Thursday, September 25, 2025

लखनऊ पुस्तक मेले में



 "पुस्तक मेले हम शाम को जाते हैं "- हॉस्टल की तरफ़ जाते हुए बच्ची ने कहा।

विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन की लिफ्ट से उतरकर आते समय मिली बच्ची से बातचीत करते हुए आए। बच्ची बीकॉम में पढ़ती है। बस्ती की रहने वाली है। हॉस्टल में रहती है।
हमने पूछा -"साल भर में कितना क्लास बंक करती हो?"
"हम क्लास बंक नहीं करते। आज शहर में दीदी से मिलने आए थे। इसलिए क्लास छोड़ दी।"- बच्ची ने सहज भाव से बताया।
हमने बताया -"क्लास बंक नहीं की तो कॉलेज लाइफ का मजा क्या? हम तो खूब बंक करते थे क्लास।"
बच्ची ने बताया कि हॉस्टल में ठीक मिलता है। साल में 29000/- हॉस्टल फीस है। मतलब क़रीब 2500/- महीना। लगभग 100/- रोज़।
लखनऊ विश्वविद्यालय के पहले नवोदय स्कूल में पढ़ाई की है। हॉस्टल में रहने का अभ्यास है। अच्छा लगता है।
लखनऊ विश्वविद्यालय कैम्पस में अंदर आने के लिए जगह लोहे के जंगले जैसे लगे हुए हैं। ऐसा लगता है कि पूरा इंतजाम किया गया है कि कोई घुस न जाये।
अंदर आते समय एक जगह क्लास रूम बाहर से देखा। अध्यापिका खड़े-खड़े किताब से पढ़कर बच्चों को कुछ पढ़ा लिखा रही थीं।
मेले में जाने के पहले हिंदी भाषा विभाग में अध्यापक डॉ मेडूसा से मिलने गए। डॉ मेडूसा प्रसिद्ध यूट्यूब ब्लॉगर हैं। दुखदर्शन नामक चैनल के माध्यम से व्यंग्यात्मक टिप्पणी करती हैं। (डॉ मेडूसा के वीडियो का लिंक टिप्पणी में। पोस्ट यहाँ पढ़ सकते हैं -https://www.facebook.com/share/p/173BMNmUG2/)
डॉ मेडूसा के क्लासरूम के बाहर बच्चे उनका इंतज़ार कर रहे थे। हम पहुँचे तो बच्चों ने मुझे अध्यापक समझकर नमस्ते किया। हमने उनका नमस्ते वापस करते हुए बताया कि हम अध्यापक नहीं हैं। हम उनकी अध्यापक से मिलने आए हैं।
हमने बच्चों से डॉ मेडूसा के बारे में पूछा तो पता चला कि बच्चे जानते नहीं थे कि उनकी टीचर प्रसिद्ध यूट्यूबर हैं। बताने पर बच्चों ने युडट्यूब खोला और देखकर बोले -"अबे यार, ये तो सही में अपनी मैडम हैं। इनके 76000 सब्सक्राइबर हैं।" बच्चों ने फटाफट उनका चैनल सब्सक्राइब किया।
कुछ देर इंतजार के बाद पता चला कि मैडम सुबह आईं थीं। उनके यहाँ किसी की मृत्यु हो जाने के कारण वापस चली गयीं हैं। मुलाक़ात नहीं हो पायेगी। हम मेले आ गए।
मेले में किताबें देखीं। कई किताबें ख़रीदीं। दिनकर पुस्तकालय दिनकर पुस्तकालय का जिक्र Praveen Jha प्रवीण झा की पोस्ट में पढ़ते थे। कई किताबें ख़रीदी वहाँ से। इनमे भगतसिंह की जेल डायरी, अनरेंस्ट हेमिंग्वे की आर्म्स एंड द में का हिन्दी अनुवाद, शंकर की चौरंगी, लोहिया के भारत विभाजन के गुनहगार थी।
बात करने पर दिनकर पुस्तकालय वालों ने बताया कि उनके संस्थापना में डॉ प्रवीण झा और Divya Prakash Dubey का बड़ा सहयोग है। उन्होने लोगों को पुस्तकालय के बारे में बताया। दुकान में घूमने पर Ashok Pande की किताबों का सेट दिखा। उसमें उनका अरविंग स्टोन लिखित वान गॉग की जीवनी 'लस्ट फॉर लाइफ' का हिन्दी अनुवाद भी था। यह किताब मेरे पास नहीं थी। मैंने ख़रीदी। फोटो अशोक पांडेय को भेजा। वो ख़ुश हो गए। लेखक को अपनी किताब पढ़ी जाते हुए देखकर मिलने वाली ख़ुशी से बड़ी कोई ख़ुशी नहीं होती।
बाद में किताब की भमिका पढ़ते हुए पता चला कि 570 पेज की इस किताब का अनुवाद अशोक पांडेय ने मात्र 19 दिन में किया था। जुनूनी लोग ही ऐसा काम कर सकते हैं। ग़ज़ब की बात। अशोक पांडेय जैसे बीहड़ जुनूनी कम ही हैं किसी भी समाज में।
पुस्तक मेले में बड़े प्रकाशकों के स्टॉल कम हैं। छोटे-छोटे प्रकाशक आए हैं। बिक्री बहुत नहीं है। साथ हज़ार रुपए दस दिन का किराया। लोगों तक दुकान का नाम पहुंचे इसलिए लगाए हुए हैं दुकान।
बाद में मेले में मिले K.k. Asthana जी के व्यंग्य संग्रह 'फटी जींस का चिंतन' ख़रीदने अद्विग प्रकाशन गए तो वहाँ मौजूद जोया ख़ान ने और भी कई किताबें ख़रीदवा दी। किताबों के साथ फोटो भी ली अपने यहाँ लगाने के लिए। हमने वहीं रखी Alankar Rastogi की किताब 'पंडित भया न कोय' (जो हम पहले ही खरीद चुके थे दिल्ली पुस्तक मेले में) भी साथ में उठा कर फ़ोटो खिंचाई। बाद में पता Swati Choudhary की अनुवादित किताब मनमोहन रे खरीदने फिर आए अद्विक प्रकाशन पर Advik Publisher । फिर कई फ़ोटो में शामिल हुए।
'अनुवाद में तकनीक का दख़ल' में कार्यक्रम Samiksha Telang शामिल थीं बातचीत में। साथ में सुभाष नीरव, डॉ राजेन्द्र प्रसाद मिश्र और प्रितपाल कौर (समन्वयक) थे। अनुवादकों ने बताया कि तकनीक से सहयोग भले मिल जाये लेकिन तकनीक पूर्ण सक्षम नहीं है अनुवाद में। समीक्षा ने बताया कि वो अनुवाद में तकनीक का बिल्कुल उपयोग नहीं करती हैं। मूल का भावानुवाद करती हैं।
समीक्षा ने मराठी से हिंदी अनुवाद का मशीनी अनुवाद और अपने द्वारा किए भावानुवाद का उदाहरण पेश करते हुए मशीनी अनुवाद की वर्तमान सीमाओं के बारे में जानकारी दी।
सबसे खटकने वाली बात श्रोताओं का अभाव था। चार वक्ता को सुनने वाले श्रोताओं की संख्या दो अंकों में भी नहीं थी। मेले का आयोजन करने वाली संस्थाओं को श्रोताओ का इंतजाम करने वाले हमारे प्रस्ताव पर ध्यान देना चाहिए। बातचीत का समय निर्धारित करने वालों को भी सोचना चाहिए कि भरी दोपहरी में डेढ़ बजे अपने आप श्रोता कैसे आयेंगे।
बातचीत के बाद हम भी वीआईपी लाउंज में एसी की हवा में घुस गए। वहाँ वक्ताओं के लिए लंच और बाकी लोगों के चाय का इंतज़ाम था।
लंच के बाद वाले सत्र में 'स्त्री अस्मिता के प्रश्न' पर चर्चा हुई। डॉ रजनी गुप्त, विवेक मिश्र, Kanchan Singh Chouhan , डॉ Swati Choudhary और केतकी (समन्वयक) ने स्त्री अस्मिता से जुड़े सवालों पर चर्चा की। सभी का मानना था कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना स्त्री स्वतंत्रता के लिए जरूरी सहयोगी उपाय है। चर्चा के दौरान हुए कुछ सूत्र वाक्य यहाँ पेश हैं :
डॉ रजनी गुप्त: Rajni Gupt
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-श्रम और कर्मठता का कोई विकल्प नहीं होता। स्त्री के अंदर आत्मविश्वास आना चाहिए। आत्मनिर्णय का भाव होना चाहिए। स्त्री का आत्मविश्वास बड़ी पूंजी है। सोशल मीडिया ने स्त्री को सशक्त बनाया है। उसको अभिवयक्ति की आजादी दी है। लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि स्त्री कहीं दैहिक आजादी के दुश्चक्र में न पद जाये।
डॉ स्वाति चौधरी :Swati Choudhary
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-औरतें क्या सच में कमजोर होती हैं! -
-समाज में दलित महिलाएं सवर्ण स्त्रियों के मुक़ाबले ज़्यादा स्वतंत्र हैं क्योंकि वे आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर हैं।
- स्त्री की क्षमताओं को कम बताते हुए उनको कमजोर बनाया जाता है जबकि पुरुष को समर्थ बताया जाता है। स्त्रियों को ख़ुद संघर्ष करके अपनी इस कंडीशनिंग से मुक्त होना चाहिए।स्त्री को सफलता -असफलता के डर में पड़े बिना स्वयं निर्णय लेना चाहिए।
कंचन सिंह चौहान: Kanchan Singh Chouhan
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-बराबरी का मौक़ा सबसे जरूरी चीज है। स्त्री और पुरुष द्वारा किए जाने वाले कामों का वर्गीकरण स्त्री की क्षमताओं को सीमित करता है। मानसिक रूप से मुक्ति सबसे जरूरी है। सोशल मीडिया के माध्यम से बनने वाली रील्स में भी स्त्रियों के आपसी संबंध (सास-बहू आदि) वैसे ही दिखाये जाते हैं। इसका कोई बहुत फ़ायदा होता है ऐसा मैं नहीं सोच पाती। स्त्री अस्मिता के लिए सबसे जरूरी है कि जैसा (अच्छा) हम सोचते हैं वैसा कर सकें इसके लिए हमें प्रयास करने चाहिए। -
विवेक मिश्र Vivek Mishra
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-हम महिलाओं के बौद्धिक रूप से बराबर नहीं समझते। उनकी उपलब्धियों को संदेह की नजर से देखते हैं।लड़कों की कंडीशनिंग ऐसी होनी चाहिए कि वे यह समझें कि लड़कियां भी बराबर सक्षम होती हैं।
बाजार भी पितृसत्ता का रूप है। स्त्री को सजग रहना होगा कि कहीं मुक्ति का उत्सव मनाते हुए वो उसके चंगुल में न पड़ जाये। स्त्री कोई निर्णय लेते समय यह ध्यान रखें कि जो निर्णय वे ले रही हैं वह उनका अपना निर्णय है। बाजार के दबाव में लिया निर्णय नहीं है।
विमर्श के बाद फिर एसी वीआईपी लाउंज की ठंडी हवा में चाय-पान हुआ। सबको नीबू की चाय पिलवाई Lalitya Lalit ने। शाम को होने वाले कवि सम्मेलन के लिए आए सूर्यकुमार पांडेय जी को बताया कि अनूप शुक्ल नॉयडा से आए हैं मेले में शिरकत करने। हमने सूचित किया कि इसके लिए NBT ने किराया अभी तक नहीं दिया है।
वीआईपी लाउंज में सत्कार का इंतजाम देख रही बच्चियाँ लखनऊ विश्वविद्यालय में एम. ए. की छात्राएँ हैं । एम. ए. के बाद पीएचडी करेंगी या फिर कोई कंप्टीशन जिससे कि कहीं शिक्षक की नौकरी कर सकें। बच्चियों ने अपने नाम बताये इकरा, बिस्मा और रुशना। इकरा का मतलब मुझे पता था पढ़ना, बिस्मा का मतलब बच्ची ने बताया मुस्कराना। रूशना का मतलब मैंने अपने हिसाब से बताया -रूठ जाना। बच्चियों ने मुस्कराते हुए मुझे बताया कि रूशना का मतलब होता है -सूरज की पहली किरण। हमको लगा हमने मतलब पूछ लिया वरना हम यही समझते रहते कि रूशना मतलब रूठ जाना।
एक बार हमको फिर लगा कि हम अपने अज्ञान और सीमित ज्ञान के चलते दूसरे लोगों और समाज के बारे में धारणायें बनाते रहते हैं। अक्सर ये धारणायें वास्तविकताओं से अलग होती हैं। पूरी जिंदगी हम ग़लत धारणाओं के साथ ही बिता देते हैं।
बाद में कंचन ने बताया कि उनके पैर में फैक्चर हुआ है। प्लास्टर चढ़ना है। देर हो गई। टाइम नहीं मिला। अपनी चोट और इलाज में लापरवाही की सूचना हँसते हुए देने के बाद कंचन न घर आने की जिद करते हुए न आने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी।
के के अस्थाना जी K.k. Asthana भी दोनों बातचीत सत्र में साथ थे। उनका व्यंग्य संग्रह 'फटी जींस का चिंतन' खरीदकर हमने उनके दस्तखत करा लिए किताब में। उन्होंने पूरे ध्यान से वक्तव्य सुनते हुए फ़ोटो भी लिए। फोटो देखकर कोई कह सकता है कि सुनने की बजाय सो रहे हैं अनूप शुक्ल। लेकिन सच यही है कि हम ध्यान से सुन रहे थे।
अलंकार रस्तोगी से मुलाक़ात हुई। चाय समोसा हुआ। अलंकार ने दिल्ली में उनकी किताब ख़रीदने पर चाय पिलाने का बकाया उधार चुकाने का प्रयास किया। लेकिन हमने फुर्ती से उनकी कोशिश को विफल करते हुए चाय,समोसे के 150/- भुगतान कर दिए। डेढ़ सौ रुपए के चक्कर में 'किताब खरीदने पर भी चाय न मिलने का उलाहना देने' का हक गंवाना ठीक नहीं लगा हमें।
घर आकर किताबें किताबें देखते हुए लगा कि ले तो आयें हैं लेकिन इनको पढ़ना भी है। अशोक पांडेय ने 19 दिन में किताब का अनुवाद कर डाला। हम कम से कम उतने दिन में इसे पढ़ लें। देखते हैं क्या होता है।


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