Tuesday, December 23, 2025

आपका पसंदीदा ध्येय वाक्य क्या है?





 आज सबेरे जगने के पहले मजेदार सपना देखा। शुरुआत एक संदेश से हुई। उस संदेश में सूचना थी कि हमारे वरिष्ठ अधिकारी हमसे मिलना चाहते हैं। मीटिंग में बुलाया है। हम तैयार होकर जाने के लिए निकलते हैं तो शर्ट नहीं मिलती। आख़िर में बनियाइन में ही पहुँच जाते हैं मीटिंग में। पता चला हमारे वरिष्ठ अधिकारी मीटिंग में नए साल की पिकनिक के बारे में चर्चा कर रहे हैं। एक दोस्त हमको दूसरे नाम से बुलाता है। ध्यान दिलाये जाने पर कहता -' इतने दिन बाद मिले हैं। अनूप की जगह आशुतोष बोल गए।'

सपने में दफ़्तर, मीटिंग और वरिष्ठ अधिकारी देखकर लगा कि रिटायरमेंट के डेढ़ साल बाद भी दफ़्तर पीछा नहीं छोड़ रहा है।
मीटिंग से लौटते में घर का रास्ता भूल जाते हैं। जिस गली यह सोचकर घुसते हैं कि यही सही रास्ता है वहाँ नयी बस्ती मिलती है। जागने तक घर नहीं पहुँच पाते।
नींद खुलने पर सपने का अंत याद करते हैं तो श्रीलाल शुक्ल जी की कहानी याद आती है -'यह घर मेरा नहीं है।' इस कहानी में एक दुनियावी रूप से सफल पिता अपने बेटे को उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर टोंकता रहता है। एक दिन पिता को घर आने पर बेटा नहीं दिखता। वे उसे खोजते हैं तो बेटे का संदेश दिखता है जिसका आशय है -" इतने अनुशासन वाले घर में रहना मेरे लिए मुश्किल है। मुझे लगता है कि यह घर मेरा नहीं है। मैं यह घर छोड़कर जा रहा हूँ।"
बेटे का संदेश पढ़कर पिता की हवा ख़राब हो जाती है। वे परेशान होकर हर संभावित जगह पर बेटे को खोजते हैं। बेटा नहीं मिलता। बाद में निराश होकर वे घर लौटते हैं तो देखते हैं कि उनका बेटा घर में ही एक कोने में सो रहा है। वे प्यार से उसे घर के अंदर ले जाते हैं। मानवीय संवेदना की बहुत प्यारी कहानी है 'यह घर मेरा नहीं है।' (कहानी का लिंक टिप्पणी में)
कहानी के साथ ही याद आता है बेटे Anany Shukla जार्जिया की फ्लाइट सुबह चार बजे की थी। समय चार बजकर बीस मिनट हुए थे। फ़ोन मिलाया बेटे को तो बच्चा बोर्डिंग कर रहा था। उसको शुभकामनाएँ देकर फिर सो गए।
बाद में सुबह उठकर चाय बनाकर पीते हुए देखा तो फ़्लाइट पाँच बजे दिल्ली से चली है। आठ घंटे में अजरबैजान के बाकू हवाई अड्डे पहुंचेगी। बाकू में छह घंटे का ले ओवर है। इसके बाद की फ्लाइट से जार्जिया जायेगा।
चाय के साथ अखबार पढ़ते हुए देखा तो एक रिटायर्ड आई जी ने आठ करोड़ की धोखाधड़ी से परेशान होकर ख़ुद को गोली मारकर आत्महत्या की कोशिश की। उनकी क्या परिस्थितियाँ रहीं होंगी मुझे पता नहीं लेकिन आई जी को पेंशन मिलती ही होगी। सवा लाख रुपए कम से कम महीना। साधारण से भी बेहतर जीवन जीवन जीने के लिए इतने पैसे बहुत होते हैं। आत्महत्या की कोशिश करना मतलब जीवन जीने की इच्छा का खतम हो जाना।
आई जी की खुद को गोली मारकर आत्महत्या की कोशिश की खबर पढ़कर 2008 में लिखी एक पोस्ट (लिंक टिप्पणी में) का एक अंश याद आया :
" आदि विद्रोही मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में है। हावर्ट् फ़्रास्ट की इस किताब का बेहद सुन्दर अनुवाद अमृतराय ने किया है। इसमें रोम के पहले गुलाम विद्रोह की कहानी है। स्पार्टाकस गुलामों का नायक है। उसकी प्रेमिका वारीनिया जब उससे कहती है कि तुम्हारे मरने के बाद मैं भी मर जाउंगी। तब वह कहता है-
'जीवन अपने आप में अमूल्य है। मुझे वचन दो कि मेरे न रहने के बाद तुम आत्महत्या नहीं करोगी।'
वारीनिया जीवित रहने का वचन देती है। स्पार्टाकस मारा जाता है। वारीनिया जीवित रहती है। अपना घर बसाती है। कई बच्चों को जन्म देती है। उनके नाम भी स्पार्टाकस रखती है। मानवता की मुक्ति की कहानी चलती रहती है।
हम सबमें स्पार्टाकस के कुछ न कुछ अंश होते हैं लेकिन हम अलग-अलग समय में बेहद अकेले होते जाते हैं। ऐसे ही किसी अकेलेपन के क्षण में लोग अवसाद को सहन न कर पाने के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। जीवन अपने आप में अमूल्य है बिसरा देते हैं। असफ़लता और अवसाद के उन क्षणों में यह बात एकदम नहीं याद आती -सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है।"
आदि विदोही किताब पढ़ने के बाद से 'सब कुछ लुट जाने के बाद भी भविष्य बचा रहता है ' मेरा ध्येय वाक्य बन गया है। जो उदास, परेशान, निराश, हताश, लुटा-पिटा दिखता है उसको यह नारा टिका देते हैं। एक किताब का इतना योगदान बहुत है।
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