Thursday, August 27, 2020

कोरोना काल की सुबह

बेंच पर बैठे लोग

 सबेरे सड़क हाउसफुल लगती है। कुछ लोग सड़क पर इतनीं तेजी से टहलते हैं गोया उनके मन में डर हो कि कहीं सड़क खत्म न हो जाये। मानो सड़क न हुई कोई कुछ देरी की वैलिडिटी वाला ओटीपी हो जिसका उपयोग न होने पर वह खल्लास हो जाएगा।

सरकारें चुनाव के पहले ताबड़तोड़ लोकलुभावन फैसले लेती है उसी तर्ज पर लोग घर पहुंचने से पहले ताबड़तोड़ टहल लेना चाहते हैं।
कुछ लोग आहिस्ते-आहिस्ते भी टहल रहे हैं। कोई हड़बड़ी नहीं। कोई उतावली नहीं। उनको विश्वास है कि सड़क कहीं भागी नहीं जा रही। यहीं रहना है सड़क को। सड़क भी उनकी ही तरह आलसी है। इसलिए जबरियन हड़बड़ाने का कोई मतलब नहीं।
मोड़ पर कुछ लोग 'राम गिनती' कर रहे हैं। 'राम-राम-राम-59', 'राम-राम-राम-60' । उनको देखकर लगा कि राम शिक्षा का माध्यम भी हो सकते हैं। गिनती गिनते हुए लोग ताली भी बजाते जा रहे हैं। ताली से कोरोना ताली याद आई। खूब ताली-थाली बजाई हम लोगों ने। लेकिन कोरोना गया नहीं। बेहया है। नठिया कहीं का। निठल्ला बैठ गया है घुटने टिकाकर। कोई भला आदमी होता तो एक बार कहने पर निकल गया होता। लेकिन इस बेशर्म को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। वो तो कहो सुशांत, प्रशांत जैसे लोगों ने टीवी पर इसका आतंक कुछ कम किया वरना इसी करम जले को देखना-सुनना पड़ता टीवी पर।
आगे बेंचों पर काटें रखे हुए हैं। ताकि लोग बैठें न उनपर। बेंचपर कांटे देखकर लगा कि हर बैठने की जगह कांटो भरी होती है। इसीलिए आजकल सरकारें जल्दी-जल्दी बदल जाती हैं। तबादले तेजी से होते हैं। कांटे हर बैठने की जगह पर होते हैं इसीलिए शायद कुदरत ने इंसान के पिछवाड़े की खाली मोटी बनाई है।
लोग फुटपाथ पर बैठे कसरत कर रहे हैं। कोई कपालभाती कर रहा है, कोई अनुलोम विलोम। कपालभाती करते लोग हवा को इतनी जोर से अंदर दबाते हैं कि हवा बेचारी का दिन घुट जाता होगा। क्या पता हवा के कुछ हिस्से दमतोड़ देते हों। टीवी वाले अगर इसे देख पाते तो मार कवरेज के कपालभाती करने वाले को रिया चक्रवर्ती बना देते।
'अनुलोम', 'विलोम' तो एक बड़े दफ्तर के दो फाटक से घुसने-निकलने जैसा है। गेट दो हैं, दरबान एक ही। हवा को एक गेट से घुसा दिया, दूसरे से निकाल दिया। मजाल कि जिस गेट से घुसे उसी से निकल जाए हवा। लेकिन यह बड़े की बात कि कोरोना काल में थर्मल स्कैनिंग न 'अनुलोम' गेट पर हो रही है न 'विलोम' गेट पर। इसीलिए लफड़े वाली हवा भी शरीफ हवा के साथ अंदर घुसकर गड़बड़ करती है।
बगीचे में कुछ पक्षी मार्निंग वॉक कर रहे हैं। बराबर दूरी बनाए हुए। लगता है उनके यहां भी कोरोना मुनादी हो गयी है। लेकिन कोई पक्षी मास्क नहीं लगाए है। दो कुत्ते भी भागते हुए आये। लेकिन भागते हुए भी 2 गज की दूरी बनाए हुए हैं। एक कुत्ता भागते हुए ठहर गया। किनारे गए। टांग उठाकर पेड़ के तने पर 'शंका निवृत्त' हुआ। निवृत्ति के बाद उसके चेहरे पर जिस तसल्ली के भाव दिखे शायद उसी को विद्वान लोगों ने परमानन्द की संज्ञा प्रदान की है।
पता नहीं कुत्तों के यहां शौचालयों के क्या हाल हैं। शायद बाजार की तरह उनको भी लगता हो, जहाँ खाली जगह देखो निपट- निपटा लो। पूरी दुनिया ही उनके लिए शौचालय है। जहां मन आये, गन्दगी फैलाओ।
पता नहीं कुत्तों के समाज में क्या राजनीतिक व्यवस्था है। जो भी हो, कुत्तातन्त्र, लोकतंत्र से अलग कुछ व्यवस्था होती होगी। लोकतंत्र होता तो जगह-जगह कुत्ते भीड़ इकट्ठा करके भाषण देते। शायद सुअरों की मदद से सभाएं करते। लोकलुभावन वायदे करते।जीतने पर गन्दगी दूर करने की कसम खाते। जीत जाने पर सुअरों से इशारे पर नीतियां बनाते। सुअरों के पनपने के लिए गन्दगी फैलाते। चुनाव में मदद का एहसान उतारते।
ऊपर तारपर एक कबूतर अकेला बैठा है। लगता है 'सेल्फ आइसोलेशन' मोड में है। किसी कोरोना कबूतर के सम्पर्क में आ गया होगा। 'वर्क फ्रॉम वायर' के मजे ले रहा है। चोंच से पीठ सहला रहा है। पंख फुला रहा है। फड़फड़ा रहा है।
उधर सूरज भी अपने बहुरंगे परिधान में आसमान के सिंहासन पर विराजे हुए हैं। वहां कोई कांटे नहीं दिख रहे। उनके जलवे के आगे सब कुछ फीका लग रहा है। उनके जलवे पूरी कायनात के जलकुकड़े लोगों की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहे हैं। सुबह हो गयी है। यह कोरोना-काल की सुबह है।

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Tuesday, August 25, 2020

परसाई के पंच-19

 1. विश्वास जितना पक्का होता है, उसके टूटने में उतना ही दर्द होता है।

2.कभी-कभी प्रेम के रिश्ते से घृणा का रिश्ता अधिक मजबूत होता है।
3. आदमी का स्वभाव ही ऐसा होता है। घर का गंगाजल नहीं पियेंगे, दूसरे के नाबदान में मुंह डालते फिरेंगे।
4. हमारे मन में एक बना-बनाया नैतिक सिद्धांत है। जो स्त्रियों की ओर देखे वह बुरा आदमी, जो न देखे वह अच्छा आदमी।
5. प्रेम का ही बाजार गर्म है। जैसे उच्च शिक्षित वर्ग में स्नो, पावडर आदि का फैशन है, वैसे ही प्रेम का भी।
6.जिसे आप ईमानदार समझते हैं, वह बेईमान निकल जाता है और जिसे बेईमान समझते हैं , वह ईमानदार निकल जाता है।
7.शुध्द चीज दुनिया में जरा मुसीबत लाती है। शुद्ध चीज से दूर रहना चाहिए।
8. रोग बड़ा बुजदिल दुश्मन है भाई! निरस्त्र पर वार करता है, सम्भलने नहीं देता।
9. भूख से बचने में ही जिसका हर क्षण लगा रहा है, उसे प्यार करने की फुरसत कैसे मिलेगी?
10. कभी-कभी मरा बाप जिंदा बाप से अच्छा होता है।
11. जिसके पास कुछ नहीं होता, अनंत दुख होता है, वह धीरे-धीरे शहादत के गर्व के साथ कष्ट भुगतता है। जीने के लिए आधार चाहिए और सब अभाव में यह दुख ही जीवन का आधार हो जाता है। वे उसे जकड़े रहते हैं,उसमें गौरव समझते हैं।

Monday, August 24, 2020

परसाई होते तो बताते कि हम कितने बौड़म हो चुके हैं

 

[नवभारत टाइम्स में आज। लेख जो हमने भेजा था उससे कई गुना बेहतर होकर छपा। सम्पादन के लिए नवभारत टाइम्स के राहुल का आभार। Chandra Bhushan जी का शुक्रिया जिनको लगा कि मैं परसाई जी पर लिख सकता हूँ।]

हरिशंकर परसाई के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी निडरता है। अपने समय की विसंगतियों और संकीर्णताओं पर उन्होंने बेपरवाह लिखा और इसकी कीमत भी चुकाई। नौकरी छोड़ने तक में संकोच नहीं किया। उनकी कलम से तिलमिलाकर लोगों ने उन पर हमले किए। आर्थिक अभाव लगातार बना रहा, फिर भी उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। अगस्त परसाई जी का महीना है, 22 अगस्त उनकी पैदाइश है तो 10 अगस्त उनकी रवानगी।
कोई पूछ सकता है कि आज परसाई होते, तो क्या लिख रहे होते। अगर वे होते तो आज की विसंगतियों पर जरूर कुछ ऐसी नियमित चोट कर रहे होते, जिससे वे बहुत बड़े वर्ग की ‘हिट लिस्ट’ में होते। पहले की ही तरह उन पर लगातार हमले हो रहे होते, बल्कि शायद पहले से भी तेज। शायद हाल यह होता कि उन पर उनकी पहले की लिखी किसी ‘पंच लाइन’ के आधार पर कोई पंचायत स्वत: संज्ञान लेकर सजा सुना चुकी होती। या फिर देश के अनेक स्वघोषित बुद्धिजीवी उनके इस वाक्य, ‘इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बारात में बैंड बजाते हैं’ के आधार पर उनके खिलाफ मानहनि का मुकदमा दायर कर चुके होते। अंतरात्मा की आवाज पर दल बदलने वाले लोग, ‘अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिए। जरूरत पड़ी तो फैलाकर बैठ गए, नहीं तो मोड़कर कोने से टिका दिया’ जैसी लाइन लिखने के लिए परसाईजी को सबक सिखाने का निर्देश अपने कार्यकर्ताओं को दे चुके होते।
परसाई कहते थे, ‘मैं सुधार के लिए नहीं, बल्कि बदलने के लिए लिखता हूं। वे यह भी मानते थे कि सिर्फ लेखन से क्रांति नहीं होती। हां, उसकी भावभूमि जरूर बन सकती है।’ वे कहते थे कि मुक्ति कभी अकेले की नहीं होती। नौजवानों को संबोधित करते हुए वे लिखते हैं, ‘मेरे बाद की और उसके भी बाद की ताजा, ओजस्वी, तरुण पीढ़ी से भी मेरे संबंध हैं। मैं जानता हूं, इनमें से कुछ कॉफी हाउस में बैठकर कॉफी के कप में सिगरेट बुझाते हुए कविता की बात करते हैं। मैं इनसे कहता हूं कि अपने बुजुर्गों की तरह अपनी दुनिया छोटी मत करो। मत भूलो कि इन बुजुर्ग साहित्यकारों में से अनेक ने अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे वर्ष जेल में गुजारे। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी और दर्जनों ऐसे कवि हैं, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़े। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफाक उल्ला खां, जो फांसी चढ़े, कवि थे। लेखक को कुछ हद तक एक्टिविस्ट होना चाहिए। सुब्रमण्यम भारती कवि और ‘एक्टिविस्ट’ थे। दूसरी बात यह कि कितने ही अंतर्विरोधों से ग्रस्त है यह विशाल देश, और कोई देश अब अकेले अपनी नियति नहीं तय कर सकता। सब कुछ अंतरराष्ट्रीय हो गया है। ऐसे में देश और दुनिया से जुड़े बिना एक कोने में बैठे कविता और कहानी में ही डूबे रहोगे, तो निकम्मे, घोंचू और बौड़म हो जाओगे।’
परसाईजी की तुलना अन्य व्यंग्यकारों से करते हुए कुछ लोग बड़ी मासूमियत से किसी दूसरे व्यंग्य लेखक को किन्हीं मामलों में उनसे बेहतर भी बता देते हैं। ऐसा करने वाले लोग परसाईजी के साथ ही दूसरे लेखकों से भी अन्याय करते हैं। परसाई मात्र व्यंग्यकार नहीं थे। वे लोक शिक्षक थे, समाज-निर्देशक थे। उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक चेतना जगाने का काम किया। जबलपुर में भड़के दंगे रुकवाने के लिए गली-गली घूमे। मजदूर आंदोलन से जुड़े। लोक शिक्षण की मंशा से ही वे अखबार में पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देते थे। उनके स्तंभ का नाम था, ‘पूछिए परसाई से’ पहले हल्के और फिल्मी सवाल पूछे जाते थे। धीरे-धीरे परसाईजी ने लोगों को गंभीर सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों की ओर प्रवृत्त किया। यह सहज जन शिक्षा थी। लोग उनके सवाल-जवाब पढ़ने के लिए अखबार का इंतजार करते थे।
आज के समय में परसाईजी कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं तो यह उनके लेखन की ताकत और उनकी विराट संवेदना है। अपने बारे में वे कहते थे, ‘मैं लेखक छोटा हूं, लेकिन संकट बड़ा हूं।’ तो लेखक तो परसाईजी अपने समय में ही बहुत बड़े हो गए थे। आज वे होते तो मौजूदा संकटों पर उनकी चोट भी बहुत बड़ी होती, शायद सबसे बड़ी होती।
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परसाई के पंच-18

 

1. गरीब आदमी के घर में कला और संस्कृति की बातें नहीं होतीं। भूखे की कला-संस्कृति और दर्शन पेट के बाहर नहीं होते।
2. आठ हजार वर्षों की संस्कृति के बोझ से दबे इन कुछ लोगों के घरों का यही हाल है कि जो त्याज्य है, अपवित्र है, हानिकारक है, वही अतिथि के लिये है।
3. बाजार में पूजा सड़ी, गली, छोटी और सस्ती सुपारी, खाने की सुपारी से जो अलग मिलती है, उसके पीछे यही फ़िलासफ़ी तो आधार रूप है कि सड़ा-गला जो है वह धर्म और परमार्थ के लिये है। पूजा की सुपारी वह सड़ी सुपारी है, जो खाने के काम न आ सके।
4. जीवित अवस्था में तुम जिसकी ओर आंख उठाकर नहीं देखते उसकी सड़ी लाश के पीछे जुलूस बनाकर चलते हो। मरते वक्त तक जिसे तुमने चुल्लू-भर पानी नहीं दिया, उसके हाड़ गंगा जी ले जाते हो। अरे, तुम जीवन का तिरस्कार और मरण का सत्कार करते हो।
5. जिन्दगी भर तिरस्कार का स्वाद लेते-लेते सहानुभूति मुझे उसी प्रकार अरुचिकर हो गयी थी जिस प्रकार शहर में रहने वाले को देहात का शुद्ध घी।
6. भगवान ने क्रोध से कहा,”पाप-पुण्य के झमेले में पड़ने वाले कायर ! वह दीवाल क्या मेरी बनायी है? तमाम दीवालें आदमियों ने खड़ी की हैं और तू उन्हें तोड़ने में पाप-पुण्य देखता है? मूर्ख ! तेरा कुत्ता तुझसे ज्यादा समझदार है। वह घुस गया, खाया और डण्डे की मार से मरकर यहां आ गया। उसमें मनुष्यत्व है, तुझमें पशुत्व भी नहीं। मैंने तुम्हें बुद्धि दी है; हाथ-पैर दिये हैं, कार्य-शक्ति दी है- और तू अकर्मण्य, बुजदिल कीड़े सा मर गया।
7. साले, मूर्ख ही शोभा देते हैं।
8. धन की जात एक होती है।
9. लगी-लगायी शादियां वे तुड़वाते थे; लड़कियों की कलंक-कथा उनके मुख से आरम्भ होकर प्रचार पाती थी। बदनामी का कारखाना उन्हीं के घर खुला था, जहां रोज माल बनता था और मुफ़्त बंटता था- लोकहितार्थ; भाई-भाई में अनबन वे ही कराते थे। ये सब सामाजिक कार्य उनके द्वारा होते थे। पवित्र आदमी थे।
10. अनेक भारतीय कुलबधुएं पति के हाथ से पिटना अपना अधिकार और गृहस्थ जीवन का जरूरी दस्तूर मानती हैं। अगर उन्हें यह अधिकार न मिले, तो वे बुरा मानती हैं।
11. जब कोई कुलवधू पिटती है, तब मुहल्ले की स्त्रियों को ऐसा लगता है जैसे कोई त्योहार मनाया जा रहा है।

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Sunday, August 23, 2020

परसाई के पंच-16

 1. जिन सवालों के जबाब तकलीफ़ दें उन्हें टालने से आदमी सुखी रहता है।

2. आत्मविश्वास धन का होता है, विद्या का भी , पर सबसे बड़ा आत्मविश्वास नासमझी का होता है।
3. जनता जानती है कि हम कतई पद-लोलुप नहीं हैं, क्योंकि हम पदों पर हैं। जो पद पर नहीं हैं, वही पदलोलुप होता है।
4. जनता बलिदान करनेवाले से बहुत डरती है। बलिदान करने वाला बड़ा खतरनाक होता है। वह उनसे घृणा करने लगता है, जिनके लिये वह बलिदान करता है। वह उनसे बदला लेता है।
5. सरकारी लिफ़ाफ़ा एक लॉटरी हैं – न जाने उसमें से क्या निकल पड़े, जो जिन्दगी सुधार दे।
6. जब कुल का सयाना अन्धा होता है, तब थोड़े-थोड़े अन्धे सब हो जाते हैं। फ़िर जिसे बुरी बात समझते हैं, उसी को करते हैं।
7. दुनिया में सब लड़ाई को बुरा बोलते हैं। सब शान्ति की इच्छा रखते हैं, पर सब हथियार बनाते जा रहे हैं।
8. अंको का ज्ञान मुझे बचपन में ’पीपरमेण्ट’ की गोलियां गिनकर कराया गया था, बड़ा होने पर मेरा गणित का ज्ञान पैसों में ही उलझ गया और अब मुझे गिनती की जरूरत इसीलिये महसूस होती है कि पहिली तारीख को तन्ख्वाह बांटने वाला बाबू कम रुपये न दे दे, अधिक की तो सम्भावना ही नहीं है।
9. इस विशाल देश में ऐसा कोई पुरुष नहीं, जिसे रूप, गुण, शील में समानता करने वाली योग्य स्त्री न मिल सके।
10. हमारे विश्वास परायण समाज में चन्दा मिलना मुश्किल नहीं है। अब तोअ 25 प्रतिशत कमीशन पर पेशेवर चन्दा इकट्ठा करने वाले भी मिल जाते हैं।
11. विचित्रता और असामन्जस्य अक्सर महानता का भ्रम कराते ही हैं।

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परसाई के पंच -17

 1. नालायक समझे जाने वाले पति की, गरीब मां-बाप वाली पत्नी तिरस्कार ही तो पाती है।

2. हमारे इस विशाल भारत देश में नेता वही होता है जो जोर से बोले या खिलाये-पिलाये।
3. क्योंकि इस जमाने में आदमी की वास्तविक शक्ल से चित्र अच्छे उतरने लगे हैं। इसीलिये प्रेमी प्रेमिका को प्रथम मिलन में ही ’फ़ोटू’ देने की जल्दी करता है।
4. पुरुष पर स्त्री की विजय के अनेक कारणों में सबसे बड़ा कारण यह है कि स्त्री, पुरुष के सम्बन्ध में अपने मनोभावों को प्रकट करने का लोभ कुछ देर के लिये संवरण कर सकती है, पर पुरुष अपनी चाह को व्यक्त करने की उतावली करता है।
5. जैसे हर ’गबदू’ ग्रेजुएट वाइस चांसलर बनने की इच्छा मन में पाले रहता है, उसी प्रकार मोटर का हर मुसाफ़िर ’फ़्रण्ट सीट’ पर बैठने की अभिलाषा रखता है।
6. ये ऐसे लोग होते हैं जो हर कठिनाई को बचाकर किसी प्रकार घिसटते हुये जिन्दगी की राह पर चलते हैं। ये ऐसे मुर्दे होते हैं कि जहां हैं वहीं रहना परम भाग्य समझते हैं। ये सन्तोषी नहीं होते; कायर होते हैं, बुजदिल होते हैं। अपने अधिकारों में से बहुत से ये दूसरों के लिये छोड़ रखते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं जो झंझट पसन्द नहीं करते।
7. जहां जीवन की परिभाषा मृत्यु को टालते जाना मात्र हो, वहां जीवन को नापता हुआ वर्ष पास-पास कदम रखता है।
8. आदमी अपने पैसे का बदला वसूल करना चाहता है, चाहे वह प्रतिदान आंसू ही क्यों न हो।
9. रेलवे में घूस लेना इस कदर कानूनी हो गया है कि अगर कोई घूस न दे तो उस पर रेल बाबू दीवानी का मुकदमा दायर करने की भी एक बार सोचता है।
10. भूख का एक स्वर होता है, चाहे वह कुत्ते की भूख हो, चाहे आदमी की भूख हो। भूख का स्वर पहचानने में आप गलती नहीं कर सकते।
11. हममें में से अधिकांश के लिये सहानुभूति भी एक कला बन गयी है। भाषा के वैभव ने हमें क्षमता दी है कि हम चुनिन्दा शब्द उच्चरित करें। नाट्य कला ने सुविधा दी है कि दर्द का भाव चेहरे पर बिछा लें। इससे ज्यादा हम करते भी क्या हैं? सोचकर सन्तोष कर लेते हैं कि ज्यादा कर भी क्या सकते हैं?

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Friday, August 21, 2020

परसाई के पंच-15

 1. मेरा अन्दाज है, इस समय देश में राजनीति के क्षेत्र में लगभग पांच हजार चमचे काम कर रहे हैं। ये प्रधान चमचे हैं। फ़िर इनके स्थानीय स्तर के उपचमचे और अतिरिक्त चमचे होते हैं। ये सब हीनता , मुफ़्तखोरी, लाभ और कुछ वफ़ादारी की ओर से अपने नेता से बंधे होते हैं। इनमें गजब की अनुशासन-भावना होती है। अगर किसी उपचमचे को जनपद को जनपद की सीट का टिकट चाहिये तो वह सीधा नेता के पास नहीं जायेगा। वह प्रधान चमचे से कहेगा और प्रधान चमचा नेता से बात करके उसका काम करायेगा।

2. नेता का दुनिया से सम्पर्क सिर्फ़ चमचे के मारफ़त होता है और कुछ दिनों में उसका यह विश्वास हो जाता है कि इस विशाल दुनिया में मेरे चमचों के सिवा और कोई नहीं रहता। अपनी दुनिया को इस तरह छोटा करके जीने क सुख नेता कुछ साल भोगता है और फ़िर उसी नाव पर सुख का बोझ इतना हो जाता है कि नाव नेता को लेकर डूब जाती है। चमचे तैरकर किनारे लग जाते हैं और दूसरे नेता के चमचे हो जाते हैं।
3. नेता मरता रहता है, चमचे अमर होते हैं।
4. कुछ चमचे जीवन-भर सिर्फ़ चमचा बने रहने का व्रत पालते हैं और पचीसों नेताओं को डुबाने का पुण्य प्राप्त करते हैं।
5. चमचा बनना आसान नहीं है। एक अच्छे चमचे का निर्माण कई सालों में होता है।
6. आन्दोलन में जब ऐसा लगता कि इस बार सरकार सख्ती कम करेगी, जेल कम दिनों की होगी और वहां आराम भी रहेगा, तब हर नेता अपने ज्यादा से ज्यादा चमचों को जेल भेजने की कोशिश करता था। तब जेल जाने के लिये वैसी ही होड़ होती थी जैसी अब चुनाव टिकट के लिये होती है।
7. चाहे साम्राज्यवाद हो , चाहे प्रजातन्त्र- दोनों चमचों की बुनियाद पर खड़े रहते हैं।
8. चमचा बड़ी तरकीब से यह बात फ़ैलाता है कि नेता का वह विश्वासपात्र है, उनका आत्मीय है और वे उसकी बात कभी नहीं टालते।
9. आम चमचों से नेता के घर के लोग और नौकर नफ़रत करते हैं। वह चमचा हजारों में एक होता है जिसे नेता भी चाहे, उनका परिवार भी और नौकर भी।
10. किराये पर देने के लिये जब मकान बनवाया जाता है तो खास ख्याल रखा जाता है कि किरायेदार को भूल से भी कोई सुविधा न मिल जाये।
11. कभी-कभी नीरसता से ऊबकर , ये घरघुसी स्त्रियां आपस में शौकिया लड़ पड़ती हैं। कलह से सस्ता मनोरंजन और क्या होगा?

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लोग खुद तक सिमटकर रह गए हैं

 


बहुत दिन बाद सड़क पर निकले। जंगल में ठहरे लोग रात में जंगली जानवरों के डर से रेस्ट हाउस से बहुत दूर नहीं जाते। हम भी कोरोना के डर से बाहर निकलते झिझकते हैं। निकलते भी हैं तो मास्क पहन कर जैसे कि जंगल में शिकारी निकलते समय बंदूक ले लेते होंगे।

कोरोना ने बड़े-बड़ों की सिट्टी और पिट्टी जोड़े से गुम कर रखी है। जैसे आखिरी दिनों में मुगल बादशाह दिल्ली तक सीमित रह गए थे वैसे हो कोरोना काल में 'तमाम' लोग खुद तक सिमट कर रह गए हैं।
लेकिन इन लोगों के अलावा और भी तमाम-तमाम लोग हैं जो कोरोना से डरे बिना मस्त , निर्द्वन्द घूम रहे हैं। मास्क नहीं, दूरी नहीं। कोरोना की ऐसी कम तैसी वाली मुद्रा में लोगों को घूमते देख कोरोना भी डर जाता होगा।
सड़क के दोनों तरफ लोग फुटपाथ पर जमे हैं। यहाँ बनी बेंचों पर बैठने से रोकने के लिए कांटे रखवा दिए गए हैं। कांटो का ताज की तर्ज पर कांटो की बेंच। लेकिन उससे क्या ? बगल में फुटपाथ तो है। लोग साफ-सुथरे फुटपाथ पर बैठे हुए कसरत कर रहे हैं।
एक भाई जी 'ओम' का जाप कर रहे हैं। जोर से। सुनते ही कोरोना घबरा गया होगा -'ये तो शंकर भक्त है। प्रलय के देवता का आदमी। प्रलय होगी तो दुनिया ही नहीं रहेगी। कोरोना भी खल्लास। ' कोरोना 'ओम' की आवाज से 'सुरक्षित दूरी' बनाते हुए निकल लिया होगा।
दूसरे भाई जी कपाल भाती कर रहे हैं। हवा अंदर जा रही है बाहर आ रही है। नापी नहीं लेकिन जितनी हवा अंदर जा रही उतनी बाहर आ नहीं रही होगी। फेफड़े जरूर अपना कमीशन काटकर कम हवा ही भेज रहे होंगे बाहर। बिना कमीशन कोई काम नहीं करता आजकल।
हवा की बात से याद आया कि आजकल अस्पतालों में कोई जाए तो कहा जाता है -'कोरोना टेस्ट करा कर आओ।' कोई मरता हुआ इंसान जाए तो भी पहले कोरोना टेस्ट करा कर पहुंचे अस्पताल। आफत है। इस चक्कर में वे लोग भी मर रहे हैं जो सामान्य उपचार से बच सकते हैं।
हवा जो अंदर जा रही है वह फौरन बाहर आ रही है। कहीं फेफड़े धकियाकर बाहर तो नहीं कर रहे हवा को -'जाओ पहले कोरोना टेस्ट कराकर आओ तब अंदर आओ।' लेकिन ऐसा होगा नहीं। फेफड़े कोई अस्पताल के डॉक्टर थोड़ी हैं जो ऐसा करें।
एक भाई जी फुटपाथ पर कसरत कर रहे हैं। फुटपाथ को दबाने की कोशिश कर रहे हैं। फुटपाथ दब नहीं रहा। वो ऊपर उठ रहे हैं। खुद ऊपर उठने के लिए भी किसी को नीचे दबाना होता है। क्रिया -प्रतिक्रिया का शाश्वत नियम है।
सूरज भाई बिना मास्क आसमान में टहल रहे हैं। हमने टोंक दिया तो हंसते हुए बोले -' यहां कौन मास्क की जरूरत। अरबों साल की सोशल डिस्टेंसिंग है हमारी तुम्हारी।'
हंसने लगे यह कहकर सूरज भाई। उनकी हंसी से दिशाएं खिलखिला दीं। सुबह हो गयी।

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Wednesday, August 19, 2020

परसाई के पंच-13

 1. वैष्णव बेखटके गबन कर सकता है, चोरी कर सकता है, काला पैसा जमा कर सकता है।

2. किसी प्रकार की आग लग जाय तो शासन को उसकी जांच की कोशिश नहीं करनी चाहिये। विश्वास कर लेना चाहिये कि आग दैवी इच्छा से लगी है। दैवी इच्छा में मनुष्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये।
3. इस कालेज में पैंतीस साल से लघु शंका गृह नहीं बना। अब एकदम लघुशंकागृह बनवा देना बहुत क्रांतिकारी कदम हो जायेगा। क्या हम इतना बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाने के लिये तैयार हैं?
4. समाज में कोई भी अच्छी स्त्री किसी शरीफ़ आदमी को प्यार नहीं करती।
5. राकेश की एक आदत है। वह उन स्थानों के आसपास घूमता रहता है, जहां गुण्डे स्त्रियों को तंग करते हैं। ज्योंही किसी सुन्दरी को कोई गुण्डा छेड़ता है, राकेश उससे भिड़ जाता है और उसे पीटकर स्त्री को उसके घर पहुंचा देता है।
6. भारत में साधु बहुत हैं। इससे समाज को बहुत लाभ हैं। इनका काम है आत्महत्या करने वाली स्त्रियों को बचाना और बिछुड़े हुये प्रेमियों को मिलवाना। भारत-साधु-समाज की व्यवस्था के अनुसार सुन्दरियों के आत्महत्या करने के स्थानों के पास एक-एक साधु छिपकर बैठा रहता है। वह चौबीसों घण्टे देखता रहता है कि कौन आत्महत्या करने जा रही है। बारह घंटे में उनकी ड्युटी बदलती है।
7. स्वामी जी हंसे। बोले.” बच्चा तुम संसारी लोग होटल में साठ साल के बूढे ’बैरे’ को ’छोकरा’ कहते हो न! उसी तरह हम तुम संसारियों को ’बच्चा’ कहते हैं। यह विश्व एक विशाल भोजनालय है जिसमें हम खाने वाले हैं और तुम परोसने वाले हो। इसीलिये हम तुमको ’बच्चा’ कहते हैं।
8. जब चुनाव आता है तो , तब हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती हैं। कहती हैं- बेटों, चुनाव आ रहा है। अब मेरी रक्षा का आन्दोलन करो। देश की जनता अभी मूर्ख है। मेरी रक्षा का आन्दोलन करके वोट ले लो।
9. इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, मंहगाई मार रही है। मनुष्य को मुनाफ़ाखोर मार रहा है, कालाबाजारी मार रही है। भ्रष्ट शासन-तन्त्र मार रहा है। सरकार भी पुलिस की गोली से चाहें जहां मनुष्य को मार रही है।
10. गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य मारे जाते हैं।
11. मनुष्य-रक्षा के लिये मुनाफ़ाखोर और कालाबाजारिये से बुराई लेनी पड़ेगी। यह हमसे नहीं होगा। यही लोग तो गोरक्षा आन्दोलन के लिये धन देते हैं। हमारा मुंह धर्म ने बन्द कर दिया है।

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परसाई के पंच-14

 

1. हमारे यहां जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं। यही सच्ची पूजा है। नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की, सो तुम जानते हो।
2. दूसरे देशों गाय दूध के उपयोग के लिये होती है; हमारे यहां यह दंगा करने और आन्दोलन के लिये होती है।
3. अगर गोरक्षा का कानून बन जाये तो यह देश अपने आप समृद्ध हो जायेगा। फ़िर बादल समय पर पानी बरसायेंगे, भूमि खूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे।
4. भगवान रखना भी एक झंझट है। वह हर बात पर दंड देने लगता है।
5. जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिये, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है।
6. अगर इस जनता को गोरक्षा आन्दोलन में न लगायेंगे तो यह बैंको के राष्ट्रीयकरण का आन्दोलन करेगी, तन्ख्वाह बढ़वाने का आन्दोलन करेगी, मुनाफ़ाखोरी के खिलाफ़ आन्दोलन करेगी। उसे बीच में उलझाये रखना धर्म है बच्चा।
7. चन्दा-चन्दा सब एक। मुझे तो लगता है कि बड़ा अनाथालय है। अनाथालय के लड़के बैण्ड बजाकर चन्दा मांगते हैं और ये देशसेवा वाले नारे लगाकर। वे अनाथों की परवरिश के लिये मांगते हैं और ये देश की परवरिश के लिये।अच्छा , फ़िर दूसरों को तो रुपया-दो रुपया देकर टाला जा सकता है पर ये देश-रक्षा वाले तो बहुत मुंह फ़ाड़ते हैं। कहते हैं- दो हजार दीजिये, तीन हजार दीजिये।
8. देश की रक्षा करना है तो यह तो मैंने माना। पर जरा किफ़ायत से करो न ! देश रक्षा क्या किफ़ायत में नहीं हो सकती?
9. हर बड़े आदमी का -कम से कम एक (चमचा) होता है। जिनकी हैसियत अच्छी है, वे एक से ज्यादा चमचे रखते हैं।
10. सारे फ़रिश्ते भगवान के चमचे हैं। शैतान ने भगवान का चमचा बनने से इन्कार किया , तो उसे स्वर्ग से निकाल दिया गया -जैसे गैर-चमचे को चुनाव-टिकट नहीं दिया जाता।
11. सबसे ज्यादा चमचे राजनीतिक क्षेत्र के नेताओं के होते हैं। इतिहास साक्षी है कि दुनिया में जितनी उथल-पुथल हुई है, वह महापुरुषों के कारण नहीं बल्कि उनके चमचों के कारण हुई है। जब भी चमचे ने अपनी अक्ल से कुछ किया है, तभी उपद्र्व हुये हैं। इसलिये हरबड़ा आदमी विश्वहित में इस बात की सावधानी बरतता है कि उसका चमचा कभी भी अपनी अक्ल का उपयोग न करे।

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Tuesday, August 18, 2020

परसाई के पंच-12

 

1. इस कौम की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने में जा रही है। पाव ताकत छिपाने में जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में ..... बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है-तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।
2. बारात की यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ, खासकर लौटते वक्त जब बाराती बेकार का बोझ हो जाता। अगर जी भरकर दहेज न मिले , तो वर का बाप बारातियों को दुश्मन समझता है।
3. बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गाँधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दूसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुजर रही थी।
4. काली शेरवानी और बड़े बाल मुझे कई रूप दे देते हैं। नेता भी दिखता हूँ , शायर भी और अगर बाल सूखे बिखरे हों तो जुम्मन शहनाई वाले का भी धोखा हो जाता है।
5. झूठ अगर जम जाए तो सत्य से ज्यादा अभय देता है।
6. कुत्ते भी रोटी के लिए झगड़ते हैं, पर एक के मुंह में रोटी पहुंच जाए तो झगड़ा खत्म हो जाता है। आदमी में ऐसा नहीं होता। प्रेम से चाय पिलाई जाती है, तो नफरत के कारण भी। घृणा भी आदमी को उदार बना देती है।
7.नियम के पाबंद ऐसे होते हैं कि अगर उनका नियम है कि भोजन के बाद सौ गज चलेंगे, तो जहां दो सौ गज खत्म होते हैं, वहां पहले से खाट बुलवा लेंगे।
8. बहुत लोगों की लाशें ज्यादा उपयोगी होती हैं। कई लोगों को देखकर लगता है, ये अगर जल्दी लाश हो जाएं तो दुनिया का कितना भला कर जाएं।
9. सबटेनेंट होते ही आदमी बदल जाता है। छः फुटा अपने को बौना समझने लगता है। एक खूबसूरत आदमी सबटेनेंट हो गया तो उसने मुहल्ले की स्त्रियों की तरफ देखना बन्द कर दिया। वह अपने को बदसूरत समझने लगा था। एक जालिम पुलिस अफसर कुछ महीनों के लिए सबटेनेंट हो गए थे, तो वे मुलजिम की तरह बर्ताव करने लगे।
10. विश्वविद्यालय के कुलपति अगर सबटेनेंट हो जाएं तो वे अपने को ऐसा छात्र समझने लगेंगे, जो परीक्षा में दबा-दबा नकल कर रहा है।
11. पुलिस कॉन्सटेबल को इंस्पेक्टर साहब कहने से वह छोड़ देता है।

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Monday, August 17, 2020

परसाई के पंच- 11

 1.हारा हुआ राजा रनिवास में जाता था, हारा हुआ नेता आध्यात्म में जाता है।

2. हर कुत्ता जन्म से ही आत्मज्ञानी होता है। वह जानता है कि मैं कुत्ता हूं और मेरा काम भौंकना है। कई लोग अपने कुत्ते को ’टाइगर’ कहते हैं, पर कुत्ता अपने को कभी शेर नहीं समझता। वह अपने सच्चे स्वरूप को पहचानता है।
3. हर इमारत या पुल में से चन्द्रा साहब का एक मकान पैदा हो जाता था। छोटी इमारत होती तो , तो किसी मकान का गुसलखाना ही उसमें से निकल आता था।
4. जिस जाति के हृदय से विश्वास उठ जाये, उसका पतन अवश्य होता है।
5. वास्तव में मकान मालिक का दरजा ईश्वर के पास ही है। ईश्वर ने सृष्टि रची, पृथ्वी बनायी, आकाश बनाया लेकिन मकान नहीं बनाये। मनुष्य पृथ्वी पर खुले आकाश के नीचे तो रह नहीं सकता था। तब मकान मालिकों ने मनुष्यों के रहने के लिये मकान बनाये। जो किराये के लिये मकान बनवाते हैं , वे ईश्वर के समान ही पूज्य हैं।
6. जो मां अपने बेटे को जितना प्यार करती है, बहू को उतना ही दुख देती है।
7.चाहे कोई दार्शनिक बने, सन्त बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अंधेरे का डर दिखाता है तो जरूर अपनी कम्पनी का टार्च बेचना चाहता है।
8. रीडर (पढने वाला) उस अध्यापक को कहते थे, जिसे कक्षा में पढाना नहीं आता और वह पाठ्य-पुस्तक या कुंजी कक्षा में पढकर काम चला लेता था।
9.एम. ए. एक ऐसी परीक्षा थी जिसे पढने के बाद तीन वर्ष बेकारी का कोर्स करना पड़ता था।
10. विद्या पढने से नहीं वरन गुरुकृपा से प्राप्त होती है।
11. महाभारत युद्द न होता अगर भीष्म की शादी हो गयी होती। और अगर कृष्न मेनन की शादी हो गयी होती तो , तो चीन हमला न करता।

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