पिछले दिनों Vineet Kumar की 'बैचलर्स किचन' पढ़ी। विनीत की यह चौथी किताब है। इसके पहले की दो किताबें उनके मीडिया के अनुभव पर आधारित थीं। एक किताब दिल्ली से जुड़े अनुभवों पर आई। 'बैचलर्स किचन' में उनके रसोई से जुड़े अनुभव हैं।
विनीत की किताब आते ही उसको पढ़ना शुरू कर दिया था। शुरुआती कुछ पन्ने पढ़ने तक Ashok Pande द्वारा अनूदित लौरा एस्कीवेल की जैसे 'चॉकलेट के लिए पानी' आ गई तो 'बैचलर्स किचन' को थोड़ा रुकने को कहकर उसे पढ़ने लगे। बेस्ट सेलर्स किताब के अनुवाद के आकर्षण में इतना फँसना तो चलता है। 'चॉकलेट के लिए पानी' पढ़ने के बाद फिर 'बैचलर्स किचन' में घुस गए।
कोई सुधी समीक्षक जब किसी किताब के बारे में लिखता है तो उसके पास समीक्षा से जुड़े तमाम टूल होते हैं। वह अपने अनुभव और ज्ञान के सहारे किताब को देखते-पलटते ही किसी न किसी खाने में रखकर अच्छे से समीक्षा कर सकता है। स्त्री विमर्श, बदलते समय में अकेले रहते लड़कों की मन:स्थिति, सोच जैसे तय जुमलों से व्याख्यायित करके बढ़िया समीक्षा कर सकता है। लेकिन हमारे जैसे अनगढ़ और कमपढ़ लोगों के लिए यह मुश्किल काम है। हम तो एक दोस्त और पाठक की हैसियत से ही अपनी बात कह सकते हैं।
विनीत कुमार से अपना परिचय ब्लॉगिंग के जमाने से है। एकाध साल इधर-उधर लगभग दो दशक। शुरुआत में तानाबाना ब्लॉग, फिर हुंकार साइट में लिखे विनीत के लेख पढ़ते रहे। इसके बाद उनकी मीडिया पर लिखीं किताबें मंडी में मीडिया (2013), मीडिया का लोकतंत्र (2023) आईं। बीच में दिल्ली से मोहब्बत बयान करते हुए इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं (2015) भी आईं। कई मुलाक़ातें भी हुईं। पहली मुलाक़ात 2009 में इलाहाबाद में हुए पहले ब्लॉगर सम्मेलन में हुई। उसमें विनीत के संबोधन और विदा होते समय हिंदी ब्लॉगिंग से हम लोगों का परिचय कराने वाले रवि रतलामी जी के साथ हुलसकर फ़ोटो खिचवाने वाले विनीत की छवियाँ मेरे मन में अंकित हैं।
ब्लॉगिंग के दिनों से अभी तक विनीत ने जितना भी लिखा है वह लगभग सारा मैंने पढ़ा है। विनीत के लेखन की खूबियाँ, ख़मियाँ तो सुधी लोग बता सकते हैं हमको तो विनीत का लिखा सब कुछ किसी घर के बच्चे का लिखा लगता है। प्यारा, सुंदर, पठनीय। कभी गुस्से में लिखी कोई पोस्ट पढ़कर लगता -'आज बाबू का मूड ख़राब है। लगता है खाना ठीक से खाया नहीं।'
विनीत ने मीडिया से जुड़े विषयों पर जो लिखा है उसका अकादमिक महत्व है, होगा। लेकिन मुझे उनकी सबसे बेहतरीन वो पोस्ट लगती हैं जिनमें उन्होंने अपने से जुड़े लोगों के बारे में लिखा है। इतने संवेदनशील , तरल, भावुक संस्मरण कम लोगों ने लिखे हैं। माँ और पिता के बारे में विनीत की पोस्ट्स इतनी आत्मीय और अपनी सी लगती हैं कि उनको खोजकर फिर-फिर पढ़ने का मन करता है। पढ़ते हैं।
विनीत की 'बैचलर्स किचन' में उनके रसोई से जुड़े अनुभवों के किस्से हैं। अधिकतर लोगों ने शायद इसी तरह से उसको देखा भी होगा। लेकिन मुझे यह किताब विनीत द्वारा अपने माँ को याद करने का जरिया लगा। साल भर से ऊपर हुआ जब विनीत की माँ नहीं रहीं। उनकी माँ मनोरमा जो पहले रूबरू थीं, बातचीत होने पर विनीत की कुशल पूछती रहती थीं वो न सांसारिक रूप में न रहने पर यादों में समा गईं। उसी का एक हिस्सा 'बैचलर्स किचन' के रूप में सामने आया है। विनीत की माँ मनोरमा की रसोई विनीत के 'बैचलर्स किचन' के रूप में सामने आई।
'बैचलर्स किचन' के पढ़ने के पहले भी विनीत के बारे में जानने का मौक़ा उनकी पोस्ट्स से मिलता रहा । घर, मोहल्ले की दीदियों, भाभियों की संगत में पले-बढ़े , बिंदी-टिकुली के संसार से परिचित विनीत के लिए उनकी माँ का साथ उनके जीवन की शुरुआती पाठशाला बनी जिसमें सीखे सबक उनके व्यक्तित्व में रच -बस गए हैं। माँ के न रहने पर इस पाठशाला में सीखे पाठ उनको जीवन के सूत्र के रूप में याद आते हैं। इनका जिक्र 'बैचलर्स किचन' में जगह-जगह मिलता है। उनकी माँ की कही कुछ बातें :
- इंसान जात भाव का भूखा होता है, भाव मिलने से दुख-तकलीफ़ का गठरी खोल देता है, रहे तब भी, नहीं रहे तब भी।
-बुझाय चाहे नहीं बुझाए लेकिन बड़ा होगा औ अपना बचपन याद करेगा तो ई बात का कसोट तो नहीं रहेगा न कि हमको भैया -दीदी, टोला -पड़ोस का बच्चा सब मारने दौड़ाता था और मेरा माई बस टुकुर -टुकुर देखते रहती थी। कुछ और नहीं तो आटा का हलुआ तो याद रहेगा ही न! यही बहुत है।
-बहुत आसरा लगाये रहते हैं हम-सब कि पढ़-लिखकर कुछ अच्छा करे।पैसा-कौड़ी तो देर-सबेर आ जाएगा लेकिन असल चीज है अपना जिनगी ठीक से संवारे।
-टेम्पू थोड़ा आगे पीछे कर लीजिएगा एक बार ड्राइवर साहब, तब ले जाइएगा।
-खाना सिरफ पेट भरने का चीज नहीं है, मन भरने का भी है। मन नहीं भरेगा तो संतोष नहीं आवेगा और जिसमें संतोष नहीं तो फिर ऊ क्या काम-धाम, रोजी रोजगार, पढ़ाई -लिखाई करेगा। पेट भर भी जावेगा तो मन लुलुआता रहेगा।
-एक होता है कि परसन दे देकर मनुहार करते हैं कि आधा और ले लो, एक कौर और खाने से कुछ नहीं होगा और एक होता है कि थारी -प्लेट देखके ही खवैया को लगे कि बहुत मनुहार से परोसा गया है। ई सब बात एक दिन का नहीं है,इसमें लगे रहना पड़ता है। जो खिलाने वाला, खवैया में तृप्ति नहीं जगा सका, उसका सब करा-धरा पानी समझो। अइसे थोड़े ही कहा जाता है -जहाँ भाव नहीं, वहाँ भात क्या!
विनीत के किचन को में दो बार देखने का मौका हमको भी मिला। अलग-अलग ठिकानों पर। बड़े उत्साह से दिखाया है विनीत ने अपना किचन। मनुहार से परोसकर कुछ खिलाया भी। बनाई हुई चीजों के बारे में बताया भी है। 'बैचलर्स किचन' पढ़ते हुए वो सब याद आया।
'बैचलर्स किचन' में विनीत ने अपने बचपन से आजतक की तमाम यादें साझा की हैं। आगे अगर कभी आत्मकथा जैसा कुछ लिखना होगा विनीत को तो 'बैचलर्स किचन' उसका जरूरी हिस्सा होगा।
'बैचलर्स किचन' में विनीत ने अपनी माँ और पिताजी से जुड़ी यादें साझा करते हुए उन यादों को शामिल नहीं किया है जो वे पहले लिख चुके हैं। उनमें से जुड़ी कुछ पोस्ट्स मुझे उनके शीर्षक से याद हैं। उनमें से एक है 'और दीयाबरनी से प्यार हो जाता'। 2009 में दीपावली के मौके पर लिखी इस पोस्ट (लिंक टिप्पणी में) की शुरुआत करते हुए विनीत में लिखा था :
"दीवाली के मौके पर मां मेरे लिए खास तौर से दीयाबरनी खरीदती। आपको शायद ये शब्द ही नया लगे लेकिन इसे समझना मुश्किल नहीं है। एक ऐसी लड़की जो दीया बारने यानी जलाने का काम करती है,जो पूरी दुनिया को रौशन करती है। प्रतीक के तौर पर उसके सिर पर तीन दीये होते और जिसे कि रात में रुई की बाती,तीसी का तेल डालकर हम जलाते। मां के शब्दों में कहें तो हमारी बहू भी बिल्कुल ऐसी ही होगी जो कि पूरी दुनिया को रौशन करेगी। आज मां दीयाबरनी खरीदे तो जरुर पूछूंगा कि कि क्या माथे पर दीया लादकर पूरी दुनिया को रौशन करने का ठेका तुम्हारी बहू ने ही ले रखी है?"
इस पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए Manisha Pandey ने टिप्पणी की थी :
"बहुत सुंदर विनीत। वो तो बचपन के खेल थे। अब असली वाली दियाबरनी कब ला रहे हो। और हां, ये लड़कियों से प्यार करने की आदत ठीक नहीं है। सिर्फ लड़की से प्यार करो। एक लड़की से। समझे... लखैरा....
"
विनीत की दियाबरनी की खोज अगर मुकम्मल हो गई होती तो इस किताब का शीर्षक शायद 'बैचलर्स किचन ' जगह 'साझे की रसोई' होता।
रोचक, पठनीय, अनूठे अंदाज में लिखी इस किताब में तमाम देशज शब्द हैं। संभव है कोई पाठक इनका सटीक न निकाल पाये लेकिन उनके प्रयोग करने के अंदाज़ से उनका सार समझ में आ जाता है।
किताब की छपाई सुंदर है और हर अध्याय की शुरुआत में बनाये रेखाचित्र प्यारे हैं। प्रूफ की गलतियाँ अगर कहीं होंगी भी तो हमको नज़र नहीं आईं।
घर में माँ की रसोई में विनीत ने रसोई के पाठ कम सीखे जीवन के पाठ ज़्यादा पढ़े। उन्हीं के बदौलत घर से बाहर निकलने पर विनीत ने 'भात तक नहीं पकाना आता' का उलाहना सुनने के बाद ख़ुद खाना पकाना शुरू किया। जिस काम का ककहरा न आता तो उसमें मास्टरी जैसी हासिल करने की प्यारी दस्तान है विनीत की किताब 'बैचलर्स किचन।'
किताब का नाम : बैचलर्स किचन
लेखक : विनीत कुमार
प्रकाशक : अनबाउंड स्क्रिप्ट
पेज : 222
कीमत : 299 रुपये
ख़रीद का लिंक : टिप्पणी में
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