महीनों पहले संगत Ibbar Rabi जी और Anjum Sharma की बातचीत सुनी थी। इब्बार जी का बातचीत करने का अलग, बेतकल्लुफ़ अंदाज़ देखकर उनसे मिलने का मन किया। अंजुम के आख़िरी सवाल -"ऐसा कौन सा काम है जिसे करना चाहते थे, अभी तक कर नहीं पाये और अभी भी करना चाहते हैं" के जबाब में इब्बार जी ने हंगरी के एक बच्चे के बारे में बताया जिसको यह पता चलने पर कि उसके पूर्वज भारत से आए थे, वह बच्चा भारत आकर संस्कृत सीखने का मन बनाता है। हंगरी से भारत की तरफ़ आते हुए जिस भी देश से गुज़रता है वहाँ की भाषा सीखता जाता है। कई देश होते हुए अफ़ग़ानिस्तान पहुंचता है तो उसको किसी देश का जासूस समझकर पकड़ लिया जाता है। तिब्बत भेज दिया जाता है। वह वहाँ की भी भाषा सीख लेता है। उसका व्याकरण तैयार करता है। अंतत: वह भारत पहुंचता है। संस्कृत सीखता है। इब्बार रब्बी जी उस बच्चे की जीवनी लिखना चाहते हैं।
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Tuesday, September 02, 2025
इब्बार रब्बी जी से मुलाक़ात
उस घुमक्कड़ बच्चे के बारे में जानने की इच्छा ने भी इब्बार रब्बी जी से मिलने के लिए उकसाया। उसका नाम बताया उन्होंने -चश्मा द क्रोश (शायद chashma d krosh)
पिछले हफ़्ते इब्बार रब्बी जी से मुलाक़ात हुई। उन्होंने अपने बचपन, काम के दिनों और रचनात्मक जीवन के तमाम किस्से बेतकुल्लुफ़ अंदाज़ में सुनाये। फ़िल्मों के बारे में बहुत बात की। कई फ़िल्मों के बारे में बताया। लेखकों, कवियों से जुड़ी यादें साझा की। देश-दुनिया के बारे में बात करते हुए कौन लोग कहाँ से आकर कहाँ पहुँचे, कहाँ बसे के किस्से रोचक अंदाज़ में बयान किए। बात करते हुए हँसते हुए बात-बात पर ताली बजाते हुए बोलते इब्बार रब्बी जी को सुनना एक प्यारा अनुभव है।
उनके द्वारा जिक्र की गई कुछ फ़िल्मों के नाम जो मुझे याद रह गए वे हैं -"रूसी फ़िल्म स्टाकर, इटालियन फ़िल्म अमर कॉर्ड, स्ट्राडा, इवान द करिवियन, हिंदी फ़िल्में -दुविधा, पहली, साहब बीबी और ग़ुलाम, कागज के फूल।" उन्होंने तार्कोवस्की, कुरुसोवा ब्रेसा की फ़िल्में देखने का सुझाव दिया।
अपने पढ़ाई के दिनों के तमाम किस्से साझा करते हुए उन्होंने बताया कि कैसे किसी सवाल के जवाब में वो दूसरी तमाम जानकारियाँ ठेल देते थे। उनके ही शब्दों में -" पर्चे में सवाल आया था दिल्ली की सल्तनतों के बारे में। हमने साले को दिल्ली की इमारतों की आर्किटेक्चरल इंपोर्टेंस के बारे में पेल दिया। बाद में दिल्ली के सुल्तानों के बारे में भी लिख दिया। जांचने वाले ने भी दया करके पास लायक नम्बर दे दिए होंगे। पास हो गए।"
हमारी लिखाई के बारे में पूछने पर हमने अपनी किताबों के बारे में बताया। पुलिया पर दुनिया, बेबवक़ूफ़ी का सौन्दर्य, घुमक्कड़ी की दिहाड़ी, सूरज की मिस्ड कॉल, कनपुरिया कोलम्बस आदि सुनकर बोले -"किताबों के टाइटल तो मजेदार हैं। लानी चाहिए थी किताबें।"
फ़िल्मों के बारे में बात करते हुए भारतीय फ़िल्मों के बारे में और दुनियावी स्तर पर हिन्दुस्तानी फ़िल्मों के साथ ईनाम के मामले में भेदभाव पर अपनी राय बताते हुए कहा -"लगान फ़िल्म में इंडियन लोग अंग्रेजों से जीतते हुए दिखाये जाते हैं। अंग्रेज़ लोग वहाँ ज्यूरी में होते हैं। कौन साला ऐसी फ़िल्म को अवार्ड देगा। वो 'स्लम डॉग' को देंगे इनाम जिसमे यहाँ की ख़ामियाँ दिखाई गई हैं। गांधी को मिलेगा इनाम क्योंकि वो एक अंग्रेज ने बनाई है।
चौरासी साल के इब्बार रब्बी जी से बात करते हुए कहीं से नहीं लगा कि वे कैंसर जैसी बीमारी से जूझ चुके हैं। अभी भी पूछने पर बताया -"दवा चल रही है।ठीक हो जाएगा।"
देश के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा -"सब अपने को विश्व गुरु बने बताते घूमते हैं। काहे के साले विश्वगुरु। मोबाइल उन्होंने बनाया, जहाज़ वे बनाते, ट्विटर, फेसबुक उनका, नए-नए काम उनके यहाँ होते रहते हैं। हम साले को विश्वगुरु कहते घूमते हैं।"
आजकल के साहित्यकारों में विनोद कुमार शुक्ल के सबसे बड़े प्रशंसक हैं इब्बार रब्बी जी। पुराने जमाने के अपने साथियों मंगलेश डबराल , पंकज बिष्ट और तमाम लोगों से जुड़े कुछ यादें भी साझा की।
अशोक पांडे Ashok Pande का जिक्र करते हुए बताया -"हल्द्वानी वाला अशोक पांडे बहुत अच्छा लिखता है। उसका 'लपूझन्ना' न पढ़ा हो तो पढ़ना।" हमने बताया कि हम अशोक पांडे के बहुत बड़े फैन हैं। इतने कि अगर फेसबुक में केवल एक लिखने वाले को पढ़ने की शर्त हो तो हम अशोक पांडे को पढ़ना चाहेंगे।
उन्होंने अशोक पांडे द्वारा अनुवादित एक किताब का जिक्र किया -"चॉकलेट एंड मार्गरिटा ।" बताया कि अद्भुत किताब है। अशोक पांडे ने इसका अनुवाद बहुत सुंदर अनुवाद किया है। अशोक पांडे द्वारा अनूदित इस किताब के बारे मुझे जानकारी नहीं थी।
बाद में अशोक पांडे ने बताया -"बीस-पचीस साल पहले यह किताब एक लोकल प्रकाशक ने छापी थी। अब सब कॉपियां खत्म हो गयीं। उन्होंने एक किताब कहीं से खोजकर, जुगाड़कर भेजने का वायदा किया है।"
नेट पर किताब का नाम खोजने पर मिला Chocolate Days Margarita Nights किताब इम्पोर्ट करनी होती है या फिर किंडल पर है। हमने नाम नोट कर लिया है। या तो अशोक पांडे भेजेंगे या फिर किंडल पर पढ़ंगे।
अशोक पांडे ने इब्बार रब्बी जी से एक बार नए साल के मौके पर हुई मुलाक़ात का भी जिक्र किया जब दोनों ने साथ बैठकर नए साल के इंतजार में शानदार बैठकी की थी। पुराने जमाने के लोगों का भी जिक्र किया जब लोगों के बीच बेतकल्लुफ़ रिश्ते होते थे, प्यारी दोस्तियाँ होती थीं।
इब्बार रब्बी जी को ज्यादा बोलना मना है लेकिन फिर भी वे लगातार बात करते रहे। कहा भी -"मुझे ज़्यादा बोलना मना है लेकिन क्या करें मुझे बोलने की बीमारी है।"
एक यादगार मुलाक़ात रही इब्बार रब्बी जी से। फिर मुलाकत होगी जल्दी ही।
-इब्बार रब्बी जी की संगत में बातचीत और उनकी कुछ कविताओं, किताबों का लिंक टिप्पणी में।
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