Friday, March 13, 2026

सैंट्रो सुंदरी की विदाई


और सैंट्रो सुन्दरी विदा हो गई।
1999 के दिसम्बर महीने में आई थी सैंट्रो सुंदरी हमारे घर। शाहजहांपुर में रहते थे उन दिनों। लखनऊ के शो रूम से खरीदी गई थी। तीन लाख बीस हज़ार में। फैक्ट्री से लोन लेकर खरीदी गई थी गाड़ी। वर्षों लोन के पैसे कटते रहे। ब्याज मिलाकर पाँच लाख क़रीब रुपये खर्च हुए होंगे खरीद में।
ब्याज का खेल ऐसा ही होता है।
शाहजहांपुर में क़रीब एक साल चली सैंट्रो। 2001 में कानपुर आ गए। सबसे ज़्यादा कानपुर की सड़कों पर ही चली सैंट्रो। इधर-उधर चोट-खरोंच लगती रही। लेकिन आमने-सामने से कभी कोई भिड़ंत नहीं हुई सैंट्रो से।
कोई एक्सीडेंट तो नहीं हुआ लेकिन एक बार शाहजहांपुर में छोटे बेटे अनन्य ने ड्राइविंग सीट पर बैठकर गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। वो अकेला था उस समय गाड़ी में। घर में ही थी गाड़ी। गियर में थी गाड़ी। चाबी घुमा दी अनन्य ने। गाड़ी उछलकर चल दी। कुछ मीटर आगे चलकर गैरज से टकराई। गैराज का दरवाजा भड़ाम से ज़मीन पर आ गया। बेटा सन्न।चुपचाप गाड़ी में बैठा रहा। उस समय श्रीमती जी के दफ़्तर से आए शमसुद्दीन ने दरवाजा खोलकर उसको गाड़ी से निकाला। बेटा थोड़ी देर में सामान्य हुआ। इसके अलावा सैंट्रो सुंदरी किसी से नहीं भिड़ी आज तक।
इसके साथ आई तमाम गाड़ियाँ विदा हो गईं लेकिन सैंट्रो सुन्दरी बनी रही। कानपुर में लोग पूछते थे कि इतनी पुरानी गाड़ी क्यों चलाते हैं। इतनी कंजूसी भी ठीक नहीं। पंकज बाजपेयी भी जब मिलते तब गाड़ी के बारे में कोई न कोई बयान जारी करते। लेकिन हमको कोई ऐसी कमी नजर नहीं आती थी इसमें जिसके कारण इसको बदलने की सोची जाये। चलती रही गाड़ी।
कानपुर में खन्ना हुंडई में इसकी सर्विसिंग होती रही। शुरुआती दौर में खन्ना हुंडई के अखिलेश इसकी मरम्मत का काम देखते थे। बाद में कभी भी कोई समस्या होती तो हम उनको ही फ़ोन करके समाधान पूछते।
हमारे घर के सब लोगों ने इसे चलाया है। अनगिनत यादें जुड़ी हैं इसके साथ। एक बार घर में देर आने पर इसके पिछले शीशे की धूल पर लिखा मिला -anup you are always late.
पुरानी होते जाने के बाद इस पर मरम्मत का खर्च बढ़ गया था। एक सर्विसिंग में आठ-दस हज़ार रुपये खर्च होते। लेकिन स्टार्ट होने में एकदम युवा गाड़ी की तरह आधी चाबी घुमाने पर स्टार्ट हो जाती। चलती भी आराम से थी। कई अंजर-पंजर (स्प्रिंग) अलबत्ता ढीले हो गए थे। किसी स्पीड ब्रेकर पर लगता इसकी पसलियाँ कमजोर हो गईं हैं।
समय के साथ आगे-पीछे, दायें-बायें तमाम खरोंच लगी सैंट्रो सुंदरी के। बाद के दिनों में कहीं कोई खरोच लगती तो हम फौरन पलटकर देखने की भी जहमत नहीं उठाते। बाद में कभी देखते तो याद आता ये स्क्रैच लगा था इसमें।
सैंट्रो को सैंट्रो सुन्दरी का नाम मिला था कानपुर में। 2017 में कानपुर में उसका किसी गाड़ी की टक्कर से बम्पर पूरा निकलकर बाहर निकल गया। गाडी का पिछवाड़ा दिखने लगा। ऐसा लगा मानो 'सड़क के रैंप पर' चलते-चलते गाड़ी की चड्ढी भारी होने के कारण सरक गयी हो। बम्पर गाड़ी के अंतर्वस्त्र जैसे ही तो होते हैं।
गाड़ियों की दुनिया के अख़बार होते तो खबर छपती-'बम्पर के मैलफंकन के कारण 18 वर्षीया सैंट्रो सुंदरी उफ्स मूवमेंट की शिकार।' तमाम लोग गाडी की उतरी हुई चड्ढी की फोटो देखने के लिए फड़क उठते।
किसी अखबार में खबर छपती - ’सड़कों पर गाडियांं तक महफ़ूज नहीं। शाम को बीच सड़क आवारा बुलेरो बुजुर्ग सैंट्रो का बम्पर नोचकर फ़रार।’
कानपुर से लखनऊ आकर गाड़ी महीनों खड़ी रही। बिना चले। लगता है इससे वह नाराज हो गई। एक दिन चलाने के लिए निकाली तो स्टार्ट तो हो गई लेकिन आगे बढ़ने से मना कर दिया। क्लच प्लेट ख़राब हो गई थी। 26 साल के दरमियान पाँच-छह बार तो बदली गई होगी क्लच प्लेट। गाड़ी सर्विस सेंटर भेजी गई। उसके कई पार्ट मिले नहीं। महीने भर से ऊपर जमा रही गाड़ी। ठीक होकर वापस आई तो लगा अब चलेगी आराम से।
लेकिन एक दिन अचानक फिर खड़ी हो गई चलते-चलते। शायद उसका अल्टरनेटर 'ख़त्तम' हो गया था। फिर क़रीब हफ़्ते भर इलाज हुआ उसका हुंडई सर्विस सेंटर में। अल्टरनेटर बदलने के बाद टनाटन चलने लगी। चलती रही। इसके बाद कोई नखरे नहीं दिखाये उसने।
इन छब्बीस सालों में गाड़ी कुल सवा लाख किलोमीटर से ऊपर ही चली। मतलब पाँच हज़ार किलोमीटर /साल । बाकी सफ़र साइकिल, मोटरसाइकिल, किराए की सवारी या और सरकारी गाड़ी में हुआ।
गाड़ी में जब पेट्रोल भराने के लिए जब भी ढक्कन खुलता तो पेट्रोल पंप वाला कहा -'इसमें ढक्कन तो डीजल का लगा है।' पता नहीं कब, कैसे ईंधन भराने का ढक्कन बदल गया था।
सैंट्रो सुंदरी टनाटन चल रही थी। रजिस्ट्रेशन भी अगले चार साल तक था। इस बीच घर में एक और गाड़ी आ गई थी। दो गाड़ियाँ घर के सामने खड़ा मुश्किल काम था। जगह नहीं थी। घर के अंदर पोर्टिको में खड़ा करने में आने-जाने में परेशानी होती। बाहर कहीं और खड़ा करना सैंट्रो सुन्दरी के लिए ठीक नहीं था। आते-जाते अकेली देखकर कोई छेड़ जाता सैंट्रो सुंदरी को। ख़राब लगता। इसलिए उसको विदा करना जरूरी हो गया था।
सैंट्रो सुंदरी भले ही 26 साल पुरानी हो गई थी। लेकिन उसके चाहने वाले अनेक थे। कानपुर, लखनऊ में कई लोगों ने कह रखा था कि इसे हमको बेंच दें। लेकिन अपनी प्यारी सैंट्रो सुन्दरी को बेचने का हमारा कोई इरादा नहीं था। हमने आजतक अपना घर का कोई पुराना सामान आज तक बेचा नहीं है। किसी जान पहचान वाले को ही दिया है। सैंट्रो सुंदरी के साथ भी यही हुआ। शाहजहांपुर में रहने वाले भांजे से पूछा तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी इसे लेना स्वीकार कर लिया।
26 साल पुरानी गाड़ी किसी को देने में संकोच भी हुआ। हमने देने के पहले बता दिया कि गाड़ी पुरानी है। कहीं भी खड़ी हो सकती है। लेकिन भांजे का इरादा पक्का रहा। इसके बाद हमने गाड़ी उनके नाम रजिस्टर करा दी। शाहजहांपुर के निवासी होने के कारण ज़्यादा परेशानी नहीं हुई। परिवहन विभाग में मित्र मोहित के सहयोग से गाड़ी का रजिस्ट्रेशन भांजे के नाम हो गया। शाहजहांपुर की गाड़ी शाहजहाँपुर वाले के नाम हो गई।
रजिस्ट्रेशन के बाद गाड़ी देने शाहजहांपुर गए। चलते हुए फ़ोटो ली। मन में सोचते -'ख़ुशी -ख़ुशी कर दो विदा, सैंट्रो सुंदरी राज करे।'
हाई वे पर चलते हुए गाड़ी कई बार 80 किमी प्रति घंटे के ऊपर चली। उसको चलाते हुए कहीं से नहीं लगा कि इतनी उम्रदराज हो गई है सैंट्रो सुन्दरी। लगा कि अपने रजिस्ट्रेशन की उम्र तक अगले चार साल तो आराम से चलेगी सैंट्रो सुन्दरी।

सैंट्रो सुंदरी को शाहजहाँपुर में भांजे को सौंप कर वापस चले आए। वह विदा हो गई लेकिन उसके साथ जुड़ी यादें सो साथ ही हैं। हमेशा रहेंगी। यादें कहाँ कहीं विदा होती हैं।


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