Wednesday, December 31, 2025

साल का लेखा-जोखा

 


आज साल 2025 का आख़िरी दिन है। साल की चलाचली के बेला। 2025 अगर किसी दफ्तर का बड़ा अधिकारी होता तो इसके विदाई समारोह आयोजित किए जाते। इसकी शान में कसीदे पढ़े जाते। आपके जैसा कोई नहीं जैसी बातें कहीं जातीं। साथ ही आने वाले के स्वागत की तैयारी चल रही होती

देश-दुनिया की घटनाओं का लेखा-जोखा करने बैठेंगे तो बहुत कुछ छूट जाएगा।वह देश-दुनिया के लोगों पर छोड़ते हैं। अपनी बात करते हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर 2025 का साल अच्छा ही बीता। शुरुआती तीन महीने कानपुर में बीते। इसके बाद के साथ महीने नोयडा में रहे। दिल्ली में कई जगहें देखीं। कुछ अकेले, कुछ Alok Puranik जी और Manu Kaushal जी की मंडली के साथ कई कार्यक्रम देखे। कुछ लोगों से पहली बार मिलना हुआ। इनमें Jagadishwar जी, Sudha Singh जी और Ibbar Rabi जी प्रमुख रहे।
नोयडा जाने के पहले इस साल श्रीलंका यात्रा हुई फरवरी महीने। इसके बाद अक्टूबर माह में लक्षद्वीप की घुमाई हुई। दोनों जगह के बहुत प्यारे अनुभव हुए। लक्षद्वीप में स्कूबा डाइब का अनुभव अद्भुत रहा।
श्रीलंका और लक्षद्वीप दोनों जगह के यात्रावृत्तांत पूरे लिखे। इनको जमाकर किताब बनाने का विचार है। कोई प्रकाशक मिला तो ठीक नहीं तो जल्द ही ई बुक फार्म में तो प्रकाशित कर देंगे। बस किताबों के नाम तय करने बाक़ी हैं। सेल्फ पब्लिशिंग का तरीका सीख जाने के बाद किताब प्रकाशित करना बायें हाथ का भले न लगे लेकिन हफ़्ते -दो हफ़्ते भर में किताब तो निकाल ही सकते हैं।
पिछले साल दो किताबें प्रकाशित हुईं थीं। 'बेवक़ूफ़ी का सफ़र' और 'पुलिया पर जिंदगी' ( प्रकाशन की सूचना का लिंक : https://www.facebook.com/share/p/14L3skA6GJd/) ।
इस साल अपनी अभी तक की लिखी सारी कवितानुमा लिखाई को जमा करके कविता संकलन -अंधेरे का बड़प्पन ई बुक के रूप में प्रकाशित किया। इसमें मेरी सारी साधारण, ख़राब और कुछ अच्छी कविताएँ शामिल हैं। इसका कवर पेज मेरी भतीजी स्वाति ने बनाया है। इस कविता संकलन का प्रिंट संस्करण बनाना अभी बाक़ी है। वह काम अगले साल पूरा होगा।
'अंधेरे का बड़प्पन' के पहले Alok Puranik जी पर केंद्रित किताब 'आलोक पुराणिक -व्यंग्य का एटीएम' को भी अपडेट करके प्रकाशित किया। ई बुक और प्रिंट दोनों फार्म में। किताब की अभी तक केवल एक ई बुक प्रति का आर्डर आया। आने वाले दिनों में कभी आलोक पुराणिक जी को कोई और बड़ा पुरस्कार मिले या फिर वो क़ायदे से विवादास्पद हो जाएँ तो तब शायद इस किताब की बिक्री बढ़े।
आने वाले वर्षों में अभी तक प्रकाशित सभी किताबों को फिर से प्रकाशित करने का विचार है। याद के लिए नाम लिख रहे हैं :
1.पुलिया पर दुनिया
2.बेवक़ूफ़ी का सौंदर्य
3. सूरज की मिस्ड कॉल
4. घुमक्कड़ी की दिहाड़ी
5. झाड़े रहो कलट्टरगंज
6. बेवक़ूफ़ी का सफ़र
7. पुलिया पर जिंदगी
अगले साल आने वाली संभावित किताबों में शामिल हैं :
1. कनपुरिया कोलंबस (अमेरिका के यात्रा संस्मरण)
2. कश्मीर के यात्रा संस्मरण
3. श्रीलंका के यात्रा संस्मरण
4. लक्षद्वीप के यात्रा संस्मरण
5. गोवा, लद्दाख और नेपाल के यात्रा संस्मरण
'कनपुरिया कोलम्बस' प्रकाशक को दी हुई हुई है। शायद अप्रैल में प्रकाशित हो। देखते हैं। इसके बाद ही बाक़ी किताबों के बारे में मामला तय होगा। अपने बाकी संस्मरण भी इकट्ठा करेंगे।
इस साल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि लखनऊ में अपने घर में शिफ्ट होना रही। यह घर हम लोगों ने 2004 में मजाक-मजाक में बुक कराया था। 2008 में इसकी रजिस्ट्री हुई थी। रिटायरमेंट के बाद इसकी दुबारा मरम्मत का काम शुरू करके नवंबर में यहाँ प्रविष्ट हुए। अभी कुछ शुरुआती समस्याएं ठीक होनी हैं लेकिन अपने घर में रहना अच्छा लग रहा है।
इस घर में किताबों के लिए भी एक कमरा है। घर का सबसे छोटा लेकिन मेरे लिए घर का सबसे प्यारा कोना। किताबें अभी ऐसे ही रख दी है अलमारियों में।इनकी लिस्ट बनानी है। सिलसिलेवार जमाना है।
किताबों के कमरे में मैंने सोचा था कि एक गद्दा डालेंगे ज़मीन पर। उस पर बैठकर, लेटकर किताबें पढ़ेंगे। मेरे विचार को संशोधित करके लकड़ी का एक सरकउआ केबिन बना दिया गया। इसको दराज की तरह अंदर-बाहर किया जा सकता है। ऊपर गद्दी लगी है। यह बिस्तर दराज रेलगाड़ी के डब्बे की बर्थ की तरह बनी है। देखते हैं इसका कितना उपयोग होता है। नहीं होगा तो फिर गद्दा ज़मीन पर डालकर पढ़ा जाएगा।
इस साल की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि रही वजन कम करना। अप्रैल से जुलाई के बीच करीब 12 किलो वजन कम किया गया। खुराक में नियंत्रण और टहलाई करके वजन करीब 95 किलो से 83 किलो तक हुआ। डायटीएशियन Rupali Karajgir की सलाह से ऐसा संभव हुआ। पिछले कुछ समय से लापरवाही के बावजूद वजन अभी भी 83 किलो के करीब बना हुआ है। मेरा प्लान तो इस साल 80 किलो तक पहुँचना था। लेकिन घर वालों और शुभ चिंतकों के 'बहुत दुबले लगने लगे', 'इतने कमजोर हो गए' जैसे प्रेम प्रदर्शन और अपनी आलस्य के प्रति सहज लगाव के कारण इस लक्ष्य की प्राप्ति में अभी सफल नहीं हो पाये। लेकिन आने वाले साल में ऐसा करेंगे।
बीते साल में उर्दू और स्पेनिश सीखना शुरू किया था। उर्दू का तो पूरा कायदा सीख गए थे। स्पेनिश का भी काफ़ी अभ्यास किया। लेकिन उर्दू अभ्यास की कमी की कारण थोड़ा पिछड़ गई। स्पेनिश डाँवा डोल हो रही है पिछले कई दिनों। आने वाले समय में दोनों भाषाओं को एकदम स्कूली बच्चों की तरह सीखने का इरादा है।
नए साल में और कोई संकल्प लेना मतलब अपने ऊपर बोझ डालना ही होगा। कोशिश करेंगे कि पढ़ना, लिखना, घूमना, फिरना, मिलना -जुलना हो सके।फ़िल्में भी देखेंगे। घूमने-फिरने में देश-विदेश होंगे। साइकिल बाजी भी करेंगे। हमारे कारण किसी भले इंसान को कष्ट न हो। कुछ सामाजिक काम कर सकें।
आने वाला साल आपके लिए शुभ हो। मंगलमय हो।

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