Friday, March 13, 2020

आलस्य

 आलस्य

दुनिया का
सबसे खूबसूरत पहलू होता है।
दुनिया में बहुत
सी चीजें सुन्दर
होती हैं।
लेकिन सबसे
सुन्दर होता है
अलसाया हुआ सौंदर्य ।
मोनालिसा की फोटो पेंटिंग
सबसे खूबसूरत इसीलिये
दिखती है क्योंकि
वह सुन्दर है साथ में अलसायी हुई भी।
आलस्य के बिना दुनिया
अधूरी है
कत्तई खूबसूरत नहीं
हो सकती आलस्य रहित दुनिया।
-अनूप शुक्ल

Wednesday, March 11, 2020

स्कूल जाते बच्चे दुनिया की सबसे खूबसूरत सैर पर होते हैं।


निर्माणी के सामने की सड़क पर सुबह सुबह स्कूल जाते बच्चे दिखते हैं। कोई अकेले सर्राटा मारता हुआ चला जाता है। कोई दोस्त से बतियाता। कोई होली के रंग के किस्से सुनाता चला जा रहा है। समूह में बच्चे आधी सड़क घेरे हुए जाते। एक लड़का धीरे-धीरे साइकिल चलाते सड़क चलते बच्चे के कंधे पर हाथ रखे बतियाते चला जा रहा है। दोनों के बीच की बातचीत निश्चित ही दुनिया की सबसे प्यारी बतकहियों में शामिल करने लायक होगी। बच्चियाँ अपनी सहेलियों के साथ खिलखिलाती हुई जा रही हैं। कोई बच्चा सड़क पर किसी नोटबुक के पन्ने पलटता जा रहा है। शायद उसका कोई इम्तहान होगा।

ई रिक्शा पर भी जा रहे हैं बच्चे। एक रिक्शे पर कई बच्चे। एक ई रिक्शा पर अकेला बच्चा भी जा रहा है। रिक्शे की सीट पर हाथ फैलाकर ऐसे बैठा है जैसे राजा लोग सिंहासन पर बैठते होंगे। अकड़ बैठकी।

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Sunday, March 08, 2020

महिला दिवस के मौके पर शिशु सदन की शुरुआत

 

कल का दिन हमारी निर्माणी के लिए ऐतिहासिक रहा। इस मौके पर निर्माणी में शिशु सदन की शुरुआत की गई। निर्माणी में लगभग 60-70 महिला कामगार हैं। अधिकतर सिलाई का काम करती हैं। अन्य अनुभागों की तुलना में महिला कामगार अधिक जिम्मेदारी से अपना काम करती हैं।
मार्च के महीने में उत्पादन लक्ष्य पूरा होने का दबाव रहता है। सुबह सबसे पहले काम का मुआयना करते हुए थोड़ी देर कामगारों से बातचीत करते हैं। जिसका काम कम हुआ उससे कारण पूछते हैं, ठीक से, ज्यादा भी काम करने को कहते हैं। बातचीत करते हुए लोगों की समस्याएं भी सुन लेते हैं। व्यक्तिगत और निर्माणी की भी। जो सम्भव हो उसको तुरन्त हल भी कर देते हैं। घर परिवार के बारे में बतिया लेते हैं।
अक्सर कई कर्मचारी हमारे पहले के कार्यकाल की कोई याद भी साझा करते हैं। एक दिन एक टेलर ने हमसे कहा -'आपका यह कोट हमने सिला था। जिसमें थोड़ा झोल आ गया है। कभी दीजिएगा ठीक कर देंगे।'
हमको ताज्जुब हुआ कि बीस-पच्चीस साल पहले हमारे कोट की सिलाई की याद है हमारे कामगार को।
ऐसे ही 3 मार्च को महिला कामगारों की बेंच पर भी गये। एक से पूछा -'काम कैसा चल रहा है? ओवरटाइम कितना चल रहा है आपका ?'
ओवर टाइम हमारी निर्माणियों की सेहत का बैरोमीटर है। जहां ओवरटाइम पूरा चल रहा है मतलब उस निर्माणी के हाल चकाचक हैं। जहां ओवरटाइम कम है मतलब फैक्ट्री के हाल खराब हैं।
हमारे पैराशूट फैक्ट्री के कवि-कामगार श्रवण शुक्ल जी की ओवरटाइम पर एक बड़ी लोकप्रिय हास्य कविता है:
'इतवार बुलाओ, सोमवार बुलाओ
चाहे जउने वार बुलाओ,
ओटी तुम हमका दिए रहो
प्राण हमारे लिये रहो।'
संयोग कि आयुध निर्माणियों में पिछले दिनों काम की कमी के चलते ओवरटाइम कम हुआ। पैराशूट आयुध निर्माणी में श्रवण शुक्ल जी के प्रशंसक इसका श्रेय उनकी इस कविता को देते हुए कहते हैं -'बहुत दमदार कवि हैं शुक्ल जी। उनकी कविता की ही ताकत है कि ओवर टाइम कम करा दिया।' 🙂
बहरहाल जिस कामगार महिला से काम के बारे में पूछा उसने दुःखी होकर कहा -'हमारा बच्चा छोटा है। उसको देखने वाला कोई नहीं है घर में। पिछले हफ्ते उसकी देखभाल के लिए छुट्टी लेनी पड़ी। इसीलिए काम कम हुआ। ओवरटाइम नहीं मिला।' बताते बताते महिला कामगार रुआंसी सी हो गयी।
उसकी बात सुनकर हमको अफसोस हुआ कि तीन महीने हुए निर्माणी में आये। इस दौरान हमने एक बार भी नहीं सोचा कि यहां शिशु सदन होना चाहिए। न किसी ने बताया। हमने महिला से पूछा -'अगर यहां शिशु सदन बनवा दें तो तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी?'
उसने कहा -'ऐसा हो जाएगा तो हम जिंदगी भर आपका एहसान नहीं भूलेंगे।'
कारखाना अधिनियम के अनुसार जहां महिला कामगार हो वहां शिशु सदन की व्यवस्था होना आवश्यक है। उसको बनवाने पर कोई हमारा जिंदगी भर एहसान मानने को तैयार है। ताज्जुब ही है कि जो काम हमारी ड्यूटी में है उसको पूरा कर देने पर कोई हमारा एहसान माने।
बहरहाल हम लोगों ने उसी समय तय किया कि निर्माणी में शिशु सदन खुलेगा। तुरन्त महिला कामगारों के काम की जगह एक बड़ा हाल तय किया गया। यह भी तय किया गया कि 18 मार्च को आयुध निर्माणी दिवस पर उसकी शुरुआत होगी। फौरन काम चालू हो गया। कोई कमेटी नहीं, कोई टीम नहीं -'डायरेक्ट एक्शन।' हाल की सफाई शुरू हो गयी।
कानपुर में पुरानी निर्माणी में यही काम कमेटियों के हवाले कर दिया गया था। लगभग डेढ़ साल लग गए थे उसको शुरू होने में।
बाद में सोचा गया कि हाल बहुत बड़ा है। 15-20 बच्चों के लिए इतना बड़ा हाल ठीक नहीं होगा। खर्च भी काफी होगा। इसके बाद दो कमरों वाले एक आफिस में ही शिशु सदन बनना तय हुआ। आफिस बढ़िया टाइल्स लगा, रेस्टरूम सहित, कामगारों के काम की जगह के एकदम पास।
जगह तय करने के बाद बच्चों के सामान , खिलौने लेने गए। ढेर सारे खिलौने ले आये। तैयारी हो गयी शिशुसदन की।
अब जब तैयारी हो गयी तो सोचा गया 18 मार्च का इंतजार क्यों किया जाए। शुभस्य शीघ्रम। तय हुआ कि महिला दिवस के मौके पर ही शुरआत हो। उद्घाटन की बात चली तो यह सोचा गया कि उद्घाटन किससे करवाया जाए। तय हुआ कि उद्घाटन वही करे जिसके लिए यह सुविधा है। मतलब महिला कामगार ही शिशुसदन का उद्घाटन करें।
महिला दिवस 8 मार्च को पड़ता है। 8 मार्च को इतवार। लिहाजा 7 मार्च को महिला दिवस मनाया गया। सुबह कैंटीन में केक काटने के बाद सबके साथ शिशु सदन आये। महिला कामगारों ने उद्घाटन किया। उद्घाटन का फीता उसी महिला कामगार ने काटा जिसकी मांग पर शिशु सदन शुरू किया गया। बच्चे खुश होकर खेल रहे थे। उनकी मम्मियां भी खुश। बाकी कामगार ,स्टॉफ, अधिकारी भी खुश। निर्माणी के महाप्रबन्धक होने के नाते देखा देखी अपन भी खुश।
शिशुसदन में अभी कई सुधार होने हैं। कुछ सुविधाएं भी जुड़नी हैं। वह सब भी हो जाएगा। सुविधाओं को मुहैया करवाने के लिए अपन मुसलसल कोसा (लगातार प्रयत्नशील) रहेंगे।
फिलहाल सभी महिला साथियों को महिला दिवस की
बधाई
। शुभकामनाएं।


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Friday, March 06, 2020

गांधी पुस्तकालय - एक सात्विक संकल्प का पूरा होना

 शाहजहांपुर आने के समय से ही गांधी पुस्तकालय जाने का मन था। चौक स्थित इस पुस्तकालय से तमाम यादें जुड़ी हैं। कई गोष्ठियां, कवि सम्मलेन और बैठकी इस पुस्तकालय में हुईं। शहर का साहित्यिक केंद्र है यह पुस्तकालय।

1948 में शुरू हुआ यह पुस्कालय चौक की जिस बिल्डिग में था वह कमजोर हो गयी थी। बुजुर्ग फर्श के झुकते चले जाने की याद जेहन में थी। पुस्तकालय के सचिव अजय गुप्त भाई साहब इसके लिए नई बिल्डिग बनवाने के लिए प्रयासरत रहे।
अजय गुप्त जी के एक गीत का अंश है:
'सूर्य जब-जब थका हारा ताल के तट पर मिला,
सच कहूं मुझे वो बिटियों के बाप सा लगा।'
जैसे एक पिता को अपनी बड़ी होती बेटियों के लिए सुयोग्य वर की तलाश और चिंता रहती है वैसे ही अजय जी को इस लाइब्रेरी के लिए नई बिल्डिंग बनवाने की चिंता लगी रहती थी। बेटियों को विदा करने के बाद इस काम को पूरा करने में जी जान से जुट गए। पूरा करके भी अब मान कहां रहे हैं। अब उनकी जिद इसे समृद्ध करने की है।
आज जब चलते हुए पुस्तकालय बन्द हो रहे हैं ऐसे में लाइब्रेरी के लिए नई इमारत बनवाने की बात सोचना और उस पर अमल करना जुनूनी लोगों के ही बस की बात है। यह सात्विक जुनून अजय भाई साहब में है। वे लगे रहे और लाइब्रेरी बन ही गयी।
वह कहते हैं न :
'जो सुमन बीहड़ों में, वन में खिलते हैं
वो माली के मोहताज नहीं होते,
जो दीप उम्र भर जलते हैं,
वो दीवाली के मोहताज नहीं होते।'
इस पुस्तकालय की इमारत के लिए अजय जी लगातार प्रयास करते रहे। दीपक की तरह जलते हुए अपने संकल्प को पूरा किया।
इसमें शहर के तमाम लोगों का सहयोग रहा। लोगों ने आर्थिक सहयोग दिया, सम्बल दिया, हौसला बढ़ाया और कहा -'आप करिये। काम होगा। कैसे नहीं होगा।' वही हुआ । लाइब्रेरी बनकर रही। इनमें अजय भाईसाहब की जीवन संगिनी आशा गुप्ता भाभी जी (जो कि स्वयं भी सिद्ध कहानीकार हैं) का भी भरपूर सहयोग रहा। वो हौसला नहीं बढ़ाती तो संकल्प मूर्तिमान होता न होता, कहना मुश्किल।
लाइब्रेरी में 30000 के करीब पुस्तकें हैं। कई दुर्लभ हस्तलिखित पत्रिकाएं हैं और शानदार भवन है। लाईब्रेरी में करीब 70 बच्चे नियमित आते हैं। सब कुछ निशुल्क ।
यह सारा प्रयास आपसी सहयोग से हो रहा है। मित्र , शुभचिंतक किताबें , आर्थिक सहयोग देकर लाइब्रेरी को समृद्ध कर रहे हैं। आप भी अपना सहयोग देकर इस सार्थक काम में भागेदारी कर सकते हैं। लेखक साथी अपनी किताबें भेज सकते हैं।
आप किताब या सहयोग जो भी देंगे उसका लाइब्रेरी के फेसबुक पेज पर उल्लेख किया जाएगा।
दुनिया में तमाम तरह के वायरस होते हैं। कुछ अच्छे कुछ बुरे। इंसान की प्रवृत्ति के अनुसार उस पर असर करते हैं। अजय गुप्त भाई साहब की लाइब्रेरी देखकर हम भी उनके जुनून की चपेट में आ गए। अपनी इस्टेट लाइब्रेरी चालू तो हो ही गई है। अब गांधी पुस्तकालय देखकर उसको समृध्द करने की ललक भी उठ रही है।
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Thursday, March 05, 2020

जो भी है इसी जनम में है, जिन्दगी के पार कुछ नहीं

 


परसों कवि अजय गुप्त जी से मिलना हुआ। चौक स्थित उनकी दुकान पर शाहजहांपुर के साहित्यकारों की नियमित बैठकी होती है। परसों मुलाकात हुई तो उनकी 'गांधी लाइब्रेरी' देखने गए। अजय गुप्त भाई साहब का सपना एक लाइब्रेरी बनाने का था। उनके सात्विक संकल्प को पूरा होते देखना मेरे लिए अद्भुत अनुभव था। उसकी कहानी अलग से। गांधी लाइब्रेरी में ही शाहजहांपुर के गीतकार बृजेश मिश्र जी ने जो गीत सुनाया वह आप भी सुनिए। आपको अच्छा लगेगा।
जो यहां करो वहां मिले
इस कथा में सार कुछ नहीं,
जो भी है इसी जनम में है
जिंदगी के पार कुछ नहीं।
कल्पना में कुछ भी सोच लो
सत्य है वही जो दीखता,
एक पल की जब खबर नहीं
उस जनम का है किसे पता।
जितना भी मिले तुरन्त ले
प्यार में उधार कुछ नहीं,
जो भी है इसी जनम में है
जिंदगी के पार कुछ नहीं।
चांदनी चकोर को भली
चोर के लिये भली कहां,
आदमी की सोच भिन्न है
कुछ भला बुरा नहीं यहां।
ज्ञान चक्षु हों जिसे मिले
उसको अंधकार कुछ नहीं,
जो भी है इसी जनम में है
जिंदगी के पार कुछ नहीं।
राग, रंग, रूप, रस सभी
भोग हेतु सृष्टि में रचे,
त्याग कर भी जो इन्हें चले
काल पाश से कहां बचे।
जिन्दगी को मौज से जियो
मुक्ति का विचार कुछ नहीं,
जो भी है इसी जनम में है
जिंदगी के पार कुछ नहीं।
जो जनम-मरण के बीच में
पाप-पुण्य खोजते रहे,
मोतियों को पा नहीं सके
डूबने से जो डरे रहे।
पतझरों में भी जो खिले सके
फ़िर उसे बहार कुछ नहीं,
जो भी है इसी जनम में है
जिंदगी के पार कुछ नहीं।
कर्म भाग्य का भविष्य है
कर्म ही से शीत-ताप है,
जिसमें सुख मिले वो पुन्य़ है
जिसमें क्षोभ हो वो पाप है।
प्यार आत्मा की प्यास है
इसमें जीत-हार कुछ नहीं,
जो भी है इसी जनम में है
जिंदगी के पार कुछ नहीं।
बृजेश मिश्र, शाहजहांपुर।

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Monday, March 02, 2020

जाकिर हुसैन से मुलाकात

 


कल जाकिर हुसैन से मिलना हुआ। शाहजहांपुर में 1992 से 2001 की पोस्टिंग के दौरान जाकिर हुसैन लंबे समय तक हमारे दफ्तर में अर्दली के रूप में रहे।

31 साल की उम्र में लेबर के रूप में भर्ती हुए जाकिर 60 में लेबर की उम्र में ही रिटायर हो गए -'जस की तस धर दीन चदरिया।'
हमारे दफ्तर में रहने के दौरान जाकिर हमारा पूरा ख्याल रखते थे। चाय-पानी और दीगर जरूरतों के अलावा फोन अटेंड करना, डाक लाना-ले जाना। नफीस लेकिन समझ में आने वाली उर्दू बोलते सुनकर लगता कि हमको भी उर्दू बोलने का अभ्यास करना चाहिए। कल मुलाकात के बाद फिर यह एहसास हुआ।
दफ्तर की देखभाल करने के साथ-साथ जाकिर साहब हमारी भी बखूबी देखभाल करते थे। कभी दफ्तर आने में देर हुई तो किसी सीनियर का फोन आने पर कहते -'हुजूर आपकी ही तरफ गए हैं।अभी निकले हैं, बस पहुंचते ही होंगे।' इसके बाद हमको खोजकर बताते -'आपको बड़े साहब पूंछ रहे हैं।'
दफ्तर में चाय पिलाने के अलावा कभी-कभी बतकही में भी शरीक होते। शायरी के भी शौकीन। कुछ पसंदीदा शेर कभी सुना देते।
1995-96 की एक मजेदार याद। उन दिनों हमारी फैक्ट्री में ISO-9000 प्रमाणपत्र पाने के लिए कोशिश चल रही थी। हम भी लगे थे। जानकारी और अनुभव की जो कमी थी उसे अपनी मेहनत से पाटने की कोशिश में लगे थे। रात देर तक काम करते।
ISO-9000 में क्वालिटी पॉलिसी भी घोषित करनी होती है। उसपर अमल सुनिश्चित करना होता है। निरीक्षण टीम यह देखती है कि निर्माणी के लोगों कम से कम अपनी क्वालिटी पॉलिसी के बारे में पता हो। हम लोग अलग-अलग तरीके से लोगों को अपनी क्वालिटी पॉलिसी याद करा रहे थे। सिलाई के लिए कटिंग के बंडल में भी घुसा देते क्वालिटी पॉलिसी। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में। बण्डल खोलेने वाला पढ़ेगा ही । याद भी हो जाएगा।
दफ्तर में काम करते हुए और दिन-रात क्वालिटी , आईएसओ-9000 की बातचीत सुनते हुए जाकिर हुसैन भी काम भर की जानकारी हासिल कर चुके थे। लेकिन उनके परफेक्शन का हमको कत्तई अंदाज नहीं था।
ऑडिट के दौरान जाकिर हुसैन की भेंट ऑडिट टीम के लीडर नीलकंठन जी से हुई। उन्होंने जाकिर जी से पूंछा -'आपकी फैक्ट्री की क्वालिटी पॉलिसी क्या है?'
फरवरी के महीने की गुनगुनी धूप में खड़े जाकिर हुसैन ने अपना मफलर फटकार कर गले में डाला और पूरे भरोसे के साथ हाथ पर हाथ रखकर बोलते हुए नफीस उर्दू में क्वालिटी पॉलिसी सुना दी। इसके बाद आईएसओ के फायदे भी गिना डाले। हमको भी ताज्जुब हुआ कि कभी इसके लिए जाकिर हुसैन को तैयार तो किया नहीं गया था।
टीम लीडर ने पूंछा कि आप कहां काम करते हैं? जाकिर हुसैन ने हमारी तरफ इशारा करके बताया -'हुजूर की खिदमत में लगे हैं।'
नीलकण्ठन जी ने मुझसे कहा -'यू आर वेस्टिंग ए टेलेंट। इनको तो ट्रेनिग देने के काम में लगाना चाहिए आपको।'
नीलकंठन जी की बात सुनकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई। आज वह बात याद करके लगता है कि हम अपनी तमाम मेधा, टेलेंट बर्बाद करते हैं। एक से एक जहीन लोग सही काम न मिलने से बर्बाद हो जाते हैं या फिर लोग उनका उपयोग नकारात्मक काम, दंगे, फसाद, फिरकापरस्ती में उपयोग करते हैं।
2001 में शाहजहांपुर से ट्रांसफर होने के बाद भी जाकिर जी से बात होती रही। शाहिद रजा और लतीफ से उनके हाल मिलते रहे। जब भी बात हुई जाकिर जी ने घर में सबकी खैरियत पूँछी।
यहाँ आने के बाद कल जाकिर हुसैन से मिलने गए। संकरी गलियों में गाड़ी फंस न जाये तो काफी बाहर खड़ी कर दी। पहुंचने पर बड़ी गर्मजोशी से मिले जाकिर । कसकर हाथ मिलाया और देर तक थामे रहे जैसे राष्ट्राध्यक्ष मिलते हुए थामे रहते हैं ताकि लोग फोटो ले सकें।
हाल-चाल पूंछने पर पता चला कि तबियत नासाज रहती है उनकी। कई तरह की बीमारियां। सबसे ऊपर चिंता सवार रहती है। डिप्रेशन में रहते हैं। बोले -'दिन भर काहिली सवार रहती है। जरा दूर चलते हैं थक जाते हैं। दिल साथ नहीं देता। हर डॉक्टर को दिखा चुके कोई फायदा नहीं हुआ। किसी से मिलना-जुलना नहीं।बस घर में पड़े रहने का जी चाहता है।'
हमने हौसला बंधाया कि मस्त रहा करो। अकेले मत रहा करो। काहे का डिप्रेशन। बच्चे अपने आप सेट हो जाएंगे। परेशान न हों। चिंता न करो।
बोले -'मैं बहुत कोशिश करता हूँ लेकिन अजीब-अजीब ख्यालात मन में आते हैं। पुरानी बातें अपने आप याद आती हैं उन्हीं में उलझ जाता हूँ।'
पेंशन के कागज देखे हमने। सब दुरस्त। कागज देखे तो जाकिर ने अपने वालिद का जिक्र किया। बोले फैक्ट्री में मुलाजिम थे। अगर उनके कागजात मिल जाएं तो उनकी कॉपी दिलवा दीजिएगा।
हमने कहा देख लेंगे लेकिन वालिद के कागजात किस लिए चाहिये ?
बोले -'कहीं जरूरत पड़ सकती है। ये एनआरसी वगैरह में काम आएंगे।'
हमने कहा -'अरे आप भी कहां की बातें सोचते हैं। मजे में रहिये। इन सबकी चिंता न करिये। हम हैं न।'
जाकिर हुसैन फीकी मुस्कान के साथ बोले -'सो तो है लेकिन कागज मिल जाएंगे तो सुकून रहेगा।'
जाकिर हुसैन के वालिद का इंतकाल सन 1980 के भी पहले हुआ था। वो उनके कागजात खोज रहे हैं कि एन आर सी में काम आएंगे। वह भी तब जब खुद उनके कागज हैं। वो सरकारी मुलाजिम रह चुके। पेंशन मिलती है।
बच्चों से बात की तो पता चला कि जाकिर सोचते रहते हैं । बच्चे अभी पुख्ता तौर पर काम में लगे नहीं हैं। बड़ा सड़क पर कपड़े की फेरी लगाता है, दूसरे नम्बर का लैब असिस्टेंट का काम सीख रहा है, तीसरा टेलरिंग का काम और सबसे छोटा हाईस्कूल कर रहा है।
जाकिर अपने बच्चों के रोजगार की चिंता में परेशान हैं। उनको दिलासा देकर विदा लेकर निकले। रास्ते में बड़े बेटे शोएब से मिले। सड़क पर कपड़ों की बिक्री करते हुए। शोएब ने बताया -'पापा आपका जिक्र करते हुए बहुत तारीफ करते रहते हैं।'
शोएब से बातचीत करते हुये कहीं से नहीं लगा कि वह रोजगार को लेकर परेशान है। तफसील से बताया कि कहां-कहां बिक्री करता है। कैसे-कैसे सामान लाता है। बोला -'दिल्ली में बहुत अंदर से छांट के कपड़े लाते हैं । एक बार जो ले जाता है वो दुबारा वापस जरूर आता है लेने के लिए।' और भी मारकेटिंग के हनर बता डाले शोएब ने खड़े-खड़े।
जाकिर के परेशान रहने की बात पर शोयब ने कहा -'बहुत समझाते हैं लेकिन वो समझते नहीं। न जाने क्या-क्या सोचते रहते हैं। कहीं आते-जाते नहीं। नई गाड़ी खरीदी तो बहुत कहने पर घूमने को राजी हुए। लेकिन जरा देर में ही बोले -घर चलो।'
दो पीढ़ियों की चिंताएं अलग-अलग होती हैं।
हमने जाकिर से पूछा -'दफ्तर में तो चाय बहुत बनाते थे। कभी घर में भी बनाई ? '
बोले -'घर में बनाने के लिए हैं। वही बनाती हैं।'
जाकिर हुसैन 70 के हो गए हैं। ऊपरी तौर पर स्वस्थ दिखते हैं लेकिन तमाम बीमारियों का इलाज करा रहे हैं। चिंता का शौक पाल लिया है।लेकिन एक रिटायर मुलाजिम जिसके बच्चे अभी काम पर न लगें हों चिंता तो करेगा ही। उसके बस में चिंता करने के अलावा और क्या हो सकता है।
हम तो हर चिंतित इंसान से यही कहते हैं -'दम बनी रहे, घर चूता है तो चूने दो।'

Friday, February 28, 2020

बम का व्यास



तीस सेंटीमीटर था बम का व्यास
और इसका प्रभाव पडता था सात मीटर तक
चार लोग मारे गए ग्यारह घायल हुए
इनके चारों तरफ एक और बड़ा घेरा है - दर्द और समय का ।
दो हस्पताल और एक कब्रिस्तान तबाह हुए
लेकिन वह जवान औरत जो दफ़नाई गई शहर में
वह रहने वाली थी सौ किलोमीटर दूर आगे कहीं की
वह बना देती है घेरे को और बड़ा।
और वह अकेला शख़्स जो समुन्दर पार किसी देश के सुदूर किनारों पर
उसकी मृत्यु का शोक कर रह था - समूचे संसार को ले लेता है इस घेरे में।
और मैं अनाथ बच्चों के उस रूदन का ज़िक्र तक नहीं करूंगा
जो पहुँचता है ऊपर ईश्वर के सिंहासन तक
और उससे भी आगे
और जो एक घेरा बनाता है
बिना अंत और बिना ईश्वर का ।
रचनाकार -यहूदा आमिखाई
अनुवाद :Ashok Pande

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Thursday, February 27, 2020

चलाना पड़ता है





 सुबह का समय। कोहरे की दुकान अभी पूरी तरह सिमटी नहीं है। सूरज भाई अभी नमूदार नहीं हुए हैं। लगता है कोहरे को मौका दे रहे हैं -' फहरा लो थोड़ी देर और अपना झंडा।'

पार्क के बाहर पुलिस जीप में बैठा ड्रॉइवर मुस्तैदी से मुंह चला रहा है। मुंह में गिरफ्तार आइटम की हड्डी पसली एक कर दे रहा है। मुंह में साबुत घुसा आइटम चकनाचूर होकर लुगदी बनते हुए उसके पेट में घुसता जा रहा है। जैसे-जैसे मुंह का आइटम पेट की तरफ बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे उसके चेहरे पर संतुष्टि का परचम लहराता जा रहा है।
पार्क में लोग मुस्तैदी से कसरत कर रहे हैं। कोने में बैठा एक आदमी तेजी से सांसें अंदर करते हुए ढेर सारी हवा पेट में इकट्ठा करता जा रहा है। उसकी तेजी से लग रहा मानो उसको डर है कहीं हवाबंदी न हो जाये दुनिया में। क्या पता कल को हवाबन्दी के बाद पूरी दुनिया को हवासप्लाई का ठेका किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को हो जाएगा। फिर तो यह भी मुमकिन है कि हर इंसान की सांस की जांच की जाए। जिसकी साँसों में उस कम्पनी की हवा न पाई जाए उसकी जिंदगी को सस्पेंड कर दिया जाए। जब तक वह पूरी हवा उस कंपनी से न भरवा ले तब तक वह दुनियबदर कर दिया जाए।
एक आदमी सीमेंट की फर्श पर बैठा बड़ी तेजी से अपने कंधे हिला रहा है। गोलगोल। उसकी तेजी देखकर हमको एकबारगी लगा कहीं उसके कंधे उखड़कर हाथ में न आ जाएं। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कंधे की एक्सरसाइज करके वह तेजी से उठा और पार्क में थूककर टहलते हुए बाहर की तरफ चल दिया। बगल से गुजरते हुए उस आदमी को टोकने का मन हुआ कि कहें पार्क में क्यों थूकते हो? लेकिन फिर यह सोचकर नहीं टोंका कि कहीं हमसे पूंछ न बैठे -'पार्क और होते किसलिए हैं? यहां भी न थूंके तो कहां थूंके?' टोंका इसलिए भी नहीं कि उसका चेहरा गुस्से में लग रहा था और उसके मुंह में बहुत कुछ इकट्ठा था।
एक आदमी एक कुत्ते को टहला रहा था। कुत्ता जंजीर घसीटते हुए आदमी को टहला रहा था। आदमी कुत्ते के मालिक का सेवक होगा। कुत्ता अपने मालिक के सेवक को अपना सेवक समझते हुए उससे चिपटकर मस्तिया रहा था। आदमी के कपड़े खराब हो रहे थे लेकिन वह कुछ कर नहीं रहा था। कुत्ता कमउम्र था। लेकिन बदमाशी में मैच्यर्ड लग रहा था। कुछ देर मस्तियाने के बाद वह आदमी के साथ जिस तरह की हरकतें करने लगा उसे देखकर लगा मानो अपनी पार्टनर के साथ डेटिंग का रियाज कर रहा हो।
कुत्ते को टहलाने के साथ वह आदमी दो बच्चों को झूला भी झूला रहा था। बच्चों और कुत्ते की देखभाल के लिए आदमी के बच्चों की देखभाल कौन करता होगा ? यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिली मुझे।
एक लड़का पार्क में टहलते हुए चने बेंच रहा था। बताया कि मां-बहन की देखभाल करता है। पिता नहीं रहे। पिता के न रहने की बात कहते हुए आंसू आ गए उसकी आंख में। पहले किसी दुकान में नौकरी करता था। कुछ ऊंचाई से कूदने के चलते पांव लचक गया। लंगड़ाते हुए चलता है।
'कितनी कमाई हो जाती है चने बेंचकर? 'पूछने पर बताया 250/- तक हो जाती है। 50-60 बच जाते हैं।
' इतने में कैसे खर्च चल जाता है ?' पूछने पर कहा -'चलाना पड़ता है।
और बात होने पर पता चला कि बच्चे जैसा वह इंसान शादीशुदा है। पत्नी और बच्चा उसके साथ नहीं रहते। कारण पूछने पर बताया कि पत्नी को खर्च के लिए दो सौ रुपये रोज चाहिए। इतने कहां से लाये हम ?
हम कुछ सोचने लगे। हमको सोच में डूबा देखकर वह बच्चा धीमी चाल से आगे जमा लोगों के पास जाकर 'चने ले लो' का आह्वान करने लगा। हम वापस चल दिये।
वापस आते समय बच्ची मिली जिसने सी-सा पर गद्दी लगवाने को कहा था। पार्क में होती हुई सफाई देखकर उसके पिता-माता ने कहा -'इसने बताया कि इसके कहने पर सफाई करा रहे हैं अंकल। गद्दी भी लगवाएंगे।'
बच्ची मुस्कराती हुई खेलने लगी। हम तैयार होकर दफ्तर आ गए।

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Wednesday, February 26, 2020

ऐसे ही इधर-उधर

 


सुबह उठे। टहलने निकले। गेट पर दरबान मिला। नमस्ते ठुकी। हाल पूछने पर बताया कि हीटर फुंक गया। सर्दी में परेशानी । और कोई समस्या पूछने पर बताया कि गुमटी में कोई खूंटी नहीं है कपड़े टांगने की। लग जायेगी कहते हुए हम सड़क पर निकल लिए। कह तो दिया अब देखना है लगती कित्ते दिन में है।

सड़क पर झाड़ू लगाती एक महिला से बात करने लगे। चार बच्चे हैं। पति बीमार। सांस की समस्या। महिला अकेली कमाने वाली। साफ चमकते दांत वाली महिला अपने सर से ऊंची झाड़ू सड़क पर लगाती बतियाती रही। घर में समस्याएं हैं लेकिन खुद कमाई का आत्मविश्वास उसकी आवाज और चेहरे पर चमक रहा था।
सड़क पार करके पार्क में धंस गए। सुबह की टहलाई करते दिखे लोग। एक बच्ची बेंच पर अकेली बैठी थी। उसके मां-पिता-भाई दूर तक टहलने जाते हैं। बच्ची को उसकी छोटी बहन के साथ पार्क में छोड़ जाते हैं। लौटकर साथ ले जाते हैं।
'तुम बैठी क्यों हो? झूला क्यों नहीं झूलती ?' हमारे इस सवाल के जबाब में बच्ची कहती है - 'भाई के आने पर उसके साथ रेस करनी है। झूलने से थक जाऊंगी।फिर उसको हरा नहीं पाऊंगी।' बच्ची भाई से जीतने के लिए अपनी ऊर्जा बचाकर रखती है।
बच्ची अपना रेसिंग ट्रैक दिखाती है। कई जगह से उखड़ा हुआ। उसको भी ठीक कराने की सोंचते हुए उससे पूछते हैं कि पार्क में और क्या कमी है ?
वह मुझे एक सी-सा के पास ले जाकर बताती है -'इसकी सीट नहीं है।' हम जल्दी ही उसकी मांग पूरी करने का वादा करके टहलने लगते हैं।
बच्ची अपनी छोटी बहन के साथ झूला झूलने लगती है। उसको झूला झुलाने वाली लड़की भी बच्ची है। उससे कुछ बड़ी। चेहरे से पता लगता है कि किसी गरीब घर की बच्ची है। छोटी बच्चियों के देखभाल के लिए रखी गयी होगी। बिना स्कूल की पढ़ाई के जिंदगी के स्कूल में नाम लिख गया।
पार्क के बाहर अलग-अलग समय में उद्घाटन, लोकार्पण, वृक्षारोपण के नामपट्ट लिखे हैं। सब रिटायर हो गए। नामपट्ट के नाम भी धूमिल हो गए। लगता है नाम भी रिटायर हो गये। नाम पट्ट पर नाम देखने की ललक भी मजेदार है इंसान में।
कई नामपट्ट देखे पिछले दिनों। कई ऐसे लोग जिनके नाम से लोग कांपते थे उनके नामपट्ट पर बन्दर अपने बच्चों के साथ लिए कूदते रहते हैं। अपनी पूंछ लोगों के नाम के आगे पंखे की तरह फहराते हैं।
अभी याद आया कि बच्ची के कहने पर झूला लगवाने का आदेश दिया है हमने। अब सोच रहे हैं कि झूले के बगल में नामपट्ट भी लगवाने की व्यवस्था करनी चाहिए- 'झूले का उद्घाटन किया फलाने इस दिन।' लेकिन लफड़ा यह कि झूला आयेगा तीन हजार का, नाम पट्ट और उद्घाटन समारोह का खर्च होगा तीस हजार का।' सोचकर शर्मा गए और नामपट्ट का विचार स्थगित कर दिया।
दोपहर में फिर गए पार्क। देखने कि क्या-क्या काम होना है। एक बच्चा पार्क में आल्थी-पालथी मारे पढ़ रहा था। पूछने पर बताया कि घर में लोग पढ़ने नहीं देते। कहीं खेत पर भेज देते हैं , कहीं जानवर चराने। इसीलिए यहां पार्क में आ जाता है पढ़ने।
बच्चे को पार्क में पढ़ता देखकर पास में ही अपनी निर्माणी की इस्टेट लाइब्रेरी को शुरू करने का हमारा इरादा और पुख्ता हो जाता है। लाइब्रेरी पिछले साल उद्घाटन के बाद से बन्द है। जब भी उसको शुरू करने की बात सोची गयी तब यह बात उठी कि पढ़ने कौन आएगा ? हमको जबाब मिल गए -'जयेंद्र जैसे लोग आएंगे।'
जयेंद्र से पूछते हैं -'पास में लाइब्रेरी खुलेगी तो वहां पढ़ने आओगे?'
'पैसे कितने पड़ेंगे लाइब्रेरी में पढ़ने के?' बच्चे का पहला सवाल होता है।
हमने कहा-'कोई पैसा नहीं पड़ेगा।जल्द ही लाइब्रेरी खुलेगी।'
टहलकर वापस आये। दफ्तर चले गए। दिन बीत गया। अभी फिर दिन शुरू हुआ तो सोचा लिखा जाए किस्सा।
अभी इत्ता ही। बाकी फिर कभी।

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