दो दिन पहले ( 5 दिसंबर, 2025) दिल्ली में रेख़्ता का प्रोग्राम देखने गए। तीन दिन का कार्यक्रम था। हर दिन का प्रवेश टिकट 600 रुपए। कार्यक्रम स्थल सराय काले ख़ाँ मेट्रो स्टेशन के पास बांसेरा (Baansera) पार्क में था। आनलाइन भुगतान का प्रमाण दिखाने के बाद हाथ में कागज का बैंड बांध दिया गया। काग़ज़ की हथकड़ी की तरह का बैंड प्रवेश पत्र था।
खिली-खिली धूप में, खुले-खुले मंचों पर अलग-अलग प्रोग्राम हो रहे थे। हम ख़ासतौर पर दोपहर को होने वाले मुशायरा को सुनने आए थे। उसके पहले जावेद अख़्तर साहब की एक गुफ्तगू थी। उसमें उर्दू से जुड़े कई सवालों के जबाब दिए उन्होंने। जावेद साहब की हाजिर ग़ज़ब की है। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि भाषा इस तरह की होनी चाहिए वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे।
एक श्रोता ने सवाल किया -"जब आपने लिखना शुरू किया था तब की भाषा में और आज की भाषा में अन्तर का कारण क्या है? आज 'मिर्जापुर टाइम्स' जैसी भाषा वाले सीरियल हिट होने का कारण क्या है?"
इसके जबाब देते हुए जावेद साहब ने कहा -"फ़िल्में सीरियल बनाने वाले दो-चार-दस लोग होते हैं। वे अपने हिसाब से सीरियल बनाते है। सवाल बड़ा यह है कि लोग ऐसे सीरियलों को देखते क्यों हैं। समाज देखता है इसलिए ऐसे सीरियल बनाते हैं लोग। देखे जाते हैं।"
इसके बाद एक लड़की ने सवाल किया। आप अपने को नास्तिक कहते हैं। और भी तमाम लोग नास्तिक हैं। लेकिन ऐसा देखा जाता है कि जब किसी नास्तिक पर कोई परेशानी आती है तो वह ईश्वर को याद करने लगता है। ऐसा क्यों होता है?
इसके जबाब देते हुए जावेद जी ने कहा -" जब इंसान पर अचानक कोई मुसीबत आती है तो उसका दिमाग़ काम नहीं करता। उसका कंट्रोल नहीं रहता दिमाग़ पर। वह कुछ का कुछ सोचने लगता है। उसको होशोहवास उड़ जाते हैं। ऐसे समय में उसके व्यवहार को नास्तिक का आस्तिक हो जाना नहीं समझा जाना चाहिए।"
जावेद अख़्तर साहब की बातचीत के बाद मुशायरा सुनने दूसरे पांडाल में गए। भयंकर भीड़ थी। तमाम लोग धूप में घास पर बैठकर भी सुन रहे थे मुशायरा। हमने दूर खड़े होकर और कुछ देर घास पर बैठकर सुना मुशायरा। कुछ शेर बहुत अच्छे लगे। अब सब भूल गए। जावेद अख़्तर की नज़्म शतरंज बहुत अच्छी लगी। उसके एक अंश यहाँ पेश है :
मैं सोचता हूँ जो खेल है
इसमें इस तरह का उसूल क्यों है
की कोई मोहरा रहे की जाए
मगर जो है बादशाह उस पर
कभी कोई आँच भी ना आए
वज़ीर ही को है बस इजाज़त
की जिस तरफ भी वो जाना चाहे.
मैं सोचता हूँ जो खेल है
इसमे इस तरह का उसूल क्यूँ है
की प्यादा जो अपने घर से निकले, पलट के वापस ना जाने पाए।
शतरंज के खेल में प्यादे की और बादशाह की औक़ात में अंतर के बहाने दुनिया में आम इंसान और ख़ास लोगों के स्थिति का बड़ा ख़ूबसूरत बयान है इस नज़्म में।
वसीम बरेलवी साहब ने कुछ नए शेर सुनाये। कुछ शेर पढ़ते हुए भूल भी गए। और कुछ सुनाने का समय भी नहीं बचा था। 'मुन्ना भाई एम बी बी एस' के कमरे की तरह शुरू होते ही खत्म हो गया मुशायरा।
मुशायरे के बाद उर्दू की दास्तान गोई सुनी। उसके पहले थोड़ी देर जूही बब्बर सोनी का नाटक 'एक लम्हा ज़िंदगी का' देखा। इसमें यह उनके दादा-दादी (सज्जाद और रज़िया) की सच्ची प्रेम कहानी पर आधारित है, जो 1938 से 1979 के भारत के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच पनपती है और इसमें मोहब्बत, शायरी, दोस्ती व देशप्रेम का सुंदर संगम दिखाया गया है। सज्जाद ज़हीर उर्दू के एक प्रसिद्ध लेखक और मार्क्सवादी चिंतक थे। आजादी के बाद पाकिस्तान चले गए थे। वहाँ फ़ैज़ के साथ जेल में डाल दिए गए। बाद में रजिया सज्जाद ज़हीर के आग्रह पर नेहरू जी ने सज्जाद ज़हीर को हिंदुस्तान वापस आने की व्यवस्था की।
इस बीच टहलते हुए कई बार चाय पी वहाँ। किताबों की दुकानें भी थीं। रेख़्ता की दुकान से कई किताबें खरींदीं। उनमें से दो किताबें मुंशी रतननाथ सरशार की लिखी हुई हैं -'आजाद के कारनामे।' मुंशी जी लखनऊ के थे। इन किताबों में लखनऊ के किस्से हैं। सौ-सवा सौ साल पहले लिखे इन किस्सों को पढ़कर अंदाजा होता है कि समय के साथ भाषा कितना बदल जाती है। समय के साथ कभी आम पहम माने जाने वाले शब्द भी चलन से ऐसे बाहर हो जाते हैं कि उनके मतलब खोजने पड़ते हैं समझने के लिए।
कव्वाली और उसके बाद सलीम सुलेमानी के प्रोग्राम को सुनने के लिए तमाम लोग जमा थे। सलीम सुलेमानी को सुनने के लिए तो इतनी भीड़ थी कि कार्यक्रम के पंडाल तक भी न पहुँच पाये। दूर खड़े होकर वहाँ लगे स्क्रीन पर देखे कार्यक्रम। हमको इस बात का अफसोस भी हुआ कि जिस सलीमे सुलेमानी को सुनने के लिए लोग इतने बेताब हैं हम उसके बारे में कुछ भी नहीं जानते। अफ़सोस सिर्फ़ यही सोचकर बराबर हुआ कि हम सलीम सुलेमानी को नहीं जानते तो वो भी कौन हमको जानते हैं।
करीब आधे दिन तक रेख़्ता के प्रोग्राम में रहने के दौरान तमाम ख़ूबसूरत चेहरे देखने को मिले। बहुत अच्छा लगा। ऐसा लगा किसी बहुत ख़ुशनुमा जगह पर आए हैं। हजारों की भीड़। कोई अपने परिवार के साथ आया है, कोई अपने दोस्त के साथ, कोई अपने यार के साथ और कोई अपने प्यार के साथ। खाने-पीने की दुकानों पर तरह-तरह के पकवान। पानी की मुफ्त व्यवस्था। हल्के होने और निपटने का बढ़िया इंतजाम। दुनिया और सोशल मीडिया की मार काट से अलग तरह का माहौल।
वहाँ पुलिस चौकी थी। बमपुलिस वाले इंतजाम के बगल में। दिल्ली महिला पुलिस बैंड वाले गाना गा रहे थे -"मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन।" खूबसूरत ड्रेस में खूबसूरत लोगों का गाना। बहुत अच्छा लगा सुनकर।
रेख़्ता के कार्यक्रम के बारे में बताने वाले Kamlesh Pandey जी से मुलाक़ात लौटते समय हुई। भीड़ और शोर इतना था कि कई बार चिल्लाकर बात करनी पड़ रही थी। उन्होंने मुशायरे में हमारे लिए सीट पर रूमाल रख रखा था। लेकिन जब तक हम उनके पास पहुँचते तब तक सीट पर दूसरे लोग जम गए थे। कोई सीट कहाँ छोड़ता है आज के समय में।
जगह-जगह लोग फ़ोटो खींचते-खिचाते दिखे। गेंदे के फूलों की क्यारियों के पास भी ऐसे लोगों की भीड़ थी।
शाम होने पर हम लौट आए। कमलेश पांडेय जी अपने बंबई वाले भाई जी के साथ देर तक जमे रहे।
लौटते हुए दयार -ए -इजहार (जहाँ मुशायरा हुआ था दिन में) सूरज भाई विदा लेते हुए दिखे। बोले -"हम तो बिना पैसे दिन भर रहे रेख़्ता के प्रोग्राम में।" हमने क्या कहते? उनकी बात और है हमारे बात और। बादशाह और प्यादे का क्या मुक़ाबला।
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