आजकल 'लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे' बारे में रोज खबरें आ रहीं हैं। आज यहाँ उखड़ गई। कल वहाँ टूट गई। बड़ी बदनामी हो रही है सड़क की।
आजकल सरकारें अपने हर कदम को मास्टरस्ट्रोक बताती हैं। कभी जिन बातों को निकृष्ट समझा जाता था अब वे मास्टर स्ट्रोक माने जाते हैं।
सड़क कई जगह टूटी है। रोज़ टूट रही है। लेकिन इसके मास्टर स्ट्रोक होने से कोई इंकार नहीं कर सकता। सबको आपदा में अवसर देखना आना चाहिए। सड़क टूटने के उजले पहलू देखने चाहिए।
सबसे बड़ा उजला पहलू सड़क की मरम्मत से उपजा रोजगार है। रोज़ सड़क टूट रही है। रोज़ बन रही है। मरम्मत के काम में दिहाड़ी मजदूर लगाए जायेंगे। उनको रोजगार मिल रहा है। सड़क जितने दिन टूटती-बनती रहेगी उतने दिन मजदूरों का रोजगार सुनिश्चित रहेगा। मरम्मत का खर्चा सड़क बनाने वाली कंपनी देगी। सरकार बिना अपनी तरफ़ से कुछ ख़र्च किए मज़दूरों का रोज़गार सुनिश्चित कर रही है। यह सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक है।
लखनऊ का इमामबाड़ा नवाब आसफ-उद-दौला ने अकाल राहत कार्य के तहत बनवाया था।यहाँ आम मजदूर दिन में दीवारें बनाते थे, और अमीर वर्ग के लोग रात के अंधेरे में गुपचुप तरीके से उस निर्माण को गिरा देते थे। करीब 20 -22 हज़ार लोगों को रोज़गार मिलता था। इस अर्थ में लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे आधुनिक इमामबाड़ा है।
सड़क बनाने में 4700 करोड़ रुपये खर्च हुए। इस शानदार काम को अगर भ्रष्टाचार माना जाये (जैसा कुछ लोग कह रहे हैं, ज़्यादा लोग मान रहे हैं) तो इसका एक उजला पहलू यह भी इससे कम के भ्रष्टाचार को भाव नहीं देना चाहिए।
कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस वे को भ्रष्टाचार के आरोपों से हलकान देखकर जेवर एयरपोर्ट इसके समर्थन में आकर खड़ा हो गया। पता चला कि बारिश में जेवर एयरपोर्ट के पार्किंग एरिया में पानी भर गया। सीढ़ियाँ डूब गईं। जेवर एक्सप्रेस वे के निर्माण में 11200 करोड़ रुपए खर्च हुए। जेवर एक्सप्रेस के पानी में डूबने की खबर को 'कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेस वे' के प्रति नैतिक समर्थन माना जा सकता है। मानो जेवर एक्सप्रेस वे ने घोषणा करके कहा है -' 4700 करोड़ की सड़क के पीछे क्यों पड़े हो हमारे बारे में बात करो हम पर 11200 करोड़ रुपए खर्च हैं।'
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे के कई जगह टूटने की खबर को पढ़कर हमारे एक मित्र, जो कि हमेशा बेवक़ूफ़ी की बातें करते रहते हैं, ने सुझाव दिया -' इस एक्सप्रेस वे का नाम रणक्षेत्र में घायल होने वाले वीर नायक के नाम पर रख दिया जाना चाहिए। सड़क का टूटना उस वीर के युद्ध में लगने वाले घाव की तरह हैं।'
हमारे दूसरे मित्र ने इस बेवक़ूफ़ी के सुझाव की डपटते हुए ख़ारिज कर दिया। कहा -' शौर्य के लिए प्रसिद्ध वीर पुरुष के नाम को शर्मिंदगी की हरकत से जोड़ना ठीक नहीं।'
बेवक़ूफ़ी की बातें करने वाले मित्र सहमकर सर झुकाकर अमेरिका, यूरोप के एयरपोर्ट बरसात में डूबने की खबरें तलाशने लगें ताकि उनको दिखाकर दावा कर सकें -" विकसित देशों में भी एयरपोर्ट डूबते हैं। हमारा जेवर एयरपोर्ट भी डूबा। यह हमारे विकसित होने का प्रमाण है।"
सर झुकाये-झुकाये उन्होंने एक और बेवकूफ़ी का सुझाव उछाल दिया -'जेवर एयरपोर्ट को पानी में डुबोने वाले बादलों यहाँ छापा मरवा कर उसका सारा पानी जब्त कर लिया जाये।'
इस पर समझदार मित्र ने क्या कहा होगा आप इसका अनुमान ख़ुद लगा सकते हैं। सुना है कि वे अकेले में किसी से कहते पाए गए -" लखनऊ की नज़ाकत मशहूर है। इससे जुड़ने वाले एक्सप्रेस वे का नाजुक होना लाजिमी है। 'लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस वे' लखनऊ की तहजीब का शानदार नमूना है।"
आपका क्या कहना है इस बारे में?

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