Wednesday, December 17, 2025

लोगों से बातचीत


 

लोगों से बातचीत करना हमेशा रुचिकर लगता है। बहुत सारी नई बातें पता चलती हैं। रोचक भी। भयावह भी।

कल शाम को जो कैब ड्राइवर मिला वह कई देशों में कई काम करके वापस भारत आया था। पहले सऊदी अरब में रहा। फिर कुवैत में। सऊदी अरब में पहले किसी ऑफ़िस में काम काम करता था। दो साल बाद भारत से चावल मँगवा कर सऊदी में बेचने का काम किया। महीने में डेढ़-दो लाख बच जाते थे।
सऊदी के बाद कुवैत गया। वहाँ ड्राइविंग का काम किया। ड्राइविंग के काम में रेसिंग कारों को सर्विसिंग के लिए ग्राहकों के पास से लाना-वापस उन तक पहुँचाना था। हर ट्रिप में दस दीनार ट्रिप के मिल जाते थे। दस दीनार मतलब 2900 रुपए। दिन में दो-तीन गाड़ियाँ लाने/ले जाने के कम से कम 6000 हज़ार रुपये टिप के मिल जाते। लेकिन वहाँ सख्ती बहुत थी। किसी गाड़ी को लाते-ले जाते समय खरोंच भी लग जाती तो ड्राइवर पर 200 दीनार का जुर्माना लगा दिया जाया। 200 दीनार मतलब क़रीब साठ हज़ार रुपए।
ड्राइवरों ने एतराज किया तो मालिकों ने जुर्माना घटाकर 50 रुपए कर दिया। लेकिन ड्राइवर विरोध करते रहे। यह कहते हुए कि सड़क पर दुर्घटना ड्राइवर के बस में तो नहीं है। मालिक लोगों का कहना था कि ड्राइवर लापरवाही न करें इसलिए कुछ जुर्माना तो रहना चाहिए। लेकिन ड्राइवर जुर्माना शून्य करने पर अड़े रहे।
इसी दौरान एक दिन मालिक की गाड़ी ही भिड़ गई। गाड़ी ख़ुद मालिक चला रहा था। ड्राइवरों ने कहा -"अब इसका जुर्माना कौन भरेगा? ऐसे ही हम लोगों के साथ भी हो सकता है। तब जुर्माना नहीं लगना चाहिए।"
मालिक ने उसी दिन सबको काम से निकाल दिया। सबको वापसी का टिकट थमा दिया।
यह सुनकर लगा कि समर्थ लोगों को अपने साथ मज़ाक पसंद नहीं होता। उनके यहाँ बेइज्जती एक रास्ता तरफा होता है । नौकर को मालिक की बेइज्जती का कोई हक नहीं होता। इसी क्रम में नौकर की किसी भी हरकत को अपनी बेइज्जती समझने का हक मालिक के पास सुरक्षित रहता है।
लौटकर कैब ड्राईवर ने कई काम किए। लेकिन अंतत: ड्राइविंग करने लगा।
और बात करने पर बताया उसने कि सुबह छह से रात बारह बजे तक गाड़ी चलाता है। पैसे की जरूरत है। माँ को पार्किंसन की बीमारी है। तीन बेटियां हैं। परिवार के और लोग भी हैं सबकी जिम्मेदारियाँ हैं। इसलिए इतनी देर तक काम करना पड़ता है।
सुबह छह से रात बारह बजे मतलब अठारह घंटे सुनकर मुझे अपने माननीय जी याद आए। अठारह घंटे काम करना उनके साथ इतने पुख्ता तरीके से जुड़ गया है कि बड़ी बात नहीं किसी दिन कोई अध्यादेश जारी हो कि उनके अलावा और कोई अठारह घंटे काम नहीं करेगा। सत्रह घंटे करे, उन्नीस घंटे करे लेकिन अठारह घंटे न करे। करेगा तो भरेगा।
लौटते समय जो ड्राइवर मिला उसने बताया कि बंथरा का रहने वाला है। वहाँ की ज़मीन के दाम ऊँचे हो गए हैं। लोग मालामाल हो रहे हैं। उसकी भी ज़मीन है वहाँ। उसके पिता से उसकी ज़मीन के लिए 11 साल का कांट्रैक्ट किसी कँपनी ने करने के लिए संपर्क किया था। पिता जी ने कहा -"कांट्रैक्ट 11 साल का नहीं करेंगे। साल-साल भर का करेंगे। हर साल पचीस प्रतिशत किराया बढ़ा कर लेंगे।" लेकिन कंपनी वाले 11 साल का एक साथ कांट्रैक्ट करना चाहते थे। सालाना बढ़ोत्तरी भी वे पाँच-दस प्रतिशत से अधिक करने को राजी नहीं थे। इसीलिए कांट्रैक्ट अभी तक नहीं हो पाया।
बातचीत के दौरान टैक्सी ड्राइवर ने flightradar24 एप के बारे में बताया जिससे किसी भी उड़ान की ताजा स्थिति पता चल सकती है। अमौसी हवाई अड्डे से सवारी के लिए वह इसी एप का इस्तेमाल करता है। मेरे लिए यह रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी थी। बाद में इसी का इस्तेमाल करके मैं अपने बेटे को लेने समय पर हवाई अड्डे पहुँचा।
अमौसी हवाईअड्डा भले ही लिखा पढ़ी में चौधरी चरणसिंह हवाई अड्डा हो गया है लेकिन बोलचाल में लोग उसे अमौसी हवाई अड्डा ही कहते हैं।
कैब ड्राइवरों से बातचीत के पहले का एक रोचक क़िस्सा याद आया। सुबह कालोनी के गेट पर तीन लोग कालोनी के गेट पर X का निशान लगाकर उसके आगे 150 लिखकर वापस जा रहे थे। X का निशान लगाकर जाते लोगों को देखकर मुझे अलीबाबा चालीस चोर की मरजीना द्वारा लोगों के घरों पर निशान लगाने की कहानी याद आई। हमने उनसे निशान लगाने का कारण पूछा।
उन लोगों ने बताया कि वे सरकार के पल्स पोलियो अभियान से जुड़े लोग हैं। वे नवजात शिशुओं को पल्स पीलियो का टीका लगवाने के लिए सर्वे करने निकले हैं। कॉलोनी के प्रेसिडेंट उनको सर्वे की अनुमति नहीं दी यह कहकर कि जिसको पल्प पोलियो का टीका लगवाना होगा वह अपने आप लगवा लेगा।
सुबह-सुबह सर्वे करने के लिए निकले लोगों यह बात सरकारी पहल का अपमान लगी। उसने झुँझालते हुए कहा -" लगवा लेना प्राइवेट अस्पताल में टीका। कुछ दिन में सब कुछ प्राइवेट ही कर देगी सरकार।"
इसके जबाब में दरबान ने कहा -" सरकार सब कुछ प्राइवेट तो कर ही रही है। फलाने जी सब कुछ तो प्राइवेट को बेचे दे रहे हैं। बचा क्या है?"
हमको लगा कि सुबह-सुबह कैसी-कैसी बातें सुनने को मिल रही हैं। कोई सुनेगा तो क्या कहेगा। हम इसीलिए आज सुबह निकले ही नहीं टहलने। बिस्तर में बैठे-बैठे समाचार देख रहे हैं। पता चला कि मनरेगा का नाम बदलने पर पर बवाल मचा हुआ है संसद में। हमको शेक्सपियर की बात याद आई -"नाम में क्या रखा है।" लेकिन शेक्सपियर को कौन समझाए जाकर कि सब कुछ तो नाम में ही रखा है। इसीलिए तो आज काम के बजाय नाम (बदलने) पर जोर है।
फोटो तीन साल पहले का। जगह अमेरिका का स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय। Know Justice , Know Peace (मतलब न्याय को जानो, शांति को जानो) । हमें डर है कि कहीं अपने यहाँ न्याय और शांति के नाम भी न बदल दिए जाएँ। जब होगा तब देखा जाएगा। अभी तो न्याय और शांति ही चल रहे हैं।

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