Tuesday, February 24, 2026

राजधानी टी स्टॉल


 कल टहलते हुए चाय की गुमटी दिखी। नाम था -'राजधानी टी स्टॉल।' गुमटी पर दो झंडे फहरा रहे थे। हवा में फहराते झंडों को देखकर लगा कि इनकी जगह गुब्बारे होते तो गुमटी हवा में होती। ऐसा होता क्या पता दुकान का नाम बदल कर हो जाता -' हवा-हवाई टी स्टॉल।' हर चुनाव सभा में उड़कर पहुँच जाती दुकान। खूब बिक्री होती।

दुकान पर रेट लिस्ट लगी थी। चाय के दाम दस रुपये। कुल्हड़ की चाय के पंद्रह रुपए। मतलब कुल्हड़ के पाँच रुपए। कभी लालू यादव जी के रेल मंत्री रहते ट्रेन में कुल्हड़ की चाय का चलन शुरू हुआ था।
दुकान वाले ने बताया कि यह दुकान तो नई है। पुरानी दुकान आठ-दस साल पहले खुली थी। आगे है। एक ही नाम से दो चाय की ठेलिया। प्रदेश की राजधानी में दो-दो राजधानी टी स्टॉल। किसी भी प्रदेश में जाकर खड़ी कर दें ठेलिया। बेचने लगे चाय।
पुरानी वाली राजधानी टी स्टॉल के पीछे एक इमारत पर बड़ा सा सीमेंट का गोला सा रखा दिखा। पता चला कि मौसम विभाग का ऑफ़िस है। उस ऑफ़िस तक जाने वाली सड़क ऊबड़-खाबड़ है। शायद इसी लिए मौसम की ख़बरें बहक जाती हों। बारिश की अनुमान वाले दिन धूप निकल आती हो। धूप वाले दिन रिमझिम बरसात।
दोनों दुकानों के मालिकान के नाम अलग-अलग हैं। पुरानी वाली दुकान पर प्रोप्राइटर के नाम दीपक जोशी और राकिम ख़ान हैं। शायद दोस्त हों जोशी जी और ख़ान साहब। नई वाली राजधानी टी स्टॉल पर इरफ़ान ख़ान का लिखा है। शायद गठबंधन से भरोसा उठ गया हो।
पिछले दिनों जगह-जगह अलग-अलग नाम वाले टी स्टॉल दिखे। क्या पता कल कोई 'ट्रम्प टी स्टॉल', 'प्रधान सेवक टी स्टॉल' देखने को मिले। यह लिखते हुए अमेरिका में ट्रम्प टावर में Abhishek Ojha के साथ पी हुई कॉफ़ी का स्वाद अनायास याद आ गया।
आगे ही शुक्ला टी स्टॉल भी है। पिछली बार बंद दिखी थी। सोचा चलकर चाय पी जाये। लेकिन चौराहे पर मुड़ गए। घर तक का ऑटो खरीदा। कप्तान गौरव तिवारी आए हमको लेने। रैपिडो में ड्राइवर को कैप्टन करके ही बताते हैं। गौरव ने बताया कि लंच के बाद की पहली सवारी उठा रहे हैं। हमने सोचा हम ख़ुद बैठे हैं ऑटो पर और ये कह रहे हैं हमको उठा रहे हैं। कितना अंतर होता है एक ही बात को दो लोगों द्वारा व्यक्त किए जाने पर।
घर आकर ऑटो रुकने पर गौरव ने अंगड़ाई ली। हमने पैसे भुगतान किए और घर में घुस गए। घर वापसी हुई हमारी। कोई इसे कहेगा -'लौट के बुद्दु घर को आए।' कोई 'बुद्धू' की जगह 'बुद्ध' भी पढ़ सकता है। ज़्यादा अंतर है भी नहीं आजकल दोनों में। वैसे अगर सही में बुद्ध घर वापस आए होते, बुद्ध की घर वापसी हुई होती तो इतिहास कैसा रहता? क्या पता इस बात की कल्पना करते हुए कोई उपन्यास लिखे -'बुद्ध की घर वापसी।'
बुद्ध जी का तो पता नहीं लेकिन आज कोई बुद्धू घर वापस लौटता है तो उससे कहा जाता है -'लौट आए, चलो बढ़िया सी चाय बनाओ।'
ट्रम्प टॉवर का किस्सा फोटो के साथ लगा है।

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