Saturday, November 23, 2019

टाइम्स स्क्वायर -दुनिया की सबसे भीड़ भरी जगह

 



अमेरिका पहुंचकर पहले दिन तो आराम किया गया। 'जेट लैग'की इज्जत भी करनी थी न । दूसरे दिन स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी देखने गए। फिर तीसरे दिन न्यूयार्क पर धावा बोला गया।
न्यूजर्सी से न्यूयार्क ट्रेन से गये। ' न्यू ब्रानस्विक स्टेशन' घर से करीब 10 मिनट की दूरी पर है। हमारे दामाद सौरभ Saurabh रोज स्टेशन छोड़ देते। हालांकि छूट्टी उन्होंने अपने बच्चे की देखभाल के लिए ली थी। लेकिन हमारे वहां पहुंच जाने पर हमारी भी देखभाल उनके जिम्मे आ गयी।
ट्रेन में टीटी हमारा टिकट लेने के बाद उसको अपने पास धर लेते थे। टिकट के बाद वो अपने यहां रोडवेज बसों में मिलने वाली चौकोर लम्बी टिकट जैसी पर्ची पंच करके हमारी सीट पर फंसा देते। कुछ देर बाद वह पर्ची भी अपने साथ ले जाते। हमको बार-बार लगता कि हमारी टिकट भी इनके पास, उनकी लगाई पर्ची भी उनके पास। अगर कहीं कोई पूछता तो हमारे पास तो टिकट का कोई सबूत नहीं । कोई बेटिकट साबित करके जुर्माना ठोंक देता। बड़ी बेइज्जती ख़राब होती परदेश में।
मामला कुछ समझ में नहीं आया। न हम टीटी से पूछ ही पाए। लेकिन हम टिकट खरीदने की रसीद अपने साथ रखे रहते। कोई पूछेगा तो दिखा देंगे। लेकिन किसी ने पूछा नहीं।
घण्टे भर बाद न्यूयार्क स्टेशन आ गया। न्यूयार्क पेन स्टेशन।
न्यूयार्क शहर बारे में हमने किताबों में पढ़ा था, ऊंची इमारतों वाला शहर, कभी न सोने वाला शहर, वैभव सम्पन्नता और चकाचौंध के लिए विख्यात शहर। मारियो पूजा के उपन्यास ’गाडफ़ादर’ में अमेरिकी जीवन के अपराध के किस्से भी न्यूयार्क के इलाके के हैं। मैनहट्टन इलाके में दुनिया भर की कम्पनियों के ऑफिस हैं। अमेरिकी किताबों-फिल्मों के अनगिनत किस्सों की गवाह हैं न्यूयार्क की गलियां। उसी न्यूयार्क को पास से देखने पहुँचे हम।
न्यूयार्क एवेन्यू और स्ट्रीट में बंटा हुआ शहर है। किसी एक्सेल शीट के कालम और रो की तरह यहां की गलियां और एवेन्यू क्रम से पूरे शहर को तरतीब से रखे हैं। सब कुछ बढ़ते , घटते क्रम में। यह नहीं कि सत्तावनवी गली के बगल में इकसठवी गली अपना डेरा डाल ले। सब कुछ तरतीब से।
स्टेशन से निकल कर सड़क का ट्रैफिक देखा। कार, बस की भीड़ थी सड़क पर। किनारे साइकिल सवारों की लेन। साइकिलें धड़ल्ले से चल रही थीं। जगह-जगह किराये की साइकिल भी खड़ीं थीं फुटपाथ में। सिटी बाइक की। जहां से मन आये उठा लो। इसके बाद जहां मन आये धर दो। हमारा भी मन हुआ कि चलाएं साइकिल हम भी। लेकिन रजिस्ट्रेशन के झमेले के चलते चलाये नहीं । अलबत्ता एक जगह साइकिल पर खड़े होकर फोटो जरूर खिंचा लिए।
सड़क पर पैदल चलने वालों की बड़ी इज्जत दिखी। पैदल यात्रियों के सड़क पार करते समय गाड़ियां रुकी रहतीं। पैदल यात्रियों के भी पार करने के सिग्नल बने होते हैं। यह नहीं कि जब मन आये सड़क पार कर लो। एक और बात यह कि पैदल यात्री सड़क की शुरुआत में बने पैदल पार पथ से ही सड़क पार करते। यह नहीं कि जहां मन आया सड़क को फलांग गए।
वहीं सड़क पार न्यूयार्क टाइम्स अखबार का दफ्तर दिखा। मन किया जाएं अखबार के सम्पादक से मिलें । कहे कि भारत का पेज देखने वाले संवाददाता से कहें कि भाई हमारा इंटरव्यू ले लेव। छाप देव, वायरल हुई जइहै। बात होती तो हम भी पूछते कि तुम्हारे यहां मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू है कि तुम लोग भी भारतीय पत्रकारों की तरह लिखकर दे दिए हो -'हमको नहीं चाहिए मजीठिया आयोग।'
लेकिन यह सोचकर कि दिन बीत जाएगा इस बवाल में हम न्यूयार्क टाइम्स के सामने सड़क पार से ही फोटो खिंचाकर आगे बढ़ गए। हमारा अगला पड़ाव था टाइम्स स्क्वायर !
टाइम्स स्क्वायर दुनिया के सबसे भीड़ वाले इलाकों में गिना जाता है। लगभग 3.5 लाख रोज यहां से गुजरते हैं। मतलब 13 करोड़ लोग साल भर में ! मतलब पांच आस्ट्रेलिया साल भर में न्यूयार्क स्क्वायर से टहल जाते हैं।
पहले टाइम्स स्क्वायर का नाम Longacre Square था। 1904 में न्यूयार्क टाइम्स के इमारत इधर बनी तो इसका नाम भी टाइम्स स्क्वायर पड़ गया। क्रासवर्ड आफ़ द वर्ल्ड, हार्ट आफ़ द वर्ल्ड , सेंटर आफ़ युनिवर्स जैसे नामों से मशहूर टाइम्स स्क्वायर नाम से मशहूर टाइम्स स्क्वायर दुनिया की तमाम चहल-पहल भरी गतिविधियों और घटनाओं का केन्द्र है।
जब हम पहुंचे टाइम्स स्क्वायर तो वहां लोगों की भीड़ जमा थी। फ़ुटपाथ पर बनी सीढियों बैठकर, लेटकर फ़ोटो खिंचा रहे थे। सेल्फ़िया रहे थे। Father Duffy Square के आसपास भी फ़ोटोबाजी हो रही थी। लोग दूसरों की फ़ोटो खींचने में सहयोग कर रहे थे। थैंक्यू वेरी मच, हैव अ नाइस डे की बौछार हो रही थी।
चारों तरफ़ मकान-मकान भर ऊंचाई के इलेक्ट्रानिक विज्ञापन चल रहे थे। सारा इलाका रोशनी से गुलजार। हम तो इत्ती रोशनी देखकर हक्का-बक्का सा होने को हुये लेकिन फ़िर आंख मूंदकर संभाल लिये खुद को।
वहीं कुछ लोग तालियां बजाते हुये डांस कर रहे थे। उनको देखते हुये हमने वीडियो बनाया। डांस खत्म होने के बाद एक लड़के ने जिमनास्ट की फ़ुथपाथ पर कलाबाजी खाते हुये डांस किया। एक के बाद दूसरे हाथ पर पूरे शरीर को टिकाते हुये डांस किया। डांस खत्म होने पर देर तक तालियां बजती रहीं।
डांस खत्म होने के बाद अपन ने मोबाइल कैमरा दूसरी तरफ़ घुमाया। कैमरे की जद में सड़क पर मार्च करती हुयी कुछ लड़कियां थीं। भयंकर सर्दी में जबकि हम जैकेट में भी ठिठुर रहे थे, वे लड़कियां केवल रंगबिरंगी शर्ट और चड्ढी पहने टहल रहीं थीं। उनके हाथ में कोई तख्ती भी थीं। जुलूस जैसा निकाल रहीं थीं वे। कुछ ही देर में उनका जुलूस आगे बढ गया। हम लोग ’टाइम्स स्क्वायर’ के बाकी हिस्से देखते रहे। फ़ोटो खींचते रहे। वीडियो बनाते रहे।
काफ़ी देर तक हमने जी भरकर जितना देख सकते थे उतना टाइम्स स्क्वायर देखा। इसके बाद बचा हुआ ’टाइम्स स्क्वायर’ बाकी लोगों के देखने के लिये छोड़ कर आगे बढ गये।
https://www.facebook.com/anup.shukla.14/posts/10218168910427699

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