नोयडा रिहाइश के दौरान हम जब भी दिल्ली घूमने का कोई किस्सा पोस्ट करते तो उसे पढ़कर आयुध विहार में रहने वाले हमारे कुछ सीनियर कहते -"कभी आयुध विहार भी आओ।" हम जाने के बारे में सोचते पर नोयडा से दो घंटे की दूरी के चलते सोचते ही रहते। जाना हो नहीं पाता। लेकिन पिछले इतवार को दोस्तों से मिलने की कड़ी में द्वारिका में रहने वाले मित्र योगेन्द्र पाठक से मिले तो पास ही स्थित आयुध विहार भी गए। (क़िस्सा यहाँ पढ़ सकते हैं -https://www.facebook.com/share/v/1CzkUFwNPx/)
हम 36 साल आयुध निर्माणी संगठन में रहे। संगठन का मुख्यालय कोलकाता में है। आयुध विहार , आयुध निर्माणी संगठन के सेवानिवृत्त अधिकारियों का मुख्यालय जैसा है। यहाँ संगठन के कई सेवानिवृत्त अधिकारी रहते हैं।
अपने देश में सरकारी सेवाओं का चरित्र मूलत: राजशाही है। बॉस ख़फ़ा तो चैन दफ़ा। हमारे संगठन में भी कुछ अधिकारी ऐसे हुए जिनसे लोग आतंकित रहते थे। उनको 'मैंन मैनेजमेंट' के नाम पर केवल चिल्लाना, धमकाना जैसे दशकों पुराने तरीकों से ही काम चलाना आता था । मैंने पाया कि ऐसे 'गलेबाज' लोगों में से अधिकांश का पारिवारिक जीवन चौपट रहता है। कुछ लोग इसलिए भी चिल्लाते रहे ताकि उनके ग़लत-सही निर्देश लोग बिना एतराज के पालन करते रहे। ऐसे अधिकांश लोग रिटायरमेंट के बाद अकेले, अलग-थलग होते गए। कोई उनसे बात करना भी पसंद नहीं करता।उनकी भी हिम्मत नहीं होती कि अपने से लोगों से बात कर सकें।
मेरा सौभाग्य रहा कि एकाध अपवाद छोड़कर मेरे सीनियर्स बहुत प्यारे, आत्मीय और ख्याल रखने वाले रहे। अपन बिना किसी लाग-लपेट के, बिना डरे, बिना दबाब के उनसे अपनी बातें रखते रहे। असहमत होने पर बहस करने, लड़नें-झगड़ने की सुविधा भी मिलती रही । कभी यह नहीं लगा कि इससे हमारा कोई नुक़सान होगा। अपने खिलंदड़े स्वभाव के चलते हमारे अधिकांश वरिष्ठ अधिकारियों से हँसी-मजाक के संबंध भी रहे। इसके पीछे मेरा खिलंदड़े स्वभाव से अधिक उन वरिष्ठों का हाथ रहा जो हमारी बेवक़ूफ़ियों को नजरंदाज करते रहे।
ऐसे लोगों से उनके रिटायर होने के बाद भी संपर्क बने रहे। पारिवारिक संबंध रहे। बातचीत होती रही। हमारे रिटायर होने के बाद तो सिलसिला बढ़ गया। टहलते हुए जिसका ध्यान आता, फ़ोन लगाकर बातचीत कर लेते।
सुभाष चंदर Subhash Chander सर के साथ शाहजहांपुर में काफ़ी दिन काम किया हमने। तमाम यादें उनके साथ की हैं। दिल्ली आईआईटी से इंजीनियरिंग करके आयुध निर्माणी संगठन में आए सुभाष सर शाहजहांपुर में मिले थे। फैक्ट्री का लगभग सारा ही काम देखते थे। बहुत मेहनत करते थे। मुझे आज भी ताज्जुब होता है कि कैसे उनको तमाम लंबे-लंबे फ़ोन नम्बर याद रहते थे। बिना डायरी देखे लोगों को फ़ोन मिलाते। पीए को बताते -"इस नंबर पर बात कराओ।"
सुभाष चंदर जी के साथ की कई मजेदार यादे हैं। किसी बात पर नाराज होते तो लगता प्यार कर रहे हैं। हमारे साथ काम करने वाले अधिकारी अजीत कुमार गुप्ता को एक बार किसी बात पर उन्होंने डाँटा तो गुप्ता जी ने उल्टा सर से शिकायत की -"सर इसमें सारा दोष आपका है। आप हमको हड़काते तो हैं नहीं। हमसे इतने प्यार से बातें करते हैं कि हमको डर नहीं लगता। बिना डरे कहीं काम होता है?" सर के पास मुस्कराने के अलावा कोई चारा नहीं था।
एक दिन दोपहर को लंच में घर जाने के पहले मैं एक फ़ाइल लेकर सर के दफ़्तर में चला गया। ऑफ़िस के बाहर लालबत्ती जल रही थी। लेकिन अपन उस समय यह सोचते नहीं थे। हमको लगा कि काम से जरूरी कोई काम थोड़ी होता है।
सर कुछ जरूरी काम कर रहे थे। हमने फ़ाइल उनके आगे रख दी। साहब ने संकोच पूर्वक कहा -"शुक्ला मैंने कुछ जरूरी काम कर रहा हूँ।" इसका मतलब यह था कि बाद में आना अपने काम के लिए। लेकिन मुझे लगा कि हम जो काम लेकर आए हैं उससे जरूरी कोई काम कैसे हो सकता है?
हमने कहा -"सर, आप अपना काम करिए। लेकिन पहले इस पर दस्तखत कर दीजिए।"
सर ने शांत भाव से लेकिन दृढ़ता से फिर कहा -"मैं कुछ जरूरी काम रहा हूँ। इसीलिए मैंने बाहर लाल बत्ती जला रखी है।"
उनके कहने की गंभीरता से मुझे लगा कि लाल बत्ती प्रोटोकाल का उल्लंघन करना शायद ठीक नहीं था। मुझे ऐसा करना नहीं चाहिए। साहब को यह ख़राब भी लगा है। उनकी शिकायत जायज है। लेकिन अब किया क्या जा सकता है।
ऐसे में होना चाहिए था कि हम सॉरी कहकर कमरे से बाहर आ जाते। लेकिन हमारी बेवक़ूफ़ी और हाजिर जबाबी ने ऐसा होने नहीं दिया। हमने कुछ ऐसा कहा -"सर, आप हमारे बॉस हैं। हम आपका सम्मान करते हैं। इसलिए हम तो आपके दफ़्तर में सर झुका के आते हैं। हमें क्या पता ऊपर बत्ती हरी है कि लाल। बत्ती हमारी ऊँचाई से भी ऊपर लगी है। इसीलिए देख नहीं पाये। आगे से देखकर आयेंगे।"
इसके बाद क्या हुआ मुझे याद नहीं। लेकिन यह किस्सा मुझे याद है। साहब को पता नहीं याद था कि नहीं। लेकिन मुलाक़ात होने पर मैंने सुनाया तो उन्होंने मजे लिए।
सुभाष चंदर जी और भाभी जी शाहजहांपुर के 'बेस्ट कपल' कहलाते थे। शाहजहांपुर के बाद कभी साथ-साथ काम नहीं किया लेकिन संपर्क हमेशा बना रहा। साहब मेटल एंड स्टील फैक्ट्री इछापूर और VFJ में वरिष्ठ महाप्रबंधक रहने के बाद आयुध निर्माणी बोर्ड के मेंबर पद से रिटायर हुए ।
सुभाष चंदर सर मेरे आयुध निर्माणी में सेवा के दौरान हमेशा मेरे सहायक रहे। उनका और उनके जैसे ही कुछ और वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग न होता तो शायद मैं आयुध निर्माणी संगठन बहुत पहले स्वैक्छिक सेवानिवृत्त हो जाता या फिर जिस पद पर पहुँच कर रिटायर हुआ वहाँ तक न पहुँचता।
सर के पास मैं शाम को पहुँचा। ढेर सारी बातें हुई, तमाम यादें दोहराई गयीं। मेरे बहुत बार मना करने के बावजूद खूब सारी मिठाई, नमकीन, चाय पिलाई। भाभी जी ने कहा -" आप काफ़ी यंग लग रहे हैं।" हमारे कम किए वजन को तमाम लोग कमजोर हो जाना कहते हैं, भाभी जी ने कहा -"यंग लग रहे हैं।" हमने उनकी बनाई हुई खीर खाते हुए कहा -"आप हमारी वजन कम करने की तपस्या में व्यवधान डाल रही हैं।" लेकिन उन्होंने मेरे अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। सब खाना पड़ा।
सुभाष चंदर सर से मिलने के बाद पास ही रहने वाले Surender Kumar सुरेंद्र कुमार सर से मिलने गए।सुभाष सर उनके ब्लॉक तक छोड़ने गए। सुरेंद्र कुमार सर हमारे ओएफ़सी में बॉस थे। मुझे याद है वे सेल फोर्ज सेक्शन का राउंड करके आने के बाद कुर्सी के पर बैठ जाते। उनके घुटने दर्द करते थे। देर तक हल्के-फुलके अंदाज़ में बातें होती। दोस्ताना लहजे में। उनके चंडीगढ़ फैक्ट्री के महाप्रबंधक बन कर जाते समय विदाई भाषण में अपनी कही एक बात मुझे याद आती है -"साहब मेरे बॉस रहे। बॉस से तमाम शिकायतें होती हैं। लेकिन मेरी एक शिकायत यह है कि साहब के साथ की मेरी ऐसी कोई याद नहीं है जिसको मैं शिकायत के रूप में याद कर सकूँ।"
चंडीगढ़ फैक्ट्री में साहब के जीएम रहते हुए हम मनाली घूमने गए थे तो चण्डीगढ़ में हमारे रहने का इंतजाम किया था साहब ने। बाद में भंडारा के वरिष्ठ महाप्रबंधक और फिर आयुध निर्माणी बोर्ड के सदस्य पद से रिटायर हुए ।
रिटायर होने के बाद साहब का कानपुर आना-जाना होता रहा। संपर्क, बातचीत बना रहा। दिल्ली से संबंधित कोई भी पोस्ट लिखता तो सबसे पहले सुरेंद्र कुमार सर की याद आती कि साहब कहेंगे -"तुम दिल्ली घूमते रहते हो आयुध विहार नहीं आते।"
यह मेरा सौभाग्य है कि मेरे जीवन में ऐसे कई वरिष्ठ , साथी और जूनियर अधिकारी हैं जो उनके शहर में पहुँचने पर मुलाक़ात न होने पर उलाहना देने और हड़काने का काम बेतकुल्लफ़ी से करते हैं। कल रात ही कानपुर में मेरे बॉस रहे आर एस सोढी जी का फ़ोन आया। उन्होंने तो हाल-चाल पूछा लेकिन भाभी जी ने हड़काया -"हमको पता चला है कि आप दिल्ली में अपने दोस्तों से मिलने आये थे लेकिन हमसे बिना मिले चले गए। हमको सब ख़बर रहती है। " हमने सुकून महसूस किया कि उनको आयुध विहार जाने की ख़बर उनके सूत्रों से नहीं पता चली थी वरना हड़काई और तेज होती। हालांकि हमने बता दिया और जल्दी ही दिल्ली में आकर मिलने का वायदा किया। फौरन ही पता भी मिल गया।
सुरेंद्र कुमार सर के एक बार कानपुर आने की रोचक याद है। दिल्ली से कानपुर शाम को आने वाली ट्रेन लेट होती गई। ट्रेन अगले दिन आई। हम साहब का और भाभी जी का इंतजार करते रहे। वे फ़ोन पर लौट जाने को कहते रहे। लेकिन हम यह कहकर स्टेशन पर ही जमे रहे कि आप कोहरे में कैसे आयेंगे? आख़िर में ट्रेन आई और हम उनको लेकर ही लौटे।
साहब ने पिछले साल अपने दोनों घुटने बदलवाये हैं। यह सुनकर मुझे बीस साल पहले के उनके दर्द का एहसास हुआ। दोनों घुटने सही सलामत काम कर रहे हैं। साहब के साथ तमाम यादें ताजा हुईं। कितना कुछ खा चुके हैं का हिसाब देने के बावजूद घर के बनाए लड्डू, नमकीन और चाय लेनी ही पड़ी। मजबूरी थी । साहब का डायलॉग -"ये तो तुमको लेना ही पड़ेगा" सुनकर लगा कि बॉस लोग अपना अधिकार भाव कभी नहीं छोड़ते। नौकरी में रहते हुए तो कई दूसरे चैनल होते हैं जहाँ से रियायत पायी जा सकती है। लेकिन रिटायर होने के बाद तो वे ही सर्वेसर्वा हो जाते हैं। बड़प्पन और अपनापे की अतिरिक्त अथॉरिटी मिल जाती है उनको।
ऐसी अथॉरिटी के सामने बाइबल का पहला सूत्र वाक्य (जो कि मुझे वीएफजे में काम करते हुए महाप्रबंधक सचिवालय में काम करने वाली जीजी ने बताया था) ही याद आता है -"सबमिट टु अथॉरिटी।" (सत्ता के सामने समर्पण करो)
सुरेंद्र कुमार साहब के यहाँ से बगल वाले ब्लॉक में रहने वाले राजेश कुमार साहब से मिलने गए। राजेश कुमार सर से हमारा बोलांगीर फैक्ट्री से (1989-1992) परिचय रहा। इंदिरा गांधी ने इस फैक्ट्री का उद्घाटन करने के बाद ही अपना अंतिम सार्वजनिक भाषण दिया था। राजेश कुमार जी ने फैक्ट्री को प्रोजेक्ट स्टेट से फैक्ट्री बनने तक वहाँ काम किया। जंगल में, शेड में रहते, काम करते हुए फैक्ट्री स्थापित की। आज तो वहाँ स्टेशन है, बोलांगीर से बडमल सड़क पुल है। लेकिन मुझे आज भी आयुध निर्माणी के तत्कालीन महानिदेशक की वह तस्वीर याद है जिसमें आयुध निर्माणी संगठन के तत्कालीन महानिदेशक बोलांगीर और बड़मल के बीच पड़ने वाली नदी को पार करने के लिए अपना पैंट उतारकर तौलिया लपेटे हुए नदी के पानी में मँझाते हुए आ रहे हैं। उनकी पैंट साथ में चलते हुए कोई आदमी अपने हाथ में हैंगर की तरह लटकाये हुए है।
राजेश कुमार जी जहाँ रहे वहाँ उनकी मेहनत, कर्मठता के किस्से लोग सुनाते रहे। फिर चाहे वो बोलांगीर फैक्ट्री रही हो, दिल्ली के रक्षाविभाग में हो, किरकी फ़ैक्ट्री में या फिर रिटायर होने से पहले चांदा फैक्ट्री से वरिष्ठ महाप्रबंधक रहे हैं , हर जगह उनके काम, मेहनत, अच्छे व्यवहार और ईमानदारी की चर्चा होती रही। वो बहुत अच्छे, बहुत उत्साही संचालक भी रहे हैं। मेरे ज़ेहन में उनकी एक तस्वीर है जिसमें वे बोलांगीर फैक्ट्री में एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं का संचालन करते हुए प्रतिभागियों का हौसला बढ़ा रहे हैं।
राजेश कुमार साहब से मिलने पर वही खाने-पीने का का आग्रह हुआ। हमने बताया कि हम इत्ता-इत्ता खाकर आए हैं लेकिन उसे माना नहीं गया। खाना लग गया था। हमने मना किया तो उन्होंने कहा -"रख दो हम बाद में खाएँगे।" अब इतने दिन बाद मुलाक़ात के बाद कोई सीनियर जिसके प्रति मन में बहुत सम्मान हो हमारे कारण भूखा रह जाये यह ठीक नहीं लगता। हमने साथ में खाना खाया। साहब ने स्टेशन छोड़ने के लिए कहा । हमने बताया कि इसी ब्लॉक में रहने वाले लोडवाल सर से भी मिल लेते हैं।
राजेश कुमार सर से विदा लेकर हम नीचे रजनीश लोडवाल Rajnish Lodwal सर के यहाँ पहुँच। बाहर तमाम जूते-चप्पल रखें थे। हमें लगा शायद कोई कीर्तन -भजन हो रहा है। लेकिन अंदर गए तो पता चला कि उस दिन मैडम का जन्मदिन था। जन्मदिन पार्टी चल रही थी। केक, मिठाई खाई। 'कुछ लेते होते तो उसका भी इंतजाम' था।
रजनीश लोडवाल सर ने वीएफजे में बहुत दिन काम किया। फिर चाँदा में वरिष्ठ महाप्रबंधक रहने के बाद आयुध निर्माणी संगठन से मेंबर पद से रिटायर हुए। हमने उनके साथ तब काम किया जब मैं आयुध निर्माणी , शाहजहांपुर में महाप्रबंधक था और साहब ओईएफ मुख्यालय में हमारे बॉस थे। कोरोना काल में लगभग सारी मीटिंग्स ऑनलाइन ही होती रहीं। उनके कामकाज में मेहनत और अच्छे साथियों के साथ दोस्ताना व्यवहार के अलावा उनका अपने कर्मचारियों के साथ मानवीय व्यवहार सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाला है। जब मैं कानपुर में आया तो मुख्यालय के ठेके पर काम करने वाले (कांट्रैक्ट पर काम करने वाले) कर्मचारियों ने बताया -"जब तक लोडवाल सर यहाँ रहें, हमको पूरे पैसे मिलते रहे।" ऐसा मानवीय नजरिया कम लोगों का रहता है।
रजनीश लोडवाल सर के यहाँ उनके भाई साहब और घर के अन्य लोगों से भी मुलाक़ात हुई। मैडम को जन्मदिन की सूखी बधाई दी। लेकिन खाने को खूब मिला।
बातचीत करते हुए रात के दस बज गए थे। हमने विदा माँगी तो रजनीश सर हमको ख़ुद छोड़ने आए मेट्रो स्टेशन तक। हमने अपने आप चले जाने जाने की ज़िद की लेकिन उसको 'ओवररूल' करके वे द्वारिका मेट्रो स्टेशन तक छोड़ने आए। उस दिन जिससे भी मिला सबने या तो जबरदस्ती अगले गंतव्य तक छोड़ा या फ़िर ' रिले रेस के बैटन की तरह' हमें अगले को सौंप दिया। स्टेशन रात के साढ़े दस बजे पहुंचे। अपने से आते तो शायद मेट्रो छूट जाती। द्वारिका मेट्रो से से डेढ़ घंटे की दूरी है नोयडा सिटी सेंटर। स्टेशन पहुंचने के पहले बेटे का फ़ोन आया -"मैं आपको लेने स्टेशन आ रहा हूँ।"
हमने बहुत मना किया कि मैं आ जाऊँगा, तुम मत आओ। लेकिन वह माना नहीं।हमारे स्टेशन पहुँचने के पहले गाड़ी लेकर पहुंच गया था। घर पहुंचते हुए घड़ी में दिन बदल चुका था।
संयोग ऐसा रहा कि उस दिन हमारी कोई बात न हमारे सीनियर्स ने मानी न हमारे बेटे ने। सबके 'अपनापे की तानाशाही' हम पर हावी रही । हम इस मामले में अपने को खुशनसीब मानते हैं कि ऐसे कई 'अपनापा और ख्याल रखने वाले तानाशाह' से हम जुड़े हुए हैं। हम अपनी खुशनसीबी पर प्रसन्न हैं । सबके भाग्य में ऐसे सुख कहाँ होते हैं।
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