Friday, December 19, 2025

इकाना स्टेडियम में मैच

 


परसों लखनऊ के इकाना स्टेडियम में भारत - दक्षिण अफ्रीका का मैच देखने गए। हमारे पास चार पास थे। कुल तीन लोग जाने को तैयार हुए। भीड़ में जाने और गाड़ी पार्किंग के झंझट से बचने के लिए कैब से गए।

रास्ते में गाड़ी वाले से पूछा -'हमारे पास एक पास बचा है।मैच देखना है?'
उसने कहा -' हमारा ख़ुद का मैच फँसा हुआ है। जिंदगी का मैच खेल रहे हैं। कोई और मैच देखने का टाइम नहीं है हमारे पास।'
इकाना स्टेडियम के सामने उसने हमको उतार दिया। हम अंडरपास से होते हुए स्टेडियम की तरफ़ गए।
बाहर तरह-तरह के मैच से जुड़े सामानों की हाट जैसी लगी थी। क्रिकेट की टी शर्ट, कैप, झंडा, बजाने के लिए प्लास्टिक की तुरही, सीटी, तरह के स्टीकर, चौके -छक्के के छूटके पोस्टर और न जाने किस-किस तरह का सामान। वहीं गाल पर तिरंगा बनाने वाले पेंटर भी मौजद थे। लोग उनसे अपने गाल पर तिरंगा बनवाकर अंदर जा रहे थे। पूरा मेले का, उत्सव का माहौल थे।
एक जगह सुरक्षा कर्मियों की वर्दी में भी टिकट बेंचते दिखे लोग। यह कहना मुश्किल था कि वर्दी , सुरक्षा कर्मी और टिकटों में से कौन नक़ली था।
स्टेडियम के अंदर जाते हुए कई बार सुरक्षा जांच हुई। पूरी जामा तलाशी। पर्स खुलवाकर कई बार देखा कि हम कोई लोहे का सिक्का या ऐसे कोई सामान तो नहीं ले जा रहे जो असुरक्षित हो।
आख़िरी सुरक्षा गेट पर घूमने वाला पहिया लगा था। पास स्कैन करने पर उसको घूमना था ताकि हम अंदर जा सकें। पास दिखाने के पर पहिए ने घूमने से मना कर दिया। शायद हमारी शक्ल उसको पसंद ना आई हो। एकाध बार कोशिश करने पर जब नहीं घुमा चक्का तो वहाँ मौजूद बालक ने अपने गले में लटके पास को स्कैन करके हमको अंदर जाने दिया। हम स्टेडियम के नीचे पहुंच गए।
स्टेडियम के नीचे के तलघर में लोगों की भारी भीड़ थी। खाने-पीने के सामानों की तमाम दुकानें। कॉफ़ी, पानी, समोसा, पिज्जा , सैंडविच और तमाम खाने-पीने के स्टॉल लगे थे। छुटके से कप में कॉफी 60 रुपए में बिक रही थी।
स्टेडियम के अंदर लोगों का रेला का रेला आ रहा था। फ़्लड लाइट में स्टेडियम जगमगा रहा था। बीच मैदान में तमाम खिलाड़ी प्रैक्टिस कर रहे थे। दूर से सब लोग पहचान में आए लेकिन अर्शदीप सिंह को पहचान गए। लोग हल्ला मचा रहे थे। तुरही बजा रहे थे। भारतमाता की जय बोल रहे थे। इंक़लाब जिंदाबाद कह रहे थे। एकाध लोगों ने पाकिस्तान का नाम लिया। लोग अचकचा गए। फिर ठहर कर नारा लगाने वाले ने ही मुर्दाबाद बोलकर नारा पूरा किया। हमको लगा कहीं नारों की मिक्सिंग हो गई तो लफड़ा होगा। कहीं कोई रिकार्ड करके FIR करा सकता है। देशद्रोह का मुकदमा चल सकता है। देशभक्ति और देशद्रोह की शिनाख्त आजकल नारों के हिसाब से होने लगे है।
स्टेडियम के हमारे वाले हिस्से में शायद सब लोग पासधारी थे। मतलब मुफ्तिया दर्शक। वहीं सचिन तेंदुलकर के सदाबहार फैन सुधीर बैठे थे। नंगे बदन। चेहरे पर तिरंगा पेंटिंग और सीने पर लिखा नारा -'WE miss you sachin. उसके साथ में सूर्या का प्रसंशक भी बैठा था। दोनों नंगे बदन थे। हम स्वेटर और जैकेट में थे। सचिन और सूर्या को नंगे बदन भारत का झंडा फहराते देखकर लगा कि इस तरह का फैन होना कितना कठिन काम है।
बीच-बीच में लोग हल्ला-गुल्ला मचाते हुए , नारे लगाते हुए मैदान में छाये कोहरे को भगाने की कोशिश कर रहे थे। कई लोग डांस करने के लिए उठते, कुछ देर ठुमका लगाते लेकिन दूसरे का साथ न मिलने पर बैठ जाते। हमारे वाले स्टैंड में दो महिलाओं ने पहल की। कई बार मिनी डांस किए। अपने साथ आए लोगों को भी उठाने की कोशिश की। लेकिन उनके न उठने पर वे भी बैठ गयीं।
अंपायर ने मैदान का निरीक्षण किया। टीवी पर खबर आई कि आधे घंटे बाद फिर से निरीक्षण होगा। मतलब आधे घंटे लेट हो गया मैच। कोहरे के कारण मैदान खेलने लायक़ नहीं था। आधे घंटे बाद फिर आधे घंटे के लिए टल गया निरीक्षण। एक बार राजीव शुक्ला दिखे मैदान में। लोगों को लगा कि अब मैच शुरू होगा। मैदान में रोलर भी आया, पिच कवर करने का सामान भी। लगा मैच होगा लेकिन हर बार मैच टलता ही गया।
एक बार फिर टहलकर हम चाय पीने गए। चाय के दाम पचास रुपये थे। समोसा भी ऐसे ही। बेचने वाले ने बताया कि एक लाख देखकर दो दुकानें लगाने का ठेका मिला है। मैच कैंसल होगा तो नुकसान होगा। लेकिन फिर यह भी कहा -"यहाँ तो फिर भी कम नुक़सान हुआ। कलकत्ते में मेसी के आने पर तो लोगों की कुछ भी कमाई नहीं हुई। पूरा पैसा ही डूब गया।"
साथ में चाय पीती बालिका के गाल पर तिरंगा पेंट हुआ था। बताया उसने कि एक गाल पर तिरंगे का पेंट बीस रुपये में हुआ। रायबरेली से आई थी मैच देखने। पति भी साथ में। उसके भी गाल पर तिरंगा बना था। ये वाला तिरंगा लहराता दिख नहीं रहा था। यह मन में लहराता है।
कुछ देर स्टैंड के गेट पर खड़े रहे। वहाँ खड़े एक जोड़े के गाल से तिरंगे पेंट उखड़ गया था। हल्का सफेद और हरे रंग का निशान बचा था। कोई इसे देखकर कह सकता कि फटा हुआ तिरंगा गाल पर लगाए हुए। हमको लगा कि कहीं कोई इस बात की भी शिकायत न कर दे कि तिरंगे का अपमान किया उन लोगों ने।
कई बार आधे-आधे घंटे लेट हुआ मैच। हम लोगों को लगा मैच अब होगा नहीं। लौटने का तय किया। लेकिन हम लोग भी आधे-आधे घंटे टालते रहे लौटना। आख़िर में नौ बजे सूचना आई कि निरीक्षण साढ़े नौ बजे होता तो हम चल ही दिए। बाहर आते हुए सोचते भी रहे कि कहीं हमारे जाते ही मैच शुरू न हो जाये। 'न देखूँगा न देखने दूँगा' वाला भाव हावी हो गया मन में।
किसी ने बताया कि मैच होने लायक़ रोशनी तो थी लेकिन उसे टीवी पर दिखाने लायक रोशनी नहीं थी इसीलिए मैच कैंसल हो गया। स्टेडियम पर आए लोग तो केवल कुछ लाख थे लेकिन टीवी पर करोड़ों लोग देखते हैं। मैच तो करोड़ों लोगों के लिए ही होते हैं। स्टेडियम पर देखने आए लोग टीवी पर देखने वाले लोगों के मुक़ाबले में अल्पसंख्यक होते हैं। अल्पसंख्यक लोग बहुसंख्यक लोगों के आगे हमेशा कमजोर पड़ते हैं।
स्टेडियम में जाने के बाद एक बार फिर से एहसास हुआ कि खेल खेल कम बाजार की लीला ज़्यादा हो गया है। खेल में आज खेल के नियम से ज़्यादा बाजार के नियम ज्यादा लागू होते हैं।
लौटने की कैब दूर जाकर मिली। काफ़ी दूर तक यू टर्न करके जब स्टेडियम के सामने से गुजरी तब एक बार फिर लगा कहीं मैच शुरू न हो गया हो। लेकिन स्टेडियम के आगे पहुंचते ही मैच कैंसल होने की सूचना मिली तो सुकून मिला कि हम नहीं देख पाये तो कोई भी नहीं देख पाया।
स्टेडियम पर जाकर मैच देखने का यह हमारा पहला मौक़ा था। वह भी असफल हुआ। गए तो मैच ही कैंसल हो गया। हमको ग़ालिब का शेर याद आया :
थी ख़बर गर्म कि 'ग़ालिब' के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे प तमाशा न हुआ

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