स्कूल की पढ़ाई के कुछ सूत्र वाक्य अक्सर याद आते हैं।उनमें से एक संस्कृत में पढ़ा याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद का यह श्लोक भी है :
"न वा अरे मैत्रेयी पुत्रस्य कामाय पुत्रम प्रियम भवति,
आत्मनस्तु वै कामाय पुत्रम प्रियम भवति।"
"अरे मैत्रेयी, पुत्र की कामना के लिए पुत्र प्रिय नहीं होता। अपनी ही कामना के लिए पुत्र प्रिय होता है।"
बचपन में पढ़ा यह श्लोक Shikha Varshney के पहले उपन्यास - ‘अस्मि’ को पढ़ने के बाद फिर याद आया।
शिखा हमारे ब्लॉगर घराने की लेखिका हैं। अपने ब्लॉग 'स्पंदन' में नियमित पोस्ट लिखती रहीं। रूस (मास्को) में जर्नलिज्म की पढ़ाई के दिनों के संस्मरण -'स्मृतियों में रूस' पहली किताब के रूप में आए। नई दिल्ली में पैदा हुई शिखा फिलहाल लंदन में रहती हैं। वही लंदन जिसके लिए मुश्ताक अहमद यूसुफी साहब ने अपनी किताब 'खोया पानी' में लिखा है -"यूं लंदन बहुत दिलचस्प जगह है और इसके अलावा इसमें कोई खराबी नजर नहीं आती कि गलत जगह पर स्थित है।"
लंदन के बारे में लिखे उनके लेख अख़बारों में ' देशी चश्मे से लंदन डायरी' स्तंभ के रूप में छपते रहे।कविता संग्रह 'मन के प्रतिबिम्ब' भी आ चुका है। घूमने-फिरने की शौक़ीन शिखा यात्रा संस्मरण लिखती रहती हैं। उनके यात्रा वृत्तान्त 'पाँव के पंख' प्रकाशित हुआ।
ब्लॉग, कविता संग्रह, यात्रावृत्त,स्तंभ लेखन के चलते कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित शिखा ने मित्रों के रस्मी उकसावे -'उपन्यास की और बढ़ो' को गंभीरता से लिया। इसका परिणाम उनके उपन्यास 'अस्मि' के रूप में सामने आया।
उपन्यास कहानी शिखा के लेखन की तरह सहज, सरल है। दुनियावी रूप में एक सफल मध्यम वर्गीय परिवार की महिला एला अपने बचपन में हासिल लिए हुनर और काबिलियत को भुला कर अपना परिवार की व्यवस्था देखती रहती है। दुनियादार पति के सामने समर्पण मुद्रा में जीती एला एक दिन अपने परिवार के साथ पैरा ग्लाइडिंग के लिए जाती है। हवा के झोंके से उसका पैराशूट बहक जाता है। एक पेड़ में अटककर वह बेहोश हो जाती है और एक गांव पहुँचती है। गांव के लोग उसकी देखभाल करते हैं। वह स्वस्थ होती है। अपने पति राजीव और बेटे अंकुर का इंतजार करती है। वे नहीं आते। एला गांव के लोगों के बीच रम जाती है।
गांव के लोगों के साथ रहते हुए एला फ़्लैशबैक में जाकर अपने अतीत के बारे में सोचती है। याद करती है कि कैसे पति और परिवार के चक्कर में वह अपना सारा हुनर, प्रतिभा और कला को स्थगित करती रही। जे उर्फ जागृति और उसके मित्र रियो को याद करती है। उन सबको याद करते वह वह गांव के लोगों से घुलती-मिलती जाती है। गांव के लोगों के बीच 'कला दीदी' के नाम से प्रसिद्ध हो जाती है।
एला का बेटा अंकुर उसको खोजता हुआ आता है। माँ को वापस चलने के लिए कहता है। लेकिन एला कुछ दिन और (दो हफ़्ते) रहने की मोहलत की बात कहते हुए उसको भी अपने साथ रखती है। अंकुर अपनी माँ की ख़ुशी देखकर उसको वहीं गाँव में रहने के लिए छोड़ जाता है। वापस जाकर सृष्टि के बारे में लिखता है और बताता कि उसको कला से लगाव है।
पत्र पढ़कर एला मुस्कराती और उसकी मुस्कान के साथ ही उपन्यास खत्म होता है।
एला संयोग से ऐसी जगह पहुँचती है जहाँ वह अपनी मनमर्जी के हिसाब से जीना शुरू करती है। अपनी कामना के अनुरूप ख़ुश रहती है।
कुल जमा 115 पेज के इस उपन्यास में जीवन के कई पहलुओं को घूम टहल कर देखा गया है। समलैंगिक संबंध और इकीगाई पर भी कुछ चर्चा है। सिद्ध लिख्खाड़ लेखक इतने मसाले को लेकर जो लिखते वो शायद बक़ौल श्रीलाल शुक्ल -'मुगदर साहित्य' के घराने का उपन्यास होता। उनके लिए शायद यह उपन्यास एक मसौदे के रूप में ही होता। लेकिन शिखा को ऐसा कुछ करना नहीं होगा। उन्होंने सिर्फ़ संकेतों में बताने की कोशिश की है कि किसी महिला (इंसान) को जब अपनी मर्जी का काम करने का मौक़ा मिलता है तो उसे कितनी ख़ुशी मिलती है।
आलोचकों की नजर से इस उपन्यास में क्या ख़ासियत और कमी है ये आलोचक बतायेंगे। मेरे लिए तो यह एक ब्लॉगर मित्र का लोगों के उकसावे पर लिखा पहला उपन्यास है। इसकी सबसे बड़ी ख़ासियत इसकी पठनीयता है। बिना लटके-झटके के लिखे इस उपन्यास को दो सिटिंग में पढ़ लिया मैंने यह इसकी पठनीयता का प्रमाण है।
शिखा को उनके पहले उपन्यास की बधाई। आशा है आगे वे और उपन्यासों पर हाथ आज़मायेंगी। इसके लिए अब उनको मित्रों के उकसावे का इंतज़ार नहीं होगा।
उपन्यास शिवना प्रकाशन से आया है। कीमत 250 रुपये है। यह अमेजन पर उपलब्ध है। लिंक यह है।
शिखा से 14 साल एक पुरानी बातचीत का लिंक यह है।

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