Tuesday, September 23, 2025

हिंदी व्यंग्य का संक्रमण काल पर एक प्रतिक्रिया



 ( प्रेम जनमेजय जी की पोस्ट ( https://www.facebook.com/share/p/19ZnaVyHd2/ ) की प्रतिक्रिया स्वरूप लिखी पोस्ट। शब्द सीमा के चलते टिप्पणी उनकी पोस्ट पर जा नहीं पायी इसलिए इसे यहाँ पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं)

आदरणीय प्रेम जी,
आपने विस्तार से अपनी बात रखी । भाषा अपने आप में बहुत बड़ा हथियार होती है। भाषाई उपयोग के ज़रिए गांधी जी की हत्या को 'गांधी वध' बताकर उसको वीरता पूर्ण काम बता देते हैं। इजरायल, अमेरिका मिलकर फ़िलिस्तीन के लाखों निरपराध बच्चों, बूढ़ों ,महिलाओं बच्चों की हत्या को बेशर्मी से जायज ठहरा सकते हैं। आपने भी अपने लेख में गोलमोल भाषा में कई बातें कहीं। पोस्ट लिखते समय अपने पर संयम रखते हुए शालीन भाषा में असहमति का सम्मान, युवाओं के स्वर, आयोजन पर पुनर्विचार जैसे वाक्य लिखे लेकिन आपके 'मुँहदेखे समर्थन ' में आई टिप्पणियों के समर्थन में जवाब देते समय आपके मन के भाव खुलकर सामने आए जब आपने असहमति व्यक्त वालों को धृतराष्ट्र ( प्रताप सहगल जी की टिप्पणी पर आपकी प्रति टिप्पणी -निश्चित ही अनेक धृतराष्ट्रों को दृष्टि देगी) फ़ारूख़ अफ़रीदी जी की टिप्पणी ( गिद्धों की चर्चा करना भी यहाँ प्रासंगिक था । इस बार गिद्धों ने मुर्दों की बजाय ज़िंदा लोगों को नोचने का अक्षम्य अपराध और कुकृत्य किया । आपने ठीक लिखा कि आयोजन की अनुमति व्यक्ति नहीं संस्था की थी ।) की भाषा पर आपका कोई एतराज न होना बताता है कि इसपर आपकी मूक सहमति है। ये दोनों बातें आपने मन के सहज उद्गार की तरफ़ इशारा करते हैं।
आपने आयोजन का दायित्व लिया। कुछेक लोगों के विरोध के बावजूद आपने इसे पूरा करना ठीक समझा। अच्छा किया। हम लोग अपनी समझ और सुविधा के हिसाब से तर्क गढ़ना सीख जाते हैं। आपके भी तर्क होंगे इसको पूरा करने के। आयोजन सफल हुआ, आपने धन्यवाद दिया। यहाँ तक बात समझ में आती है।
लेकिन आप परसाई जी, जोशी जी का हवाला देकर क्या कहना चाहते थे वह आपने जो लिखा वह मैं समझ नहीं पाया। इतना गोलमोल आपने जानबूझकर लिखा है या अनजाने में यह समझ में नहीं आया मुझे। आप लोग परसाई जी से मिले हैं, परसाई पाठशाला की चर्चा करते हैं। लेकिन अपने किसी निर्णय के समर्थन में परसाई, जोशी का गोलमोल जिक्र करके जो लिखते हैं उससे लगता है आप अपने तर्क के प्रति आश्वस्त नहीं हैं।
परसाई जी संस्था और अवसर देखकर अपने स्टैंड नहीं बदलते थे। परसाई जी ने आपातकाल का समर्थन किया था। उसके पीछे उनके अपने तर्क थे। उन्होंने जो लिखा वो गोलमोल भाषा में नहीं लिखा। अपनी बात के समर्थन में जनता सरकार के समय में लिखे उनके लेख तीसरी आजादी का जांच कमीशन (तीन लेख) में जिस तीखे स्वर में उन्होंने जयप्रकाश नारायण जी , मोरार जी देसाई जी और अटल बिहारी बाजपेयी जी की खिंचाई की थी उसको पढ़कर लगता है की आज के समय में किसी भी सरकारी सहयोग की आकांक्षा रखें वाली कोई पत्रिका उनको अपने यहाँ फिर से प्रस्तुत नहीं कर सकती।
सचिव साहित्य अकादमी पर जो कुछ आरोप लगे। अदालत ने उन पर कुछ निर्णय लिए। उन पर दोष सिद्ध नहीं हुआ। इन सब तर्कों के आधार पर आपने आयोजन किया । ठीक किया। यहाँ तक ठीक। लेकिन जो लोग इसको ग़लत बताते हुए इससे असहमति व्यक्त कर रहे हैं उनकी समझ को धृतराष्ट्र बताना और उन लोगों की सोच को गिद्ध दृष्टि बताने वाली सोच को मूक सहमति देना आपकी कहाँ से उचित है प्रेम जी।
जहाँ तक यौन शोषण के मामले में अंतिम निर्णय आने वाली बात है (जैसा प्रताप सहगल जी ने लिखा और उस पर धृतराष्ट्र वाली टिप्पणी लिखी) तो अपने 36 साल के भारत सरकार के राजपत्रित अधिकारी के रूप में काम करने के अपने अनुभव के आधार पर कहना चाहता हूँ कि ऐसे मामलों में सारे निर्णय नियोक्ता अधिकारी की समझ, मूड, मंशा और आरोपी की सेटिंग और पहुँच, पीड़िता की जिद, पहुँच और उसको मिले सहयोग के हिसाब से होते हैं। कई केसों में वीडियो के साक्ष्य होने के बावजूद अधिकारी दोष मुक्त होते और पीड़िता को सांत्वना देने, समझाने की मंशा से कहे कुछ तीखे वाक्य को यौन अपराध मानकार उनको पीड़िता को समझाने वाले पर सजा होते देखा है। यह भी कि सरकारी विभागों में आमतौर पर खराब कार्य क्षमता के आधार पर लोगों के ख़िलाफ़ कार्यवाही होती है, प्रमोशन रुकते हैं, लोग बर्खास्त नहीं किए जाते जब तक की व्यक्तिगत दुश्मनी न हो।
इस तरह की घटनाओं पर स्टैंड तय करने समय दूर तक हानि-लाभ का हिसाब भी काम करता है। लोग देखते हैं कि संस्था का स्तर कैसा है? संस्था छोटी है या बड़ी? आगे कितना फ़ायदा नुकसान होगा? हम जैसे लोगों को जिनका ऐसी संस्थाओं से कोई संपर्क नहीं रहा, न यह पता कि इनसे कितना लाभ उठाया जा सकता है इनसे मिलने वाले लाभ-हानि की चिंता से मुक्त होकर कोई निर्णय लेना ज्यादा आसान है। लेकिन उन लोगों को जिनको ऐसी संस्थाओं से मिलने वाले किसी लाभ का अंदाज़ है, लाभ मिलते रहे हैं, उनकी आदत हो गई है, इनसे मुक्त होना मुश्किल है।
मैंने अपनी पोस्ट ( https://www.facebook.com/share/p/1CMtwM3rqX/ में इसी बात की तरफ़ इशारा किया था। कुछ दिन पहले एक महिला के साथ हुई घटना में आरोपी का पक्ष लेने वाले से नाराज होकर एक लेखक सम्मान प्रतियोगिता से अपनी किताब वापस ले लेता है क्योंकि वह आरोपी के समर्थन में पोस्ट लिखता है और उसी तरह की घटना पर बयान देकर (कि यह घटना पाँच साल पुरानी है) समारोह में शामिल होता है। इसके पीछे और किसी कारण के अलावा साहित्य अकादमी संस्था का बड़ा होना और उसके विरोध की स्थिति में आने वाले समय में होने वाले नुक़सान की आशंका का भी योगदान रहा होगा।
बातें और भी बहुत सारी हैं लेकिन उनको कहने से व्यक्तिगत आक्षेप होने का डर है इसलिए उनको लिखने से बचना चाहता हूँ। लेकिन जब आप लिखते हैं -"साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और सचिव का धन्यवाद कि उन्होंने हिंदी साहित्य की उपेक्षित विधा को अकादमी का मंच पुनः दिया।" इस टिप्पणी से ऐसा लगता है कि जैसे किसी व्यंग्य कोई दीन-हीन, छुई-मुई जीव है जिसे अकादमी के अध्यक्ष और सचिव ने कृपा करके उबार दिया। इससे यह भी लगता है कि आप इस उपेक्षित, दबे-कुचले बेचार व्यंग्य के गार्जियन और आधिकारिक प्रवक्ता हैं और उसके उद्धार के लिए अध्यक्ष और सचिव के आभारी हैं। साहित्य, कला की कोई भी विधा केवल आयोजनों, समारोहों से आगे बढ़ती होती तो सारी कलायें अमीरों के यहाँ पल्लवित, पुष्पित होती। व्यंग्य के एक पाठक के तौर पर आपकी ऐसी भाषा पर मेरा सख्त एतराज है।
एक बात और सोशल मीडिया की प्रवृत्ति के बारे में। आप बड़े-बुजुर्ग हैं। पुराने जमाने के लोग जब बड़े-बुजुर्गों की राय अंतिम होती थी। उनकी राय के ख़िलाफ़ कुछ बोलना धृष्टता माना जाता था। लेकिन सोशल मीडिया में मामला बराबरी का होता है। यह कभी-कभी क्या अक्सर ही बुजर्गों को नागवार गुजरता है। बुजुर्ग लोग इसका बुरा मान जाते हैं।
आपने पिछली जो पोस्ट लिखी थी वह पंकज चतुर्वेदी जी की पोस्ट की कॉपी थी। (https://www.facebook.com/share/p/1YtmtH9NjC/) पंकज चतुर्वदी जी ने अपनी पोस्ट डिलीट कर दी। लेकिन आपकी वाल पर वह पंकज चतुर्वेदी जी की कॉपी की हुई पोस्ट है। मैंने उस पर टिप्पणी करके आपसे सवाल पूछा था :
"पोस्ट को कॉपी करके अपनी वाल पर पेस्ट करना रोचक है। प्रेम जनमेजय जी ने इसे Pankaj Chaturvedi जी की वाल से कॉपी किया हुआ बताया है। लेकिन Pankaj Chaturvedi जी ने शायद यह पोस्ट हटा ली है। अब यह पोस्ट प्रेम जनमेजय जी की मानी जायेगी कि Pankaj Chaturvedi जी की? अब अगर इस पोस्ट पर कोई बवाल होता है तो वह प्रेम जनमेजय जी के खाते में जाएगा या फिर Pankaj Chaturvedi जी के खाते में। Pankaj Chaturvedi जी के खाते में जाने की बात कहें तो कौन Pankaj Chaturvedi क्योंकि लिंक हट चुका है और Pankaj Chaturvedi कई हैं फेसबुक पर।"
आपने न मेरी टिप्पणी का कोई जवाब दिया और न ही अपनी पोस्ट से पंकज चतुर्वेदी का नाम हटाया। 'परसाई की पाठशाला' चलाने और परसाई जी के उद्धरण/उदाहरण पेश करने वालों को पता होना चाहिए कि यह कहीं से परसाई परंपरा में नहीं आता। परसाई जी अपनी बात कहने के लिए किसी दूसरे का सहारा नहीं लेते थे । न ही चूक की तरफ़ इशारा किए जाने पर चुप्पी साध जाते। आपका यह अंदाज यह परसाई जी की परंपरा का मखौल है।
बात बहुत लंबी हो गई। टिप्पणी में शब्द सीमा के कारण इसे वहाँ पोस्ट नही किया जाता इसलिए आपकी पोस्ट के साथ इसे साझा कर रहा हूँ।
मैं आपसे एक बार साफ़ कहना चाहता हूँ कि आपने अपने तर्क और अपनी जिस किसी भी वाध्यताओं के चलते कार्यक्रम का सफल आयोजन किया वहाँ तक बात ठीक है। उसके लिए आपको बधाई। मैंने इसको ठीक नहीं समझा इसलिए नहीं आया। यह कोई ऐसा बड़ा वीरता पूर्ण काम नहीं है कि मैं उसकी ढींग हाकूँ। लेकिन जिस अंदाज़ में आपने इसको अपनी बातों को गोलमोल तरीके से परसाई/जोशी जी के बहाने सही ठहराने की कोशिश की वह ठीक नहीं लगा मुझे इसलिए मैंने यह सब लिखा।
आपका व्यंग्य में बहुत योगदान है। 'राजधानी में गँवार' लेख से लेकर 'व्यंग्य यात्रा' की यात्रा के अनेक पड़ाव हैं। लेकिन इनके चलते आपने व्यंग्य के लिए जितना कुछ किया है उससे कहीं अधिक आपने अपने लिए हासिल भी किया होगा। व्यंग्य को समृद्ध करने के जितने श्रेय और तारीफ़ लोग आपकी खुले में करते हैं उससे कम चर्चा उन गड़बड़ियों की नहीं होती जो इस 'व्यंग्य समृद्धि यात्रा' के दौरान आपसे जानबूझकर या अनजाने में हुईं। उनका अंदाजा आपको भी होगा लेकिन उनको स्वीकारने का साहस परसाई जी जैसे बिरले लोगों को ही होता है जो राज्य सभा की सदस्यता के प्रयास में असफल होने पर लिख सकें -"लाभ जब थूकता है तो उसे हथेली पर लेना पड़ता है।"
ये मेरे स्वतः स्फूर्त विवार हैं। इनके पीछे आपके प्रति कोई द्वेष का भाव नहीं है। आपके प्रति सम्मान का भाव है। सम्मान एक बुजुर्ग होने के नाते और एक वरिष्ठ व्यंग्यकार और उससे अधिक एक मेहनती संपादक के नाते हैं। आपके काम से से अधिक आपकी बात को ग़लत और गोलमोल तरीक़े से जायज़ ठहराने की कोशिश के प्रतिकिया स्वरूप टिप्पणी है यह। इससे अधिक और कुछ नहीं। कोई बात बुरी लगे तो माफ करियेगा।
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#Vyangykaar Ghanero

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