Saturday, August 08, 2026

उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो


 आजकल स्वीमिंग पूल में एक सज्जन रोज मिलते हैं। हमसे पहले वाले बैच में आते हैं। हमारे पूल में उतरते समय वे तैराकी करके वापस जा रहे होते हैं। कपड़े पहनते दिखते हैं।

उन सज्जन के दोनों पैर पोलियोग्रस्त हैं। बैसाखी लेकर चलते हैं। पैरों को हाथ से उठाकर जिस तरह से शार्ट्स के अंदर करते हैं उससे लगता है कि दोनों पैर पोलियो से बुरी तरह ग्रस्त हैं।
तैरने में पैरों की बड़ी भूमिका होती है। बिना स्वस्थ पैरों के कैसे तैरते होंगे यह मेरे लिए कौतूहल का विषय है। मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि वे फ्लोटिंग करते हैं। ब्रेस्ट स्ट्रोक। बहुत दिनों से कर रहे हैं स्वीमिंग। आराम से तैरते हैं। उनकी हिम्मत और लगन की मन ही मन दाद देते हुए उनको सलाम करता हूँ।
हमारा तैरने का अभ्यास जारी है। अब तैरते हुए सर पानी के बाहर इतना उठ जाता है कि साँस ले सकें। सर पानी के ऊपर उठाने के पहले साँस पानी के अंदर छोड़ना भी आ गया। लेकिन पानी के ऊपर सर उठाकर साँस लेने में कभी-कभी गड़बड़ हो जाती है। गड़बड़ यह कि जितने समय सर ऊपर रहा उतने समय में साँस न ले पाये तो लफड़ा हो जाता है। साँस कम हो जाती है, कुछ देर में रुकना पड़ता है।
तैरते हुए साँस का गणित भी गृहस्थी की तरह होता है। जितनी आमदनी उतने में खर्च चलाना होता है। पानी के अंदर सांस छोड़ना मतलब खर्च करने जैसा है। सर ऊपर करके साँस लेने आमदनी जैसा। आमदनी और खर्च में संतुलन जरूरी होता है। ऐसा नहीं कि खर्चा ज़्यादा कर दिया और कमाई कम हुई। पानी में सांस की कोई उधारी नहीं चलती। कोई क्रेडिट कार्ड नहीं चलता कि अभी खर्च कर लो फिर किस्तों में चुकाते रहें।
पानी में सांस का हिसाब राहत इंदौरी के शेर जैसा होता है :
"उँगलियाँ यूँ न सब पर उठाया करो
खर्च करने से पहले कमाया करो।"
साँस छोड़ने के पहले साँस लेना जरूरी होता है। हमारे साथ के कई लोग तसल्ली से ब्रेस्ट स्ट्रोक करते हैं। उनको देखकर हम भी सोचते हैं यह तो बड़ा आसान है। लेकिन करते समय कभी कुछ भूल जाता है, कभी कुछ।
साँस लेना सीखने के बाद 'किक' पर काम करना है। पैर सही समय पर मेढक की तरह चलने लगें तब स्वीमिंग का पाठ पूरा हो जाएगा। अभी एक-दो किक तो ठीक चलते हैं। इसके बाद पांव बहक जाते हैं। पैर और पंजे साइड में मेढ़क तरह चलने की बजाय ऊपर-नीचे, छप्प-छैयाँ स्टाइल में चलने लगते हैं। इसके पीछे शुरुआती अभ्यास का हाथ है। आदतें देर से जाती हैं।
आज कोच ने हमारी प्रगति देखकर कहा -'चलिए आपको डीप में ले चलते हैं।'डीप मतलब 14 फीट गहराई।हमने कहा -'डीप में हम ख़ुद जाएँगे। जब सीख जाएँगे।जल्द ही जाएँगे। '
ठीक कहा न?

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