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| पीताम्बर पांडे ड्यूटी से घर लौटते हुए। |
आज सबेरे स्विमिंग के लिए निकले। साइकिल से। स्विमिंग पूल 8 किलोमीटर दूर है।
सड़क किनारे एक आदमी कुत्ता टहलाते हुए दिखा। कुत्ता टहलाते हुए वह दातुन करते जा रहा था। उसको देखते, साइकिलियाते, आगे निकल गए।
मोड़ पर ऑटो वाले सवारियों के इंतजार में खड़े थे। एक आदमी अचानक पैदल चलते हुए मुड़ा। मुड़ने के बाद उसने पहले गर्दन से मुड़ने का इशारा किया। इसके बाद हाथ भी दिया। ट्रैफिक नियम का पालन करने वाला इंसान था।
एक लड़की तेज़ी से सड़क पार करके ऑटो की तरफ़ बढ़ी। उसकी चाल और सर के बाल संवारने के अंदाज़ में युवा बालिका का आत्मविश्वास टपक रहा था। आगे एक और बालिका ने दूसरे ऑटो में बैठने के पहले मुँह से पान मशाले की पूरी पीक सड़क को भेंट कर दी। जिस लापरवाह अंदाज में उसने सड़क पर पान मशाला थूका वह अलग तरह का आत्मविश्वास था।
अमौसी मेट्रो स्टेशन के बाद अमौसी हवाई अड्डा पार करने के बाद आगे एक आदमी साइकिल पर जाते दिखा। उसके कंधे पर बंदूक लटकी थी। साइकिल पर लगे झंडे में शंकर जी का फ़ोटो था। बड़ी-बड़ी मूछें। साइकिल के मडगार्ड पर रबड़ का कवर लगा था ताकि बरसात का पानी कपड़े कम खराब कर सके।
साइकिल, बंदूक, झंडा, मूछों के गठबंधन युक्त साइकिल सवार के बगल में जाकर हमने उससे बात की। उनकी फ़ोटो लेने का अनुरोध किया। उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार करते हुए साइकिल किनारे की। हमने फोटो लिए और थोड़ा बतियाये भी।
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| साइकिल पर पीताम्बर पांडे। कंधे पर बन्दूक, साइकिल पर झंडे पर शंकर जी का चित्र, हैंडल के आगे देश का झंडा, मडगार्ड पर मोमिया। शानदार मूछें और पीछे किसी ऑफिस का प्रवेश द्वार सर पर मुकुट की तरह लग रहा है। |
साइकिल सवार का पीताम्बर पांडे है। सुरक्षा दरबान का काम करते हैं। एक सेठ के यहाँ। पहले हमारी कालोनी में भी दरबान का काम कर चुके हैं। कालोनी वाले पैसे कम देते थे, पूजा-पाठ और दीगर काम भी करवाते थे इसलिए यहाँ आना छोड़ दिया। अलबत्ता व्यवहार के चलते बुलाने पर मंदिर में पूजा-पाठ करने अभी भी आते हैं।
पांडे जी ने बताया कि वे लखनऊ आने से पहले हरिद्वार में रहते थे। उसके पहले अल्मोड़ा। अल्मोड़ा के मूल निवासी पीताम्बर पांडे लखनऊ में दरबानी करते हैं। अल्मोड़ा के नाम से हमें अपना तमाम दोस्त याद आ गए जिनका घर वहाँ है।
पीताम्बर पाण्डे अपनी बहन के यहाँ रहते हैं। ख़ुद का परिवार नहीं है। क्यों नहीं है यह नहीं पता लेकिन बातचीत से अंदाज़ लगा कि वे घर बसाना चाहते हैं।
जिस जगह पर साइकिल रोकी थी उसके पास की दुकानों की तरफ़ इशारा करते हुए बताया -' ये सब दुकानें हमारे बहनोई की हैं।'
उन्होंने हमसे पूछा -'क्या तुम ड्यूटी जा रहे हो? कहाँ काम करते हो?'
हमने बताया -' हम रिटायर हो गए। फ़िलहाल स्विमिंग के लिए जा रहे हैं।'
कंधे पर तंगी बंदूक के बारे में हमने पूछा -' ये बंदूक और साइकिल का कांबिनेशन बड़ा जोरदार है।'
इस पर हँसते हुए पांडे जी ने बताया -' ये चिड़िया मारने वाली बंदूक है।'
चिड़िया मारने वाली बंदूक से चौकीदारी करने वाली बात मजेदार लगी। अपने देश की चौकीदार भी याद आ गए। वे भी अपना भौकाल ऐसे ही झाँसे वाले अंदाज़ में बनाते हैं।
पीताम्बर पाण्डे जी विदा लेकर अपन स्विमिंग पूल की तरफ़ चल दिए। पूल का पानी हमको आवाज दे रहा था।


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