Monday, November 23, 2020

सड़क , पगडंडी और राजपथ

 

कल सुबह आर्मी गेट पर इकट्ठा होना था। सुबह साढ़े सात बजे। इस गेट से ही हम रोज आते-जाते हैं। कार से। कार पर महाप्रबन्धक या निर्माणी की गाड़ी का बोर्ड लगा होता है। गेट पर तैनात जवान गाड़ी देखते ही गेट खोल देते हैं। हम निकल जाते हैं। लेकिन कल साइकिल पर थे। लेकिन न तो साइकिल पर और न अपन के चेहरे पर महाप्रबन्धक लिखा था। गेट पर तैनात जवान ने सवालिया निगाहों से कहा –’इधर से जाना मना है।’ हमने बताया-’हम फ़ैक्ट्री के महाप्रबन्धक हैं, रोज इधर से ही जाते हैं।’
जवान ने बताया –’लेकिन हम तो आपको नहीं पहचानते ।'
इससे यह सीख मिली कि आप क्या हो और अपने को क्या मानते हो यह हमेशा जरूरी नहीं होता। जो मायने रखता है वह यह कि लोग आपको क्या मानते हैं, किस रूप में जानते हैं।
बहरहाल, हमने बताया तो गेट खुल गया। बाहर जाना था इसलिये खुल गया जल्दी। अन्दर आना होता तो शायद कुछ देर और बतियाना होता। उसी समय मन किया कि एक बोर्ड चेहरे पर भी लगवा लें, महाप्रबन्धक का। कोरोना काल में ऐसा करना आसान भी है। मास्क पर लिखवा लें-’ महाप्रबन्धक, आयुध वस्त्र निर्माणी, शाहजहांपुर।’
गनीमत है कि ऐसे बेवकूफ़ी के आइडिये जितनी तेजी से आते हैं दिमाग में उससे ज्यादा तेजी से गायब हो जाते हैं।
बाहर साइकिल साथी इन्तजार कर रहे थे। अगल-बगल के पार्कों में लोग क्रिकेट और दीगर चीजों में मशगूल थे। हम लोग मऊ की तरफ़ चल दिये।
रास्ते में धूप खिली हुई थी। सूरज भाई धूप की सर्चलाइट हमारे चेहरे पर मार रहे थे। आंखें धूप से तर-बतर हो गयीं। सड़क पर भी धूप जगर-मगर कर रही थी। सड़क का हर टुकड़ा जगमगा रहा था। कोने के मैदान में लोग बास्केट बाल खेल रहे थे।
मऊ की तरफ़ जाने वाली सड़क पर गढ्ढे किसी खूबसूरत चेहरे पर चेचक के दाग की तरह खिले हुये थे। साइकिल का पहिला एक चक्कर पूरा करने में चार गढ्ढों से होकर वापस आता। ऊपर नीचे होते हुये उसकी झल्लाहट हमको साइकिल की गद्दी और हैंडल की मार्फ़त साफ़ पता चल रही थी। सड़क के गढ्ढों से बेखबर हम आगे बढते रहे।
आगे एक जगह दीवार पर हिंदी और अंग्रेजी में लिखा था -'दीवार फांदने वाले को गोली मार दी जायेगी। यह चेतावनी पढ़कर लगा कि अनपढ़ या फिर हिंदी अंग्रेजी न जानने वाले इससे कैसे खबरदार होंगे। रात में कैसे दिखेगी यह चेतावनी।' इससे ज्यादा और कुछ सोचने का मन नहीं हुआ।
आगे अगल-बगल के खेतों के बाद बस्ती शुरु हुई। लोग अपने-अपने घरों के बाहर धूप सेंकते बतियाते बैठे थे। कुछ दुकानों के बाहर गप्पाष्टक कर रहे थे। एक बच्चा सड़क पर टहलता हुआ दिखा। उसके मां-बाप उसे पीछे से सहेजते-दुलराते हुये चल रहे थे। हमने रुककर उसको फ़ोटियाया। बच्चे को प्यारा बताया तो बच्चे के मां-बाप भी बच्चे की तरह प्यारे हो गये। नाम पूछा तो पता चला बच्चे का नाम बताया गया –तबिश। हमने बच्चे के नाम का मतलब पूछा तो बाप ने कहा –हमको पता नहीं। हमने पूछा –तुम्हारा क्या नाम? उसने बताया - मुजम्मिल। हमने मुजम्मिल का मतलब पूछा उसको वह भी नहीं पता था। मां ने नाम बताया –मदीना। वही सबसे आसान नाम। मांओं के नाम और काम वैसे भी सबसे आसान होते हैं।
बाद में पता किया तो ताबिश का मतलब होता है- स्वर्ग, मजबूत, बहादुर, जोरदार। मुजम्मिल का मतलब –लिपटे हुये। मदीना का नाम का मतलब मिला – सौंदर्य की भूमि। लोग अपने नाम का मतलब जाने बिना ही जिन्दगी निकाल देते हैं।
आगे एक बच्चा बीच सड़क पर अपनी रिक्शे टाइप की गाड़ी लिये अकेले शान और अकड़ के बोध के साथ टहल रहा था। अपनी गाड़ी को तख्ते-ताउस की तरह संभाले बच्चा बड़ा प्यारा लग रहा था। आगे एक मस्जिद के पास से कुछ बच्चे निकल रहे थे। एक बच्चा सर पर टोपी लगाये किताब सीने से लगाये सर झुकाये चुपचाप चला जा रहा था।
तमाम पक्के मकानों के बाहर की कच्ची नालियों में पानी और कीचड़ जमा हुआ था। पानी कम कीचड़ ज्यादा। गोया किसी लोकतांत्रिक सरकार का मंत्रिमंडल हो जिसमें शरीफ़ मंत्री कम, दागी ज्यादा हों। उस नाली के पानी और कीचड़ के गठबंधन में कुछ पक्षी अपना दाना-पानी तलाश रहे थे। एक पक्षी अपने हिस्से का दाना-पानी लेकर उड़ गया। उसकी उड़ान देखकर लगा कोई घपलेबाज घपला करके विदेश फ़ूट लिया हो। उड़ते हुये पक्षी के पंजे से छूटा हुआ कीचड़ जगह-जगह छितरा रहा था।
एक बड़ी होती बच्ची अपने घर की चौखट पर खड़ी शीशा हाथ में लिये अपना चेहरा देख रही थी। चेहरा देखते हुये अपने चेहरे को साफ़ भी करती जा रही थी। शायद कोई कील निकाल रही थी। उसको देखकर हमको एक पोस्ट याद आ गयी जिसमें मैंने लिखा था:
“किरण एक बच्ची की नाक की कील पर बैठकर उछल-कूद करने लगी। नाक की कील चमकने लगी। उसकी चमक किसी मध्यम वर्ग की घरैतिन को सब्सिडी वाला गैस सिलिन्डर मिलने पर होने वाली चमक को भी लजा रही है। रोशनी से बच्ची का चेहरा चमकने लगा है, आंखों और ज्यादा। आंखों की चमक होंठों तक पहुंच रही है। लग रहा है निराला जी कविता मूर्तिमान हो रही है:
नत नयनों से आलोक उतर,
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।“
खेतों में सूरज भाई का जलवा बिखरा हुआ था। हर पौधा अपने सर पर ओस का मुकुट पहने हुये था। सूरज की किरणें ओस के बूंदों पर कूद-कूद कर हर पौधे को चमका रहीं थीं।
आगे सड़क किनारे एक कुत्ता निपट रहा था। सड़कों के किनारे कुत्तों के सुलभ-शौचालय होते हैं। पीछे की दोनों टांगे चौड़ी करते हुये सड़क पर निपटते हुये कुत्ते के चेहरे पर कब्ज-पीड़ा की झलक दिखाई दी। निपटने के बाद कुत्ते के चेहरे पर दिव्य-निपटान की आनंद पसर गया।
कुछ देर में हम कच्ची-पक्की-सड़कों के विविधता भरे रास्तों से निकलकर राजपथ पर आ गये। सड़क चौड़ी हो गयी। विविधता खत्तम। एकरसता शुरु।
आगे ओवरब्रिज के पहले एक बुजुर्ग अपने हाथ रिक्शा पर बैठे बीड़ी पी रहे थे। मुंह के बचे हुये चन्द दांत पीले थे और मैल की परतों के सहारे अपनी रक्षा करते दिखे। बुजुर्गवार 70-75 के थे। बताया –’मांगन जा रहे।’ मांगकर खाना उनका रोजगार है। अपने यहां तमाम लोग मांगने-खाने को रोजगार की तरह मानते हैं। पूरी दुनिया में बेरोजगारी बढती जा रही है। इसको एक झटके में इलाज करने का एक ही तरीका है –मांगकर खाने को भी रोजगार घोषित कर दिया जाये। दुनिया के सारे बेरोजगार एक दिन में ही बारोजगार से बेरोजगार हो जायेंगे।
हमारे साथ के अग्रवाल जी ने उस बुजुर्ग को कुछ पैसे देने चाहिये। फ़ुटकर थे नहीं तो बुजुर्ग के हिस्से में आये पचास रुपये। बुजुर्गवार ने बिना किसी अतिरिक्त उत्साह के उसे ग्रहण किया।
यहां पर अग्रवाल जी अपने पोते सार्थक के साथ अपने एक कर्मचारी के यहां के लिये निकल लिये। जाने से पहले उन्होंने हमको एक अपने द्वारा संकलित सूक्ति संग्रह भेंट किया। पुस्तक भेंट का कार्यक्रम राजपथ पर संपन्न करके अग्रवाल जी चले गये। बाकी बचे हम लोग आगे बढ गये।
पुल के ऊपर खड़े होकर हमने फ़ोटोबाजी की। इसके बाद आगे सड़क किनारे एक ढाबे में बैठकर चाय पी गयी।
ढाबे पर चाय वाले गुप्ता जी बड़े मन से पकौड़ी बना रहे थे। एक-एक पकौड़ी को कड़ाही में डालते हुये अगली पकौड़ी बनाते जा रहे थे। सारी पकौड़ियां कड़ाही में पहुंचकर फ़ुदकने लगीं ऐसे जैसे जनप्रतिनिधि लोग मंत्रिमंडल में शामिल होकर फ़ुदकने -उचकने-बयान देने लगते हैं। एक पकौड़ी कुछ ज्यादा ही उछल गयी। कड़ाही से उछलकर जमीन में आ गिरी। गर्म तेल की जगह सड़क की धूल में लोटपोट होने लगी। कभी अर्श पर थी अब फ़र्श पर।
गुप्ता जी ४२ साल से दुकान चला रहे हैं। पहले कहीं और थी दुकान। उजड़ गयी तो यहां आ गये। सडक किनारे जमा लिया ढाबा। जब आये थे तब कन्धे तक घास थी। सब साफ़ करके बनायी जगह। चलते हुये एक पांव मोटा दिखा गुप्ता जी का। पता चला फ़ीलपांव है। कोई इलाज नहीं इसका।
“कैंसर के बाद दूसरी लाइलाज बीमारी है –फ़ीलपांव”– बताया गुप्ता जी ने।
सारे कष्टों के बयान के बावजूद गुप्ता जी के चेहरे पर दैन्य भाव कहीं नहीं दिखा। वे कहते भये-“ ईमानदारी से मेहनत करने से हर समस्या का हल निकल आता है।“
चाय पीते हुये हमने इधर-उधर के फ़ोटो भी लिये। बगल के सरसों के खेत को अपनी यात्रा का भागीदार बनाया। तब तक अग्रवाल जी भी सार्थक के साथ हमारे साथ वापस जुड़ गये। हम वापस हो लिये।

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Tuesday, November 17, 2020

एक प्यार का नगमा है....

 

इतवार की सुबह दीपावली के खुमार में डूबी थी। रात रोशनी के हल्ले में नीरज जी की कविता मूर्तिमान हो गयी होगी:
'लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग
उषा जा न पाए, निशा आ न पाए।'
इसी सड़क पर लोग कम थे लेकिन थे। एक आदमी एक हाथ में डंडा लिए दूसरे हाथ थे अकड़ मुद्रा में सिगरेट पीता हुआ चला जा रहा था। ऐसे जैसे सफेद सीको पटाखा मुंह में धरा हो, बस छूटने की देर।
दुर्गा होटल के पास सड़क पर सजावटी, लोहे के पाइप की बनी, साइकिलें धरी थी। रात खूब सजी होंगी। फूल, पत्ती, रोशनी के मेकअप में खूबसूरत लग रहीं थीं। सुबह सूरज की रोशनी में बिना मेकअप की उनींदी बुजुर्गियाती नायिकाओं सरीखी लग रही थी लोहे के जरिये से बनी साइकिल।
शहीद पार्क के पहले मंदिर पर मांगने वालों की महफ़िल जम गई थी। सड़क किनारे लाइन से बैठे लोगों को दान देकर लोग पुण्य कमाते जा रहे थे। एक भाईसाहब थर्मस में चाय लिये सबके ग्लास में उड़ेलते जा रहे थे। थर्मस से निकलती चाय भाप उड़ाती हुई उनके ग्लास में स्थान ग्रहण करती जा रही थी। चाय पीते हुए लोगों के मुखमंडल पर सुबह के संतोष ने अपना तंबू तान दिया था।
शहीद पार्क पांच मिनट देर से ,0735 पर पहुंचे। कुल जमा पांच साइकिल सवार थे। बाकी दीपावली की सुस्ती और खुमारी की भेंट चढ़ गए। नन्हे साइकिल साथी सार्थक अलबत्ता मौजूद थे। उनके दादा जी की साइकिल की ब्रेक जाम हो गयी थी। एन टाइम पर पता चला। ठीक भी न करा पाए। लिहाजा सार्थक को हमारे साथ छोड़कर वापस चले गए।
सड़कें शान्त थी। इक्का-दुक्का मजदूर दिहाड़ी की आशा में सड़क किनारे, चबूतरों पर इंतजार में थे कि शायद कोई उनको ले जाने वाला मिले। कुछ लोग ग्राहक के इंतजार में बीड़ी फूंक रहे थे। कुछ लोग बतिया रहे थे। बाकी शान्त थे।
घरों के बाहर जमा लोग अपने हिसाब से व्यस्त थे। कोई सड़क धो रहा था। कोई समसामयिक स्थिति पर बयान जारी कर रहा था। एक आदमी 'यहां भैंस का ताजा दूध मिलता है' का बोर्ड लगाए दूध बेंच रहा था। शहर अलसाया सा ऊंघ रहा था। जगने के पहले की नींद मलाई मार रहा था।
शहर के बाहर निकलकर आये। खेतों में लोगों ने फसलों को जानवरों से बचाने के लिए कांटे के तार लगा रखे थे। एक जगह तारों पर पुराने कपड़े भी लटके दिखे। आदमियों ने जंगल काटकर गांव , शहर बनाये। जंगल के बाशिन्दे जानवरों की एंट्री बैन कर दी। अब जानवर बेचारे कहां जाएं। वे कौन सा तार, कौन सी बाड़ लगाएं इंसान की घुसपैठ रोकने के लिए?
एक खेत में पाकड़ का घना पेड़ दिखा। चारों तरफ से जमीन तक झुका हुआ। ऐसे जैसे धरती ने 'पाकड़ मास्क'लगा रखा हो। एक खेत में दो नीम के पेड़ पक्की सहेलियों की तरह सटे हुए, गलबहियां सी किये खड़े थे।
आगे एक गांव पड़ा। नाम पता चला -'शहबाजनगर बड़ा'। हमने पूछा कोई छोटा भी है शहबाजनगर ? बोले -'न। बस बड़ा ही है।' आबादी पूछने पर बताई गई -एक हजार।' लेकिन आबादी बताने से ही संतोष नहीं मिला उसको। फौरन बताया 500 वोट हैं। अगले ही क्षण उसने वोटों की संख्या 750 कर दी।
एक चारपाई पर बुजुर्गवार खटिया के तख्तेताउस पर विराजमान थे। घर के बाकी सदस्य रियाया , दरबारी की तरह उनके आसपास बैठे धूप सेंक रहे थे। समय कत्तई ठहरा हुआ था। कोई हड़बड़ी नहीं किसी को। धूप भी तसल्ली में खिली हुई थी।
वहीं गायें, बछिया और बकरी के बच्चे भी धूप सेंक रहे थे। कुछ बकरी के बच्चे जाड़े से बचाव के लिए झबला-फ्रॉक जैसे कपड़े पहने हुए थे। बाकी के दिगम्बर बने घूम रहे थे।
नुक्कड़ पर एक दुकान के पास लोग खड़े थे। कुछ लोग काम पर जा रहे थे, बाकी वहीं बतिया रहे थे। दुकान वाले ने बताया कि जरूरत का सामान बेंचकर गांव का शहर जाने से रोकते हैं।
आगे ठेका देशी शराब था। 100% शुध्द शराब मिलने की सूचना थी। ठेका बन्द था। बगल में ही एक घोड़ा बोरी में मूंह डाले अपना सुबह का नाश्ता कर रहा था। हमको पूछा तक नहीं अगले ने।
शहबाजनगर रेलवे स्टेशन पर फोटोबाजी हुई। वहां खड़े शख्स ने बताया कि यहां का ग्राम प्रधान कोरोना में मर गया। पहले किसी स्कूल में चपरासी था। प्रधान बन गया लेकिन कुछ काम नहीं करवाया। उसके पहले वाले ने अलबत्ता कुछ काम करवाया था। दो बीघा खेत के मालिक छिद्दन मियां रिक्शा चलाते हैं। और कोई काम ही नहीं मिला। 200 रुपये कमा लेते हैं रोज के। चार बच्चे थे। एक खत्म हो गया। दो लड़कियां हैं। शादी करेंगे खेत बेंचकर।
परसाई जी याद आ गए -'इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है।'
लौटते हुए दो बच्चे एक पुलिया पर कौड़ी खेलते दिखे। देखा तो प्लास्टिक के गोल बेतरतीब सिक्के टाइप दिखे। उनका दांव लगा थे। एक तरफ ऊंचा , दूसरी तरफ़ कम ऊंचा। ऊंचा-चपटा का दांव लगा रहे थे बच्चे। एक रुपये के दस के हिसाब से मिलते हैं प्लास्टिक के सिक्के। भाई हैं दोनों। जुआं खेलना सीख रहे हैं। आगे चलकर महाभारत करेंगे। महाभारत की शुरुआत भी तो भाईओं के बीच जुए से हुई थी।
एक झोपड़ी के पास एक बुजुर्ग तराजू में बांट धरे ईंटे तौलते दिखे। बाद में पता चला कि ईंटों के बांट बना रहे थे। आधा किलो से एक मानक बांट से आधे किलो की ईंट तौली। उसका मिलाकर एक किलो बनाया। फिर ईंट और बांट मिलाकर दो किलो का और फिर चार किलो का बनाया। वजन संतुलन के लिए गोभी के डण्ठल और दीगर सब्जी के टुकड़े भी प्रयोग करके ' गठबंधन बांट' बना लिया।
स्कूल के दिनों में एक किलोग्राम की मानक परिभाषा पेरिस की किसी प्रयोगशाला में प्लेटिनम-इरीडियम की एक रॉड के वजन के बराबर पढ़ी थी। आज कोई एक किलोग्राम की मानक परिभाषा पूछे तो हम कहेंगे -'शाहजहांपुर से शहबाज नगर जाने वाली सड़क किनारे 15 नवम्बर, 2020 दिन इतवार की सुबह करीब साढ़े दस बजे गुनगुनी धूप में एक बुजुर्ग के हाथों हिलते-डुलते तराजू के पल्ले में रखे आधे किलो के बांट , ईंट के टुकड़े और गोभी के हरे ठंडल के संयोग से बने वजन को मानक किलोग्राम कहते हैं। '
शहर पहुंचकर साइकिल साथी विदा हुए। हम पंकज की दुकान पर चाय पीने पहुंचे। पंकज ने चाय बनाईं। पिलाई।इस बीच वहीं फैक्ट्री के कुछ लोग मिल गए। एक विजय शुक्ला पिछले साल दिसंबर में रिटायर हुए थे। एम टीएस। बोलने , सुनने से लाचार इशारों से बताया -'चार मंजिल का मकान है सामने वाला हमारा।'
पता चला शुक्ल जी खुद सिगरेट नहीं पीते थे लेकिन रोज तीन पैकेट सिगरेट खरीदकर फैक्ट्री वालों को पिला देते थे। ऐसे दिलदार के पास लोग मुफ्तिया सिगरेट पीने आते थे। मुफ्त माल सबको आकर्षित करता है। रिटायरमेन्ट के बाद भी सिगरेट पिलाने का सिलसिला जारी है।
वहीं एक तिपहिया साइकिल रिक्शे पर एक आदमी एक पैर सीधा किये बैठे चाय पी रहा था। एक एक्सीडेंट में पैर का घुटना टूट गया। तारीख बताई 16 अगस्त , 2006। हर जगह इलाज करवाया। ठीक नहीं हुआ। बड़े-बड़े अस्पतालों के नाम गिना डाले जयपाल ने जहां के डॉक्टरों ने जबाब दे दिया। बताने का अंदाज ऐसा मानो सकी टूटी हुईं टांग गर्व का विषय है उसके लिए जिसे बड़े-बड़े डॉक्टर ठीक नहीं कर पाए।
एक्सीडेंट मोटरसाइकिल से हुआ था। पीछे बैठे थे जयपाल। आगे जो बैठे थे उसके भी चोट लगी थी। लेकिन वह पैसे वाले थे। उनकी चोट ठीक हो गयी। जयपाल की चोट गरीबी के कारण अभी भी ठीक नहीं हो पाई। 30 साल की उम्र है। समाज वाले ही घर वाले हैं। वही खिला-पिला देते हैं। जहां आड़ मिलती है, वहीं सो जाते हैं।
चाय पीने के बाद पंकज से गाने की फरमाइश हुई। पंकज ने सुनाया -'एक प्यार का नगमा है, मौजों की रवानी है' गाना सुनने में हम इतने मशगूल हो गए कि रिकार्ड नहीं कर पाये। दुबारा कहा तो पंकज ने सुनाया -'आया रे खिलौने वाला , आया रे'। हमने 'एक प्यार का नगमा है' गाने की फिर से फरमाइश की। पंकज ने दुकान के पास रखे तख्त पर बैठकर गाना शुरू किया। लेकिन थोड़ी देर में ठहर गए। रुकावट के लिए खेद हो गया। शायद कुछ और सोचने लगे। भूल गए। खुरदुरी जिंदगी में भी ' प्यार के नगमें 'ऐसे ही पाज होते रहते हैं।

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Monday, November 16, 2020

परसाई के पंच-103

 1. जब तक किसी बड़े आदमी की एक-दो रखैल नहीं होतीं तब तक वह इज्जतदार नहीं माना जाता।

2. बाहर देश का नाम ऊंचा होने से उस देश के आदमी को भूख नहीं लगती।
3. हमारे समाज में नारी की गुलामी के कारण ऐसी भावना व्याप्त हो गयी है कि पुरुष केवल ’नर’ है और स्त्री केवल ’मादा’, जो एक-दूसरे के पास केवल प्रजनन के प्रयोजन से आते हैं। वे और किसी कारण से, किसी और स्तर पर मिल ही नहीं सकते।
4. भारतीय से कोई स्त्री हंसकर बोल लेती है, तो वह ’मूरख’ समझता है कि यह तो मुझपर आशक्त है।
5. जीवन यदि मशीन है, तो प्रेम उसे ठीक से चलाने के लिये ’मोबिलाआइल’ है। जो लोग ’मोबिलआइल’ को मशीन मान लेते हैं, उनकी लाशें तालाबों में तैरती हुई मिल जाती हैं।
6. मैं देखता हूं अपने संगठन का , अपने नेता का, अपने झण्डे का, अपने नारे का सिर्फ़ एक ही अर्थ, एक ही उपयोग, एक ही उद्देश्य श्रमिक मानता है कि यह वह है जो बोनस दिलाता है, वेतन-भत्ता दिलाता है, सस्पेण्ड हो गये तो बहाल कराता है। याने संगठन,नेता, झण्डा, घोषणापत्र, सिद्धान्त –पैसा है, सिर्फ़ पैसे के सिवा कुछ नहीं।
7. कर्मचारी केवल अपने अधिकार जानता है, अपने कर्तव्य नहीं जानता। वह समाज के प्रति अपना दायित्व न समझता है, न निभाता है जबकि सारे लाभ वह इसी समाज से चाहता है, जिसमें पैसा भी शामिल है। श्रमिकों ने जैसे अपनी एक अलग दुनिया बना ली है। बाकी दुनिया में क्या हो रहा है, इससे उसे मतलब नहीं है।
8. अमेरिका जब किसी विकासशील देश से औद्योगिक और व्यापारिक सहयोग करता है या सहायता करता है तो उसमें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुनाफ़े का उद्देश्य होता है।
9. ट्रेड यूनियनों ने मजदूरों से आर्थिक लड़ाई लड़वायी है। बोनस, मंहगाई भत्ता, वेतनवृद्धि और ओवर टाइम की लड़ाई लड़वायी है।
10. सुविधाभोगी, कायर, अवसरवादी लेखक, पत्रकार, अध्यापक, बुद्धिजीवी वर्ग ने इस देश और उसकी जनता के साथ बड़ा धोखा किया और करते जाते हैं।
11. हर दंगे में गरीब आदमी मारे जाते हैं और गरीबों की झोपड़ियां जलायी जाती हैं। अभी तक इतने दंगे हुये मगर बड़ा हिन्दू या बड़ा मुसलमान कोई नहीं मारा गया। यह सब दंगे सुनियोजित होते हैं।


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परसाई के पंच-102

 1. बिना व्यवस्था में परिवर्तन किये, भ्रष्टाचार के मौके बिना खत्म किये और कर्मचारियों को बिना आर्थिक सुरक्षा दिये, भाषणों, सर्कुलरों, उपदेशों, सदाचार समितियों, निगरानी आयोगों के द्वारा कर्मचारी सदाचारी नहीं होगा।

2. राजनीति को नकारना भी एक राजनीति है।
3. हम छोटे-छोटे लोग हैं। हमारे प्रयास छोटे-छोटे हैं। हम कुल इतना कर सकते हैं कि जिस देश, समाज और विश्व के हम हैं और जिनसे हमारा सरोकार है, उनके उस संघर्ष में भागीदार हों, जिससे बेहतर व्यवस्था और बेहतर इन्सान पैदा हो।
4. आत्मविश्वास कई तरह का होता है- धन का, बल का, विद्या का, पर सबसे ऊंचा आत्मविश्वास मूर्खता का होता है।
5. मूर्खता के भी दर्जे हैं। अपढ़ता मूर्खता नहीं है। सबसे बड़ी मूर्खता है – यह विश्वास लबालब भरे रहना कि लोग हमें वही मान रहे हैं जो हम उनसे मनवाना चाहते हैं। जैसे हैं फ़ूहड़, मगर अपने को बता रहे हैं फ़क्कड़ और विश्वास कर रहे हैं कि लोग हमें फ़क्कड़ मानते हैं।
6. पता नहीं क्या बात है कि ऋषि, मुनि, सन्त, मनीषी भगवान के पास पहुंचने का रास्ता तो खोज लेते हैं, पर वहां अच्छे आदमी से पहले बुरा आदमी पहुंच जाता है। पता नहीं, यह रास्ते की खूबी है, भगवान की या रास्ते पर चलने वालों की।
7. सेवा ढंग से की जाय , तो वह धन्धा भी हो जाती है।
8. बुद्धिमान और ईमानदार वकील भूखे मरते हैं।
9. धर्म के मामले विज्ञान और बुद्धि से परे होते हैं। विज्ञान और बौद्धिक तर्क के स्पर्श से धर्म अशुद्ध हो जाता है।
10. धन उधार देकर समाज का शोषण करने वाले धनपति को जिस दिन ’महाजन’ कहा होगा उस दिन मनुष्यता की हार हो गयी।’ महाजन’ कहना मनुष्यत्व की हीनता स्वीकार करके ही तो सम्भव हुआ।
11. अब समाजवाद आ रहा है। बेकारी बढ़ रही है, लोग या तो रिक्शा चलाना सीख रहे हैं या भूखा मरना ! विदेशों में हमारी वाह-वाह हो रही है, देश में हाय-हाय मची है। धीरे-धीरे भारत के नागरिक रिक्शावाले या भिखारी हो जावेंगे- याने सब एक ही आर्थिक स्तर पर आ जावेंगे। यही समाजवाद है – आर्थिक समानता !

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परसाई के पंच-101

 1. इतिहास जब आगे बढ़ता है तो उसके पहिये को पकड़कर रोकनेवाले के हाथ टूट जाते हैं।

2. मैं लेखक छोटा हूं, मगर संकट बड़ा हूं। एक तो बड़ा संकट मैं आचार्यों , समीक्षकों और साहित्य के नीतिकारों के लिये हूं, जिनके लिये वर्गीकरण जरूरी है और जो तय नहीं कर पाते कि इस आदमी को किस खाते में डाला जाये। परेशान होकर इन्होंने मुझे व्यंग्य लेखक, व्यंग्यकार, व्यंग्य शिल्पी आदि कहना शुरु किया, तो कई दूसरे व्यंग्य लेखक और प्रबुद्ध पाठक उनके सिर चढ़ बैठे कि अब व्यंग्य को साहित्य की विधा भी मानो।
3. डॉक्टर कैंसर के रोगी को बताय कि उसे कैन्सर है, तो वह स्वस्थ मानसिकता का है। पर अगर कैंसर के रोगी को डाक्टर राग जैजैवंती सुनाने लगे तो डाक्टर जरुर मानसिक रोग से ग्रस्त है।
4. वास्तव में मैं जो लिखता हूं, वह विनोद या हास्य नहीं है। वह व्यंग्य है और लोगों का कहना सही है कि वह कठोर होता है। व्यंग्य मानव-सहानुभूति का बहुत ऊंचा रूप है। वह हास्य नहीं है, रुदन है, मगर अरण्य-रुदन नहीं है।
5. निंदा अत्यन्त नीच कर्म है। कायर ही निंदा करते हैं। आत्मविश्वासी आलोचना करते हैं। निंदा निंदक की आत्मशक्ति का नाश करती जाती है। इन प्रवृत्तियों से गुट बनते हैं, गैर जिम्मेदारी की बातें होती हैं, परस्पर द्वेष पैदा होता है और संगठन कमजोर तथा बदनाम होता है।
6. एक ख़ास किस्म के मरीज भी होते हैं जिन्हें निज का कोई दुःख नहीं होता पर जो इसलिए दुखी हैं कि वे देखते हैं , दूसरे सुखी हैं।
7. दूसरे के दुःख में दुखी होना आसान है; दूसरे के सुख में सुखी होना बहुत मुश्किल है।
8. हिन्दी में सबसे प्रचलित और लोकप्रिय पद्धति है –अपनों कि प्रशंसा और परायों कि निंदा। यह बड़ी स्पष्ट, सरल और उलझन विहीन पद्धति है। इसके मानदंड भी स्थिर और शाश्वत हैं।
9. मैं ‘शाश्वत साहित्य’ रचने का संकल्प करके लिखने नहीं बैठता। जो अपने युग के प्रति ईमानदार नहीं होता, वह अनंत काल के प्रति कैसे हो लेता है, मेरी समझ से परे है।
10. व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है, विसंगातियों, मिथ्याचारों और पाखंडो का परदाफाश करता है ।
11. व्यंग्य सहानुभूति का सबसे उत्कृष्ट रूप होता है।

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Wednesday, November 11, 2020

परसाई के पंच-100

 

1. अच्छा साहित्य पढ़ने की और खरीदकर पढ़ने की आदत जब तक लोगों में नहीं आयेगी, लेखक की जिन्दगी कष्टमय रहेगी ही।
2. एक पीढ़ी पूज्य होती जाती है, उसे मन्दिर में बिठाना पड़ता है, कभी-कभी जल और पुष्प अर्पित करना पड़ता है।
3. अनेक छायावादी कवियों को जानता हूं, जो रात को एकान्त में बैठकर नयी कविता लिखने की कोशिश करते हैं और जब नहीं बनती, तो सबेरे उठकर लोगों से कहते हैं –’नयी कविता कूड़ा-करकट है।“
4. साफ़ बात है- काम कर सकते हो, चल सकते हो तो चलो। अन्यथा देवता बनकर मन्दिर में बैठो, हम कभी-कभी आकर अक्षत,पुष्प चढायेंगे, आरती भी कर देंगे। लेकिन अगर तुम भक्तों को इकट्ठा कर राह चलनेवालों पर पत्थर फ़िकवाओगे, तो तुम्हें कौन पूजेगा?
5. जहां असत्य है, पाखण्ड है, मिथ्याचार है; वहां कला नहीं। राजनीति और समाजनीति में समझौते की गुंजाइश है, साहित्य और कला के क्षेत्र में समझौता आत्मघात का लक्षण है।
6. आप अगर पुस्तकों की भूमिका देखें, तो आपको यह आभास होगा कि हर लेखक सर्वश्रेष्ठ है, हर कृति उत्तम और युगान्तरकारी है। सफ़ेद झूठ और काले झूठ के साथ यह भूमिका झूठ भी होता है।
7. जीवन की दरिद्रता और अभाव से तंग आकर अनेक साहित्यकार राजनीति की गोद में जाने को मजबूर होते हैं। फ़िर तो उसके स्तन-पान करके उसकी समस्त कूटनीति, अवसरवादिता, छल और प्रपंच सीख लेते हैं और उनके सत्य का स्वर ऊपर उठ नहीं पाता। कुछ सम्पन्न होते हुये भी , ऊंचे पद पर सम्मान और धन के लोभ में अपने को ’होलसेल’ बेच देते हैं।
8. मानवी अन्तर्द्वन्द की कौन कहे, बाह्य परिस्थितियों के संघर्ष की रेखाएं तक बड़े-बड़े लेखकों को खींचना नहीं आता।
9. किताबें लिखकर और साहित्य भरना और साहित्यकार कहलाने का दम्भ करना हिन्दी वालों को बहुत आता है।
10. विचारों से गांधीवादी, मार्क्सवादी तो भावनाओं से फ़्रायडियन अथवा कट्टर धर्मपारायण। राष्ट्रीयता पर लिखते हैं पर मराठी, गुजराती और बंगाली भेदों से परे नहीं। जब तक अपने आप में यह छल-कपट चलता रहेगा, तब तक ऊंचा साहित्य लिखना पत्थर पर दूब उगाना है।
11. हर साहित्य में लेखक अपने पाठकों को मूर्ख समझता है – सम्भवत: उतना ही मूर्ख जितना कोई नानी अपने छोटे नाती-पोतों को कहानी सुनाते हुए समझती है।

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Monday, November 09, 2020

पेट की आग बहुत दूर तक ले जाती है

 इतवार के दिन साइकिल चली। खूब चली। सात बजे शहीद पार्क तिराहे पर मिलने की बात हुई थी Pathak जी से। घर से निकलते ही सात बज गए।

साइकिल के पिछले पहिये में हवा कम थी। लेकिन चल रही थी आराम से। हर अगला पैडल मारते हुए सोचते जाते -' हवा भरवानी है।'
सड़क साफ थी। लिट्टी-चोखा वाला कड़ाही में कंडे सुलगाये बैगन भून रहा था। भर्ता बनेगा इनका। गोलमोल रहने वालों का भर्ता ही बनता है।
एक बुजुर्गवार सड़क पर एकदम अनुशासन में टहल रहे थे। दूसरे बुजुर्ग सड़क पर कर रहे थे। दांए-बाएं , बाएं-दाएं देखते हुए। हमको केदारनाथ जी की कविता याद आ गयी:
मुझे आदमी का सड़क पार करना
हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह
एक उम्मीद सी होती है
कि दुनिया जो इस तरफ है
शायद उससे कुछ बेहतर हो
सड़क के उस तरफ।
पुल पार करके त्रिमूर्ति तिराहे पर वीर रस के तीनों कवि चुपचाप खड़े दिखे। रात भर कवि सम्मेलन के बाद सुबह के थके हुए कवियों की तरह, जिनको कविता पढ़वाई मिलने में देर हो रही हो।
साइकिल यात्री हमारे इंतजार में थे। हमारे पहुंचते ही चल दिये। मंजिल थी गर्रा पुल। करीब 9 किमी। शहर के बीच से होते हुए गए। लोग अपने घरों की सफाई करते दिखे, घर का कूड़ा सड़क पर डालते। कुल्ला करते दिखे। पानी की रबर पाइप से सड़क धोते दिखे। एक जगह भूसा खाली हो रहा था।
शाहजहाँपुर की सड़कें कम चौड़ी हैं लेकिन सड़क के दोनों तरफ नाले खूब चौड़े हैं। दोनों तरफ के नाले की चौड़ाई मिला लें तो सड़क की चौड़ाई के बराबर पड़ेंगे। लोगों ने नाले के ऊपर लेंटर डालकर घर तक पहुंचने का रास्ता बनाया हुआ है। कुछ लोग उन पर चारपाई डाले आराम करते भी दिखे।
साइकिल की हवा भरवाई गयी अहिबरन की दुकान पर। मुंह में बीड़ी सुलगाते हुए अहिबरन ने बताया कि कचरा फँसा है छुच्छी में। निकाला गया। साइकिल का पेट हवा से भर गया तो फुर्ती से चलने लगी।
शहर खत्म हुआ तो खेत शुरू हुए। सड़क के दोनों तरफ गन्ने के खेत। एक जगह खेत के बाहर मोटरसाइकिल और साइकिल खड़ी करके लोग गन्ने काट रहे थे। हमें लगा चोरी कर रहे हों। लेकिन लौटने तक भी वे कटाई करते रहे। मतलब खेत उनका ही होगा। चोरी करने वाले इतनी देर तक नहीं रुकते।
सड़क किनारे एक बंदर सीने पर दोनों हाथ रखे शांत बैठा था। ऐसे जैसे कोई चिंतक देश चिंता में जुटा हो। उसके आगे ही बंदर जोड़ा बैठा था। बंदरिया के शरीर पर कुछ लाल निशान दिखे। क्या पता वह घरेलू हिंसा का शिकार हुई हो। दोनों लड़ झगड़कर शांत मुद्रा में बैठे थे। हो सकता है उनके लड़ने की बात मेरी खाम ख्याली हो। लेकिन अपन तो यही सोच रहे। इंसान जैसा होता है, वैसा ही तो दूसरे के बारे में सोचता है।
जगह-जगह खेतों के बीच की जगह पर साधुओं-फकीरों के डेरे दिखे। तंबू में, कच्ची-पक्की झोपड़ियों में बाबा जी लोग भजनरत थे। कहीं से आये होंगे। खाली जमीन पर झोला धर दिया। धार्मिक स्थल डाल दिया। चल गया तो चंदा, चढ़ावा आने लगा।
गर्रा नदी के पुल पर पहुंचकर फोटोबाजी हुई। साथ के लोग अपने-अपने अनुभव बताते बतियाये। तय हुआ कि आगे नगरिया मोड़ तक चला जाये। नगरिया मोड़ पर फिर फोटोबाजी हुई। इसके बाद लौटना।
साथ चलते Ashish जी सड़क किनारे लगाये कदम्ब के पेड़ों की जानकारी देते गये। साल भर पहले लगाए गए पेड़ अब बड़े हो गए थे। दो साल में पूरे बालिग हो जाते हैं कदम्ब के पेड़। आशीष जी जुनूनी अंदाज में पेड़ लगाने के काम में जुटे हैं। अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा पेड़ लगाने में खर्च करते हैं। शहर में एस. पी. बंगले के पास नई नर्सरी लगाई है। पूरा शहर हरा-भरा करना है। Halftree में देखिये इनके लगाए पेड़ों के बारे में।
लौटते हुए लोग अपने-अपने घरों की तरफ चलते गए। हम और पाठक जी साथ वापस आये। रास्ते में एक आदमी ठेले पर कुछ किताबें लिए जा रहा था। शायद बस स्टैंड। किस्सा तोता मैना घराने की किताबें। एक महिला ने ठेले वाले को रोका। हमको लगा कोई किताब खरीदेगी। लेकिन बुढ़िया ने बुजुर्ग से कहा-'दो पुड़िया मसाला दे देव।' किताबें कोई नहीं खरीदता, सब मसाला खरीद रहे हैं।
चौराहे पर मजदूरों की भीड़ थी। वे इंतजार में थे कि कोई उनको दिहाड़ी पर ले जाये। इनमें राजगीर, पुताई वाले और दूसरे मजदूर थे। इतवार का दिन था लेकिन दिहाड़ी मजदूर के लिए कोई इतवार नहीं होता।
रास्ते में पंकज की दुकान पर चाय पी गयी। पंकज देर से उठे थे। नहा रहे थे। हमने इंतजार किया। साथ में चाय पी। पंकज की माँ और पिताजी से भी बतियाये। पंकज ने बताया कि उनके बारे में लिखी पोस्ट उसने पढ़ी है और सबको धन्यवाद भी दिया है।
लौटते हुए कामसासू काम्प्लेक्स गये। कामगार लोग मशीनों पर बैठ गए थे। हर तरह के काम के उस्ताद हैं ये लोग। सब दीपावली पर घर जाने के इंतजार में हैं।
रामलीला मैदान के पास एक आदमी वेल्डिंग मशीन ले जाते दिखा। नाम दिखा -'जलालुद्दीन वेल्डर।' जलालुद्दीन से हमको जलालुद्दीन अकबर याद आये। वो जहाँपनाह थे, ये वेल्डर। हैसियत में भले अंतर हो लेकिन काम दोनों का जोड़ने का रहा।
पता चला खिरनीबाग से आये हैं जलालुद्दीन। हमने पूछा -'इतनी दूर से आते हो वेल्डिंग का काम करने?'
'पेट की आग बहुत दूर तक ले जाती है'-जलालुद्दीन का जबाब था।
हम कुछ कहे बिना वापस लौट आये। लेकिन लौटने के पहले भी कुछ हुआ वह भी सुना ही दें।
हुआ यह कि जलालुद्दीन की वेल्डिंग मशीन को देखते हुए हम आगे निकल गए। नाम देखकर पीछे मुड़े। मुड़कर देखते हुए सड़क किनारे साइकिल एक तरफ झुक गई । हम भी झुके। साइकिल और झुकी। सम्भलते-सम्भलते हम इतना झुके कि सड़क से जुड़ गए। मतलब जमीन पर चू गए एक तरह से। पैंट और टी शर्ट पर धूल की मोहर लग गयी।
गिरते ही फौरन अपने आप उठे। उठने के बाद कई लोग उठाने के लिए लपके। लेकिन हम तब तक उठ गए थे। गिरते हुए को और गिराने के लिए तथा और गिर कर उठ चुके को उठाने वाले बड़ी ततपरता से मिलते हैं। उठकर साइकिलियाते हुए घर आ गए।
कुछ देर बाद पता चला कि चश्मे का एक ग्लास गायब। लगा वहीं गिरा होगा जहां हम गिरे थे, मतलब चुये थे। गये। खोजा। मिला नहीं शीशा चश्में का।
बहरहाल शाम को चश्में की दुकान पर गए। शीशा बन गया। 200 रुपये ठुक गए लेकिन बार-बार निकलते शीशे की जगह पुख्ता शीशा लग गया।
सुबह अख़बार देखा। हमारी साइकिलिंग की फ़ोटो दिखी। हमको श्रीलाल शुक्ल जी की बात याद आई -'सरकारी अफसर जहां निकल जाता है , वहीं उसका दौरा हो जाता है।'

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परसाई के पंच-99

 

1. ’बिग पावर’ का यह कर्तव्य है कि वह कहीं शान्ति न रहने दे। सब डर के साये में जिन्दा रहें।
2. हर मिशन एक खूबसूरत धोखा होता है।
3. राजनीति में सबकुछ होता है। आपस में तय करके भी लड़ाई होती है।
4. कुछ लोग ऐसे भी होते हैं , जिनका हृदय तलुवे में होता है। वे हृदय को कुचलते हुये चलते हैं।
5. क्रान्ति और भ्रान्ति में थोड़ा-सा अन्तर होता है। कभी-कभी भ्रान्ति को भी क्रान्ति समझ लिया जाता है।
6. सन्त एक नैतिकता अपने लिये रखता है, दूसरी दूसरों के लिए।
7. शीर्षासन का राजनीतिक फ़ायदा यह है कि इसमें हर चीज उलटी दिखती है। और सफ़ल राजनीति के लिये चीजें उलटी दिखना जरूरी है।
8. आम कवि सम्मेलनों में या तो गाना जमता है, या गाली, क्योंकि ये दोनों सहज ही समझ आते हैं; इन दोनों के परे जो कविता नाम की चीज है, वह अगर सुनायी जाये, तो कवि को हूट कर दिया जायेगा।
9. विज्ञापनबाजों ने जिस तरह नारी का उपयोग किया है, उसी तरह हमारे कुछ कवि कर रहे हैं। नारीछाप साबुन और नारीछाप कविता- एक ही टाइप है।
10. कवि पर जिम्मेदारी है कि वह जन-रुचि का परिष्कार करे। यह कहना गलत है कि जनता समझती नहीं है। हम ही जनता को नहीं समझते। हमने अपने ऊपर नट, गायक और मेमने का ’रोल’ ले लिया है।
11. हमारी आधी कविता का स्रोत तो यह है कि ’उसका’ पिता उसे हमसे मिलने नहीं देता –इसलिये हम घुट रहे हैं ! और आधी का विषय है, उस न मिल सकने वाली के सलमासितारे ! बस प्रेम-गीत हो गया। नर भी प्रसन्न, नारी भी प्रसन्न ! ताली, ’वंसमोर’ और फ़िर एक प्याला काव्य-वारुणी !

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परसाई के पंच-98

 1. धर्म वह है, जिसका पालन धनी-गरीब सब कर सकें, जो बड़े और छोटे सबके लिये सुलभ हो।

2. विचार को निर्बाध गति से प्रकट होने देना चाहिये। विचार जब लुप्त हो जाता है, या विचार प्रकट करने में बाधा होती है या किसी के विरोधी विचार से भय लगने लगता है, तब तर्क का स्थान हुल्लड़ या गुण्डागर्दी ले लेती है।
3. यह कैसी रिश्तेदारी या मित्रता है कि अपने आदमी को गलत करते देखकर भी उसे चेताया न जाय। यह तो इसी तरह हुआ कि कोई खन्दक में गिरा जा रहा है और उसका मित्र दूर खड़ा देख रहा है। उससे पूछा कि क्यों भाई, तू उसे क्यों नहीं रोकता? तो वह कहता है –’जरा आपसी मामला है; रिश्तेदारी है, वे बुरा मान जायेंगे। गिर ही जाने दो।’
4. समाज में वह शक्ति आनी चाहिये कि सामाजिक, मिथ्यावाद, असामाजिक कृत्य और समाज के लिये हानिकर कर्मों का विरोध कर सकें।
5. जिस धर्म के पालन में लाख रुपये लगें, वह धर्म नहीं है, धन्धा होगा।
6. पाखण्ड विशेष धर्म में ही नहीं है, सबमें हो रहे हैं।
7. इस देश में ऐसा ही होता आया है –बड़े से बड़े मस्तिष्क को राजसत्ता खरीदती रही है। द्रोणाचार्य-सरीखे शस्त्र और शास्त्र मर्मज्ञ को दुर्योधन ने ऐसा खरीदा कि महाभारत में द्रोणाचार्य दुर्योधन की ओर से लड़े –यह जानते हुये कि उसका पक्ष अन्याय का पक्ष है।
8. अन्याय के विरुद्ध जिसकी आवाज बुलन्द नहीं होती वह लेखक या कलाकार नहीं बन सकता।
9. अमेरिकी बड़ा विचित्र आदमी होता है। वह भीतरी शान्ति, व्यक्तिगत शान्ति तो चाहता है पर बाहर सरकार को अशान्ति फ़ैलाने देता है।
10. बेशर्म की नाक इस्पात की बनी होती है।
11. सच्ची दोस्ती वही है, जब दोस्त एक-दूसरे को बेवकूफ़ बनायें।

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