Friday, August 07, 2026

लोकतंत्र में तानाशाह की एनाटॉमी

 


"वह पुराने तानाशाहों की तरह सैनिक वर्दी और हथियारों में सेना की सहायता से नहीं आता। भीड़ के बीच से आता है। एक भ्रम प्रस्तुत करता हुआ, एक नया 'नैरेटिव' गढ़ता हुआ आता है। वह एक अकेले व्यक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक राजनीतिक दल के प्रमुख के रूप में दिखता है। इस दल की एक राजनीतिक विचारधारा होती है। इस दल व दल के मुखिया का लक्ष्य इस विचारधारा को समाज, देश में क्रियान्वित या साकार करने का होता है। अपनी ऊपरी सतह पर यह विचारधारा आकर्षक व लुभावनी होती है। अपनी विचारधारा और कार्यक्रमों के माध्यम से यह दल स्वच्छ प्रशासन, सामाजिक समरसता, समग्र विकास, आर्थिक उन्नयन, शीघ्र न्याय, अच्छे भविष्य जैसी बातों से लोगों को प्रभावित व आकर्षित करता है। इस दल के मुखिया के साथ इसी विचारधारा के समर्थक होते हैं।

ये उसकी शक्ति और आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं। इस प्रमुख या संभावित तानाशाह को स्वयं पर, दल की विचारधारा पर अकम्पित आस्था होती है। वह दल की विचारधारा का प्रखरतम और प्रबलतम समर्थक व प्रचारक होता है। उसे अपने उद्देश्य की सफलता व महानता पर अगाध विश्वास होता है।इस महानता पर आस्था की बुनियाद में देश के 'अतीत का महान गौरव' व 'उग्र राष्ट्रवाद ' होता है।
वह मानता है कि दल व उसकी विचारधारा पहले इस राष्ट्र और फिर उसके द्वारा बदला गया यही राष्ट्र, पूरी दुनिया को बदल देगा। वह कुशल संगठनकर्ता और व्यूहकार होता है। वह धरती पर 'नया स्वर्ग रचने' की आकांक्षा और स्वप्न रखता है। इसे छुपाता नहीं है। उसके अंदर मनुष्य की प्रवृत्तियों को समझने व नियंत्रित करने का कौशल होता है। वह देश के किसी भी तात्कालिक नियम व कानून से स्वयं को बँधा हुआ महसूस नहीं करता। वह स्वयं को ही कानून समझता है। लुई 16 वें की तरह कहता नहीं , पर 'स्वयं को राज्य' समझता है।
जो उसका विरोध करते हैं वह उन्हें तत्काल दण्डित करता है। वह किसी को अपनी सत्ता नकारने की अनुमति नहीं देता। उसे बौद्धिकों से नफ़रत होती है। प्रश्न उसे परेशान करते हैं। समर्पण से वह शक्ति पाता है। असत्य उसे प्रेरणा देता है। उसकी मुद्रायें नाटकीय होती हैं। वह भव्यता और दिव्यता में प्रस्तुत होता है। उसे कभी आत्मसंसय नहीं होता। वह मसीहा होने का आत्मबोध व आत्ममुग्धता में विचरण करता है। भीड़ उसके सम्मोहन और उन्माद में उसका अनुगमन करती है।"
- कथाकार 'प्रियंवद' की किताब 'भारतीय लोकतंत्र का कोरस' में उद्धृत कृपलानी की किताब का एक अंश।

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