Thursday, August 27, 2026

मैं इस उम्मीद में डूबा कि वो बचा लेगा

 मैं इस उम्मीद में डूबा कि वो बचा लेगा,

अब इसके बाद मेरा इम्तहान क्या लेगा?
वसीम बरेलवी जी का यह शेर कल तब याद आया जब कोच हितेश ने मुझे पानी में कूदने को कहा। जहाँ से कूदने को कहा वहाँ पानी हमने ऊँचाई से क़रीब दो गुना होगी।
कल दायाँ कंधा भी कुछ दर्द कर रहा था। आधी चौड़ाई तैरने में ही ठहर जा रहे थे। लगा कहीं दर्द बढ़ न जाये। लेकिन तैरते रहे आहिस्ते-आहिस्ते।
ऐसे में कोच ने गहरे ने कूदने को कहा तो मैंने मना किया। यह सोचकर कि कहीं उखड़ न जाए। लेकिन हितेश ने दुबारा कहा यह कहते हुए -‘ आप चिंता न करें। कंधे को कुछ नहीं होगा। मैं हूँ न।’
मैंने कहा मैं कूदूँगा लेकिन पहले चौड़ाई एक बार में पार कर लें। पूल बंद होने के पहले कूदूँगा। इस पर हितेश ने कहा -‘ आप जम्प करिए। मैं पूल आज से बंद करवा दूंगा।’
इसके बाद हम कूदने की जगह पर जाकर खड़े हो गए। हितेश भी पानी में उतर गए। थ्री, टू, वन हुआ। वन के बाद भी थोड़ा झिझके कि न कूदें। लेकिन फिर कूद ही गए पानी में। छपाक से।
कूदने पर चारो तरफ़ पानी ही पानी। हम पानी में पाँव चलाने लगे। हाथ भी। लेकिन सर पानी के अंदर ही रहा। सर पानी के अंदर रहने के कारण सांस नहीं ले पाये। जो जमा थी उसी से काम चलाते हुए हाथ-पांव मारते रहे। क़रीब चौथाई मिनट के बाद जमा साँस खर्च हो गई। हमने हाथ ऊपर किया। बग़ल में चल रहे हितेश ने मेरा हाथ पकड़ कर किनारे कर दिया।
बाद में कूदने का वीडियो देखा। पाँव ठीक से नहीं चल रहे थे। हाथ भी उस तरह नहीं कि सर ऊपर उठ सके।
एक बार गहरे में कूदने का अनुष्ठान हो गया। अब जल्दी ही फिर कूदेंगे। रोज़ कूदेंगे। बस चौड़ाई तैरकर पार करने लगें।
ऊपर वसीम बरेलवी का शेर लिख तो दिया। लेकिन हमारे लिए इसमें ‘डूबा’ की जगह ‘कूदा’ होना चाहिए।
वैसे नामी शायर का शेर तो प्रभाव जमाने के लिए लिखा। सच ने यहाँ मेरी ख़ुद की तुकबंदी ज़्यादा मुफ़ीद बैठती है जिसकी शुरुआत इस तरह है :
“मेढक ने पानी में कूदा-छपाक”
यह तुकबंदी और इससे जुड़ा क़िस्सा टिप्पणी में दी लिंक में पढ़ सकते हैं।
पानी में कूदने का वीडियो Shivam के सौजन्य से। शिवम भी पूल में लोगों को तैरना सिखाते हैं।
वीडियो में हितेश मेरे पानी में कूदने के बाद मेरे साथ , बगल में चलते दिख रहे हैं।

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