Monday, August 24, 2026

कौनौ नौकरी होय तौ बताओ दादा


 स्विमिंग पूल से लौटते हुए रास्ते में दिहाड़ी मजदूर मिलते हैं। काम की तलाश में खड़े। साइकिल रोककर अक्सर उनसे बतियाने लगते हैं। अक्सर मुलाक़ात होती है तो चेहरे पहचाने लगते हैं। नाम नहीं पूछा।

पहले दिन साइकिल रोकी तो कई लोग लपकते हुए आए। पूछने लगे -‘ काम के लिए मजदूर चाहिए ? क्या काम है?’
हमने बताया कि मजदूर नहीं चाहिए। हम स्विमिंग पूल से लौट रहे हैं।
लोगों को कौतूहल हुआ। पूछने लगे -‘ कित्ता बड़ा है? कित्ते पैसे पड़ते हैं? हमको भी जाने को मिल सकता है क्या ?’
हमने बताया। आसपास के शहरों/गांवों के लोग हैं। बोली जानी-पहचानी। उनकी ही बोली में बतियाने से और अनौपचारिकता हो गई। एकाध ने साइकिल की घंटी, लाइट छूना शुरू किया। उनके से कुछ छुवन ‘ बैड टच घराने ‘ की भी थी। एक ने बिजली वाली घंटी खोल ली हैंडल से। कहा -‘ ये कैमरा है?’
हमने बताया -‘ कैमरा नहीं ये घंटी है। बिजली से चार्ज होती है’
दूसरे ने उसे डपटा तो उसने घंटी वापस लगा दी साइकिल में।
कुछ और लोग आ गए वहाँ। एक आदमी सलमान ख़ान स्टाइल में चश्मा कई तरह से लगाते हुए पोज दे रहा था। घनी दाढ़ी वाले उस आदमी को लोगों ने बताया -‘ इसका नाम परमाणु बम है। जब फटता है तो तबाही मच जाती है।’ वह आदमी हंसते हुए इधर-उधर चला गया।
अगले दिन रुके तो एक नौजवान लपकता हुआ आया। पूछा -‘ दादा , नहा आए ? कैसा रहा आज का दिन ?’
हमने कहा -‘ हम नहाने नहीं तैरना सीखने आते हैं। सीख रहे हैं।’
बगल में खड़े दूसरे आदमी ने स्विमिंग पूल और हमारी तैराकी को ख़ारिज करते हुए अपने गांव के तालाब और फिर नदी में तैरने के किस्से बताये। कहा -‘ यहाँ से पानी में उतरते थे वहाँ निकलते थे।’ यहाँ से वहाँ तक की दूरी उसने हाथ के इशारे से बताई। आप अपने हिसाब से अनुमान कर लें।
काम के बारे में बात होने पर कुछ लोगों ने कहा -‘ काम नहीं मिला आज अभी। कल भी नहीं मिला था। त्योहार आने वाला है। खर्च का जुगाड़ समझ नहीं आ रहा। कमाई का कोई ठिकाना नहीं।’
एक ने कहा -‘ कौनौ नौकरी होय तौ बताओ दादा।’
नौकरी के लिए तो तमाम लोग कहते हैं। हम कहाँ से बता दें ?
इस बीच एक ऑटो वहाँ आता है। उसमें नाश्ते के पैकेट हैं। ऑटो में बैठे लोग बाँटने लगते हैं। मज़दूर लोग लपक कर पैकेट लेते हैं। कुछ लोग फ़ौरन खाने लगते हैं। कुछ सहेज लेते हैं।
नाश्ता बाँटने वाली संस्था का नाम Hunger free world है। नियमित कई जगह नाश्ता बाँटती है। बदल-बदल कर। नेट खोजने पर पता चलता है मलाबार ग्रुप (केरल) की संस्था है। दुनिया में भूखे, बेसहारा लोगों के लिए खाना पहुँचाने का प्रयास करती है। भारत के 70 प्रमुख शहरों में प्रतिदिन 50000 से 60000 लोगों को भोजन उपलब्ध कराती है यह संस्था।
लोगों ने यह भी बताया कि स्थानीय विधायक भी खाना बँटवाते हैं।
पास ही सड़क के बीच डिवाइडर पर कुछ लोग चूल्हे जलाए खाना बनाते भी दिखे। उनको शायद मुफ्त खाना पसंद नही आता।
काम की तलाश में कुछ महिलायें भी बैठी दिखीं। बतियाते हुए काम का इंतज़ार। बारिश के कारण भी काम कम हो गया है।
अपने-अपने शहरों से दूर काम की तलाश में आए लोगों की बातचीत में देश-दुनिया में छाये तमाम मुद्दों और राजनीति की कोई चर्चा नहीं सुनी। काम की तलाश उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा है। भूख का इलाज सबसे बड़ी चुनौती।

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