Wednesday, December 24, 2025

विनोद कुमार शुक्ल जी नहीं रहे



 कल विनोद कुमार शुक्ल जी नहीं रहे। वे लंबे समय से बीमार थे। उनके इलाज में लापरवाही के समाचार और उसके खंडन के समाचार आते रहे। इसके पहले उनकी रॉयल्टी से संबंधित खबरें चर्चा में रहीं।

विनोद कुमार जी के बारे में लोगों ने लेख लिखे। अपने-अपने हिसाब से उनके बारे में लेख लिखे। उनसे एक मुलाक़ात से लेकर उनके साथ ज़िन्दगी के कई साल गुजारने वाले लोगों के मुग्ध, आत्मीय संस्मरण। अखबारों में भी उनके न रहने की ख़बरें, भले ही कोने में, दूसरे -तीसरे कॉलम में छपीं।
विनोद जी मैं भी एक बार मिला हूँ। कुछ घंटे उनके साथ रहे थे हम लोग वर्धा में। धीमी आवाज में बातचीत करते हुए कई संस्मरण साझा किए। किसी लेखक के बारे में कोई याद साझा करके उनको लगा कि यह बात सार्वजनिक रूप से कहना शायद ठीक नहीं होगा। उन्होंने हमसे कहा -"इसे कहीं लिखियेगा नहीं।" संकोची स्वभाव के व्यक्ति को लगता होगा कि उसकी कोई बात किसी को बुरी न लग जाये।
एक मुलाक़ात के आधार पर किसी के पूरे व्यक्तिव के बारे में कुछ कहना ऐसे ही होगा जैसे कैलकुलस में छोटे x (small x ) को शून्य से लेकर पूरे फ़लक तक इंटीग्रेट करके देख लिया जाये। गणितीय समाकलन में पूरा फ़लक एक समान माना जाता है। इंसान के व्यक्तित्व में अनगिनत पहलू होते हैं। उसको को किसी गणितीय संख्या की तरह इंटीग्रेट करना संभव नहीं होता। विनोद जी के बारे में भी उनसे एक मुलाक़ात के आधार पर उनके व्यक्तित्व के बारे में कुछ कहना ठीक नहीं होगा। उनके व्यक्तिव के बारे में सहज, सरल, मानवीय, विनम्र, आत्मीय विशेषण उनसे जुड़े लोगों के अनुभवों के आधार के कहे जाते हैं। और भी बहुत कुछ रहा होगा उनमें जो उनके साथ लगातार रहने वाले बेहतर अनुभव कर सकते होंगे।
विनोद कुमार शुक्ल जी के न रहने लोग उनको उनकी कविताओं और लेखन के माध्यम से जानेंगे:
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था
हताशा को जानता था
इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया
मैंने हाथ बढ़ाया
मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ
मुझे वह नहीं जानता था
मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था
हम दोनों साथ चले
दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे
साथ चलने को जानते थे।
विनोद कुमार शुक्ल जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
विनोद कुमार शुक्ल जी को ज्ञानपीठ सम्मान मिलने के समय उनके बारे में लिखा संस्मरण :


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