आज स्विमिंग पूल से पैदल लौटे। रास्ते में एक जगह फल का ठेला दिखा। सोचा आम ले लिए जाएँ। कुछ दिन के और मेहमान हैं आम। आम आदमी पार्टी के बारे ने भी लोग ऐसा ही कहते हैं। पार्टी का तो पता नहीं लेकिन आम फिर आयेंगे। अगले सीजन में। आम किसी नेता, चमचे , वोटिंग, पोलिंग के मोहताज नहीं।
एक किलो आम लिए। छाँटकर। कम से कम दस आम रिजेक्ट लिए। साइकिल या कार से आए होते तो खड़े-खड़े या बैठे-बैठे तौलवा लेते। घर में सुनने को मिलता -‘ तुमको फल ख़रीदना भी नहीं आता।’
सुनने को तो आज भी कुछ मिल सकता है। सुनने के लिए कोई गड़बड़ करना जरूरी नहीं। सुनाने वाला इसे अपना अधिकार समझता है।
आम के साथ एक किलो सेव भी लिए। 160/- किलो आम , 280/- किलो सेव। मिलाकर हुए 440/- हमने जोड़े ठीक लेकिन भुगतान किए 340/- गूगल में नाम आया अशरफी। दुकान वाले ने ध्यान दिलाया तो सौ रुपया और दिए।
पूछा तो पता चला अशर्फी भतीजे का नाम है। भतीजा मंडी गया है फल लेने। फल कानपुर से लाते हैं। उन्नाव के रहने वाले हैं। हसनगंज। 2000 से ठेला लगा रहे हैं। गाँव में खेती है तीन बीघा। दस बीघा वहाँ के पंडित जी की खेती बटाई पर करते हैं। 35 साल से।
पंडित जी के बारे ने बताया -‘ उनके चार भाई जहाज उड़ाते हैं। एक भाई कुड़क अमीन है।यहीं लखनऊ में रहते हैं।’
फल के गणित के बारे में बताया। कभी ख़राब हो जाते हैं तो फेकने पड़ते हैं। आम 130 में लाए थे। 160 में बेंच रहे हैं। जो आम ख़राब हो गए वो नुकसान भी झेलना पड़ेगा। लेकिन कोई समस्या नहीं। दाना-पानी चलता है।
‘ पुलिस वाले पैसा नहीं माँगते यहाँ ठेलिया लगाने के?’ यह पूछने पर बताया साहेबलाल ने -‘ पैसा नहीं देते। लेकिन खिला-पिला देते हैं कभी-कभी।’
क्या खिलाते- पिलाते हैं यह नहीं पूछा हमने।
साहेबलाल की बात सुनकर हमको जबलपुर की पुलिया वाले रामफल याद आए। रामफल का भतीजा उनका ठेला पुलिया से बाज़ार ले जाता था। उसके लिए रामफल उसको पैसे देते थे।
साहेबलाल ने अपना बताया-‘ किसी का पैसा दबाकर नहीं रखते। जो कहा वो किया। कभी बात से मुकरे नहीं। मुकर जाएँ तो जबान का कोई भरोसा नहीं करेगा।’
हम फल लेकर घर चले आए यह सोचते हुए कि हर इंसान अपने आप में एक महाआख्यान होता है। हरेक की एक कहानी होती है। कुछ कहानियाँ कही जाती हैं, बाक़ी सब अनकही रह जाती हैं।

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