Thursday, June 11, 2026

तैराकी सीखने का ग्यारहवां दिन

 



आज सुबह समय पर पहुँचे स्वीमिंग पूल। ठीक आठ बजे। पानी में उतरकर तैरना शुरू किया। तैराकी EV वाहन की तरह हो रही है। इलेक्ट्रिक गाड़ियां उतनी ही चलती हैं जितनी चार्ज होती हैं। चार्ज होने के बाद खड़ी हो जाती हैं। जहाँ तक साँस रहती, वहाँ तक तैरते। इसके बाद सांस छोड़कर ऊपर आ जाते। दुबारा साँस भरते। तैरते। ऐसा कई बार किया।

कोच से पूछा तो उसने बताया -'ऐसे ही करिए। हो जाएगा।'

 उसके समझाने के तरीके से मुझे गोरख पांडेय की कविता याद आ गई :

"समाजवाद बबुआ, धीरे-धीरे आई"

मतलब हड़बड़ाना नहीं है। तैराकी आई बबुआ, धीरे-धीरे आई। 

कोच ने समझाया -'आपका पीछे का वजन ज्यादा है। पैर जल्दी-जल्दी चलाइये। बैक स्ट्रोक लेते समय पानी को नीचे धकेलिये। ऊपर आते समय सांस ले लीजिए। मतलब न्यूटन बाबा का क्रिया-प्रतिक्रिया का नियम स्वीमिंग पूल में भी लागू है। कोच ने जब पीछे का वजन ज़्यादा होने वाली बात कहीं तो लगा वहीं छाँट देते थोड़ा वजन। लिखने वाली कलम की तरह छील देते चाकू दे नीचे का भारीपन। लेकिन ऐसा होता कहाँ है?

सबेरे कई वीडियो देखकर गए थे। थ्योरी एकदम पक्की करके गए थे। लेकिन प्रैक्टिकल में हुआ नहीं। कई बार की कोशिश के बाद सर ऊपर आना शुरू हुआ। लेकिन मुँह से साँस लेते ही फिर गड़बड़ा जाते। फिर कोशिश करते । फिर लड़खड़ाते। हमारे हाल उस गाड़ी जैसे हो गए जैसे जीपीएस में गाड़ी लोकेशन के आसपास टहलती रहती है लेकिन मंजिल पर पहुँच नहीं पाती। 

वीडियो में यह भी बताया गया था कि बैक स्ट्रोक में सांस लेने टाइमिंग का मसला है। एकदम सर्जिकल स्ट्राइक टाइप। पानी को नीचे धकियाओ। बदले में पानी ऊपर को धकियाये , सर ऊपर आए, उसी समय साँस ले लो। चुके तो फिर मुंडी पानी के अंदर। कई बार कोशिश करने पर सर तो ऊपर आ गया लेकिन साँस लेने से पहले फिर पानी के अंदर।

साँस लेने के पहले सर पानी के अंदर हो जाने का कारण ऊपर आते समय पैर ठहर जाना लगा। जैसे कोई घटना होने पर सड़क पर खड़े लोग सहायता करने की बजाय वीडियो बनाने  लगते हैं। फोट खींचने लगते हैं। उसी तरह सर ऊपर आते समय पाँव ठहरकर सर का मूवमेंट देखने लगते। सर और पांव का तालमेल इंडिया गंठबंधन के चुनाव के समय एक्शन की तरह हो जाता। तालमेल के अभाव में पानी पूल का पानी शरीर के साथ खेल कर जाता। 

देखते-देखते आज भी घंटा पूरा हो गया। सीटी बज गई। पूल के बाहर आने का संकेत हो गया। हम भी पूल के बाहर आ गए। बाहर आकर गाड़ी स्टार्ट करके घर आ गए। 

घर आकर DIANA NYAD की ऑटोबायोग्राफी Find a Way निकालकर पढ़ना शुरू किया। करीब 300 पेज की किताब है। ऐसा लगता है कि किताब पूरी होने तक तैरना सीख जायेंगे। सोचने में क्या हर्ज है। 

सोचने को बड़े लोग देश को अगले 20 साल में ठेल-ठाल कर विकसित बनाने हल्ला मचाए हुए हैं। भले ही देश की अर्थव्यवस्था दिन पर दिन गड़बड़ा रही है, रुपया डब रहा है, देश के स्मार्ट शहरों में पीने का पानी नहीं है, सीवर लाइन, पानी के लाइन के साथ बचपन की सहेलियों की तरह गलबहियाँ करते हुए साथ बह रही हैं।

आज हमारी तैराकी सीखने का ग्याहरवाँ दिन था। 



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