युद्ध हमारा ध्येय होना चाहिए (War should be our Motto)
करीब पच्चीस साल पहले यह बात हमारे फाइनेंस के सलाहकार ने खरीदारी का निर्णय लेने वाली मीटिंग में कहीं थे। रक्षा उत्पादन से जुड़े संस्थान से संबद्ध होने के चलते आम धारणा थी कि युद्ध होता रहेगा उससे जुड़ी चीजों की माँग बनी रहेगी। काम मिलता रहेगा। स्थिति अच्छी रहेगी।
हालांकि युद्ध से हमारा कोई व्यक्तिगत फ़ायदा नहीं जुड़ा था। फिर भी यह लगता था कि लड़ाई से जुड़े सामान का बनाने का आर्डर मिलता रहेगा तो अच्छा रहेगा। उनसे बना हुआ सामान किसके ख़िलाफ़ इस्तेमाल होगा यह सोचने की जहमत कौन उठाता है।
लेकिन दुनिया तमाम हथियार बनाने वाली तमाम कंपनियों का तो अस्तित्व ही इस बात पर टिका होता है कि उनके बनाए हथियार बिकते रहें। इसके लिए लॉबीइंग करते हैं। चुने हुए राष्ट्राध्यक्ष को पटाते हैं। अपने हिसाब से राष्ट्राध्यक्ष चुनते हैं। चुनाव में चंदा देते हैं। जीत जाने के बाद अपने हिसाब से नीतियां बनवाते हैं। अपने हथियार बिकवाने के लिए लड़ाई करवाते हैं। लड़ाई रुकवाते हैं। शांतिकाल में अगली लड़ाई की तैयारी के लिए फिर हथियार बेचते हैं। फिर लड़ाई करवाते हैं ताकि उनका धंधा चलता रहे।
लाखों-करोड़ों लोगों से जुड़े जीवन का फ़ैसला दो-चार लोग अपने फायदे नुकसान के हिसाब से लेते हैं। उनको देश के लोगों की भावनाओं से कोई मतलब नहीं होता। अपने हिसाब से नैरेटिव बनाते हैं वे लोग। ट्रम्प का 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नैरेटिव भी इसी तरह का एक झांसा है। महान बनकर अमेरिका कैसा होगा यह किसी को नहीं पता है, बस हमला किए जा रहे हैं ताकि उन लोगों को फ़ायदा हो जिन्होंने उनको चंदा दिया होगा, राष्ट्रपति बनवाया होगा। नमक का कर्ज उतारना है।
अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला किया। हमले का निर्णय अमेरिका के राष्ट्रपति ने लिए। अमेरिकी अखबार वासिंगटन पोस्ट में प्रकाशित एक सर्वे के अनुसार अधिकांश अमेरिकी लोग चाहते हैं कि ईरान के साथ युद्ध खत्म किया जाए। सर्वे के कुछ निष्कर्ष इस तरह से हैं :
-आपके अनुसार अमेरिका को ईरान के ख़िलाफ़ हवाई हमले जारी रखने चाहिए या बंद कर देंने चाहिए?
इस सवाल के जबाब में 1 मार्च को 25% लोग हमले जारी रखने के पक्ष में थे, 47% लोग चाहते थे कि हमले बंद कर देने चाहिए। 28% लोगों का कोई मत नहीं था।
हफ़्ते भर बाद 6-9 मार्च को यह प्रतिशत बदलकर क्रमश: 34% , 42% और 24% हो गया। मतलब सर्वे में शामिल अधिसंख्यक अमेरिकी अभी भी चाहते हैं कि ईरान के ख़िलाफ़ हवाई हमले बंद होने चाहिए।
- आपको क्या लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के ख़िलाफ़ हमले के उद्देश्य के बारे में स्पष्ट रूप से समझाया है कि वो क्या करना चाहता है?
इस सवाल के जबाब में 65% लोगों को लगता है कि ट्रम्प प्रशासन ने हमलों के उद्देश्य के बारे में ठीक से नहीं बताया है। 35% लोग मानते हैं कि ऐसा किया गया था।
-युद्ध के लक्ष्य को देखते हुए लड़ाई में हुआ खर्च और नुकसान ( मौतें) उम्मीद से कम हैं या ज़्यादा?
इस सवाल के जवाब में 63% लोग मानते हैं कि खर्च और नुकसान उम्मीद से ज़्यादा हुआ है। 37% लोग मानते हैं कि खर्च और नुकसान उम्मीद के मुताबिक ही है।
- ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई से अमेरिका की दीर्घकालिक सुरक्षा में योगदान क्यों नहीं मिलेगा?
इस सवाल के जवाब में 19 % लोगों का मानना है ईरान के ख़िलाफ़ लड़ाई फालतू की है, ईरान (अमेरिकी) सुरक्षा के लिए कभी खतरा था ही नहीं। 14 % लोग मानते हैं कि युद्ध बेकार है (ये लोग युद्ध के ख़िलाफ़ हैं), 9% लोग मानते हैं हमला इजरायल के उकसावे पर, पैसे और ध्यान बंटाने के लिए हुआ, 6% लोग मानते हैं इससे अमेरिका और उसके साथियों को नुक़सान होगा, 6% लोगों का मानना है कि इससे तनाव बढ़ेगा, 5% लोग कोई कारण नहीं बता पाये।
यह सर्वे 1005 आनलाइन और फ़ोन से कराया गया। सर्वे में शामिल अधिकांश लोग ईरान के ख़िलाफ़ अमेरिकी हमले को ग़ैर ज़रूरी बताते हैं। 1005 लोगों के सर्वे से पूरे देश के लोगों के मिजाज को भाँपना मुश्किल है। लेकिन फिर भी एक सैंपल तो ऐसा कहता कि लोग इस लड़ाई को ग़ैरज़रूरी मानते हैं।
लड़ाई में तमाम संसाधन लगते हैं। अमेरिका में ही गैस के दाम 17% बढ़ गए हैं। महंगाई बढ़ने के साथ लोगों की नाराज़गी भी बढ़ेगी। लोग लड़ाई के ख़िलाफ़ होते जाएँगे।
एक तरफ़ अमेरिका लड़ाई में कूदा हुआ है। दूसरी तरफ़ अख़बार में छपी एक रपट के अनुसार अमेरिका के एक तिहाई लोग आपने इलाज के अपने खाने में कटौती करते हैं। पेट काटकर इलाज करवाने वाले अमेरिकी अपने ज्यादातर बड़े खर्चे मकान खरीदना आदि टालते रहते हैं।
जिस देश की एक तिहाई आबादी अपना पेट काटकर इलाज का इंतजाम करती हो उस देश का राष्ट्रपति द्वारा बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह अपने देश के संसाधन लड़ाई में फूंकते देखकर कहावत याद आती है -'घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।'
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