कल एक मित्र से मिलने गए। करीब 7 किलोमीटर की दूरी उबर कैब से 20 मिनट में तय की। 110 रुपए किराया। ड्राइवर चेहरे से नेपाली लग रहे थे। लेकिन थे नहीं। नेपाली लगने के पीछे कोई कारण नहीं। लेकिन हाल में नेपाल में बवाल हुआ है तो उसका ख्याल मन रहा होगा। वैसे भी नेपाल में हुए बवाल के बाद तमाम लोग 'नेपाल विशेषज्ञ' हो गए हैं।
दोस्त दफ़्तर में मिले नहीं। हम बिना बताये आए थे। वे निकल गए थे। फ़ोन किया तो बोले -"पता होगा तो रहते दफ़्तर में।"
हमने कहा -"कोई बात नहीं, फिर मिलेंगे।"
मित्र को सरप्राइज देने के लिए सोचकर गए, लेकिन हमको ही सरप्राइज मिल गया।
लौटते समय पैदल आए। रास्ते में तेजी से आती गाड़ियाँ। हर गाड़ी को देखकर लगता कि इसको हमें कुचलने की सुपारी मिली है। जितनी जगह में साइकिल वाला भी निकलने के पहले सोचे, उतने में टेढ़े-मेढ़े होकर मोटर साइकिल वाले फर्राटे से निकले जा रहे थे।
सड़क किनारे तमाम ऑटो वाले लाइन में सवारियों के इंतज़ार में मोबाइल देख रहे थे। मोबाइल ने दुनिया को टाइम समय बिताने का ऐसा औजार थमाया है कि इंसान समय निकालकर, समय काटने के लिए, इसमें घुसा रहता है।
जगह-जगह तरह-तरह का सामान बेचने वाले खड़े थे। फोर्टिस अस्पताल के पास सड़क किनारे कई खस्ता-कचौड़ी वाले साइकिलों पर अपनी दुकान सजाये हुए थे। किसी पर जय श्रीराम का बोर्ड लगा था , किसी पर शिवा की मशहूर खस्ता कचौड़ी लिखा था। शैव और वैष्णव संप्रदाय में लड़ाई, युद्ध के किस्से सुने हैं। लेकिन शायद खाये-पिए लोग रहे होंगे। यहाँ दोनों सम्प्रदायों के आराध्य के बोर्ड वाले बच्चे पेट भरने के खस्ता-कचौड़ी बेंच रहे थे।
उधार देने से मना करने के लिए कभी 'उधार प्रेम की कैंची है', 'आज नकद, कल उधार' वाक्य लोग दुकानों में लिखवाते थे। शिवा की कचौड़ी वाले बच्चे ने अपने बोर्ड पर लिख रखा था :
'नाजुक है ज़िन्दगी, परेशान है जमाना,
आपको उधार देकर हमें क्या कमाना।'
बोर्ड पर जमाना और कमाना के ऊपर बच्चे ने स्कैनर लगा रहा था। उससे पूछकर पूरा शेर नोट किया। उसने बताया कि यहां फोर्टिस अस्पताल और मेट्रो होने के चलते कचौड़ियाँ बिकती हैं। कई लोग खाते भी दिखे।
एक कचौड़ी वाले ने कचौड़ी के साथ दिए जाने वाले अचार की तारीफ़ में लिखा था :
"अचार एक जादू है, हमने दिया और आप गए।"
इस नारे को पढ़कर ठग्गू के लड्डू की कुल्फी का जुमला याद आया :
"बदनाम कुल्फी, खाते ही जेब और जुबान की गर्मी गायब।"
बदनाम कुल्फी की याद आते ही आगे कुछ कुल्फी वाले दिखे। एक ने अपनी कुल्फी की तारीफ में लिखा था :
"चाँद की तारीफ सितारों से पूछो,
कुल्फी कर (की) तारीफ़ खाने वालों से पूछो"
हमने बिना खाये ही क़ुल्फ़ी की तारीफ कर दी। आगे एक क़ुल्फ़ी वाले ने फिर उधार विरोधी नारा लिख रखा था :
"फूल है नाजुक, तंग है जमाना,
तुम्हें उधार देकर हमें क्या कमाना।"
दो उधार देने वाले पहली लाइन भले अलग बोलने लेकिन दोनों का इरादा एक ही है -"उधार नहीं देगें, चाहे जो हो जाये।"
रास्ता भले सीधा हो लेकिन बार-बार हम गूगल मैप में दूरी देख रहे थे। गूगल भी जरा -जरा देर में दूरी ट्रम्प टैरिफ की तरह घटा-बढ़ा रहा था। कभी 4.2 किलोमीटर, कभी 6.5 किलोमीटर, कभी 8.4 किलोमीटर। वह हमको गाड़ी समझ रहा था। उस हिसाब से जरा देर में पहुँचने का इशारा कर रहा था। हम सामने से आने वाले ट्रैफ़िक को देखते हुए सड़क के दायीं तरफ़ चल रहे थे। गूगल हमसे हर चौराहे पर मुड़ कर बायीं तरफ़ आने को कह रहा था। हम उसकी बात माने नहीं, सीधे चलते रहे।
हम सड़क पर सामने देखते चल रहे थे।एक मोटरसाइकिल वाला मेरे बगल से तेजी से गुज़रते हुए निकला। उसका हाथ मेरे हाथ से टकरा गया। मेरा मोबाइल और हाथ में पकड़ा चश्मा मेरे हाथ से छूटकर सड़क पर गिर गया। मेरे हाथ में मोबाइल और चश्मा एकदम सटे-सटे से थे। दोनों बेचारे सड़क पर गिरे तो क़रीब दो फुट दूर थे। गिरते हुए शायद चिल्लाए हों दोनों। लेकिन उनकी आवाज सुनाई नहीं दी मुझे। आजकल लोग अपने अलावा किसी की आवाज़ कहाँ सुनते हैं।
हमने मोबाइल और चश्मा दोनों को सड़क से उठाया। उनको झटका लगा था। अंदरूनी चोट भले लगी हो लेकिन कोई फ़्रैक्चर नहीं हुआ था। दोनों सहमे हुए थे। मेरे हाथ में आकर चुप बने रहे काफ़ी देर।
आगे एक ठेले पर "कानपुर के मशहूर स्पेशल सचिन गोलगप्पे" बिक रहे थे। सचिन के नाम से तेंदुलकर अपने आप जुड़ जाता है। कोई बाहरी देखे तो शायद पूछे -"क्रिकेट से रिटायर होने के बाद 'भारत रत्न' खिलाड़ी गोलगप्पे बेच रहा है।" आजकल हर बड़ा आदमी कुछ न कुछ बेचने के काम में लगा है। बल्कि आज बड़े होने का पैमाना ही यही हो चला है कि वह क्या-क्या बेच सकता है। जितना बड़ा सेलिंग एजेंट, उतना बाद आदमी। पिछले दिनों कपिल देव, सुनील गावस्कर पान मसाला बेंचते दिखते थे तो मन करता था -"यही काम बचा है आप लोगों के पास पेट पालने के लिए।"
कानपुर के स्पेशल गोलगप्पे वाले ने बताया कि वह कानपुर के भोगनीपुर का रहना वाला है। भोगनीपुर से हमको बचपन में पढ़ी कानपुर की तहसीलों के नाम याद आ गए। अब उनमें से कई तो बड़ी होकर जिला बन गई हैं।
रास्ते में तमाम बच्चे दिखे तो साइकिल, मोटर साइकिल कोई सामान डिलीवर करने को भागे जा रहे थे। इधर सामान डिलीवरी करने वाले लोग बेहिसाब बढ़ें है। तमाम नई उमर के बच्चे इस काम में जुटे हैं। सामान डिलीवर करने अस्थाई रोजगार का बड़ा जरिया बन गया है। ऐसा रोजगार जिसमें आगे चलकर उन्नति की गुंजाइश का पता नहीं।
रास्ते में तमाम लड़के-लड़कियां भी सामने से आते दिखे। शाम हो गई थी। लगभग सभी के चेहरों पर दिन भर के काम की थकान दिखी। चेहरे कुम्हलाए से। हो सकता है ऐसा मुझे इसलिए भी लग रहा हो कि गर्मी में चलते हुए थकान लग रही हो। लेकिन अब सोच रहे हैं तो यही लग रहा है कि बच्चे वाक़ई कुम्हलाये से थे।
घर पहुँचकर हमने बिस्तर पर पसरकर तमाम साँसे एकसाथ ले डाली। बाद में पता किया तो पता चला कि सारी साँसें सुकून, तसल्ली और आराम की थीं।
आपने कभी लीं हैं ये वाली सांसे?
https://www.facebook.com/share/p/1XZdwxkuAf/

No comments:
Post a Comment