Monday, March 16, 2026

लखनऊ पुस्तक मेला


 कल हम लखनऊ के रवीन्द्रालय में लगे पुस्तक मेला देखने गए। रास्ते में ऑटो ड्राइवर विकास ने कहा -'कोई दवा की दुकान रास्ते में दिखे तो बताइयेगा। दवा लेनी है। बुखार है।

हमने कहा -'पहले बताया होता तो घर से लेकर दे देते।'
पता चला दो दिन से बुखार है विकास को। दवा लेकर काम चला रहे हैं। आज कुछ ज़्यादा लग रहा बुखार। हमने कहा -' ऐसा है तो घर में आराम करते।'
इस पर विकास ने कहा -'काश जिंदगी इतनी ही आसान होती।'
इस बात का हमारे पास कोई जबाब नहीं था। आगे चलकर एक दवा की दुकान से दवा ली विकास ने। तुरंत खाई नहीं। बोले -'आपको छोड़कर तब खाएँगे दवा। आधा घंटा कहीं रुककर आराम भी करेंगे।'
पुस्तक मेले में 57 दुकानें थीं। अधिकतर दुकानों पर चर्चित हो चुकी किताबें दिखीं। ज्यादातर बुक सेलर थे। दिनकर पुस्तकालय भी गए। पहले से सोच रखा था कि कोई किताब लेंगे नहीं। पहले ही इतनी रखीं हैं अनपढ़ी। लेकिन फिर जब गए तो तीन किताबें ले ही लीं:
-लखनऊ के नबाब लेखक अमृतलाल नागर
-नॉर्वेजियन वुड -लेखक मुराकामी अनुवादक मदन सोनी
-आशा टिफ़िन्स -सर्वेन्द्र विक्रम सिंह
आशा टिफ़िन्स पहले भी ऑनलाइन खरीदने की कोशिश की थी। लेकिन पैसा गया नहीं था। आर्डर हुआ नहीं। यह किताब ख़रीदने का कारण सर्वेन्द्र विक्रम सिंह जी से मित्रता और पुरानी जान पहचान होना रहा। शिक्षा विभाग से रिटायर होते ही उनका उपन्यास आना देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। पढ़कर देखेंगे।
इसके बाद एक दुकान से बानू मुस्ताक की Heart लैंप खरीदी। 2025 में बुकर पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद इसकी काफ़ी चर्चा है। कुछ पन्ने पढ़कर इसे ख़रीद किया। अमर्त्य सेन की आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन भी कुछ पन्ने पढ़कर वापस रख दी यह सोचकर कि पता नहीं कब पढ़ पायेंगे। पढ़ेंगे तब मंगा लेंगे।
इसी दुकान पर किताब देखते हुए एक युवा महिला अपनी किताब लेकर आईं। किताब के बारे में बताया और ख़रीदने का आग्रह किया। हमने कहा -'आपके स्टॉल पर आयेंगे। वहीं से लेंगे। दुकान का नंबर 57 बताया उन्होंने। आमतौर पर नंबर और नाम भूल जाते हैं। लेकिन इलाहाबाद में हॉस्टल का हमारा कमरा नम्बर 57 ही था इसलिये शॉप नम्बर भूलने की संभावना खत्म हो गई।
बाक़ी दुकानें देखते हुए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के स्टॉल पर गए। वहाँ कई किताबें सस्ते दाम पर मौजूद थी। नजीर अकबराबादी की रचनाओं का 680 पेज का संकलन (हार्ड बाउंड) 210 रुपए प्रिंट दाम में, फ़िराक़ गोरखपुरी की उर्दू भाषा और साहित्य पर लिखी 370 पेज की किताब 57 रुपए में मिल रही थी। नजीर साहब की किताब के कुछ पन्नों कीड़ों ने भी पढ़ा था शायद। जगह-जगह छेद थे उसमें। हमने खरीद लीं दोनों किताबें। अलावा इसके कन्नौज का इतिहास और गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही' पर लिखी किताब भी ख़रीदी।
इसके बाद अपन दुकान नम्बर 57 की तरफ़ गए। सबसे आख़िर में इस दुकान पर कई नए लेखकों की किताबें थीं। लेख़क भी मौजूद थे वहाँ। अपनी-अपनी किताब के बारे में जानकारी दे रहे थे। हमने पूछा -'वो लेखिका किधर हैं जो अभी अपनी किताब के बारे में बताते हुए मुझे मिलीं थीं।'
संयोग से लेखिका के साथ मिले लेखक दुकान पर मौजूद थे। उन्होंने किताब दिखाई। किताब का नाम है -When the Light Finds Her. लेखिका का नाम है -डॉक्टर शिवांगिनी श्रीवास्तव। किताब उलटते-पलटते देखते हुए डॉक्टर शिवांगिनी भी आ गईं। उनसे बात करते हुए पता चला कि वे कानपुर की ही रहने वाली हैं। कानपुर मेडिकल कॉलेज से MBBS करने के बाद अब रायबरेली मेडिकल कॉलेज से MD की पढ़ाई कर रहीं। पुस्तक मेले में शिरकत करने के लिए बड़ी मुश्किल से मिली छुट्टी लेकर लखनऊ आईं हैं। सुबह से शाम तक बीस से ऊपर किताबें बिक चुकी थीं शिवांगिनी की।
हमने सोचा ये बढ़िया तरीका किताब बेंचने का। कोई नहीं भी जानता हो लेखक और किताब के बारे में फिर भी ख़ुद बताने पर ख़रीद ही लेंगे कुछ लोग। परसाई जी ने अपना पहला व्यंग्य संकलन भी छपा कर ख़ुद भी बेचा था। लेखक को अपना प्रचार भी करना पड़ता है लोगों तक पहुँचने के लिए। लोग करते भी हैं। कई लेखकों जिनका चर्चा संसार उनकी किताबों तक ही सिमटा रहता है। लोगों तक अपना लेखन पहुँचाने के लिए प्रचार में आत्मनिर्भर होना पड़ता है। विषय कोई भी हो उनकी चर्चा का केंद्र उनका लेखन ही रहता है। हमने ये ऐसे लिखा, इसकी उन्होंने ऐसे तारीफ़ की, इसको लोगों ने समझा नहीं लेकिन इस पर ये इनाम मिला।
इसके विपरीत कुछ लेखक ऐसे भी होते हैं जो अपने लिखे पर ख़ुद चर्चा करना पसंद नहीं करते। मुराकामी ने अपने उपन्यास नॉर्वेजियम वुड की भूमिका के आख़िर में लिखा है :
" सच कहूँ तो इस उपन्यास के छपने के बाद मैंने इसे कभी पढ़ा नहीं (मुझे ऐसा करने में शर्म आती है) , और मुझे यह भी अच्छी तरह याद नहीं है कि यह पुस्तक किस बारे में है ...."
पता नहीं सच क्या है लेकिन जब मुराकामी जी कह रहे हैं तो मानना ही होगा। यह भी एक अंदाज़ है ख़ुद के लेखन के बारे में बात करने का।
शिवांगिनी ने उनकी किताब का मेरे साथ वीडियो बनवाया, फोटो लिया। वो इंस्टाग्राम पर सक्रिय हैं। फेसबुक पर नहीं। वीडियो बीस सेकेंड का बना। शायद वे इसे रील के रूप में शेयर करें। वीडियो बनाते हुए अपनी किताब पर हस्ताक्षर करते समय जूम करके फ़ोटो लिए गए। वीडियो बनाने के अंदाज से लगा कि पहले भी इस तरह के वीडियो बन चुके होंगे। किताब पर अपने ऑटोग्राफ देते हुए शिवांगी ने लिखा -Happy reading Anoop Sir 🙂 . देखते हैं कब पढ़ पाते हैं किताब।
विदा होने से पहले हमने शिवांगी के डॉक्टर होने का फ़ायदा उठाते हुए हमने कई मेडिकल सलाहें भी ले लीं। मुफ्त में।
शिवांगी से उनके प्रकाशन के अनुभव के बारे में भी बातचीत हुई। इसके पहले उनका एक कविता संकलन भी आ चुका है -Broken yet beautiful. हमने शिवांगी का परिचय दिनकर पुस्तकालय वालों से भी करा दिया। डॉक्टर प्रवीण झा के बारे में बताया। इससे शायद उनको अपने आगे के लेखन और उसकी बिक्री के बारे में सहायता मिले।
शिवांगी की किताब लेने के बाद वहीं मौजूद अमत्य अज्ञेय 'आदित्य' ने आपकी किताब 'प्रश्न से उत्तर तक ' के बारे में बताया। इस किताब में रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी बातों के बारे में बताया गया है -'धूप में कपड़े जल्दी क्यों सूखते हैं, चाय जल्दी क्यों ठंडी होती है, मिठाई फ्रिज में सख्त क्यों हो जाती है' जैसे तमाम सवालों के सरल जबाबों का संकलन है इस किताब में। MCA की पढ़ाई किए अमत्य के नाम में अनुप्रास अलंकार की छटा का करना हम नहीं पूछा पाये।
वहीं पर मौजूद कवियत्री स्वर्ण रश्मि जी की कविता पुस्तक 'सूफी इश्क़' भी खरीदी। स्वर्ण रश्मि गाजियाबाद से अपनी किताब के प्रमोशन के लिए आईं हैं। उन्होंने अपने लेखन और कवि सम्मेलन से जुड़े अपने अनुभव सुनाये। स्टॉल पर ही उनकी फ़ोटो और परिचय भी लगा था। स्वर्ण रश्मि जी ने अपने बारे में जानकारी देते हुए बताया कि उनके बोर्ड परीक्षा में उनके संस्कृत में 100 में 99 नम्बर आए थे।
चलते -चलते अभिनंदन मौर्य से भी मुलाक़ात हुई। उनकी दो किताबें मौजूद थीं। हमने एक किताब Dominating Lady Boss खरीदी। महिला बॉस के बारे में चर्चा है शायद किताब में।
बातचीत करते हुए पता चला कि पुस्तक मेले में यह स्टॉल Authors Adda के नाम से अलॉट है। किसी प्रकाशक ये बुक सेलर की बजाय लेखकों का स्टॉल है यह। लेखक अपनी-अपनी किताबें रखते हैं। पुस्तक मेले में ख़ुद आकर स्टॉल पर खड़े होकर या मेले में घूमकर मेले में आए पाठकों से संपर्क करके अपनी किताब के बारे में बताते हैं। शायद ज्यादातर लोग टाल देते होंगे। कुछ लोग ख़रीदते भी हैं। जैसे मैंने शिवांगी के बताने पर उनकी किताब के साथ चार किताबें खरीदीं।
'लेखकों का अड्डा' में आकर हमें भी अपनी किताबों के बारे में प्रचार करने की प्रेरणा मिली। लिखने की भी। क्या पता अगले किसी पुस्तक मेले में अनूप शुक्ल Authors Adda में अपनी बेचते मिलें -पुलिया पर दुनिया, बेवक़ूफ़ी का सफ़र, पुलिया पर जिन्दगी, अंधेरे का बड़प्पन और दूसरी किताबें। अपनी ऑनलाइन किताबों का लिंक तो अभी साझा कर दे रहे हैं टिप्पणी में। इस पोस्ट को पढ़कर अगर एक भी किताब की ख़रीद हुई तो लगेगा कि हमारी किताबें भी बिक सकती हैं।
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