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| काउंटर पर चाय बनाती दिव्यांशी |
दो दिन पहले कटिंग सैलून में चाय की दुकान का नाम सुना -'दो कौड़ी की चाय।' दुकान का नाम ध्यान खींचने वाला था। तय किया था जाएँगे देखने दुकान। पीने चाय।
आज शाम को गए 'दो कौड़ी की चाय' पीने। घर से करीब चार किलोमीटर दूर है दुकान। LDA कॉलोनी में बंगला बाजार के पास।
दुकान के बारे में मेरे मन इमेज़ किसी रेस्टोरेंट की थी। किसी बिल्डिंग में बैठने का इंतजाम होगा। लेकिन पहुँचने पर देखा कि फुटपाथ पर एक गोल गुमटी पर बन रही थी 'दो कौड़ी की चाय।' चाय के साथ बन मक्खन, कटलेट और दूसरे कई नाश्तों का इंतज़ाम था। गुमटी के सामने, फुटपाथ पर प्लास्टिक की कुर्सियों पर बैठने का इंतज़ाम था। पूरा फुटपाथ चाय पीने वालों से भरा था। ज्यादातर युवा लोग थे। चौड़ी कुर्सियों पर बैठे लोग तसल्ली से गपियाते हुए चाय पी थे। दुकान एक तरह से हाउस फुल थी।
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| ‘दो कौड़ी की चाय’ की दुकान पर दिव्यांशी, प्रभात (काउंटर के आगे) और रंजीत और आकाश ( काउंटर के पीछे) |
दुकान पर कोई कुर्सी खाली न देखकर अपन गुमटी के सामने ही खड़े होकर चाय बनना देखते रहे। काउंटर के अंदर खड़े दो लोग नाश्ते का सामान और चाय बना रहे थे। काउंटर के बाहर खड़ी एक प्यारी बच्ची चाय के भगौने में चम्मच हिलाते हुए चाय बना रही थी।
मैंने ध्यान से चाय बनाती बच्ची का वीडियो बनाने के बाद पूछा -' ये दुकान का नाम बड़ा मजेदार है। कैसे रखा? किसने सजेस्ट किया? '
इस पर उसने कहा -'इस बारे में दुकान के ओनर से पूछिए। वो बतायेंगे।' यह कहते हुए उसने वहाँ कुर्सियां समेटकर इधर -उधर रखते हुए एक खूबसूरत बालक की तरफ़ इशारा किया। बालक का नाम प्रभात है।
प्रभात से बातचीत की तो पता चला कि उसके तार कानपुर से जुड़े हुए हैं। वहाँ कुछ साल रहे हैं। वैसे पैदाइश और शुरुआती पढ़ाई लिखाई तो कालापानी वाले प्रदेश अंडमान निकोबार में हुई। लेकिन बाद में बीबीए और एमबीए की पढ़ाई बनारस हिदू विश्वविद्यालय से हुई। 2018 में एम बी ए करने के बाद कुछ साल ओम लाजिस्टिक में काम किया इसके बाद शायद एम बी ए के सीखे गुरु और कानपुर और बनारस वालों के चाय वालों से प्रेरणा लेकर लगा होगा कि चाय की दुकान खोली जाये। तो खोल ली।
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| काउंटर के भीतर काम करते हुए रंजीत और आकाश। |
दुकान का नाम 'दो कौड़ी की चाय' रखने के पीछे ध्यान खींचने वाली बात मुख्य रही होगी। कानपुर के 'ठग्गू के लड्डू' तो इस मामले में तमाम अटपटे नाम रखने वालों के पितामह हैं। वैसे भी पहले दुकानों, प्रतिष्ठानों के नाम शरीफ टाइप रखने के चलन था। लेकिन अब शराफ़त का जमाना नहीं रहा। ख़ुराफ़ाती नामों को लोग ज़्यादा भाव देते हैं। रचनात्मक ख़ुराफ़ात का उदाहरण है दुकान का नाम।
बातचीत करते हुए पता चला कि प्रभात को दुकान का मालिक बताने वाली बालिका दुकान की साझा मालकिन दिव्यांशी भी कानपुर की हैं। गुमटी नंबर पाँच में घर है दिव्यांशी का। पिता नये गंज में जनरल मर्चेंट की दुकान है। बीएड की पढ़ाई कर रही हैं। कानपुर में ही प्रभात और दिव्यांशी की मुलाक़ात हुई और दोनों ने लखनऊ में 'दो कौड़ी की चाय' की दुकान खोल ली।
दुकान की शुरुआत 14 फ़रवरी , 2022 को हुई। वेलेंटाइन डे को शुरू हुई दुकान में शायद इसीलिए युवा लोगों का ज़्यादा जमावड़ा रहता है।
कुल चार लोग मिलकर चलाते हैं दुकान। प्रभात, दिव्यांशी के अलावा सीतापुर महोली के आकाश और रंजीत दुकान में चाय और नाश्ते बनाने का काम करते हैं। आकाश और रंजीत दोनों सीतापुर में बीएससी की पढ़ाई भी कर रहे हैं। पास ही किराए पर रहते हैं।
चाय बनाते हुए दिव्यांशी से बात करते हुए पता चला कि प्रभात के पिता पुलिस विभाग से जुड़े रहे। मूलत: आज़मगढ़ के रहने वाले हैं। नौकरी के सिलसिले में अंडमान गए। वहीं प्रभात का बचपन बीता। इसके बाद राहुल सांकृत्यायन की तर्ज़ पर कानपुर, बनारस घूमते हुए लखनऊ में अड्डा जमाया।
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| काउंटर के सामने खड़े प्रभात। दिव्यांशी अंदर कुछ सामान बनाने गई है। |
Anita Misra को पता भी नहीं चला और उनके मोहल्ले (गुमटी नंबर पाँच) की बच्ची ने लखनऊ में चाय की दुकान खोल ली। देश-दुनिया के स्तर पर दो कौड़ी के लोगों की हरकतें देखते-देखते आजिज हो गई होंगी। कभी आ 'दो कौड़ी की चाय' भी पीकर देखें लखनऊ आकर ।
प्रभात ने यह भी बताया कि दुकान की मालकिन दिव्यांशी उनकी मंगेतर है। शायद अगले साल तक उनकी शादी हो। मतलब शादी के पहले दोनों साथ काम करने का अभ्यास कर रहे हैं।
हम तो निठल्ले थे। खड़े होकर बतिया रहे थे। लेकिन दिव्यांशी और प्रभात को चाय और दूसरे सामान बनाने के साथ ग्राहकों को सर्व भी करना था। हमारे अनुरोध करने पर सबने साथ खड़े होकर फ़ोटो भी खिंचवाया। काउंटर के पीछे खड़े सीतापुरी बालकों में से एक (रंजीत) ने बाहर निकलकर हमसे बतियाते हुए हमारा परिचय पूछा। अपना इंस्टाग्राम का खाता दिखाया। हमारा फेसबुक पता नोट किया। और कुछ बातचीत होती तब तक काउंटर से आवाज आई -' रंजीत, जल्दी आकर चाय बनाओ।'
प्रभात ने बताया कि उनकी 'दो कौड़ी की चाय' की कानपुर में भी कई दुकानें (शायद चार) और आजमगढ़ में भी एक दुकान है। लखनऊ की दुकान दोपहर दो बजे से रात ग्यारह बजे तक खुलती है। दिन में किसी को चाय पीना हो तो बताये हम 'दो कौड़ी की चाय' के अड्डे पर पहुँचकर चाय पिलायेंगे।
हमने वहीं बैठकर अदरख की चाय पी। 25 रुपए की एक चाय। छोटा ग्लास ऊपर तक भरा था। थोड़ा ठहरकर पीना पड़ा वरना हाथ जलते। ग्लास थोड़ा बड़े हों या कुल्हड़ में चाय हो तो बेहतर है। चाय बढ़िया लगी। इस बढ़िया लगने के पीछे चाय के स्वाद से ज़्यादा युवा बच्चों का उद्यमशीलता, व्यवहार और प्यारा अंदाज़ था।
प्रभात और दिव्यांशी को सफल होने के लिए शुभकामनाएँ।




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