Tuesday, September 15, 2020

परसाई के पंच-35

 1. भारत-भूमि कुछ ऐसी उपजाऊ है कि बाहर से आयी हुई चीज यहां खूब फ़लती-फ़ूलती है। विदेश से आयी हुई प्लेग हमारे गांव-गांव में पहुंच गई और प्लेग की तरह आयी अंगरेज जाति भी खूब फ़ली-फ़ूली।

2. दो सौ वर्षों तक हमारे सिर पर सवार होकर अंग्रेजों ने हमसे तो बहुत कुछ लिया और साथ ले गये, परन्तु हम बड़े घाटे में रहे कि उनसे समय की पाबन्दी भी नहीं सीख सके।
3. भाषा की जठराग्नि प्रचण्ड होनी चाहिये और उसे अन्य भाषाओं के शब्दादि निगलने को प्रस्तुत रहना चाहिये। परन्तु यहां सतर्कता की आवश्यकता है। हम यह देख लें कि हम कहीं सड़ा-गला माल तो नहीं निगल रहे हैं।
4. इस रुदन से आक्रान्त संसार में अगर आदमी ईमानदारी से पक्षपात रहित होकर अपने भीतर देखे तो निस्सन्देह उसे अपने से अधिक हास्यास्पद आदमी ने मिले।
5. जैसे जिन्दगी में हर चीज की ’वैल्यूज’ बदल गयी हैं, हमारे समय तक आते-आते वसन्त भी पैसों का मोहताज हो गया है।
6. सबसे प्रधान आदमी के ठीक पीछे हमेशा खड़े हो जाने की दक्षता प्राप्त कर लेना, बड़ी साधना का परिणाम है।
7. हिन्दी का लेखक या तो वास्तव में बुद्धू होता ही है, या बुद्धू बनने के अवसर की ताक में रहता है और सरलता के गर्व के साथ बुद्धू बन जाता है।
8. कहीं घर में आग लगती है तो देखते हैं कि सब चिल्लाते हैं- ’पानी लाओ ! पानी लाओ !’ पर पानी कोई एक-दो ही लाते हैं ! शेष केवल चिल्लाते हैं !
9. पढ़ाने वाले पढाते नहीं हैं और पढने वाले पढते नहीं हैं, पर दोनों एक-दूसरे की शिकायत करते हैं। और नेता लोग बड़ी समझदारी से गर्दन हिलाकर कहते हैं कि यह शिक्षा-पद्धति ही दोषपूर्ण है, इसे बदलना चाहिये। याने बदलना तो चाहिये पर बदलने का काम कोई जादूगर या भगवान कर जाये तो कर जाये, ये स्वयं नहीं करेंगे।
10. इतनी मेहनत करनी पड़ती है विद्यार्थी को। पेपर आउट करना, नकल करने के लिये पायजामा में कागज छिपाना, नोट्स की नकल करना, नम्बर बढ़वाने की कोशिश। फ़िर भी लोग आरोप लगाते हैं कि विद्यार्थी मेहनत नहीं करते। झूठ है। वे व्यर्थ का श्रम नहीं करते। जो काम जरूरी है, उसी को करते हैं।
11. इस देश में कोई युवक नहीं जानता कि उसका आखिर होगा क्या? वह क्या करेगा? वह यह भी जानता है बी.ए. करने से कुछ नहीं होता। जब तक फ़ेल होता है, विद्यार्थी कहलाता है। जब पास हो जायेगा तब बेकार कहलायेगा। और हम उससे कहते हैं, पढने में मन लगाओ।

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