Saturday, November 16, 2019

किताबों की दुनिया की सबसे बड़ी दुकान में

 

मन्टनोवाह झरने से लौटते हुये शाम हो गयी थी। पेट भूख के हूटर लगातार बजा रहा था। क्या खायें-क्या न खायें के शाश्वत चिंतन के बाद स्टारबक्स पहुंचे। लाटे चाय पी गई। यह चाय हम लोगों की चाय के सबसे नजदीकी होती है। स्टारबक्स की चेन पूरे अमेरिका में है। जगह-जगह इनकी दुकाने मौजूद हैं। स्टारबक्स में इंटरनेट मुफ़्त होता है। आप आइये, दिन भर बैठिये, चाय-काफ़ी पीजिये चाहे न पीजिये। मुफ़्त इंटरनेट सुविधा का उपयोग कीजिये। लोग घंटों यहां बैठे रहते हैं, अपना काम करते हैं। कोई रोक-टोंक नही।
इसी सम्बन्ध में एक मजेदार घटना। 4 जुलाई को स्टारबक्स के एक कैफ़े के एक कर्मचारी ने एक ग्राहक की शिकायत पर कैफ़े में मौजूद पुलिस अधिकारियों से अनुरोध किया कि या तो वे वहां से चले जायें या ऐसी जगह बैठें जहां से वे ग्राहकों के सामने न पड़ें। इस पर बवाल हुआ। आफ़ीसर्स एशोसियेशन ने इस घटना के खिलाफ़ लिखा। स्टारबक्स के बायकाट का अनुरोध किया। फ़िर स्टारबक्स के सीईओ ने लिखित माफ़ी मांगकर मामला रफ़ा-दफ़ा किया।
इस घटना में अपने देश के नजरिये से कुछ बातें मजेदार हैं। अपने यहां किसी ग्राहक की हिम्मत नहीं होगी कि कैफ़े में आये पुलिस के लोगों की उपस्थिति पर एतराज करे। करे भी तो कैफ़े के कर्मचारी की हिम्मत नहीं होगी कि पुलिस वालों से कहे कि भाई साहब आप निकल लें या फ़िर ऐसी जगह बैठें जहां से ग्राहकों को तकलीफ़ न हो। इसके बाद पुलिस भी अपनी एशोसियेशन की तरफ़ से लिखने की बजाय फ़ौरन कैफ़े के मालिक को पकड़कर थाने ले जायेगी और अन्दर करके त्वरित न्याय की तरफ़ बढेगी। लेकिन यह अमेरिका है भाई यहां लोग लिखा-पढी में ज्यादा भरोसा करते हैं।
पोर्टलैंड में टहलते हुये आसपास की इमारतें देखी गयीं। पोर्टलैंड का खुला मंच देखा जहां अक्सर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहते हैं। हजारों लोग बैठकर देखते हैं। उसके सामने ही पोर्टलैंड का ’द पायनियर कोर्टहाउस’ है। मंच के पास ही पोर्टलैंड के मौसम को चित्रित करते हुये एक मूर्ति है। पोर्टलैंड में साल भर बारिश होती रहती है। इसलिये घर से निकलिये तो छाता साथ में हो। मूर्ति में इसी भाव को दिखाते हुये एक व्यक्ति छाता लिये खड़ा है। यह यहां की ’सिग्नेचर मूर्ति’ है।

मूर्ति के साथ खड़े होकर हम सबने फ़ोटो खिंचाई। हमने ’कट्टा कानपुरी’ का कातिलाना शेर याद किया:
तेरा साथ रहा बारिशों में छाते की तरह
कि भीग तो पूरा गये पर हौसला बना रहा।
पोर्टलैंड में कलकत्ते की तरह ट्राम भी चलती है। सड़क किनारे पटरियां हैं। उन पर ट्राम। हमारे सामने ही एक ट्राम आई। यात्री उतरे- चढे।
यह सब तो ठीक लेकिन पोर्टलैंड का सबसे बड़े आकर्षण से मुलाकात तो अभी बाकी थी। यह आकर्षण है यहां का ’पावेल बुक स्टोर।’ इसको देखने सबसे बाद पहुंचे।
’पावेल बुक स्टोर’ https://www.powells.com/ दुनिया में नई और पुरानी किताबों की सबसे बड़ी दुकान कही जाती है। ’पावेल सिटी आफ़ बुक्स’ के नाम से मशहूर यह किताबों की दुकान अनूठी है। तीन मंजिला इमारत में स्थित इस दुकान में नौ अलग तरह के कलर कोड वाले कमरे हैं। इनमें भी 3500 सेक्सन हैं। ये नौ कलर कोड अलग-अलग तरह की कैटेगरी की किताबों के हिसाब से हैं। साहित्य, कानून, इंजीनियरिंग मतलब कि तरह-तरह की किताबें।

1971 में वाल्टर पावेल ने इस पावेल बुक्स की शुरुआत की। इसके बाद उनके बेटे और फ़िर बेटे की बेटी न काम संभाला। फ़िलहाल काम इमली पावेल देखती हैं। तीसरी पीढी चला रही है यह दुकान। आज के समय में पांच दुकाने हैं इनकी। पांच सौ कर्मचारी। किताबों की दुकान से आमदनी की बात करने पर लोग शर्माते हैं। पावेल्स की 2009 की कमाई 4.5 करोड़ रही।
पावेल बुक स्टोर में घुसे तो सबसे पहले ही सूचना केन्द्र मिला। यहां दुकान के बारे में जानकारी मिली कि नौ रंग वाले अनुभागों में कैसी किताबें हैं। सबमें बारी-बारी से टहले। किताबों को अलट-पलटकर देखा। पढने का नाटक करते हुये फ़ोटो खिंचाये। दुकान में जगह-जगह बेंच भी रखी हुईं थी जिन पर बैठकर लोग किताबें पढते दिखे। दुकान में पुरानी किताबें भी थीं बिकने के लिये।
शुरुआत में ही एक नोटिस बोर्ड पर हालिया बड़े इनाम पायी किताबों और उनके लेखकों के नाम लिखे हुये थे। इनमें नोबल पुरस्कार , बुकर पुरस्कार आदि से सम्मानित लोगों और उनकी किताबों के नाम थे। पावेल बुक स्टोर में ’लेखक से मिलिये’ कार्यक्रम भी होते हैं। इसमें लेखक को बुलाया जाता है। उसकी किताब पर बात होती है। सवाल-जबाब किये जाते हैं। लेखक पाठकों/दर्शकों से अपनी बात कहता है। उनके सवालों के जबाब देता है।
पावेल बुक स्टोर में एक जगह कार की मरम्मत की सूचना का बोर्ड लगा था। पता किया तो मालूम हुआ कि पहले यहां कारों की मतम्मत होती थी। कभी का गैराज आज किताबों की दुकान है।

पावेल बुक स्टोर को देखते हुये हमको अपने यहां किताबों की दुकानों की स्थिति याद आई। कानपुर में ’करेंट बुक स्टाल’ साहित्यिक पुस्तकों का सबसे बड़ा स्थल है। उनकी किताबों की बिक्री का यह हाल है कि स्कूली मौसम में साहित्यिक किताबें बेंचना स्थगित करके स्कूलों की किताबें बेंचते हैं। वैसे इस तरह की दुकाने चलते रहने के लिये इनका आर्थिक पहलू भी मजबूत होना चाहिये। इस लिहाज से स्कूलों की किताबें भी बेंचना कोई गड़बड़ काम नहीं। आर्थिक स्थिति ठीक रहेगी तभी साहित्य सेवा हो सकेगी।
दिल्ली की फ़ुटपाथों वाली दुकान बन्द होने की सूचना आ ही गयी। किताबों की बिक्री कम हो रही है। ऐसे में ऐसी दुनिया की सबसे बड़ी किताबों की दुकान देखना अद्भुत अनुभव रहा।
दुकान से निकलते हुये हमने सोचा कि एकाध किताब भी लेते चलें। हमने ’2019 के बेस्ट अमेरिकन एस्से’ किताब छांटी। सोचा जरा देखा जाये कि इनके सबसे बढिया लेख कैसे हैं। इसके बाद गैबरियल मार्खेज की किताब ’लव इन द टाइम आफ़ कालरा’ दिख गयी। सेकेंड हैंड किताब 8.95 डालर में मिली। नई के दाम 12.95 डालर लिखे हैं। यह किताब हमने साल भर से भी पहले नेट से डाउनलोड की है लेकिन अब तक अनपढी है। क्या पता अब पढ ही ली जाये।
इसके बाद ओरहम पामुक की किताब ’द रेड हेयर्ड वूमेन’ ली। हम ओरहम पामुक की सबसे प्रसिद्द किताब खोज रहे थे लेकिन नाम नहीं याद आ रहा था। काउंटर पर पता किये तो वह वहां ले गया जहां ओरहम पामुक की किताबें रखी थीं। इंद्र अवस्थी ने खोजी तो पता चला हम उनकी किताब ’इस्तन्बुल द मेमोरी एंड द सिटी’ खोज रहे थे। किताब अवस्थी ने खोजी थी इसलिये बोले –’पैसे भी हम ही देंगे।’ बाद में किताब जबरदस्ती हमारे सामान के साथ लाद दी। इस जबरदस्ती से याद आया कि स्टारबक्स में काफ़ी के पैसे भी उन्होंने ही यह कहकर दिये कि उनको वहां यहां छूट मिलती है। हम मान गये लेकिन बनाया तो बेवकूफ़ ही हमको। वैसे ऐसे बेवकूफ़ बनने का भी मजा है। दुनिया ऐसे बेवकूफ़ बनाने वालों के चलते ही खुशनुमा है।
किताबों की दुकान से निकलकर हम रात को घर पहुंचे। खाते-पीते-गपियाते हुये सो गये।

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