आज के अख़बार में पढ़ा -'कुछ विशेष शब्द बताते हैं आपका भविष्य।' इसमें बताया गया है कि बातचीत में मैं, मेरा जैसे शब्द प्रयोग करने वाले आत्मकेंद्रित होते हैं। हम, हमारा प्रयोग करने वाले लोग ज्यादा सामाजिक होते हैं।
मुझे याद आया कि बाद के दिनों में किसी सूचना के बारे में पूछने अक्सर जबाब मिलता -'देखना पड़ेगा, कैसे होगा, हो नहीं पायेगा।' 'देखना पड़ेगा' सुनते ही अक्सर हमारे उपदेश का नल खुल जाता। हम विस्तार से बताते कि कैसे बोले गए शब्द लोगों के व्यक्तित्व का एक्सरे होते हैं।
'देखना पड़ेगा' से यह व्यवहार में नकारात्मक ध्वनित होता है। ऐसा लगता है सामने वाला कहना चाह रहा है कि सूचना के बारे में बताना एक अतिरिक्त काम है। इसकी जगह कहना चाहिए -"देखकर बताते हैं।" 'देखना पड़ेगा' से लगता है बताने वाला नकारात्मक, आलसी, ऐंठू, टालू इंसान है। उसके अंदर काम को लेकर उत्साह नहीं है। नई चुनौतियों इसके बनिस्बत 'देखकर बताते हैं' कहने वाला धनात्मक, मेहनती, विनम्र और काम के प्रति समर्पित इंसान है।
इस तरह का उपदेश देकर हम अपने को ज्ञानी साबित कर लेते। उपदेश समझाने वाले अंदाज में होता। ज़्यादा लंबा नहीं होता। लोग झेल लेते। भले ही बाद में मन में झुंझलाते हों और सोचते हों कि साहब हैं तो जो कहेंगे उसे झेलना ही होगा।
मुझे यह भी याद आया कि नौकरी के शुरुआती दिनों में किसी की पूरी बात सुने बिना उसके शुरुआती वाक्य सुनकर अक्सर मैं 'नहीं, नहीं' कहते हुए अपनी बात कहना शुरू कर देता। बाद में सामने वाले की पूरी बात सुनने पर हमारे जबाब अक्सर अलग होता। यह आदत कई लोगों में देखी है मैंने। शुरुआती शब्द सुनते ही प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं। इस चक्कर में अक्सर बात गड़बड़ा जाती है।
जबलपुर में रहने के दौरान मैंने पाया कि वहाँ लोग 'अपन' शब्द का इस्तेमाल करते हैं। 'अपन देख लेंगे', 'अपन कर लेंगे', 'अपन ऐसा करेंगे ', 'अपन साथ चलेंगे'। 'अपन' शब्द हम से भी ज्यादा आत्मीय और सामाहिक लगता है। 'हम' शब्द में सामाजिकता है लेकिन थोड़ी ऐंठ भी है। सामाजिकता के साथ-साथ अधिकार भाव है। इसके मुकाबले 'अपन' ज़्यादा आत्मीय, विनम्र और मुलायम शब्द है। साथ रहने, साथ चलने का निरहंकारी भाव है 'अपन में।'
मैं, मेरा, मेरे को, कहने वाले अक्सर कितने असामाजिक या ऐंठ वाले होते हैं इसका कोई पैमाना नहीं है। 'शब्द' इलाके के अनुसार चलन में आते हैं। 'मैं, मेरा' प्रयोग करने वाले लोग इसे अपने पर विश्वास का प्रतीक भी बता सकते हैं। यह कह सकते हैं कि यह उनके अहम का नहीं बल्कि आत्मविश्वास का परिचायक है।
'ये फलाने की गारंटी है, 'फलाना है मुमकिन है' कहने वाले लोग 'मैं, मेरा ' कहने वाले लोगों से भी ज़्यादा आत्मकेंद्रित, ऐठूँ, अड़ियल होते हैं या ज्यादा आत्मविश्वासी यह कहना मुश्किल। लेकिन व्यवहार से समझ में तो आता है।
'अपन' शब्द ऋग्वेद के श्लोक "संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्" ("हम सब एक साथ चलें, एक साथ बोलें, और हमारे मन एक (समान/एकीकृत) हों") का कोड वर्ड है। 'मैं' और 'मेरा' और 'मेरी गारंटी' कहने वाले लोग ऋग्वेद के इस सूत्र मंत्र से अलग घराने के लोग होते हैं। यह लिखते हुए विनोद कुमार शुक्ल जी की कविता याद आ गई :
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
विनोद कुमार शुक्ल जी जिस इलाके में रहे उस तरफ़ 'अपन' का चलन है। उनकी यह कविता 'अपन घराने' की कविता है। पता नहीं यह कहना कितना सही है लेकिन अपन तो ऐसा ही मानते हैं।
आपका क्या कहना है? Suresh Pant जी और Ajit Wadnerkar जी बतायें।

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