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Thursday, August 20, 2026
कुसंग का ज्वार भयानक होता है
कुसंग का ज्वार भयानक होता है। - आचार्य रामचंद्र शुक्ल
कल स्विमिंग पूल में तैरते हुए मुझे आचार्य शुक्ल का लिखा यह सूत्र वाक्य तब याद आया जब तैरते समय पैर पुराने अंदाज़ में चलते रहे।
स्विमिंग की शुरुआत हमने ‘गठबंधन स्ट्रोक’ से की थी। हाथ ब्रेस्ट स्ट्रोक स्टाइल में , पैर फ्री स्टाइल में। बाद में शुद्ध ब्रेस्ट स्ट्रोक की पार्टी ज्वाइन की। अभ्यास से हाथ का मूवमेंट ठीक हुआ। सर पानी के ऊपर आने लगा। साँस पानी के ऊपर लेने लगे। पानी में सांस छोड़ने लगे। लेकिन अभी भी बहक जाते हैं। एकाध बार ब्रेस्ट स्ट्रोक की मेढक स्टाइल में चलने के बाद फ्री स्टाइल में छप्प-छैयाँ करने लगते हैं। नतीजतन थोड़ी देर में पैर नीचे होते जाते हैं और कुछ देर में पानी में खड़े हो जाते हैं।
शुरुआत में फ्री स्टाइल में पैर चलाने की आदत ब्रेस्ट स्ट्रोक के लिए कुसंग की तरह लगी है। छूटती नहीं। इसी चक्कर में एक बार में लंबी दूरी तक तैरना नहीं हो पा रहा।
लगभग सभी कोच ने हमारी अभी तक की तैराकी देखकर हमको पास घोषित कर दिया है। यह कहते हुए कि बाक़ी स्टैमिना और सुधार अभ्यास से हो जाएगा। इतना सीख गए , बहुत है। प्रैक्टिस करेंगे आगे अपने आप सीखेंगे।
कोच द्वारा हमको पास घोषित करना मैं उसी तरह मानता हैं जैसे स्कूलों में नियम है कि छोटी क्लास में कोई बच्चा फेल नहीं किया जाएगा।
आजकल पैर की किक ठीक करने में लगे हैं। सबसे जरूरी है टाइमिंग। जब छोड़ने के बाद सर ऊपर उठे तो फ़ौरन सांस लेने के बाद सर पानी में डुबोकर हाथ आगे करके ग्लाइड करने के बाद पैर से किक करनी चाहिए। लेकिन हमारी किक हाथ के आगे होने के साथ ही हो जाती है। दोनों की टाइमिंग में गैप होना चाहिए। कभी हो जाता है। कभी नहीं होता। बल्कि ज़्यादा समय नहीं ही होता। इस चक्कर में ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाते। एक ही जगह कदमताल करके थोड़ा आगे बढ़कर खड़े हो जाते हैं।
आज की स्थिति है कि तैरने के सारे स्टेप्स सीख चुके हैं। अलग-अलग सब कर लेते हैं। लेकिन सबमें नियमित तालमेल का अभाव है। कभी हो जाता है, कभी नहीं हो पाता। सारे स्टेप्स लगता है हमसे मौज ले रहे हैं। देरी से तैराकी सीखने की सजा दे रहे हैं। सबके साथ के बिना तैराकी का विकास रुका हुआ है।
रोज़ अपनी कमियाँ नोट करके उसको दूर करने के वीडियो देखते हैं। पूल में अभ्यास भी करते हैं। जब कभी ठीक हो जाता है तो जो सुख मिलता है वह अनिर्वचनीय घराने का है। जब साँस लेने के लिए सर हाथ के मूवमेंट और पानी के दबाव के कारण तैरता हुआ ऊपर आता है तो लगता है ‘ उदित उदय गिरि मंच पर’ ऐसी ही किसी मुद्रा के लिए लिखा होगा तुलसीदास जी ने।
25 मीटर चौड़े पूल को शुरुआत में छह बार में तैर लेते थे। अब आसानी से चार बार में कर लेते हैं। इस तरह सूत्र में कहा जाये तो अपन सवा छह मीटर के तैराक हैं।
सोचा था कि इसी महीने पूल की चौड़ाई एक बार में पार कर लेंगे। लेकिन लगता है कि अभी और समय लगेगा। पूल भी इसी हफ़्ते चार दिन बाद बंद हो जाएगा। इसके बाद किसी और पूल में सीखेंगे। चार दिन में कितना सीखते हैं यह आगे पता चलेगा।
फिलहाल यह अपने में सुकून देह है कि तैरना सीख लिए।
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तैराकी
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