आज कॉलेज के दोस्त संजीव शर्मा से Sanjiv Sharma मुलाक़ात हुई। लखनऊ से स्कूली पढ़ाई के बाद इलाहाबाद से इंजीनियरिंग करने के बाद संजीव ऑस्ट्रेलिया में बस गए। उनकी पत्नी सुधा ने रायपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। मायका भिलाई में था। फ़िलहाल ऑस्ट्रेलिया में जोखिम विश्लेषण (Risk एनालिसिस) का काम देखती हैं। कॉलेज में कम्प्यूटर की पढ़ाई किए संजीव आजकल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन के काम में जुटे हैं।
मतलब जिस विषय में पढ़ाई की उससे पल्ला छुड़ा लिया। मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं।
संजीव ने ऑस्ट्रेलिया के बारे में कई रोचक जानकारियां दीं। तसल्ली की जिंदगी। सुनकर एहसास हुआ कि लोग बेफालतू ही अमेरिका में बसने के लिए हलकान रहते हैं। इसके मुकाबले ऑस्ट्रेलिया में टिकना ज़्यादा आसान और आरामदेह है। वैसे हमें तो अब लखनऊ ही मजेदार लगता है।
संजीव की अम्मा जी से मिलना सबसे सुखद रहा। उनसे एक रोचक याद भी जुड़ी है। शाहजहांपुर में रहने के दौरान संजीव ने बताया था कि उनकी माताजी के पास सत्यनारायण की कथा कविता वाले फार्म में है। उसका वे अक्सर पाठ करती हैं। पढ़ते-पढ़ते वह कथा की किताब फट गई थी। संजीव चाहते थे कि कोई उसको टाइप कर दे ताकि वे उसका प्रिंट लेकर नई सत्यनारायण कथा बन सके।
हमने सत्यनारायण कथा की फोटो मंगाये और टाइप करके भेज दी। इससे संजीव की अम्मा जी बहुत खुश हुईं। खूब आशीर्वाद दिए हमको। हमको वो आशीर्वाद साक्षात लेना था इसलिए उनसे मिलने खासतौर पर मिलने गए।
संजीव आस्ट्रेलिया के हिंदी रेडियो दर्पण से भी जुड़े हैं। उनकी माता जी भी इसमें कार्यक्रम देती रहती हैं। हिंदुस्तान में अध्यापन से जुड़ी रहीं श्रीमती गार्गी शर्मा जी आजकल सिडनी में बच्चों को हिंदी पढ़ाती हैं। उनके रेडियो दर्पण से जुड़े व्याख्यानों का संकलन दर्पण नाम से छपा है। किताब दिखाते हुए माताजी बार-बार उसके आवरण के बारे में बताती रहीं कि इसे हमारी नन्ही परी गौरा (संजीव की छोटी बिटिया गरिमा गौरा शर्मा ) ने बनाया है।
अपने साथ मैं विनीत कुमार Vineet Kumar की किताब 'बैचलर्स किचन' ले गया था। माताजी को किताब भेंट की और विमोचनी मुद्रा में फ़ोटो खींचा। जल्द ही विनीत बाबू की किताब ऑस्ट्रेलिया पहुंचेगी। सुधा जी ने किताब पलटते हुए कहा -' मनोरमा की रसोई के किस्से रोचक हैं। मेरी बेटियों को भी पसंद आयेगी किताब।'
संजीव, सुधा और माताजी से थोड़ी देर की मुलाकात में तमाम सारी बातें हुईं। अम्मा जी जिद करके कुछ-कुछ खिलाया। संजीव की शिकायत भी -'कोई काम करो तो ये लड़ता है कि अम्मा काम क्यों करती हो? आराम करो।' हमको अपनी अम्मा की याद आ गई कि कैसे एक बार उनको कानपुर के घर में किचन के प्लेटफार्म पर चढ़े देखकर हमारी श्रीमती ने उनको कहा था -'आप अगर ऐसे काम करेंगी तो हम अभी इनसे शिकायत करते हैं।' मैं उन दिनों जबलपुर में था। लेकिन सुमन की यह बात सुनते ही वे फौरन प्लेटफार्म से लगभग कूद गई थीं।
माताजी मथुरा की हैं। हमने उनको अर्चना चतुर्वेदी के बारे में बताया। भल्लो बुआ की एक रील दिखाई। सुनाई। जल्दी ही भल्लो बुआ का एक और श्रोता आस्ट्रेलिया में जुड़ेगा।
कॉलेज से 41 साल पहले निकले थे हम। इतने दिनों में छुटपुट बातचीत का सिलसिला बना रहा। मुलाकात कम ही हुई। आज की मुलाकात में पिछले तमाम सालों की यादें जल्दी-जल्दी साझा हुईं। आशा है जल्दी ही फिर मुलाक़ात होगी। तसल्ली से बातें होंगी।
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