कल बैंक जाना हुआ। बैंक मतलब बैंक ऑफ़ बड़ौदा। बैंक से रोज KYC अपडेट करने की नोटिस आ रही है। KYC मने know your customer. अपने ग्राहक को जानिए। ग्राहक को जानने का मतलब ग्राहक अपने बारे में बैंक को बताये।
जिस बैंक में वर्षों से खाते हैं। वहाँ बार-बार ग्राहक अपने बारे में बताये। ग़ज़ब बेइज्जती है।
पता चला कि आशियाना में बैंक ऑफ़ बड़ौदा की शाखा है। बैंक की तरफ़ जाते हुए देखा एक ऊबड़-खाबड़ मैदान में बच्चे क्रिकेट खेलने के लिए ईंटों का विकेट बना रहे थे। टीम बांटकर टॉस के लिए तैयार हो रहे थे। पास में बैठी एक महिला धूप में बैठी चुनही तंबाकू रगड़ रही थी, सड़क पर आते जाते लोगों को देखते।
कुछ देर हमने मैदान में खेल की तैयारी करते बच्चों को देखा। पास खड़े आदमी से पूछा-'बैंक कितनी दूर है?' आदमी ने बताया कि आशियाना वाली बैंक के मुक़ाबले ट्रांसपोर्ट नगर वाली ब्रांच पास है। गूगल में देखा तो ट्रांसपोर्ट नगर का रास्ता सीधा है। अपन मुड़कर ट्रांसपोर्ट नगर वाली ब्रांच की तरफ चल दिए।
रास्ते में बैंक ऑफ़ बड़ौदा (BOB) से इंग्लैंड के तेज गेंदबाज बॉब विलिस की याद आई। अपने समय में दुनिया के बेहतरीन फ़ास्ट बॉलर थे बॉब विलिस। छह साल पहले सत्तर साल की उम्र में दुनिया से विदा हुए।
बैंक का रास्ता सीधा था। ट्रांसपोर्ट नगर होने के कारण जगह-जगह चाय,नाश्ते की दुकानें थीं। ड्राइवर, क्लीनर,हेल्पर जैसे लोग दुकानों के बाहर बेंचों पर बैठे खाने-पीने में जुटे थे। रास्ते में एक दुकान का नाम दिखा -'ग़ुलाम टॉयर सर्विस।' पुराने टॉयरों का धंधा करने वाली दुकान। ग़ुलाम शब्द से 'आदि विद्रोही' का नायक स्पार्टकस याद आया।
'आदि विद्रोही' में गुलामों के ठेकेदार का एक संवाद याद आ गया। ठेकेदार अपने गुलामों को खूब खिलाता-पिलाता है। उनकी देखभाल करता है। गुलामों की देखभाल का कारण बताते हुए कहता है -'ग़ुलाम की गलती पर आप उसको जान से मार सकते हैं लेकिन अगर उसका मूड ख़राब हो गया तो उसको आप अपना काम बिगाड़ने से नहीं रोक सकते। इसलिए मैं गुलामों को कायदे से रखता हूँ। '
बैंक में एक बुजुर्ग महिला हाथ में ख़ाली फार्म लिए। अपना KYC कराने के लिए काउंटर पर खड़ी थीं। उनको फार्म भरना नहीं आता था। काउंटर पर बैठे आदमी ने पास खड़े बैंक कर्मचारी से कहा -'माता जी का फार्म भर दो।' उसने ना-नुकुर करते हुए कहा -'किसी से भरवा लें।' हमने सोचा हम ही भर देंगे। लेकिन जब तक हम अपना सेवा ऑफ़र करें तब तक काउंटर पर बैठे आदमी ने ज़ोर देकर बुजुर्ग महिला का फ़ार्म भरने के लिए बैंक कर्मचारी को थमा दिया।
बैंक कर्मचारी ने कम्प्यूटर पर देखकर बताया -'आपका KYC अभी तक हुआ नहीं। कानपुर से ही होगा।' KYC फ़ार्म भरकर हम तीन दिन पहले भेज मेल कर चुके हैं। अभी तक हुआ नहीं। मैंने भी ऐसा ही सोचा था कि अभी तक हुआ नहीं होगा। बैंक ने मेरे विश्वास की रक्षा की।
काउंटर पर बैठे आदमी ने सुझाव दिया कि अपना खाता यहाँ ट्रांसफर करवा लें। अपन 'हाँ' कहकर वापस लौट लिए।
लौटते में सोचा किसी दुकान पर बैठकर चाय पियें। एक चाय दुकान के पास एक आदमी अपनी मोटर साइकिल को बार-बार 'किकिया' रहा था। मोटरसाइकिल स्टार्ट नहीं हो रही थी। शायद पेट्रोल खत्म हो गया था। दुकान पर बैठे एक आदमी ने चाय की चुस्की लेते हुए सलाह दी -'नाले में घुसा दो। अपने आप टंकी फुल हो जायेगी।' मोटर साइकिल वाले ने मुस्कराते हुए भले आदमी की तरफ़ देखा। मुझे याद आया कि साहब ने नाले से गैस निकलने की बात कही थी। यहाँ ये भाई जी नाले से पेट्रोल भरवा दे रहे हैं। फिर याद कि पेट्रोल को भी तो गैस ही कहते हैं (गैसोलीन)।
नुक्कड़ की दूसरी चाय की दुकान के बाहर तख़्त पर बैठे तमाम ग्राहक चाय, समोसा, नाश्ता में जुटे थे। दुकान की मालकिन एक महिला है। ठसक के साथ काउंटर पर बैठी है। मालिक होने की ठसक लिंग निरेपक्ष (Gender Neutral) होती है। मालकिन की जगह CEO लिखें तो कैसा रहेगा? सड़क के दूसरी तरफ़ थी दुकान इसलिए हम वहाँ रुकने के बजाय आगे बढ़ गए।
एक दुकान पर गरमा-गर्म समोसे निकल रहे थे। सोचा घर के लिए ले लें। लेकिन फिर दोपहर का खाने का समय याद करके नहीं लिए। दोपहर का खाने का समय लिखते हुए कहानीकार अमरकांत जी की प्रसिद्ध कहानी 'दोपहर का भोजन' याद आई। रात को ही इंडिया टुडे वार्षिकी में अमरकांत जी के बारे में उनकी बहू कुमुद शर्मा जी का संस्मरण पढ़ा था।
अमरकांत जी पर लिखे संस्मरण से पता चला कि अमरकांत जी 'वर्मा जी' थे। कुमुद शर्मा जी का अमरकांत जी के बेटे अरुण जी से विवाह 'अंतर्जातीय' था। ब्राह्मण परिवार की कुमुद जी के लिए अपने पिता के भय के कारण अंतर्जातीय विवाह की परिकल्पना ही डरा देने वाली थी। बहरहाल, बाद में यह संभव हुआ।
अपने समाज में प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह , अन्तर धार्मिक विवाह अपने में एक क्रांतिकारी काम माना जाता है। कई लोग इस क्रांति को ही अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि मानकर खुश और संतुष्ट हो जाते हैं।
आगे सड़क बनाने का काम चल रहा था। सड़क की शुरुआत में 'सावधान कार्य प्रगति पर है' लिखा था। सावधान से लग रहा था 'चेतावनी' जैसी हो। सड़क बन रही है। सावधान हो जाओ। फिर न कहना बताया नहीं। सरकारों को भी इस तरह के बोर्ड लगाने चाहिए -"सावधान, विकास हो रहा है।" फिर न कहना बताया नहीं।
सड़क बनाने वाले फुटपाथ पर बने नल के पानी से नहा रहे थे। जाँधिया पहने नहाते लोगों मजदूरों की देखकर मुझे कलकत्ता की सड़कों के मोड़ों पर नलों में नहाते , रिक्शे धोते, नहाते मज़दूर याद आ गए। आगे एक जगह मजदूर लोग बैठे खाना खा रहे थे। उनको खाते देखकर हमारी भूख भी तेज हो गई। अपन लपकते हुए घर आ गए। घर में गरमा-गरम खिचड़ी हमारा इंतजार कर रही थी।
खिचड़ी खाते हुए हम लोगों ने कहावत याद की -खिचड़ी के चार यार -दही, पापड़, घी, अचार।'
यार से अपने तमाम यार -दोस्त या आए। उनसे बात करेंगे आज। आपको भी याद आ रहे होंगे अपने दोस्त। उनसे बात करिए। अच्छा लगेगा।
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