कल शाहजहांपुर जाना हुआ। कुछ घंटे रहकर काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस से वापस लौटे। शाहजहांपुर से पौन लेट चली ट्रेन आगे और लेट होती गई। लखनऊ के पहले आलमनगर स्टेशन पर खड़ी हो गई। देर तक खड़ी रही तो हमने ट्रेन में बैठे-बैठे ही कैब बुक की। दस मिनट बाद आने की सूचना मिली तो हम ट्रेन से उतरकर स्टेशन के बाहर आ गए। कैब का इंतजार करने लगे।
दस मिनट बाद कार आई। ड्राइवर साहब ने गाड़ी स्टार्ट करने के पहले पान मसाले का एक पाउच मुँह के हवाले किया । कैब का पिन डाला। गाड़ी स्टार्ट की और चल दिए। घर 13 किलोमीटर दूर था। करीब आधे घंटे का सफ़र। थोड़ी देर बाद हमारी ड्राइवर से बातचीत शुरू हुई।
बात की शुरुआत -'कहाँ के रहने वाले हैं' से हुई। पता चला औरैया के रहने वाले हैं ड्राइवर साहब। हमने कहा -'खोये के शहर नवाबों के शहर आए हैं गाड़ी चलाने।'
बताते चलें कि औरैया में खोए की बड़ी मंडी है। आसपास के जिलों में खोए की सप्लाई औरैया से होती है।
आगे बात हुई तो पता चला कि ड्राइवर साहब गाड़ी के मालिक भी हैं। जो ड्राइवर यह कैब चलाता है वह घर गया है। उसकी पत्नी कि डिलीवरी होनी है। ऐसे में मना भी नहीं कर सकते तो ख़ुद चला रहे हैं गाड़ी।
पता चला छह महीने पहले ही गाड़ी खरीदी है। हमने गाड़ी की मासिक किस्त पूछी तो बताया छह लाख महीना। हमें लगा कुछ ग़लत सुना मैंने। फिर पूछा तो पता चला कि एक साथ अट्ठाइस गाड़ी निकलवाई हैं। सबकी किस्त मिलकर छह लाख रुपए महीना है। बताया -'लखनऊ में जितनी भी 79 नम्बर वाली गाड़ियां हैं वो सब हमारी ही हैं। 79 औरैया का गाड़ी रजिस्ट्रेशन कोड है।
एक साथ अट्ठाइस गाड़ी की खरीद की बात सुनकर मैं चौंका। फिर पता चला कि दो बसें भी चलती हैं उनकी। कैब स्टार्ट करते समय के ड्राइवर पाँच मिनट में ही बड़े उद्यमी में बदल गए ।
पहली गाड़ी की 2012 में खरीदी थी जावेद ने। दोस्तों से कुछ पैसे लिए, कुछ बैंक से लोन लिया। बीते 14 साल में अट्ठाइस गाड़ियाँ और दो बसें और भी न जाने क्या -क्या जुड़ गया गाड़ियों के काफिले में । गांव में ढाई करोड़ की कोठी बनवाई है। कुल तीन भाई और दो बहने हैं। एक बहन की शादी कर दी। उसका पति डॉक्टर है। दूसरी की अप्रैल में हैं। उसका होने वाला पति एयरफोर्स में है। उसी की शादी के कार्ड छपवाने आए थे लखनऊ। यहाँ ड्राइवर छुट्टी पर चला गया तो उसके बदले गाड़ी चलाने लगे। गाड़ी खड़ी रखना ठीक नहीं।
एक भाई यूपीएससी की तैयारी कर रहा है। दूसरा गांव में रहकर घर देखता है। जावेद पूरा बिजनेस का काम देखते हैं।
ख़ुद पढ़ने में अच्छे रहे हैं जावेद। विकट ग़रीबी में दिन बीते। गांव से पढ़ाई की लिए बीस किलोमीटर दूर आते थे। हाईस्कूल में 85 प्रतिशत नम्बर आने पर पिता ने साइकिल दिलवाई थी तो वह सबसे कीमती चीज लगती थी। बाद में इंटर, बीएससी, एमएससी किया। टीचिंग के लिए बीएड किया। लेकिन फिर घर के हालात देखकर गाड़ी चलाने के लिए कार ख़रीदी। इसके बाद मेहनत और लगन से इतना कुछ हासिल किया।
पहली गाड़ी जब खरीदी थी तब गाड़ी चलाना नहीं आता था। ड्राइवर रखा। गाड़ी चलाना सीखा। व्यापार के हुनर सीखे। पैसा कमाया। इतना कुछ हासिल किया।
दो बच्चों के पिता जावेद ने बताया कि उनका बेटा अभी सातवीं में पढ़ता है। पढ़ने में बहुत अच्छा है। बेटी फारसी सीख रही है। सब भाइयों और पिता को भी गाड़ी ख़रीद के दी है।
हमने पूछा -'तुम्हारे पिताजी गाड़ी तो चला नहीं पाते । उनके लिए क्या ड्राइवर रखा है?'
'नहीं। जब कभी कहीं जाना होता है उनको तो मेरी वाइफ ले जाती हैं उनको। वाइफ गाड़ी चला लेती हैं गाड़ी। वो घर में बहू की तरह नहीं बेटी की तरह रहती है।' -जावेद ने कहा।
'इतना तामझाम मेंनटेन करने में बड़ी मेहनत करनी पड़ती होगी। आज गाड़ी भी चलानी पड़ रही है तुमको।' -मैंने कहा।
'हाँ मेंहनत तो पड़ती है। टेंसन भी होता है। अभी रात दो बजे तक चलायेंगे गाड़ी। इसके बाद सबके हाल लेंगे। कौन गाड़ी कहाँ हैं। बस का खासतौर पर देखना होता। दो बसों में डेढ़ सौ सवारी चलती हैं रोज़। उसकी स्थिति ख़ासतौर पर देखनी होती है।' -जावेद ने बताया।
इतना सुनकर हम जावेद की उद्यमशीलता से प्रभावित हो गए। तारीफ़ भी की। इसपर जावेद ने बताया कि वो वकालत भी करते हैं। हाईकोर्ट में। यह मुझे ताज्जुब की बात लगी। इतना सब करने वाला इंसान वकालत भी करे वो भी हाईकोर्ट की। हमने पूछा किस तरह के केसों की वकालत करते हो? वो बोले -'क्राइम के केस देखते हैं। आज की तारीख़ में हमारे पास सौ केस हैं क्राइम के।'
क्राइम के केस में जमानत सबसे अहम बात होती है। जावेद ने बताया कि आजतक उन्होंने क़रीब ढाई सौ जमानतें कराई हैं। एक केस के बारे में विस्तार से बताया कि एक तिवारी जी के पिताजी का मर्डर किन्ही पाठक जी ने करवा दिया था। बदले में तिवारी जी ने पाठक जी के पिताजी को मार दिया। इस मर्डर केस में एक तिवारी जी को आजीवन कारावास की सजा हुई थी। तिवारी जी जावेद से बात की। जावेद ने जमानत कराने की गारंटी ली । पैरवी की। बीस लाख खर्च हुए। महीने भर में जमानत हो गई।
जीवन का अपना अनुभव बताते हुए जावेद ने कहा -' आज के समय में पैसे सब काम हो जाता है। बस जरूरत है कि सही जगह पर पैसा सही समय पर पहुँच जाये।'
'वकालत कहाँ से सीखी?' के जवाब में बताया जावेद ने -' इलाहाबाद में हमारे एक अंकल थे उनके पास रहते हुए, उनके बस्ते में बैठकर, साथ में मेहनत करते हुए सीखी। पढ़ने का शौक है। रोज़ कम से कम घंटे भर वकालत से संबंधित पढ़ाई करने की कोशिश करते हैं।'
1988 की पैदाइश है जावेद की। इसी साल हमने अपनी नौकरी शुरू की थी। हम रिटायर हो गए। जावेद संघर्ष करके आगे बढ़ रहे हैं।
लेकिन हमें यह लगा और अभी भी सोच रहे हैं कि एक साधारण से दिखते इंसान में इतनी क्षमतायें संभव हैं क्या कि वो गाड़ी का बिजनेस देख ले, गाड़ी भी चला ले और दूसरे शहर में हाईकोर्ट में वकालत भी कर ले। लेकिन जावेद की बताई बात पर अविश्वास करने का भी कोई कारण समझ में नहीं आता।
घर पहुँचकर हमने बैग में रखी मिठाई के पैकेट से एक पीस मिठाई खिलाई। पानी उनके पास था। गाड़ी से उतरने के पहले हिदायत भी दी कि पान मसाला क्यों खाते हो? मत खाया करो। इस पर जावेद ने कहा -'आप सही कह रहे हैं। मुझे पता है कि ख़राब चीज़ है। लेकिन आदत जैसी पड़ गई है।'
चलते समय जावेद की फ़ोटो खींची। बताया कि लिखेंगे तुम्हारे बारे में। इस पर जावेद में पूछा -'आप राइटर भी हो क्या?' हमने कहा -' राइटर जैसा कुछ नहीं। बस ऐसे ही लिखते हैं रोजनामचा।'
'आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा'- कहते हुए जावेद ने गाड़ी स्टार्ट की और चल दिये।
https://www.facebook.com/share/p/186uoKNj9E/

No comments:
Post a Comment