Monday, September 15, 2025

घनश्याम जी से बातचीत और कविता संग्रह

 


सुबह लैपटॉप खोले देख रहे थे। मैसेंजर पर घनश्याम गुप्ता जी का संदेश दिखा -"जन्मदिवस की शुभकामना।"
Ghanshyam जी फ़िलाडेल्फ़िया, अमेरिका में रहते हैं। नवंबर, 2019 में अपन न्यूजर्सी , अमेरिका में थे। मेरी पोस्ट पढ़कर घनश्याम जी ने संदेश लिखा -"हो सके तो मिलने आओ, अच्छा लगेगा।"
हम चले गए थे। तीन घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद घनश्याम जी से मिलना हुआ। उनकी पत्नी भूलने की बीमारी से ग्रस्त थीं। कमजोर भी हो गईं थीं। कभी गणित की प्रोफ़ेसर रही वंदना जी को छोटी-छोटी बातें याद दिलानी पड़ती थीं। घनश्याम जी के साथ काफ़ी देर रहे थे। खाना खाया। घनश्याम जी ने अपनी कविता भी सुनाई -"जो होना था सो होना ही था।" उनके यहाँ से लौटकर रात में फिलाडेल्फिया के आज़ादी के स्मारक देखे थे।
आज घनश्याम जी का संदेश देखा तो फौरन उनको फ़ोन मिलाया। पुरानी यादें ताजा हुईं। उनको मेरे जन्मदिन की याद है -"आजकल ही कभी पड़ता है जन्मदिन। इसलिए शुभकामनाएं भेज दीं।"
मैंने घनश्याम जी को बताया कि मेरा जन्मदिन कल यानि 16 सितंबर को पड़ता है।
पत्नी के न रहने पर घनश्याम जी अकेले रहते हैं। कभी पास में रहती बेटी के पास भी। बेटा भी अमेरिका में ही है। तबियत नरम-गरम चलती रहती है। गुजारा हो जाता है।
"बचपन और जवानी भारत में गुजारने के बाद जिंदगी का बड़ा हिस्सा अमेरिका में गुजर रहा । कैसा लगता है?" -पूछने पर घनश्याम जी ने बताया -" ठीक लगता है। पुरानी यादें भी हैं, यहाँ की भी। लेकिन इतने अनुभव हो जाने के बाद अब नॉस्टेल्जिया जैसा नहीं लगता लेकिन यादें तो हैं ही। यहाँ हर देश के लोगों को देखता हूँ। भारतीय, चीनी, जापानी, अफ़्रीकी और तमाम देशों के लोगों को। पहले भारत और अब अमेरिका में रहते हुए सोच में थोड़ा व्यापकता आई है। यह सोच शायद उस सोच से अलग है जो तब होती अगर मैं भारत में ही रहता।"
एक जगह रहते हुए इंसान और कई जगह जीवन गुजार चुके इंसान की सोच, नजरिये में अंतर होता है। जीवन के व्यापक नजरिये आमतौर पर इंसान की सोच को विस्तार देते हैं।
जन्मदिन की बात चली तो मैंने घनश्याम जी को बताया कि मैं अपना कविता संग्रह
'अन्धेरे का बड़प्पन' कल तक पूरा करके ऑनलाइन अपलोड कर दूँगा। दो-चार दिन में यह ख़रीद के लिए उपलब्ध भी हो जाएगा। इसमें मेरी अब तक की लिखी लगभग सभी कविताएँ, तुकबंदियाँ शामिल होंगी। कविताओं के प्रूफ पढ़ते हुए लगा कि इनको कविता कहना क्या ठीक होगा? कविता के नाम पर 'कट्टा कानपुरी' का कलाम सुनाना कैसा रहेगा। कौन ख़रीदेगा इसे, कौन पढ़ेगा?
लेकिन फिर मुझे लगा कि कोई ख़रीदे या न ख़रीदे किताब तो आनी चाहिए। आम लोगों को फौरन समझ में आनी बात का ये मतलब थोड़ी कि वे कविता नहीं हैं। फ़िराक़ गोरखपुरी की कही बात में मेरा समर्थन किया -"लिट्रेचर इज ब्रिलरियेंस इलिट्रेसी।" -'आम, अनपढ़ लोगों के समझ में आना वाला साहित्य ही असली साहित्य है।' इस कसौटी पर मेरी कविताएँ तो एकदम ख़री उतरती हैं।
अब जैसे कट्टा कानपुरी का ये शेर देखिए :
शायर बुला रहा है, आओ बेटे शेर इधर,
शेर मचल रहा है, मेरे कम्पट गये किधर।
- कट्टा कानपुरी
अब इसे समझने के लिए किसी सहायक या अनुवाद किए जरूरत पड़ेगी क्या किसी को? नहीं न। तो फिर कैसा संकोच?
Ibbar Rabi जी की कविता 'अमरूद' का एक अंश देखिए :
"अमरूद अमरूद से कुछ कह रहा है ।
एक पिलर-पिलर हो रहा है,
दूसरा जमरूद हो रहा है।
एक समर्पण की खाई में नेस्तनाबूद हो रहा है,
दूसरा फूलकर ताबूत हो रहा है।"
अब इस कविता कठिन और ऊँचा वाला अर्थ तो बड़े लोग बतायेंगे। लेकिन अमरूद अमरूद के कहने और पिलर पिलर होने वाली बात तो हम भी समझ गए। कुछ इसी तरह की कविताएँ हैं मेरे कविता संग्रह में।
बात घनश्याम जी शुरू हुई थी और पहुँच गई कविता संग्रह से। कहाँ से कहाँ पहुँच गए। फिलहाल तो काम करते हैं अपने कविता संग्रह पर जिसमें बहुत ख़राब घराने की कविताओं से लेकर कुछ प्यारे एहसास की कविताएँ भी हैं।
घनश्याम जी से मुलाकात का किस्सा और उनकी कविता इस पोस्ट में पढ़ सकते हैं : https://www.facebook.com/share/v/1CFnjxDsW2/


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