Tuesday, March 24, 2026

शहीदों की प्रतिमाओं का अनादर


 आज सुबह पता चला कि कल शाहजहांपुर में शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर कहीं डंपिंग ग्राउंड पर फेंक दिया गया।

बिस्मिल, अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को काकोरी कांड ( 09 अगस्त, 1925) में शामिल होने के कारण फाँसी हुई थी। तीनों शहीदों के शाहजहांपुर से जुड़े होने के कारण इस शहर को बलिदानी शहर कहा जाता है। शाहजहांपुर के वीर रस के कवि किसी भी मंच पर हों ये मुक्तक अवश्य पढ़ते थे :
विश्व के संताप सब बोये गए है।
धूल के कण रक्त से धोए गए हैं।
पांव के बल मत चलो अपमान होगा।
सर शहीदों के यहां बोये गए हैं।
बिस्मिल और अशफ़ाक़ का अटूट और अनूठा रिश्ता सांप्रदायिक सद्भाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह सांप्रदायिक सद्भाव शाहजहांपुर की खासियत रही है। 1992 में बाबरी मस्जिद कांड के बाद लगभग पूरा उत्तर भारत दंगों की चपेट में था। ऐसे समय में शाहजहापुर उन कुछ शहरों में था जहाँ कोई दंगा नहीं हुआ था। यह शायद बिस्मिल-अशफ़ाक़ की साझी सांप्रदायिक सद्भाव की विरासत के कारण संभव हुआ।
शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान के बीच का सांप्रदायिक सद्भाव का अटूट भी उन लोगों को अखरता था जिनकी राजनीति की दुकान ही सांप्रदायिक वैमनस्य की जमीन पर चलती है।
शहर के लगभग केंद्रीय स्थल पर स्थित शहीदों की ये प्रतिमाएं शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल थीं। बाहर से आने वाला कोई भी शहर आता तो इन प्रतिमाओं को जरूर देखने आता। माल्यार्पण करता। इन प्रतिमाओं से कुछ दूरी पर ही खिरनी बाग में बिस्मिल का घर है। थोड़ी दूर पर स्टेशन के पास अशफाक उल्ला की मजार है। देश के लिए क़ुर्बान हो जाने वाले शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से गिराकर मलवे में फेंक देना वाला समाज कृतघ्न, मानसिक रूप से दिवालिया और अपराधी मनोवृत्ति का ही कहा जाएगा।
कल भगतसिंह के जन्मदिन मौके पर रात के अंधेरे में चोरों की तरह शहीदों की प्रतिमाओं को बुलडोजर से ढहाकर मलवे में फेंक दिए जाने के बाद जिम्मेदारी के नाम पर लीपापोती हो रही है।
महापौर अर्चना वर्मा ने कहा कि जिन शहीदों ने देश को आजादी दिलाई, उनके साथ इस तरह का व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने इसे ‘माफी के लायक नहीं’ बताया। उन्होंने कहा कि अगर उन्हें पहले जानकारी दी जाती, तो वे पूरी टीम के साथ मौके पर मौजूद रहतीं और प्रतिमाओं को सम्मानपूर्वक हटवाया जाता। शाहजहांपुर को शहीदों की नगरी बताते हुए उन्होंने इस घटना को ‘हृदय विदारक’ बताया।
जानकारी हुई कि ये प्रतिमाएँ शहर के किसी सुंदरीकरण अभियान के प्रोजक्ट के तहत गिराईं गईं। इन मूर्तियों के कारण जाम लगता था इसलिए इनको पीछे हटाना प्रस्तावित था। नई मूर्तियाँ लगनी थीं। शहीदों की मूर्तियां शहर की सुंदरता बाधक थीं। शहीदों की मूर्तियां अतिक्रमण की तरह हटा दिन गईं। महापौर को पता नहीं चला। पता नहीं कौन गिरा गया ये मूर्तियां। एफआईआर होने की बात हो रही है। जांच होगी। जांच के बाद शायद ठेकेदार के यहां दिहाड़ी पर काम करने वाला कोई बुलडोजर ड्राइवर बर्खास्त कर दिया जाए।
जहाँ इन शहीदों की मूर्तियां लगीं थीं उससे डेढ़-दो सौ मीटर दूर सदर थाना है। उनको भी पता नहीं चला और बुलडोजर चल गया। स्थानीय लोगों ने नगर निगम पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक माफियाओं के घरों पर बुलडोजर चलते देखा था, लेकिन शाहजहांपुर में शहीदों की प्रतिमाओं पर बुलडोजर चला दिया गया।
काकोरी कांड से जुड़े इन शहीदों का दुनिया भर के शहीदों में प्रमुख स्थान हैं। यहाँ लगी प्रतिमाएं इन शहीदों की सबसे प्रमुख प्रतिमाएं थीं। ऐसा कैसे हुआ कि इन पर बुलडोजर चल गया और किसी को पता भी नहीं चला।
उत्तर प्रदेश की सरकार के वरिष्ठ मंत्री शाहजहांपुर के विकास पुरुष के रूप में जाने जाने वाले माननीय महोदय को भी इस बारे में पता नहीं चला, ताज्जुब है। शहर के हर गली, मोहल्ले, सड़क, पुलिया, सेल्फी प्वाइंट, सार्वजनिक शौचालय के उद्घाटन, लोकार्पण, पुनर्निर्माण पर पत्थर पर माननीय का नाम है। हाल के वर्षों में शायद ऐसी कोई ट्रेन नहीं चली जिसको प्रधानमंत्री जी ने झंडी न दी हो। इसी तर्ज पिछले कुछ वर्षों में शाहजहांपुर में ऐसा कोई निर्माण नहीं हुआ जिस पर माननीय मंत्री जी का नाम न हो।
हो सकता है कि इन मूर्तियों को भी इस लिए ढहा दिया गया हो ताकि बाद में उनके उद्घाटन पर वर्तमान सरकार के लोगों के नाम होंगे। शहीदों से इस तरह नजदीकी जुड़ाव हो सकेगा।
शहीद पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल के चरित्र से प्रभावित होकर तुर्की के तत्कालीन शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने तुर्की के एक शहर का नाम बिस्मिल के नाम पर रखा है। जिन बिस्मिल के नाम पर करीब सवा लाख की आबादी वाला बसा है उस शहर का क्षेत्रफल 1679 वर्ग किलोमीटर है। तुर्की में जिन बिस्मिल के नाम पर 1679 वर्ग किलोमीटर जमीन है उन्हीं बिस्मिल की मूर्ति को उनके अपने शहर में कुछ वर्ग फिट की ज़मीन मयस्सर नहीं। उनकी मूर्तियां अतिक्रमण की तरह बुलडोजर से ढहा दी जाती हैं।
नगर आयुक्त के बयान के अनुसार मूर्तियो के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या होती थी इसलिए मूर्तियाँ हटाई जानी थीं। शाहजहांपुर शहर की दो प्रमुख सड़कें संकरी हैं। उनके दोनों तरफ़ आबादी और दुकान के कारण लगभग रोज जाम लगता है। मूर्तियों के हटाने से जाम की समस्या खत्म नहीं होगी। यह एक बहुत लचर बहाना है।
आज के समय दुनिया में बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतें पूरी की पूरी स्थानांतरित करने की तकनीक मौजूद हैं। ऐसे समय में देश के शहीदों की प्रतिमाएं सौंदर्यीकरण के नाम पर ढहा देना शर्मनाक है।
जगदंबा प्रसाद मिश्र 'हितैषी' की पंक्तियां हैं :
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा॥
सौंदर्यीकरण के बाद शायद प्रतिमाओं की जगह कोई सुंदर बाज़ार बने, दुकाने खुलें तब हितैषी जी की पंक्तियां नए रूप में चरितार्थ होंगी। बाजार में रोज़ रौनक होगी। रोज़ लोगों के रेले-मेले लगेंगे।
पिछले वर्ष काकोरी एक्शन के सौ वर्ष पूरे होने पर देश भर में तमाम आयोजन हुए। शहीदों के बलिदान को याद करते हुए उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया गया। शहीदों को उनके क्रांतिकारी कृत्यों के लिए अंग्रेज़ सरकार ने फाँसी की सजा दी थी। अग्रेजों ने तो मुकदमा चलाया था, बहस का मौक़ा दिया था क्रान्तिकारियों को। लेकिन क्रान्तिकारियों की मूर्तियो को बिना कोई मौक़ा दिये, बिना किसी बहस के, बिना कोई बचाव का मौक़ा दिए , बिना नगर निगम की महापौर के , बिना माननीय मंत्री, महापौर की जानकारी ढहा दिया गया।
बीते सौ साल में समाज कितना क्रूर हो गया है।
बिस्मिल , अशफ़ाक़ और रोशनसिंह को इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उनकी मूर्तियां के साथ उनके जाहिल वंशजों ने क्या सलूक किया। वे अपनी मूर्तियों की स्थापना के लिए फाँसी पर नहीं चढ़े थे। फ़र्क़ जिन लोगों को पड़ता है वे जरूर सोचेंगे कि कोई समाज अपने देश के बलिदानी शहीदों के सम्मान के प्रति इतना ग़ैरजिम्मेदार , बेपरवाह, उदासीन कैसे हो सकता है कि उनकी प्रतिमाएँ अतिक्रमण की तरह रात के अंधेरे में ढहा दी जाएँ और ज़िम्मेदार लोग बयान दें कि उनकी जानकारी के बिना यह काम हो गया।https://www.facebook.com/share/p/1GQBggVbdh/

शहीद पंडित रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाक उल्ला ख़ान और ठाकुर रोशन सिंह की मूर्तियां जो अब ढहा दी गई हैं। 👇 शहीदों की टूटी, विखंडित मूर्तियां, जमींदोज मूर्तियों की फोटुएँ नेट पर मौजूद हैं। उनको लगाने की हिम्मत नहीं है मेरी। मेरी यादों में यही मूर्तियां रहेंगी।

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