कल रात को सब्जी खरीदने गए। धनिया, मिर्च, अदरख, प्याज, लहसुन, गोभी, शकरकंद, सिंघाड़ा। हफ़्ते में दो दिन लगता है सब्जी बाजार। इतवार, वृहस्पतिवार।वृहस्पतिवार लिखते हुए याद आया अम्मा इसे 'बेफ़ै' कहा करती थीं। वृहस्पतिवार लिखने-पढ़ने वालों का शब्द है। लिखने -पढ़ने वाले भी बोलचाल में इसे वृहस्पति ही कहते हैं। लोक भाषा में वृहस्पति भी गोलियाकर 'बेफ़ै' हो जाता है।
लोकभाषा में संभ्रांत भाषाओं के शब्दों के किनारे घिसकर उनको गोल बना दिया जाता है। वृहस्पतिवार 'बेफ़ै' हो जाता है, शुक्रवार 'शूक' हो जाता है। गोलाकार होने पर शब्द आसानी से लुढ़कते हैं। दूर तक जाते हैं। ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं।
सड़क किनारे लगे सब्जी मंडी में सड़क के दोनों तरफ़ सब्ज़ी वाले बैठे रहते हैं। रात देर होते-होते सब्जी वाले किसी तरह सब सब्जी बेचकर घर वापस लौट लेना चाहते हैं। सब्जी के दाम कम हो जाते हैं। बीस रुपये की पाव भर धनिया, सौ रुपए के ढाई किलो प्याज। साठ रुपये किलो टमाटर। कहीं और भी सस्ती बिक रही होगी सब्जी। कहीं इससे कई गुने दाम पर।
सब्जी वाले ज्यादातर स्कैनर लिए बैठे हैं। जिन लोगों के पास स्कैनर नहीं है वे पास के किसी सब्ज़ी वाले के स्कैनर में भुगतान के लिए बोल देते हैं। एक सब्जी वाला तीन-चार लोगों के भुगतान ले रहा है। अपना ख़ुद की सब्जी का भुगतान भी ले लेता है।
मुझे लगा कल को कहीं सब्जी वाले पर आयकर वाले छापा न डाल दें। कहें पाँच सौ रुपए कमाई इनकम टैक्स वालों को बताते हो जबकि तुम्हारे स्कैनर से हज़ार रुपये बरामद हुए। वह कितना भी कहे कि इसमें शकरकंद वाले और अदरख वाले की बिक्री भी शामिल है लेकिन वे मानेगे ही नहीं। ज्यादा हल्ला मचाएगा सब्जी वाला तो उसके पीछे ED लग जायेगी। सब्जी वाले के पास 'सत्ता धारी पार्टी' को ज्वाइन करने या उसके खाते में चंदा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा।
अपने यहाँ लोकतंत्र में सत्ताधारी पार्टी का मतलब रंगदारी मांगने वाले लोगों का गिरोह होता गया है।
शकरकंद वाले बुजुर्ग मोटी सफेद जैकेट पहने थे। सफेद, उजले, बिना दाग वाले दांत। शुद्ध मुस्कान। उनकी जैकेट लाल होती और लाल टोपा पहने होते-सफेद फुंदने वाला तो पूछ ही लेते -‘ अरे सांता जी , आप अभी तक यहीं हो।बच्चों को गिफ्ट देने कब जाओगे ?’
लेकिन मैंने उनसे पूछा नहीं। स्कैनर के पैसे के बारे में अलबत्ता पूछ लिया -'उनसे हिसाब कैसे करोगे? कित्ते पैसे आए तुम्हारे कैसे हिसाब करोगे?'
बोले -' सब हिसाब है। तीस रुपये तुम्हारे हुए। इसके पहले के साठ। और पहले के पैसा मिलाकर एक सौ तीस रुपये हो गए अब तक। उई दई देहैं (वो दे देंगे)।' हमने निष्कर्ष निकाला -'आम लोगों में सहज विश्वास अभी क़ायम है।'
हमने पूछा -' तुम शकरकंद साठ रुपये किलो बेच रहे हो? बगलवाला तो चालीस में दे रहा है।'
'वो सफेद शकरकंद है। मीठी नहीं है।'- बुजुर्गवार ने विश्वास से बताया।
लाल सिंघाड़ा और हरे सिंघाड़ा तो एक ही दुकान में साठ रुपये और चालीस रुपये के दाम पर बिकते मिले। अभी उबले सिंघाड़े खाते हुए लगा हरे सिंघाड़े का पता लेकिन लाल (जो लाए थे) वाले वाक़ई स्वादिष्ट हैं।
सब्जी बाजार में घूमते -फिरते सब्जी ख़रीदते देखते -देखते झोला भर गया। उठाकर चलना मेहनत का काम लगने लगा तो लौट लिए।
रास्ते में एक आदमी पेड़ की आड़ में खड़े होकर फ़ोन पर किसी से कह रहा था -'यश से कहना, लड़ाई न करे। आराम से बात करे।'
आदमी की कदकाठी और बात करने का अंदाज़ देखकर मुझे ट्रम्प के भारत-पाक के बीच लड़ाई रुकवाने के दावे याद आए। अगर दावा सही है तो क्या पता ट्रम्प ने भी अमेरिका में किसी सब्जी मंडी के पास किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर दोनों देशों के हाकिमों को फ़ोन किया होगा -' लड़ाई न करो भाई। आराम से बात करो।'
सब्जी मंडी में या रास्ते में या कॉलोनी में कोई शहर में हुए प्रधानमंत्री के दौरे के बारे में बात करते नहीं सुनाई दिया। कल प्रधानमंत्री जी ने लखनऊ में अटल जी और अन्य महापुरुषों प्रतिमाओं का उद्घाटन किया। 235 करोड़ की लागत लगी। संयोग से कल ही अटल बिहारी जी का बाबरी मस्जिद गिराने पर हुई लोकसभा में अटल जी का भाषण सरसरी तौर पर पढ़ा। उन्होंने कहा था -"मस्जिद गिरने पर आडवाणी जी का चेहरा आँसुओं से तर था।"
बाबरी मस्जिद गिराने का श्रेय आडवाणी जी, उमा भारती जी आदि को दिया जाता है। लेकिन अदालत में सभी ने अपने दोषी न होने के हलफ़नामे दिए। सभी बच भी गए। जिस बात का श्रेय सामाजिक जीवन में लेते हुए लोग सत्ता में आए उसी को अदालत में नकारना आज के समय की राजनीति है।
लौटकर ताजा इंडिया टु डे में सुरेंद्र मोहन पाठक जी की पसंदीदा किताबों की लिस्ट देखी। एक चादर मैली सी (राजेन्द्र सिंह बेदी) , गॉडफ़ादर (मारियो पूजो) , गिरती दीवारें (उपेंद्र नाथ अश्क) और बगैर उनवान के (बिना शीर्षक -सआदत हसन मंटो का उपन्यास) में से पहली दो किताबें पढ़ चुके हैं। गॉडफ़ादर फ़िल्म देखने के बाद इसे फिर से पढ़ना सोचा था। अब पढ़ेंगे। गिरती दीवारें कई बार ख़रीदने की सोची, मिली नहीं। 'बगैर उनवान' भी मंगायेंगे।
बात सब्जी खरीदने से शुरू हुई थी। उसका हिसाब बताना तो भूल ही गए। घर लौट के आए तो सब्जी देखकर हमको बताया गया कि हम सब्जी गड़बड़ लाए हैं। सोया मेथी बड़ी-बड़ी है, छाँट के लेनी चाहिए थी। सब्जी और फल ख़रीदने पर अक्सर हमको उलाहने मिलते रहते हैं। हम सोच रहे हैं 'सब्जी खरीदने की कला' सिखाने वाला कोई आनलाइन कोर्स हो तो उसे ज्वाइन कर लें। आपको पता हो तो बताइयेगा।
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