झाँसी में हुए लिट्रेचर फ़ेस्टीवल में Neeraj Badhwar जी ने आज के मीडिया पर अपनी बात रखते हुए कहा था -"आज मीडिया दो भागों में बँट गया है। एक सत्ता समर्थक, दूसरा सत्ता विरोधी।लोग भी इन्ही दो खेमों में बंट गए हैं। वे या तो सरकार के समर्थन में हैं या विरोध में। संतुलित बात कहने, लिखने वाले बहुत कम हैं।"
नीरज बधवार की कही बात याद से लिखी यहाँ। शब्द कुछ अलग हो सकते हैं लेकिन जितना मैं समझा उसका भाव यही था। पाश की कविता "बीच का रास्ता नहीं होता" की तर्ज पर राजनीति ने मीडिया के ज़रिए समाज से बीच के रास्ते पर बुलडोजर चला दिया है।
हालांकि आम जीवन में संतुलित सोच रखने वाले होंगे, शायद बहुतायत में भी हों लेकिन सोशल मीडिया सत्ता समर्थक और सत्ता विरोधी खेमों में बंटा सा है। अधिकतर लोग घोषित समर्थक या विरोधी है। कुछ लोग महीन अंदाज़ में वसीम बरेलवी जी के शेर के हिसाब से काम करते हैं:
उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए।
देखते-देखते साहित्य, विज्ञान, पत्रकारिता, प्रेम, मोहब्बत, आर्थिक मसलों पर लिखने पढ़ने वाले लोग खुलकर राजनीति की खबरों पर अपने-अपने पक्ष के समर्थन में लिखने लगे हैं। कुछ भूतपूर्व प्रतिष्ठित पत्रकारों की भाषा तो इतनी आक्रामक, जहरीली और सस्ती हो जाते है कि विश्वास नहीं होता कि उन लोगों ने कभी देश के नामी संपादकों के साथ काम भी किया होगा, जिनसे उन्होंने पत्रकारिता का ककहरा सीखने की बात लिखी है।
साफ़-साफ़ सत्ता समर्थक और सत्ता विरोधी लिखाई करने वाले लोगों के पाठक भले तमाम होंगे लेकिन टिप्पणियाँ करने वाले उनकी सोच के समर्थक ही होते हैं। उनकी सोच के विपरीत टिप्पणी करने वाले के हाल बेहाल करने में ख़ुद या तो लेखक या उनके समर्थक कोई कसर नहीं छोड़ते। 'मॉब लिचिंग' की 'डिजिटल नुमाइश' देखनी हो तो किसी ऐसी किसी पोस्ट पर विरोधी विचारों वाले की पोस्ट देख लीजिए अंदाज़ लग जाएगा।
इस समर्थन और विरोध के चक्कर में लोगों के सोशल मीडिया पर आपसी संबंध खराब हो गए हैं, उनकी आपस की भाषा आक्रामक हो गई, आपस का हास्य बोध गुम हो गया है। सोशल मीडिया चलाने वाले लोगों की शायद सफलता है यह कि उनके प्लेटफार्म पर चहल-पहल बनी रहती है। उनकी आमदनी इसी सनसनी पूर्ण हलचल से होती है।
भाषा दुनिया का सबसे प्रभावशाली हथियार है। भाषा के ज़रिए नीच से नीच हरकतें करते हुए लोग उसको जायज़ ठहरा सकते हैं। अपनी क्रूरतम कमीनगी को भी अपना बेचारापन बताते हुए ख़ुद निर्दोष साबित कर सकते हैं। राजनीतिक प्रवक्ता अपने दल के लोगों द्वारा हुई किसी चूक को अपनी गलती मानने के बजाय दूसरे दल द्वारा की गई उसी तरह की किसी गलती का हवाला देते हुए कहते हैं -"उन्होंने भी तो की थी यह हरकत। हमारी नीचता उनकी नीचता के मुक़ाबले कम ख़राब है।"
लोग झूठ तो इतनी सफ़ाई बोलते हैं कि सच बेचारा परेशान होकर कहता होगा -"भाई साहब आप ही सही हो। हमारे आपके नाम बदल गए हैं शायद।" आम जनता तो वसीम बरेलवी के शेर के हिसाब से सोचती होगी :
"वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से,
मैं एतबार न करता तो और क्या करता।"
आज स्थिति है कि लोग अपने धर्म समाज के उदात्त मानव मूल्यों की बात करने वाले को बेवकूफ मानते हैं। देश, समाज के लिए अपना जीवन, जान कुर्बान करने वाले लोगों को सुनी-सुनाई बातों के आधार पर इस कदर 'ट्रायल' करते हैं कि अगर वे लोग देखते तो कहते -"शुक्र है खुदा का कि हम आज यह झेलने के लिए ज़िंदा नहीं हैं। जेल, फाँसी तो हमने झेल ली, यह बेबुनियाद 'ट्रोलिंग' झेलना हमारे बस में नहीं है।"
परसाई जी के एक लेख का अंश है :
‘मेरे बाद की और उसके भी बाद की ताजा, ओजस्वी, तरुण पीढ़ी से भी मेरे संबंध हैं। मैं जानता हूं, इनमें से कुछ कॉफी हाउस में बैठकर कॉफी के कप में सिगरेट बुझाते हुए कविता की बात करते हैं। मैं इनसे कहता हूं कि अपने बुजुर्गों की तरह अपनी दुनिया छोटी मत करो। मत भूलो कि इन बुजुर्ग साहित्यकारों में से अनेक ने अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे वर्ष जेल में गुजारे। बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, माखनलाल चतुर्वेदी और दर्जनों ऐसे कवि हैं, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़े। रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और अशफाक उल्ला खां, जो फांसी चढ़े, कवि थे। लेखक को कुछ हद तक एक्टिविस्ट होना चाहिए। सुब्रमण्यम भारती कवि और ‘एक्टिविस्ट’ थे। दूसरी बात यह कि कितने ही अंतर्विरोधों से ग्रस्त है यह विशाल देश, और कोई देश अब अकेले अपनी नियति नहीं तय कर सकता। सब कुछ अंतरराष्ट्रीय हो गया है। ऐसे में देश और दुनिया से जुड़े बिना एक कोने में बैठे कविता और कहानी में ही डूबे रहोगे, तो निकम्मे, घोंचू और बौड़म हो जाओगे।’
यहाँ परसाई जी ने कविता और कहानी की बात कही। आज के समय इसमें राजनीति जोड़कर पढ़ना चाहिए।
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