पिछले हफ़्ते अख़बार में ख़बर पढ़ी -‘ चीन में बेरोजगार जेन-जी पैसे देकर कर रहे हैं नौकरी का नाटक।’
सामाजिक दबाब और काम का अभ्यास बना रहे इस लिए चीन में बेरोजगार युवा पैसे देकर ऐसे ऑफिस या ऑफिस जैसा दिखने वाली जगहों में जाते हैं। इसके लिए वे कंपनियों को 350 से 600 रुपये प्रतिदिन तक भुगतान भी करते हैं।
पैसे देकर नौकरी का भ्रम बनाते रखने के कारण यह हैं :
-घर पर दिन नहीं बिताना चाहते
-ऑफिस जाने का रूटीन बना रहता है
-दूसरों के बीच अकेलापन कम होता है
-नौकरी के लिए आवेदन करते हैं
-स्टार्ट अप या फ्रीलांस काम कर रहे हैं
-कंप्यूटर -इंटरनेट का इस्तेमाल
मतलब इज़्ज़त से बेरोजगार बने रहे के लिए भी पैसा चाहिए।
सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए घर से बाहर रहने के उदाहरण तो भारतीय समाज में भी मिलते हैं। आयुध निर्माणियों में कुछ लोग जब सस्पेंड होते थे तो घर से समय पर निकलते थे। शाम को समय पर घर जाते थे। घर में बताते नहीं थे कि सस्पेंड हुए हैं। भले ही बाद में कोई दूसरा बता देता था या जब महीने के आख़िर में तनख़्वाह आधी मिलती होगी तब घर वाले पूछते हींगे तो बता देते होंगे।
नेट पर इस बारे में खोजने पर पता चला कि इस तरह काम करने वाले बेरोजगार दफ़्तर में काम करने की हरकते करते हैं। फ़ाइल में डूबे रहना। फ़ाइल लेकर झटके से कहीं चल देना। किसी से कुछ डिस्कस करने लगना। शायद बॉस की एक्टिंग करने वाले के लिए ऐसे इंसान की सुविधा भी मिलती हो जिसको वो फटकार भी सकते हों।
भारत में लोगों के क्या करते हो के सवाल से बचने से के लिए लाइब्रेरी स्टडी कैफ़े का चलन बढ़ा है। जापान में भी स्टडी रूम और कैसे वर्क का चलन बढ़ा है। अमेरिका और यूरोप में को वर्किंग स्पेश और को वर्किंग कैफ़े का चलन है।
लेकिन यह सब चीन जैसा पैसे देकर रोजगार का नाटक करने से अलग है।
कोई बहुत व्यस्त दिखे तो हमे लगता है कि वह काम से ज़्यादा काम का नाटक कर रहा। क्या पता दिन में अठारह-बीस घंटे काम करने वाले लोग भी इसी तरह काम से ज्यादा काम का नाटक करते हों।
शाहजहांपुर में हम लोग मजाक में अपने दोस्तों से कहते थे -‘ क्या बात है ? बहुत बिजी दिख रहे हो, कोई काम-धाम नहीं है क्या?’
आपका क्या कहना है इस बारे में ?

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