पोज में फ़ोटो खींच-खिंचा रहे थे। लड़के ने लड़की की कई पोज में फ़ोटो खींची। लड़की ने लड़के की। ढेर सारे अंदाज़ में साथ खड़े होकर सेल्फी भी ली दोनों ने। सेल्फी भी कभी लड़का लेता, कभी लड़की। कैमरे के सामने मुस्कराते हुए फ़ोटो ले रहे थे। लगातार मुस्कराने के चक्कर में जबड़े दर्द कर रहे होंगे। देर तक फ़ोटो यज्ञ चलता रहा।
लड़के के बाल खासे बड़े थे। गले में हेयर बैंड लटकाये था। लड़की के बाल सामान्य। दोनों ख़ुश मुद्रा ने थे। चहक़ योग कर रहे थे।
बात करने के लिहाज़ से मैंने मुफ़्त ऑफ़र दिया -‘ लाओ तुम्हारी साथ में फ़ोटो खींच दें।’ बालिका उत्साहित दिखी। लेकिन बालक ने सर झटक कर मना कर दिया। बालक ने बालिका को जिस अंदाज़ में देखा उसका कोई अनुवाद करता तो लगता वह कह रहा था -‘ अपन लखनऊ में किसी दूसरे से फ़ोटो नहीं खिंचवायेंगे।’
बालिका से बातचीत की। पता चला भोपाल से आए हैं लखनऊ। घूमने। बालिका ने अपना नाम बताया पल्लवी, बालक का राहुल। दोस्त हैं दोनों।सहज मिडिलची मानसिकता के प्रभाव में सोच लिया कि घर से बिना बताये आए हैं दोनों घूमने।
इसके बाद हाल की तमाम घटनाओं को बिना सिलसिले के याद किया। अपने-आप। पहले के दिनों के हिसाब से सोचते तो यही लगता कि बालक , बालिका को बहाने से लाया है साथ। लेकिन हाल की कुछ घटनाओं ने इस सोच को ख़ारिज किया। आख़िर ने तय किया कि कोई किसी को बरगलाकर नहीं लाया है। उम्र साथ लाई है दोनों को।
लड़का चंचल लग रहा था। समझदार होने का पूरा दिखावा कर रहा था। हमने लड़की से और बातचीत करने का प्रयास किया। लेकिन बालक अपनी मित्र को समेट के दूर कोने में ले गया। नए अंदाज़ में सेल्फी लेने के लिए। हमने बालक को दुष्ट मान लिया। दूसरों के बारे में राय बनाने में हम सहज सिद्ध होते हैं।
कुछ देर बाद बालक ने जेब से सिगरेट निकाली। सुलगाई। कश लेकर धुंआ हवा में छोड़ दिया। हमें लगा उसको टोंके-‘ भोपाली बालक, तुम भोपाल से लखनऊ की हवा ख़राब करने आए हो?’ लेकिन बोले नहीं।
दो-चार सुट्टे लगाने के बाद बालक ने सिगरेट बालिका को पकड़ा दी। बालिका ने भी सहज अंदाज़ में सुट्टे लगाए। देखकर लगा सिगरेट सुट्टा अभ्यासी है बालिका।
सिगरेट के कश खाते हुए बालिका ने इधर-उधर भी देखा। हम भी उसकी निगाह में आए होंगे। उसने हमको अपनी तरफ़ देखते देखा शायद। देख तो रहे ही थे हम उन दोनों को। दोनों घूम गए। पीठ हमारी तरफ़ करके सुट्टा लगाने लगे। हमको लगा-‘ बालिका कितनी संस्कारी है। बुजुर्गों का कितना लिहाज करती है। उनकी निगाह बेचकर सिगरेट पीती है। लोग ‘ बे-फ़ालतू’ में युवा पीढ़ी पर संस्कारहीन होने का आरोप लगाते हैं।’
सोचते तो हम और भी बहुत कुछ। लेकिन तब तक हमारे बेटे की ट्रेन आ गई। बेटा बाहर आ गया। हम उन बालक-बालिका के बारे में सोचने का काम वहाँ मौजूद जनता की सौंप कर बेटे के साथ घर की तरफ़ चल दिए।

Thursday, June 25, 2026

मैराथन चाय बालक


 कल चारबाग स्टेशन जाना हुआ। बेटे को लेने के लिए। दिल्ली से आने वाली लखनऊ मेल से। गाड़ी राइट टाइम थी। हम थोड़ा जल्दी पहुँच गए। चारबाग स्टेशन के सामने वाली दुकान पर चाय पी।

चाय की दुकान पर अकेला बच्चा था। वही चाय बना रहा था। बन मक्खन भी। बिस्कुट सामने कंटेशनर में रखे था। ज्यादातर लोग चाय पीने वाले थे। कुछ लोग बन मक्खन भी ले रहे थे। दुकान के सामने फुटपाथ पर कुछ लड़के-लड़कियां अपने सूटकेस पर बैठे थे। शायद कहीं बाहर से आए थे। शायद कोई इम्तहान देने आए होंगे। और किसी काम से भी आए हो सकते हैं। लेकिन स्टेशन पर  कोई युवा सूटकेस, बैग लिए दिखता है तो यही लगता है कोई इम्तहान देने आया है या इंटरव्यू। यह भी क्या पता इसका इम्तहान भी निरस्त होने वाला है।

सामने ही एक रिक्शेवाला अपने रिक्शे पर सो रहा था। शायद रात में रिक्शा चलाया हो। उसकी सुबह अभी हुई नहीं थी। 

चाय पीते हुय बच्चे से बात से बात की। उसने बताया कि वह लगातार 48 घंटे से जगा हुआ है। नींद आ रही। बहुत तेज आ रही है । लेकिन क्या करें? पहले भी कई बार इस तरह लगातार काम कर चुका है। उसका रिलीवर नहीं आया तो मजबूरी में काम पर लगा हुआ है। रिलीवर आयेगा तब छुट्टी होगी।  आँखों  में नींद की झलक थी। लेकिन बच्चा मुस्कराते हुए बात कर रहा था।

और बात करने पर पता चला बच्चा सीतापुर का रहने वाला है। पिताजी की बीमारी के चलते इंटर के बाद काम में लग गया।करीब डेढ़ साल हो गए काम करते।  अब पिताजी ठीक हैं। लेकिन बच्चे का काम जारी है। 

48 घंटे जागकर लगातार चाय बेचने की बात सुनकर ताज्जुब व्यक्त किया। उसने बताया कि एक बार लगातार तीन दिन काम किया। तीन दिन मतलब 72 घंटे। मैराथन चाय वाला। बालक ने बताया कि आमतौर पर उसकी ड्यूटी 24 घंटे की होती है। 24 काम फिर आराम। यही 24 घंटे कभी 48 और कभी 72 में बदल जाते हैं। 

लगातार काम करने का कारण बालक ने बताया -'दुकान जीजा की है। दीदी के घर रहता है। अपनी दुकान है। इसलिए देरी हो जाने के कारण भी करता रहता है। 

बालक ने कहा -'जाड़े में चाय बेचने में मजा आता है। उस समय  ग्राहक खूब आते हैं। जब ग्राहक आते हैं तो काम करने में मजा आता है।' 

एक चाय 15 की और बिस्कुट 5 रुपए का था। हमने बात करने के लालच में एक चाय और पी। चाय बनी भी बढ़िया थी। 

 सोचा 'माननीय चाय वाले' से कठिन मेहनत तो यह बालक कर रहा है। अनगिनत लोग कर रहे होंगे।  लेकिन उनकी चर्चा नहीं होती। आम लोगों की चर्चा नहीं होती। चर्चा ख़ास लोगों की होती है। चर्चा के लिए  इंसान  खास होना जरूरी होता है। आम लोगों के हिस्से 'चर्चा रस श्रवण' हो आता है। 

Friday, June 19, 2026

तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन


 आज सुबह तैराकी के लिए निकले। पराग डेयरी चौराहे के पहले एक बच्चा तेजी से सड़क पार करता दिखा। भागता, लड़खड़ाता, झुककर सीधे खड़ा होता। शायद सड़क किनारे के बने किसी घर में रहता होगा।   सूरदास जी कृष्ण जी के बालपन का वर्णन करते हुए लिखते हैं :

'किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत ।
मनिमय कनक नंद कै आँगन, बिंब पकरिबैं धावत ॥'

सड़क किनारे रहते घरों के बच्चों के लिए सड़क ही उनका आँगन होती हैं।वहीं वे  घुटनों के बल चलना, दौड़ना, भागना सीखते हैं। सड़क रूपी आँगन में मणियाँ नहीं लगी। बिम्ब नहीं बनते यहाँ।  बारिश के दिनों में अलबत्ता सड़क के गड्ढों में परछाइयाँ बनती होंगी। बच्चे उन परछाइयों को पकड़ने की कोशिश करते होंगे। लेकिन  कोई सूरदास इस पर कोई पद नहीं रचता। हर बच्चे का बचपन कृष्ण के बचपन सरीखा नहीं होता। 

बच्चे के गुजरने के इंतज़ार करते हुए कार रोकी। बच्चा डिवाइडर पारकर अपने घर में घुस गया। यहाँ तो सड़क है।हम अपने देश के बच्चे को बचाकर निकल रहे हैं।  ईरान, फ़िलिस्तीन में सड़क और घर में खेलते बच्चों का क्या हुआ होगा। खेलते-खेलते कोई मिसाइल उन पर गिरती होगी। वे 'शांत' हो जाते होंगे। युद्ध चलता रहता है। बाद में कभी समझौता होगा। जिन लड़ाई लोलुप, सत्ता लालची बुड्ढों ने युद्ध का बिगुल बजाया होगा वही लोग शांति का मसीहा बनकर पेश होते है। लड़ाई थमती है लेकिन अनगिनत बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों की क़ूबानी लेकर। 

आज शुक्रवार को ईरान-अमेरिका में शांति समझौता हुआ। देखना है कि यह सही में लागू हो पाता है क्या। ईरान-अमेरिका में शांति होते ही खबर आई कि यूक्रेन ने रूस की पाइप लाइन  पर ड्रोन  से हमला कर दिया। लगता है दुनिया हथियारों के सौदागर यह सुनिश्चित करते हैं कि दुनिया के किसी न किसी हिस्से में लड़ाई होती रहनी चाहिए। वे  दुष्यंत कुमार के शेर को अच्छे से याद करके अमल में लाते हैं:

'मेरे सीने (देश ) में न सही, तेरे सीने (देश) में सही, 

हो कहीं भी (युद्ध की) आग लेकिन आग जलनी चाहिए।'

कल डायना नायड की आत्मकथा  'Find a way ' के शुरुआती अंश पढ़े । डायना के पिता (सौतेले) ने बचपन से उनको जल्दी उठकर तैराकी का अभ्यास करने की आदत डाली। उनको ज़ेहन में बचपन से विश्वास दिलाया कि उनका नाम NYAD स्पेशल है। उनकी किसी और सहेली का नाम डिक्शनरी में नहीं होगा लेकिन नायड़ का नाम होगा। यह खास नाम है। डायना नायड ख़ास है।

डायना नायड  अपने सौतेले पिता  एरिस Aris को अपना असली पिता समझती रहीं। Aris का वर्णन करते हुए डायना नायड ने लिखा है -'वह जालसाज था। बहुभाषी था। 17 भाषाएँ जानता था। वाकपटु था। अपनी लच्छेदार बातों से लोगों को मुग्घ कर लेता था। डायना की सहेलियाँ उसने मिलने के बाद कहती थीं -'इतना शानदार व्यक्तित्व मैंने पहले कभी नहीं  देखा।' 

लेकिन एरिस Aris का दूसरा रूप भी था। वह असल में जालसाज था। क्रूर था। उसने डायना का 14 वर्ष की उम्र तक यौन शोषण किया। डायना घर में डरकर रहती थी। उनकी माँ जानने के बावजूद डायना को अपाए सौतेले पिता के यौन शोषण से बचा नहीं पायी। इसका उनके मन में अपराध बोध था। उनमें अपने बच्चों को बचाने के लिए, अपने पति के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत नहीं थी। इसका कारण शायद यह भी था कि वे बचपन में माँ-बाप के प्यार से वंचित रहीं। अपने पति के प्यार को खोने से डरती थी वे। बाद में हालांकि उन्होने अपने पति से तलाक लिया। यह शायद बच्चों की सुरक्षा के लिए बहुत देर से उठाया कदम था। 

डायना नायड की आत्मकथा इस मामले में अनूठी है। ख़ासकर इसलिए  कि उन्होंने अपने जीवन के निर्माण में शामिल लोगों के बारे में लिखते हुए आख़िर में उनकी अच्छाइयों के लिए उनको याद किया है। सौतेले पिता द्वारा अपने यौन शोषण के बावजूद उन्होंने दो बातों के लिए अपने पिता को धन्यवाद दिया :

"'विजेता' (चैंपियन) के रूप में मेरी खुद की छवि बनाना ।

नींद को छोड़कर तैराकी के अभ्यास को तरजीह देना।"

डायना नायड अपने मैराथन तैराक बनने के पीछे अपने सौतेले पिता द्वारा सिखाई इन बातों को सबसे प्रमुख मानती हैं।

डायना नायड की आत्मकथा अभी पढ़ रहे हैं। बाद में डायना नायड के समलैंगिक होने के पीछे भी कारण उनके सौतेले पिता द्वारा उनका बचपन में किया यौन शोषण कारण रहा? शायद इस बारे में डायना नायड ने आगे लिखा हो आत्मकथा में।

डायना नायड की यह आत्मकथा अंग्रेजी में हैं। किसी शब्द का मतलब डिक्शनरी में खोजने में समय लगता है। कल इसका उपाय मैंने यह निकाला कि गूगल के एआई वर्जन में जाकर किताब के पेज का फ़ोटो उसमें अपलोड करके निर्देश देते हैं -'हिंदी में अनुवाद करो (ट्रांसलेट इन हिंदी) । पूरे पेज का हिंदी अनुवाद फौरन सामने आ जाता है। उसको हम फटाक से पढ़ लेते हैं। कभी-कभी अंग्रेजी भी पढ़ते हैं जो कि हिन्दी के साथ पढ़ने में बेहतर समझ आती है।

आज पूल में अभ्यास किया। सर पानी में झुकाकर रखें रहे। पाँव चलाते रहे। सर उठाकर तैरते हुए साँस लेने में कुछ प्रगति हुई । लेकिन पूरी सफलता नहीं मिली। अलबत्ता अब हाथ चलाना सीख लिया है। यह पता चल गया कि कैसे हाथ चलाने से सर ऊपर उठेगा, साँस लेने के लिए। सबसे बड़ी बात कि सीखने में हड़बड़ी वाली भावना अब नहीं है। तसल्ली से तैरने का आनंद ले रहे हैं । तैरना मजेदार है। तैरते हुय साँस लेना सीखना है। सीख ही जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का अठाहरवाँ दिन था। 


Wednesday, June 17, 2026

तैराकी सीखने का सोहलवाँ दिन




 आज सुबह तैराकी के लिए सही समय पर पहुँच गए। ठीक आठ बजे। पढ़कर जो आए थे उसपर अमल शुरू किया। सबसे पहला सबक यह कि तैरते समय सर पर नीचे रखना है। जैसे हाई कमान के सामने मंत्री, संतरी, सांसद, विधायक रखते हैं। केवल साँस लेते समय सर उठाना है। बाक़ी समय सर नीचे ही रखना है। स्वीमिंग पूल के फर्श की तरह निगाह। कॉलेज के जमाने में रैगिंग के दिनों में जूनियर्स को अपने शर्ट की तीसरी बटन देखने को कहा जाता था। तीसरी बटन देखने का रिवाज तो लड़कों में था। लड़कियों में क्या रिवाज था यह पता नहीं। यह जरूर याद है कि उन दिनों में लड़कियों/लड़कों का अनुपात 1:50 से भी नीचे ही था। 

सर लगातार नीचा करके तैरने में लगा यह सही पोज है। पहले अक्सर सर बार-बार ऊपर करते थे। लड़खड़ा जाते थे। समर्पण मुद्रा में तैरने में तैरना सहज लगा। पहले बार-बार सर उठाकर ऊपर देखने में संतुलन गड़बड़ा जाता था। सर नीचे करके तैरने के साथ पांव लगातार चलाते रहना था। आज इसका अभ्यास किया। हमने तय किया कि रोज-रोज़ नई तरह से सीखने की बजाय मूल बात पर फ़ोकस करना जरूरी है। रोज़-रोज़ पोज बदलने में कोई फ़ायदा नहीं। पहले का अभ्यास छूट जाता है। तैराकी कोई राजनीति तो है नहीं जो दलबदल की तरह पोजबदल करके कुछ हासिल हो।

साथ सीखते बच्चे ने मुझे फिर से सिखाया। उसका एक दाँत टूटा हुआ है। उसने बताया स्कूल में खेलते समय टूट गया। दूध का दाँत है। इसकी जगह नया दांत आयेगा। क्या उसे चाय का दाँत कहाँ जाए। पूल किनारे बैठे पक्षी को देखते हुये उसने कहा -'वह ईगल हम लोगों की तरफ़ देख रहा है। कहीं काटेगा तो नहीं?' 

बगल में तैरती बच्ची ने सुनकर कहा -'वह ईगल नहीं कौआ है। काटेगा नहीं।' 

मेरे साथ तैरता बच्चा उसकी बात अनसुनी करते हुए पूल से निकलकर बाहर चला गया। इसके बाद पूल में डाइव करके फिर साथ में तैरने लगा। 

पूल में सिखाने वाली बच्ची एक बुजुर्ग महिला का हाथ पकड़कर उसको तैरना सिखा रही थी। हाथ पकड़कर पानी में उनको घसीटते हुए पैर चलाने को कह रही थी। महिला कुछ देर अभ्यास करने के बाद रुककर आराम करने लगी। हमने कोच बालिका से शिकायत की -'तुमने हमको तैरना नहीं सिखाया। अभी तक हम ठीक से तैर नहीं पाते।' 

बच्ची ने हमको शुरुआती दिनों में कई बार गाइड किया है। मेरी बात के जबाब में उसने कहा  -'आप तो सीख गए हैं अंकल। प्रैक्टिस करते रहिए। परफेक्ट हो जायेंगे।' 

साथ तैरते बच्चे के पिता बाहर से उसकी गतिविधि देख रहे थे। फोटो भी ले रहे थे। हमने उनसे अपना तैरने का वीडियो बनाने को कहा। उन्होंने कहा -'ठीक।'

वीडियो बनवाने के लिए हम पूल के अंदर थोड़ी दूर से (करीब छह -सात मीटर) तैरते हुए किनारे तक आए। वीडियो बना। मेरे मोबाइल पर भेज भी दिया उन्होंने। 

वीडियो देखते हुए अपनी कई कमियाँ पता लगी। एक तो पाँव सीधे की जगह थोड़े मुड़े हुए थे।  दूसरे पाँवों के आपस में तालमेल का अभाव था। दोनों पांव किसी प्रदेश के मुख्यमंत्री और आलाकमान द्वारा थोपे उप मुख्यमंत्री की तरह अलग-अलग बयान बाजी जैसी करते दिखे। हाथ के मूवमेंट देखकर भी लगा कि इनको बहुत फैलाने की जरूरत नहीं। औक़ात में रहने से ज़्यादा कुशलता से तैर सकेंगे। यह भी लगा कि अगर रोज़ वीडियो बनायें तो बेहतर समझ सकेंगे अपने मूवमेंट।

तैरते हुए, अभ्यास करते हुए आज एक दो बार सर ऊपर करके साँस भी ले ली। ऐसा लगा मानो पूल के पानी को झांसा देकर हवा गटक ली हो। जल्दी ही तैरते हुए नियमित साँस लेना सीख जाएँगे।

आज हमारा तैरना सीखने का सोहलवाँ दिन था।






हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्रीस्ट्रोक


 शनिवार को शाम को गए स्वीमिंग के लिए। साथ में तैरते एक बच्चे ने कहा -'हम आपको सिखाते हैं स्वीमिंग।' हमने कहा -'सिखाओ।'

बच्चे ने हमको पहले, दूसरे दिन के सबक सिखाये। हमको वो आते थे। फिर भी हमने उसके कहने पर वो दोहराये। बच्चे ने कहा -'गुड, ऐसे ही करिए। सीख जायेंगे।'
बच्चा ख़ुद सीख रहा है। बाँह में फ़्लोटर जैसे बाँधे हुए था। उसके सिखाने का अनुभवि मजेदार रहा।
पूल में जितने कोच हैं उतनी सलाहें देते हैं। कोई कहता है ब्रेस्ट स्ट्रोक के साथ पांव भी उसी तरह चलाइये। हम अपने पैर और हाथ की तकलीफ़ के बारे में बताते हैं। वह कहता है -'ठीक है। ऐसे ही चलाइये।'
दूसरा कोच कहता है -'जिस तरह सहज हैं उस तरह करिए। तकलीफ़ वाले स्टेप्स मत लीजिए। प्रैक्टिस करिए। हो जाएगा।'
एक दिन हमने पैर ब्रेस्ट स्ट्रोक के हिसाब से चलाये। किनारे का पाइप पकड़कर प्रैक्टिस की। लेकिन जब तैरने लगे तो पाँव फ्री स्टाइल में ही चले। पाँव फ्री स्टाइल में, हाथ ब्रेस्ट स्ट्रोक के हिसाब से। विभिन्न विचारधारा वाली पार्टी का गठबंधन। तालमेल नहीं हुआ।
सीखा हुआ भुलाकर नए सिरे से करना तैराकी सीखने के लिए सयोनी घोष हो जाना हुआ। इरादा बदल दिया। जिस तरह सीख रहे थे वैसे ही सीखेंगे।
कल नेट पर जानकारी ली। हाथ ब्रेस्टस्ट्रोक और पांव फ्रीस्ट्रोक के साथ तैरना संभव है ? नेट बाबू बोले -'एकदम संभव है।'
इसके बाद तैरते हुए साँस लेने के तरीक़े, तरकीबें भी बताई नेट ने। हमने सीख ली। तैराकी के बारे में वीडियो देखते हुए बचपन में पढ़े हुए विज्ञान के सबक दुबारा सीखे। प्लवन (तैरने) और गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत फिर से पढ़े। गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत तो जैसे मुस्कराते हुए गाना गा रहा था -' जहाँ जाइएगा, हमें पाइयेगा।'
तैरने समय फेफड़े में भारी साँस तैरने में सहायता देती है। शरीर का वजन विरोध करता है। दोनों में संतुलन बनाना सबसे अहम मुद्दा है। साथ चुनाव लड़ती दो विभिन्न पार्टियों के बीच सीटों के तालमेल जैसा ही जटिल मुद्दा। जल्दी तय नहीं हो पाता। लेकिन हो तो जाता ही है।
आज अभी जा रहे हैं स्वीमिंग के लिए। कल जो थ्योरी पढ़ी है उसको अमल में लाने की कोशिश करने। देखते हैं कितना कर पाते हैं।
स्वीमिंग पूल में डायना नायड को भी जरूर याद करते हैं। उनकी सीख भी :
1. हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए (Never Ever Give up)
2. अपने सपनों को पूरा करने के लिए आपकी उम्र कभी भी ज़्यादा नहीं होती (You are never too old to chase your dream)
3. यह देखने में भले ही एक व्यक्ति का खेल लगता है, लेकिन असल में यह एक टीम वर्क है (It looks like a solitary sport, but it's a team)
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Tuesday, June 16, 2026

राजनीतिक पार्टी में निवेश


 टीएमसी के बागी विधायकों/सांसदों के NCPI में विलय  समाचार सुने। NCPI को पिछले चुनाव में कुल 822   वोट मिले थे। जबकि बागी सांसदों को कुल एक करोड़ वोट मिले थे। मतलब NCPI के वोटों से 12000 गुना। अपने से बारह हज़ार गुना छोटी पार्टी में विलयातुर सांसदों को देखकर कृष्ण बिहारी नूर का यह शेर याद आता है :

"मैं एक कतरा (बूँद) हूँ, मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।" 

यह एक खुद्दार इंसान का बयान है। अपने स्वाभिमान को बचाकर रखने की ज़िद है। बूँद भले ही छोटी है लेकिन उसका अलग अस्तित्व है। सागर से मिलने पर उसका अस्तित्व मिट जाएगा। यहाँ तो सागर (बागी सांसद) बूँद (NCPI) में मिलने को छटपटा रहा है। 

लेकिन खबर यह भी है कि वे सागर में नहीं महासागर (NDA) में मिलेंगे। यह मिलन  द्वारा उचित माध्यम (NCPI) होगा। एकदम सरकारी अंदाज़ में। टीएमसी के सासंद  NCPI के कंटेनर  में जमा होंगे। NCPI का कंटेनर NDA के समन्दर में उलट दिया जाएगा। तर्पण होगा टीएमसी के बागी सांसदों का। 

लेकिन जिस तरह का उचक्कापन और अवसरवादिता टीएमसी के बागी सांसदों ने दिखाई है उसके खिलाफ बागी लोगों को एतराज होगा। बगावत का मतलब किसी स्थापित सत्ता, नियम, या अधिकार (Authority) के खिलाफ खुले तौर पर विरोध या विद्रोह करना है। यहाँ तो स्थापित सत्ता से जुड़ने का काम हो रहा है। भगोड़ेपन को बागी कहना ठीक नहीं। 

पानसिंह तोमर फ़िल्म का डायलग याद आता है -"बीहड़ में तो बागी होते हैं, डकैत मिलते हैं पार्लियामेंट में।"   हो सकता है कोई भूतपूर्व बागी टीएमसी के भगोड़े लोगों द्वारा ख़ुद को बागी कहने के ख़िलाफ़ याचिका डाल दे। 

टीएमसी के चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बनना सहज बात हो सकती है। लेकिन जिस बेशर्म तरीके से उनसे जुड़े सासंद उनसे अलग होकर एकदम ख़िलाफ़ पार्टी से जुड़ने का उपक्रम कर रहे हैं वह शर्मनाक है। सत्ता में रहते विरोध करके अलग हो जाते तो बहादुरी समझ में आती। इस तरह के धोखेबाजी समाज के लिए धोखेधड़ी की एक और मिशाल कायम करना हुआ। लोग बेशर्मी से किसी को धोखा देंगे और नजीर में कहेंगे -'इन लोगों ने भी तो किया था। जब वे कर सकते हैं तो हम क्यों न करें।' अलग तरह की पार्टी कहलाने के नारा लगाने वाली पार्टी के लोग अपनी हर चिरकुटई को बेशर्मी से सही ठहराते हुए कहती है -' हमारे पहले वाली  पार्टी ने भी तो किया था ऐसा?' 

अरे जब पहले वाली की तरह आप भी गड़बड़ कर रहे हैं तो आपमें और उनमें अंतर क्या है? अन्तर शायद इस बात का है कि वो थोड़ा शर्माते हुए करती थी, अब सब धांधली, गड़बड़ी खुल्लमखुल्ला हो रही है। गड़बड़ियों में खुलापन आ गया है। पारदर्शिता आई है। 

अवसरवादिता , धोखाधड़ी आज की राजनीति का जरूरी तत्व हो गया है। जो धोखा देना नहीं जानता, मौके के हिसाब से पाला बदलना नहीं जानता वह शायद राजनीति के लिए मिसफ़िट है।

NCPI की स्थापना में एकाध लाख रुपए खर्च हुए थे। सांसदों और विधायकों द्वारा इस  पार्टी को ज्वाइन करने के बाद इसकी क़ीमत अरबों में हो जायेगी। इससे अच्छा रिटर्न आन इन्वेस्टमेंट और कहाँ होगा आज के दिन। NCPI को अपना नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड में लिखवाने के लिए अप्लाई कर दे देना चाहिए। निवेश पर सबसे तेज  लाभ का रिकार्ड। 

क्या पता कल को आपस की बातचीत में शेयर के बिजनेस करने वाले राजनीतिक पार्टी बनाने में पैसा लगाने लगें। आपस की बातचीत में कहने लगें -' सोचते हैं कुछ शेयर बेचकर दो-चार राजनीतिक पार्टी बना लें। आजकल इन पर अच्छा रिटर्न मिल रहा है।'

क्या आप भी कोई राजनीतिक पार्टी बनाने की सोच रहे हैं। 

Monday, June 15, 2026

कार का पंचर बनवाते हुए वीडियोग्राफी

 




शनिवार को स्वीमिंग पूल सुबह बारिश के कारण बंद हो गया था। शाम को गए। जाते समय कार के डैशबोर्ड में दायीं तरफ़ बल्ब जैसा जला। हमें लगा कोई वार्निंग है। हमने दायें-बायें देखा। समझ में नहीं आया। एक दिन पहले घर से सामने तिराहे पर जली कार का ध्यान आया। हमें लगा हमारे साथ भी कोई हादसा न हो जाये। हम शीशा खोलकर गाड़ी चलाते हुए गए स्वीमिंग पूल तक। कार का एसी ऑन, शीशा खुला। बेवक़ूफ़ी के सौन्दर्य का मुजाहिरा।

स्वीमिंग पूल से लौटकर सोचा कार दिखवा लें। वार्निंग सिग्नल अभी भी था। अब डैशबोर्ड में एक तरफ़ लिखा हुआ भी आ रहा था -' बायें पहिए की हवा कम है।' हमें लगा शायद बल्ब जैसा जलना भी उसी कारण होगा। धीरे-धीरे कार चलाते हुए हवा की दुकान पर पहुँचे। हमने कहा -'हवा भर दो।'
हवा भरने के लिए टायर देखा गया तो पाया गया टायर में एक कील घुसी हुई है। इसी कारण हवा कम है। उसने बताया पंचर है। हमने कहा -'बना दो।'
कार पंचर बनाने के लिए सौंपकर हमने डैशबोर्ड का फोटो लिए। AI को दिखाकर पूछा -'इसका मतलब क्या है?'
AI ने फौरन बता दिया -'कार के पहिए में हवा कम है।'
हवा का इलाज पंचर बनाकर हो ही रहा था। हम इधर-उधर के नज़ारे देखने लगे। एक लड़की अपने भाई -बहनों को साथ लिए रील जैसा कुछ बनाती जा रही थी। उसको देखकर हमने भी सड़क पर आते-जाते लोगों की रिकार्डिंग शुरू की। इस बीच अमेरिका से Atul Arora का फ़ोन भी आया। उन्होंने बताया कि जल्दी ही वो हमको वीडियो एडिटिंग सिखायेंगे।
कई मजेदार सीन दिखे इस बीच। एक कुत्ता लंगड़ाता हुआ जाता दिखा। कई लोग हमको देखकर फुर्ती से निकले। पंचर वाले ने पूछा (बाद में) -'क्या आप वीडियो बनाते हैं?'
हमने कहा -'सीख रहे हैं।'
वीडियो बनाकर घर आ गए। सोचा कि एक और वीडियो बनाकर दोनों को जोड़कर एक वीडियो बनायेंगे। आज देखा तो यह काम किया गया। देखिए कुल क़रीब आठ मिनट की वीडियोबाज़ी। देखिए हमारे आसपास का नजारा। बताइए कैसा लगा ?

हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए

स्वीमिंग पूल 

 कल डायना नायड की ऑटोबायोग्राफी (Find a way) पर आधारित फ़िल्म Nyad (नेटफ़्लिक्स पर) देखी। दो घंटे की इस फ़िल्म में डायना नायड द्वारा पाँचवे प्रयास में क्यूबा से फ्लोरिडा की 103 मील (165.76 किलोमीटर) दूरी तैरकर पार करने का विवरण है। इनमें पहला प्रयास डायना नायड 28 साल की उम्र में किया था। असफल रहीं। मैराथन तैराकी के कई रिकार्ड बनाने के बाद उन्होंने तैराकी छोड़ दी। 

60 साल की उम्र में, अपनी माँ की मृत्यु के बाद, उनको अपना बचपन का सपना फिर याद आया। उन्होंने फिर से तैराकी शुरू की। तीन बार फिर असफल रहीं। समुद्र में पायी जाने वाली भयंकर जहरीली जेली फिर के डंक से मरते-मरते बचीं। भयंकर समुद्री तूफ़ान में फँसकर मरते हुए बची। उनके साथियों ने मान लिया कि वे शायद इस उम्र में इस काम के लायक नहीं हैं। उनकी पक्की सहेली बोनी और  मुख्य नेविगेटर जॉन बार्टलेट ने उनके पाँचवे प्रयास में जुड़ने से मना कर दिया था (फ़िल्म के अनुसार)। लेकिन डायना नायड की जिद थी कि वे फिर प्रयास करेंगी। 

बोनी और जॉन बार्टलेट डायना की जिद के चलते उनसे फिर से जुड़े। डायना ने  103 मील की दूरी तैरकर पार की। क्यूबा से फ्लोरिडा की 103 मील की यह दूरी तय करने में डायना  को 110 मील 177 किलोमीटर तैरना पड़ा। यह दूरी उन्होंने करीब 53 घंटे में तय की। मतलब तैरने की गति लगभग 3.34 किलोमीटर प्रतिघंटा रही। 

फ्लोरिडा पहुँचने वहाँ जमा भीड़ को संबोधित करते हुए  डायना नायड ने तीन बाते कहीं :

1. हमें कभी भी, किसी भी हाल में हार नहीं मानना चाहिए (Never Ever Give up)

2. अपने सपनों को पूरा करने के लिए आपकी उम्र कभी भी ज़्यादा नहीं होती (You are never too old to chase your dream)

3. यह देखने में भले ही एक व्यक्ति का खेल लगता है, लेकिन असल में यह एक टीम वर्क है (It looks like a solitary sport, but it's a team) 

डायना नायड ने अपनी सफलता का श्रेय अपनी कोच बोनी स्टोल और अपनी 35 लोगों की मेडिकल और नेविगेशन टीम को दिया, जिनके बिना यह मुमकिन नहीं था। 

डायना नायड के मुख्य नेविगेटर जॉन बार्टलेट इस अभियान के दौरान बीमार थे। इसके बावजूद वे इससे जुड़े। अभियान की इस ऐतिहासिक सफलता (2 सितंबर 2013) के कुछ ही महीनों बाद, 10 दिसंबर 2013 को 66 वर्ष की आयु में जॉन बार्टलेट का सोते समय अचानक निधन हो गया था।

अपने सपने पूरा करने की ज़िद, मेहनत, लगन और समर्पण के साथ टीम वर्क के कारण डायना नायड ने  अपना बचपन का सपना पूरा किया। उस समय उनकी उम्र 64 वर्ष थी। उनके पहले और बाद में भी अभी तक यह दूरी किसी ने तैरकर (बिना शार्क पिंजड़े के) किसी ने तय नहीं की है।

डायना नायड़ की कहानी बताती है -कोई काम नहीं है मुश्किल, जब किया इरादा पक्का।

आपका भी कोई सपना है जिसे आप पूरा करना चाहते हैं?