Tuesday, December 09, 2025

काम ही मनोरंजन है


 कल शाम को ट्रांसपोर्टनगर से घर आने के लिए गाड़ी बुक की। आम तौर पर ऑटो बुक करते हैं। 50 से 60 रुपए लगते हैं। कल बुक करने के बाद किराया देखा तो 35 रुपए दिखा रहा था। मतलब फिर बाइक बुक हो गई। बुक करते ही मेसेज भी आ गया -I am on the way. Pls dont cancel.

हमने अनुरोध को माना। कैंसल नहीं किया। लेकिन जब तक बाइक आई तब तक सोचते रहे कि अगर ऊँची मोटरसाइकिल होगी तो पीछे बैठने में तकलीफ़ होगी। लेकिन 'बाइक' स्कूटी थी। आराम से बैठ गए।
दस मिनट का सफर बतियाते हुए कटा। 'बाइक बालक' ने बताया कि वह पास ही एक पेस्टीसाइड कंपनी में एकाउंटेंट का काम करता है। रोज़ तीन-चार घंटे बाइक चलाता। 400-500 रुपए कमा लेता है। छुट्टी के दिन ज़्यादा चलाता है बाइक। घर में माँ, पत्नी, बच्चा है। बहनों की शादी हो गई। पिता तीन साल पहले रहे नहीं। पत्नी ब्यूटीशियन का काम करती थी। बच्चे होने के बाद छोड़ दिया। बच्चा बड़ा होने पर कोई दूसरा काम करेगी।
हमने बालक से पूछा -' ऑफ़िस के काम के बाद बाइक चलाने के बाद मनोरंजन के लिए कोई समय मिलता है क्या? ऐसा समय जिसमें कोई मनचाहा शौक पूरा किया जा सके?'
'अरे हमारे लिए काम ही मनोरंजन है। खाली समय है कहाँ? कमायें न तो जीवन मुश्किल है।जिस दिन दफ़्तर की छुट्टी होती है उस दिन तो ज़्यादा चलाते हैं बाइक। ' -बालक ने कहा।
कमाई के लिए पूरे समय ऑटो या कैब चलाने की संभावना के बारे में पूछने पर बालक ने कहा -' बाइक तो मैं चला सकता हूँ लेकिन ऑटो या कैब चलाने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता। शायद ऑटो या टैक्सी चलाने का काम उसको कमतर लगता हो। पढ़ा-लिखा होना और ऑफ़िस जाब में लगा होना इसके पीछे कारण होगा। इससे लगा कि सुविधाएँ और पढ़ाई-लिखाई भी अवरोध का काम करती हैं।
बाइक पर मिलने वाली सवारियों के बारे में पूछने पर उसने बताया कि ज्यादातर सवारियां युवा कामगार होते हैं। कम आमदनी वाले युवा। कभी-कभी लड़कियां भी होती हैं सवारी के रूप में। पैसे की स्थिति 'लैंगिक भेद' की दूरियाँ कम कर देती है।
लड़कियों का सवारी के रूप में बाइक के इस्तेमाल के बारे में जानकर मुझे परसाई जी की बात याद आई-'एक की कमाई से पूरा नहीं पड़ता' वाक्य नारी-मुक्ति के इतिहास में दर्ज हो गया, जो सामाजिक और आर्थिक सच्चाई को दर्शाता है।
लड़कियां बाइक का सवारी के रूप में भले इस्तेमाल करने लगी हों लेकिन अभी तक कोई 'बालिका बाइक चालक' नहीं दिखी। अलबत्ता कल एक महिला ई रिक्शा चालक जरूर दिखी। महिला ई रिक्शा चालक दूरी बचाने के लिए उल्टी तरफ़ से आ रही थी। हमारा ऑटो चालक भी कहीं और देखते हुए चला रहा था। संभावित टक्कर बचने पर दोनों एक दूसरे पर हँसते हुए हल्का दोषारोपण किया और आगे बढ़ गए।
घर पहुँचने पर मैंने सोचा 'बाइक बालक' को कुछ पैसे टिप के रूप में दे देंगे। लेकिन उसने स्कैनर दिखाया तो मुझे 35 रुपए देने का ही आप्शन था। हमने 35 रुपए ही भुगतान कर दिए। टिप देने की भावना दायें-बायें हो गई। वैसे भी टिप का कोई करार तो था नहीं।
बालक हमको छोड़कर चला गया। हम घर आकर और अभी भी सोच रहे हैं आज के युवाओं की स्थिति कितनी कठिन है। उनके पास जीवन जीने की जद्दोजहद में मनोरंजन का कोई समय नहीं है। लेकिन वे जी रहे हैं। मेहनत कर रहे हैं। अपने देश में ही नहीं,शायद पूरी दुनिया में यह हाल हैं। बहुत कठिन है डगर युवजन की।
फोटो इंटरनेट से रैपिडो साइट से

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