Sunday, December 07, 2025

ट्रेन यात्रा


 


शताब्दी आज फिर लेट हुई। एक घंटा दस मिनट लेट बताकर दो घंटा देर से आई। कोई डाँटे न इसलिए रोती हुई आवाज़ में सीटी बजाती हुई आई।

कोच अटेंडेंट से पूछा तो बताया कि दिल्ली से लेट चली थी। हवाई जहाज की सवारी समेटती हुई आई। हवाई जहाज़ का तो पता ही है। पिछले दिनों कित्ता हल्ला मचा।
हमको किसी भक्त के बयान का इंतज़ार है जिसमें वह बताए कि इंडिगो की उड़ानों का निरस्त होना किस तरह देश के हित में है। हो सकता है कि कोई कहे कि देश के पाँच किलो अनाज पाने वाले समुदाय को हवाई यात्राओं के निरस्त होने से कोई फ़र्क़ नहीं होता। बहुमत हमारे साथ है (जैसे डालर के मुक़ाबले रुपया कमज़ोर होने पर एक ने कहा -‘ रुपया का मूल्य कम होने से देश को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।’
चार दिन पहले लखनऊ से आए थे तो शताब्दी एक घंटे देरी से शुरु करके पूरे दस घंटे देरी से पहुँची गाजियाबाद। उसके सामने तो दो घंटे कुछ भी नहीं। हर परेशानी को निपटाने का मुफ़ीद तरीका यही है कि उससे बड़ी परेशानी में नहीं फँसने का शुक्र मना लिया जाये।
लोकतंत्र में सरकारें इसी तरह अपनी कमियाँ सही ठहराती हैं। कोई भ्रष्टाचार पकड़ा गया तो कहती हैं -‘पहले तो इससे बड़ा हो चुका है। अभी दंगे में जितने लोग मारे गए , पहले के दंगों में उससे ज़्यादा मारे जा चुके हैं। अभी बहुत स्कोप है हमारे लिए पतन का।’
स्टेशन पर एक आदमी कुछ लोहे के पार्ट साइकिल में लादे खड़ा था। पूछने पर पता चला कि सिलाई मशीन के पार्ट हैं। गाजियाबाद से इटावा ले जा रहा है। हमको लगा साइकिल शताब्दी में बैठकर मशीन के पुर्जे लेकर जाएगा। लेकिन उसकी बिटिया ने बताया कि वह दूसरी ट्रेन से जाएगा। शायद किसी पैसेंजर ट्रेन से।
ट्रेन आख़िर में आ ही गई। आते ही हमारी सीट एक युवा जोड़े ने झटक ली। बोला -‘ अंकल जी हमारी सीट पर आ जाइए।’ क्या करते? आ गए।
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