Wednesday, December 10, 2025

संसद तेली की घानी

 

देश की मौजूदा तमाम समस्यायों पर बातचीत छोड़कर संसद में वंदेमातरम पर घंटों बहस हुई। बहस सुनकर समस्यायें भाग खड़ी हुई होंगी। धूमिल की कविता पटकथा का यह अंश याद आया :

मुझसे कहा गया कि सँसद देश को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है
या यह सच है कि
अपने यहाँ संसद तेली का वह घानी है
जिसमें आधा तेल है आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है तो
यहाँ एक ईमानदार आदमी को अपने ईमानदारी का मलाल क्यों है
जिसने सत्य कह दिया है उसका बूरा हाल क्यों है?
Shambhunath Shukla जी ने इस मसले पर बढ़िया बात कही है। रोचक किस्सा भी सुनाया है -'जिसे न दे मौला उसे दे सिराज-उद-दौला ।' (अपडेट देखें) सुनिए। लिंक यह रहा : https://www.facebook.com/share/v/1PuheFP8J3/
अपडेट : Raj Gopal Singh Verma जी ने टिप्पणी में बताया -"सिराज-उद-दौला नहीं, आसफ-उद-दौला है वह! कृपया संशोधित कर लें।" नेट पर खोजने पर पता चला कि : "यह कहावत "जिसको न दे मौला, उसको दे आसिफ-उद-दौला" है, न कि सिराज-उद-दौला; यह अवध के नवाब आसिफ-उद-दौला की दरियादिली और उदारता को दर्शाती है, जिनका शासनकाल लखनऊ में कला, संस्कृति और भव्य इमारतों (जैसे बड़ा इमामबाड़ा) के लिए मशहूर था और उन्होंने अकाल के दौरान जनता को रोजगार दिया, जिससे लोग उन्हें भगवान का रूप मानने लगे थे, हालांकि उन्होंने खुद को ईश्वर से ऊपर नहीं माना. "

https://www.facebook.com/share/p/1CCpYWa8zF/

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