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| पहुँच गए बाली |
मलेशिया से बाली तीन घंटे की दूरी पर है। जहाँ उड़ते ही एयरहोस्टेस ने कानाफूसी वाले अंदाज़ में नाश्ते के लिए पूछा। हमने बताया शाकाहारी। उसने नाश्ते की ट्रे थमा दी। कॉफ़ी के कप से कॉफ़ी छलक गई। हमने सोचा बाद ने फिर ले लेंगे। आराम से नाश्ता करते रहे ।
नाश्ते के बाद चाय-कॉफ़ी माँगी। लेकिन में मिली नहीं। ख़त्म हो गई थी।
विमान परिचारिका महिलाएँ साड़ी पहने थीं। कुछ कुछ लुंगी वाले अंदाज़ में।
जहाज उड़ते ही नेट कनेक्शन आ गया। भड़भड़ाकर नोटिफ़िकेशन आने लगे। ज्यादातर यात्रा की शुभकामना संदेश। हमने नेट का उपयोग करके पोस्ट लिख मारी। कुछ के जबाब भी।
जहाज हवा में तैर रहा है। चल रहा है। हवा के बहुत बड़े पूल में सीधे फ्री स्टाइल में बढ़ता चला जा रहा है। हमको पानी में तैरना सीखने में कई महीने लगे। जहाज पहले दिन से ही हवा में तैरने लगा होगा। इंसान और मशीन में यही फ़र्क़ होता है।
आगे की सीट की एक महिला यात्री पीछे आईं। बोली -‘ हमारा सेल गिर गया है। उठा दीजिए।’ हमें लगा बैटरी का सेल। लेकिन पता चला कि उनका मोबाइल नीचे गिरा था। हमने पाँव से उसकी अपनी तरफ़ खींचा। झुककर उठाया। इनको दे दिया। उन्होंने धन्यवाद फेंका और अपनी सीट पर बैठ गई।
हवाई जहाज के उतरने का समय हो गया। नीचे बाली का समुद्र दिख रहा है। समुद्र तट
पर बने मकान सीप, घोंघे, मोती जैसे छोटे-छोटे दिख रहे हैं।
जहाज लाहे-लहर चल रहा है। हवा में ठहरा सा हुआ। तेजी से चढ़ा भले हो लेकिन उतर आराम से रहा है। किसी राजनीतिक पार्टी की तरह तेजी से नहीं पतित हो रहा। इंसान और मशीन का फ़र्क़ है यह।
लोग उचक-उचक कर खिड़की से नीचे देख रहे हैं। नीचे समुद्र का पानी चमकती जालीदार चादर की तरह लग रहा है। पानी लहरों के रूप में हिल-डुल कर जहाज का स्वागत जैसा कर रहा है। जहाज भी आहिस्ते-आहिस्ते उतर रहा है।
हम बाली में उतर रहे हैं। उतर चुके हैं। इंटरनेट , जो थोड़ी देर को बंद हुआ था, फिर चालू हो गया है।
परिचारिका हमारा स्वागत करते हुए कह रही है - ‘लेडीज एंज जेंटलमेन, बॉयज़ एंड गर्ल्स, आपका बाली में स्वागत है।’ मलेशिया एयरलाइन्स पूरी पारिवारिक है।
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