Friday, December 12, 2025

नियमित लेखन




 Prabhat Ranjan जी ने एक पोस्ट (लिंक टिप्पणी में) में उन्नीसवीं सदी के प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक एंथनी ट्रॉलोप(Anthony Trollope) के बारे में बताया। एंथनी ट्रॉलोप(Anthony Trollope) को ब्रिटिश साहित्य के इतिहास में महान और सबसे लिक्खाड़ लेखों में माना जाता है। वे ब्रिटिश पोस्ट ऑफिस में पूर्णकालिक नौकरी भी करते रहे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बहुत लिखा।

बहुत लिखने वाले हर भाषा में होते हैं। यह अलग बात है कि उनका लिखा कितना पढ़ा जाता है। कितना आगे पहुंचता है।
लिखने का हर एक का अंदाज़ अलग-अलग होता है। कोई रोज़मर्रा के किस्से लिखता है, कोई राजनीति पर, कोई साहित्य पर। जिसका जिसमें मन आता है उस पर लिखता है। कई बार लिखने हुआ पोस्ट करने के बाद सोचते हैं ये फालतू बात लिख दी। लेकिन एकाध लोग तारीफ़ी टिप्पणी कर देते हैं तो लगता है ठीक किया, पोस्ट कर दिया।
पोस्ट के साथ फोटो लगाने का क़िस्सा भी मजेदार होता है। कई बार पोस्ट से जुड़ी फोटो मौजूद रहती है। बल्कि फ़ोटो ही पोस्ट का आधार रहती है। कई बार पोस्ट से एकदम अलग फ़ोटो ध्यान में आ जाती है और वह लग जाती है। फोटो के चलते पोस्ट वायरल टाइप हो जाती है।
तीन दिन पहले रेलवे स्टेशन का किस्सा लिखते हुए घर की फ़ोटो लगा दी। साथ में रामदरश मिश्र जी की कविता। पोस्ट को 2600 लोगों ने लाइक किया, 437 टिप्पणियाँ हुईं, 66 लोगों ने पोस्ट साझा की। कुछ लोगों ने फ़ोन भी किया, घर की बधाई देते हुए। व्यक्तिगत सूचनाओं, उपलब्धियों पर सोशल मीडिया में भरपूर प्रतिक्रिया मिलती है। हम सभी को धन्यवाद भी नहीं दे पाये। इस पोस्ट के माध्यम से सभी मित्रों को धन्यवाद दे रहे हैं।
बहरहाल, बात नियमित लिखने की हो रही थी। लिखने के तमाम विषय हमेशा सूझते हैं। मसाला भी रहता है। लेकिन संकोच हमेशा हाथ रोक लेता है। आसपास इतने किस्से हैं, राजनीति, समाज, साहित्य से जुड़ा लोगों का इतना लेखन है उद्धरत करने के लिए। लेकिन आलस और संकोच के चलते लिखना स्थगित हो जाता है। कुछ विवादास्पद लिखने पर होने वाले बवाल की सोचकर बहुत कुछ लिखना रह जाता है। राजनीति पर कुछ लिखने की सोचते ही अज्ञानी बुद्धिजीवियों के ठस हमलेनुमा टिप्पणी के बारे में सोचकर लिखना स्थगित हो जाता है।
मुझे लिखने का सबसे ज्यादा मसाला घूमने,फिरने के दौरान हुए अनुभवों से मिलता है। अभी तक जितनी यात्रायें की उनके बारे में थोड़ा बहुत लिखा। एक हफ़्ते के यात्रा विवरण पर तीस-चालीस पोस्ट तक लिखीं। यह अब की बात है। लेकिन अफ़सोस कि 43 साल पहले की साइकिल से भारत यात्रा के बारे में कुछ ही पोस्ट लिख पाये। उन दिनों डायरी में शुरुआती दिनों के अनुभव लिखे थे। बाद में केवल कहाँ से कहाँ गए यही दर्ज करके रह गए। अब तो सारे विवरण बिसरा गए। यादें धुंधला गयीं। लेकिन कभी-कभी कुछ-कुछ यादें उछलकर सामने आ जाती हैं।
अभी Shambhunath Shukla जी के दक्षिण भारत के यात्रा विवरण पढ़ते हुए मुझे कई किस्से याद आए। एक किस्सा विजयवाड़ा का।
हम लोग विजयवाड़ा में एक दुकान पर सुबह का नाश्ता कर रहे थे। हमारी साइकिलों पर 'जिज्ञासु यायावर' और 'भारत दर्शन' लिखा देखकर एक लड़के ने हमसे बातचीत की। उसको जब पता चला कि हम लोग इलाहाबाद से आए हैं तो उसने हमसे घर चलने की ज़िद की। हमने कहा-"हमको आगे जाना है।" उसने कहा -"मेरी माँ इलाहाबाद में पढ़ी हैं। महादेवी वर्मा जी ने उनको पढ़ाया है। उनको जब पता चलेगा कि इलाहाबाद से आये लोगों को बिना घर लाए, बिना कुछ खिलाये पिलाये जाने दिया तो वे वे बहुत नाराज होंगी। इसलिए आप लोगों को तो मेरे घर चलना ही होगा।"
हम लोग गए। उनकी माता जी हमसे मिलकर बहुत ख़ुश हुईं। खाना बनाया। खिलाया। तब आगे जाने दिया। हम अपने प्रोग्राम से आधे दिन पीछे हो गए। लेकिन बहुत खुशनुमा अनुभव साथ लेकर आगे बढ़े।
बाद में इलाहाबाद लौटकर एक दिन मैं महादेवी वर्मा जी से मिलना। शायद दोपहर का समय था। वे आराम कर रहीं थीं। थोड़ी देर में आई अपनी बैठक में। थोड़ा नाराज थीं इस बात से कि बिना बताये, असमय मिलने चले आए। मैंने उनको विजयवाड़ा में उनकी शिष्या से मुलाक़ात का क़िस्सा सुनाया। वे थोड़ा ख़ुश हुईं, लेकिन असमय मिलने आने की खिन्नता उनके चेहरे पर बनी रही। कुल मिलाकर पाँच-दस मिनट रहे होंगे उनके साथ।
चलते समय याद आया कि आटोग्राफ ले लिए जाये। कोई आटोग्राफ बुक तो ले नहीं गए थे। जेब में एक कागज था। उसी पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए। उन्होंने दस्तखत कर दिया। हम उनको प्रणाम करके वापस लौट आए। पुराने तमाम कागजों में याद-कदा वह कागज दिख जाता है। फिर कहीं इधर-उधर हो जाता है।
विजयवाड़ा में उस लड़के (जिसके नाम अब मुझे याद नहीं रहा) की फ़ोटो मुझे पिछले दिनों दिखी। क्लिक -III कैमरे से खींची बदरंग हो चुकी काली-सफेद फ़ोटो फेंकी जाने वाली चीजों में शुमार हो चुकी थी। हमने देख ली। सुरक्षित रख ली इसलिए अभी मिल नहीं रही है। मिलेगी तो पोस्ट करेंगे। मिल तो वह डायरी भी भी नहीं रही है जिसमें 43 साल पहले की यात्रा के कुछ किस्से और जगहों के नाम लिखे हैं जहाँ हम गए थे। कभी मिलेगी तो लिखेंगे इसके बारे में। साइकिल यात्रा के कुछ किस्से हमने अपने ब्लॉग में लिखे हैं। चाहें तो टिप्पणी में दी कड़ी में जाकर पढ़ सकते हैं।
इतना लिखने के बाद लगा कि पोस्ट दो हिस्सों में बंट गई है। एक में लिखने से जुड़ी बातें हैं, दूसरे में साइकिल यात्रा से जुड़ा एक संस्मरण। अब सोच रहे हैं कि पूरी पोस्ट साझा करें कि दो हिस्से अलग-अलग। फ़िलहाल हम पूरा लिखा हुआ पोस्ट कर रहे हैं। आपको जो पसंद आए पढ़ लीजिएगा। एंथनी ट्रॉलोप जैसे लिक्खाड़ की याद में इतना जुलुम तो चलता है।
वैसे आप बतायें कि पोस्ट पूरी ही ठीक लगी या दो हिस्सों में होती तो बेहतर रहता है। दो हिस्सों में कौन सा हिस्सा बेहतर रहता पोस्ट के लिहाज़ से।
फोटो अपनी साइकिल से जिसकी हवा निकली हुई है। हवा भरने का पंप खोजा जा रहा है। जल्दी ही साइकिल सड़क पर भी चलेगी। फ़िलहाल इतना ही। बकिया फिर कभी।

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