Tuesday, December 09, 2025

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे






 


गाजियाबाद स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते हुए एक आदमी ने पूछा -"शताब्दी में जनरल डिब्बा किधर लगता है?" जनरल मतलब बिना रिजर्वेशन वाला डिब्बा। हमने बताया -"शताब्दी में जनरल डिब्बा नहीं लगता।" फिर हमने बिना मांगे सलाह दी -"टीटी से पूछकर बैठ जाना। टिकट बनवा लेना।" उसने कहा -"नहीं। ऐसी ट्रेन से जायेंगे जिसमें जनरल डिब्बा लगता हो।"

बाद में देर तक सोचते रहे कि पहले लगभग सब ट्रेनों में जनरल डिब्बे लगते थे। अब धीरे-धीरे कम होते-होते गायब ही रहे हैं। आपका रिजर्वेशन नहीं है आप यात्रा नहीं कर सकते। ट्रेनों के किराए भी धीरे-धीरे बढ़ते ही जा रहे हैं। लंबी दूरी की यात्राओं के लिए रिजर्वेशन मिलना मुश्किल हो गया। आम आदमी के लिए यात्रा मुश्किल हो गई है। मुश्किल तो पहले भी होता था लेकिन पहले जनरल डिब्बे होते थे। कुछ नहीं हुआ तो कष्ट सहकर भी चले ही जाएँगे। अब कष्टप्रद यात्रा का विकल्प भी सीमित हो रहा है। (रेलवे की जानकारी के अनुसार जनरल डिब्बों की संख्या लगभग स्थिर है)
गाजियाबाद में एक बुजुर्ग दंपति चढ़े। उनके पास छोटे-छोटे कई बैग थे। चढ़ाने में दिक्कत देखकर हमने उनका सामान चढ़वा लिया। रखवा दिया। लखनऊ में उतरते समय भी सहायता कर दी। बुजुर्ग घर जाने के लिए ऑटो खोजने निकले तो मिला नहीं। टहलकर वापस आ गए बुजुर्ग। खड़े होकर कहने लगे -"यहाँ तो इतने ऑटो मिलते थे। आज पता नहीं क्यों नहीं मिल रहे हैं।"
संयोग से हम वहीं रुके थे। ऑटो मिलने में परेशानी के चलते हमने उनका पता पूछकर अपने मोबाइल से उबर एप उनके लिए ऑटो बुक कर दिया। उनको ताज्जुब हुआ कि मोबाइल से ऑटो कैसे आ गया। मैंने बताया आनलाइन बुक हो जाते हैं। उन्होंने कहा -"हम भी इसे लगायेंगे अपने मोबाइल में।"
ऑटो आने तक बातचीत के दौरान पता चला कि बुजुर्ग 2020 में GST के एडिशनल कमिश्नर पद से रिटायर हुए हैं। बेटा आईआईटी करके आई ए एस का इम्तहान दे रहा है। मानता नहीं है। कहता है आई ए एस बनना है।
GST के एडिशनल कमिश्नर के पद से रिटायर होने के बाद भी उनको कैब बुकिंग के एप की जानकारी नहीं थी। ऐसा शायद इसलिए होगा कि वे नियमित यात्राएँ नहीं करते होंगे। पहले जरूरत नहीं पड़ती होगी। बाद में ऑटो मिल जाते होंगे।
वे जब ऑटो से बैठकर चले गए तो हम भी घर की तरफ़ चल दिये। रास्ते में कई बार सोचा कि अपने मोबाइल से उनके लिए ऑटो बुक करके कहीं गड़बड़ तो नहीं किया। बार-बार यह ख्याल आता रहा कि कहीं कुछ लफड़ा हो गया तो अपन फँसेंगे। यह ख्याल बेबुनियाद था। लेकिन आ बार-बार रहा था मन में। इतने लफड़े होते रहते हैं मोबाइल से बुकिंग, पैसे ट्रांसफर और तमाम कामों में। समाज में होने वाले नए-नए तरह के अपराध लोगों के आपसी विश्वास को कितना कम कर रहे हैं यह एहसास हुआ। लोग किसी की सहायता करने में सोचते हैं कि कहीं कोई लफड़ा न हो जाये।
घर आकर मोबाइल में देखा कि अभी तक वे अपने घर नहीं पहुंचे हैं।ऑटो ड्राइवर को फ़ोन किया। उसने बताया कि जाम में फँसे होने के कारण ऑटो धीरे-धीरे चल रहा है। बुजुर्ग से भी बात की। उन्होंने अपना नंबर बताया और मिस्ड कॉल करने को कहा ताकि वे बाद में बात कर सकें। हमने मिस्ड कॉल कर दी। अभी तक फ़ोन आया नहीं।
फोटो लखनऊ में हमारे नए ठिकाने का। इसको बनवाने के साथ जुड़े किस्सों के चलते रामदरश मिश्र जी की कविता अनायास याद आ ही जाती है :
बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।
किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़्रर धीरे-धीरे।
जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।

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